प्रासंगिक

1987 के मेरठ दंगों ने बाबरी विवाद की पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी

प्रासंगिक: यह वास्तव में एक त्रासदी है कि जिन लोगों के पास यह सुनिश्चित करने की क्षमता थी कि भारत सांप्रदायिकता के बवंडर में न फंस जाए, उनमें से कोई भी मेरठ हिंसा के असली रूप को पहचान नहीं पाया.

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हाशिमपुरा, 1987. (फोटो: प्रवीन जैन)

हाल ही में जब सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवाणी तथा अन्य पर आपराधिक षड्यंत्र का मुकदमा फिर से चलाने की तजवीज़ दी, तब यह ख्याल हर किसी के जेहन से टकराया कि यह बाबरी विध्वंस की 25वीं वर्षगांठ का साल है.

यह भी कहा गया कि 6 दिसंबर के नजदीक आने के साथ-साथ दशकों पुराने इस संघर्ष से उभरने वाला कोलाहल और तेज होता जाएगा क्योंकि प्रतिद्वंद्वी समूह इस सालगिरह को एक दूसरे से विपरीत अंदाज में मनाने की योजना बना रहे हैं.

उम्मीद की जा रही है कि संघ परिवार और उससे संबद्ध संगठन इस अवसर का जश्न मनाएंगे, जैसा कि वे कम से कम पिछली चौथाई सदी से कर रहे हैं.

खासतौर पर यह देखते हुए कि उनकी पार्टी केंद्र और राज्य, दोनों जगहों पर सरकार में है. लेकिन मुस्लिमों के लिए, चाहे वे बाबरी राजनीति के सहारे आगे बढ़ने वाले राजनेता हों, या सामान्य नागरिक, यह दिन काले दिन- एक शोक और स्मरण के दिन के तौर पर मनाया जाएगा.

सोलहवीं सदी के इबादत स्थल पर चल रहा विवाद कम से कम 164 वर्ष पुराना है. यह विवाद 1853 से चला आ रहा है, जब हिंदू पुजारियों और मुस्लिम मौलवियों के समूह के बीच इस मुद्दे को लेकर पहली बार टकराव हुआ था.

इसके बाद उपनिवेशी शासन के दौर में कई प्रकरणों ने इस विवादित स्थल की राजनीति को बदला. लेकिन इनमें से कोई भी प्रकरण आजादी के बाद इस स्थल से जुड़ी पहली बड़ी घटना- दिसंबर, 1949 में गुपचुप तरीके से मस्जिद के भीतर राम लला की मूर्ति की स्थापना- से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं था.

चूंकि इसके बाद इबादत स्थल को जनता के लिए बंद कर दिया गया, इसलिए यह विवाद अपने छोटे भौगोलिक दायरे में सिमटा रहा. 1986 की फरवरी तक मंदिर नगरी अयोध्या से बाहर इस मामले की कोई धमक नहीं सुनाई दी.

फरवरी, 1986 में एक स्थानीय अदालत के हिंदू श्रद्धालुओं के लिए मस्जिद का फाटक खोलने के फैसले ने सांप्रदायिकता के ज्वार के लिए रास्ता तैयार कर दिया. यह अनसुलझा संघर्ष साधारण किस्म का न होकर हकीकत में भाजपा की सत्ता तक की यात्रा के पीछे की सबसे अहम वजह है.

बाबरी मस्जिद को ढहाकर राम मंदिर का निर्माण करने का आंदोलन कभी भी एक-आयामी नहीं था. न यह उस तरह शुरू ही हुआ था जिस तरह आजकल आंदोलन शुरू होते हैं. इसके आखिरी अंजाम का अभी भी इंतजार है.

आधुनिक समय में हुई सारी घटनाएं, जिसमें 1853 के टकराव को भी शामिल किया जा सकता है, अलग-अलग महत्व वाली घटनाओं की एक श्रृंखला के बाद हुईं.

अयोध्या के इतिहास में इन सारे अध्यायों को भारत को हमेशा के लिए बदल कर रख देने वाली घटनाओं की श्रृंखला के बीच अलग-अलग प्रकरणों और इतिहास को विभाजित करने वाली रेखाओं के तौर पर याद रखे जाने की जरूरत है.

उदाहरण के लिए अगर ताला खोलने के मजिस्ट्रेट के आदेश को न्यायपालिका और हिंदू बहुसंख्यकवाद की सांठ-गांठ के तौर पर दर्ज किया जाना चाहिए, तो इसे उस अवसर के तौर पर भी याद रखा जाना चाहिए जब राजीव गांधी ने दोनों तरह की सांप्रदायिकता के सामने घुटने टेक दिये.

इसी तरह से 1987 की गर्मियों की शुरुआत में मेरठ में एक के बाद एक हुए सांप्रदायिक बलवे की घटना को भी उस वक्त के तौर पर दर्ज किया जाना चाहिए जब जन्मभूमि का जिन्न बोतल से बाहर निकल आया.

तीस सालों के बाद जब मैं मुड़कर उन दंगों को देखता हूं, पत्रकार के तौर पर हम में से कई युवा जिसके गवाह रहे, तो संदर्भ बदला हुआ दिखता है. अब हाशिमपुरा और मलियाना से निकलने वाले अर्थ हमारे तब के निष्कर्षों से कहीं आगे चले जाते हैं.

यहां तक कि 2017 में 1987 के अप्रैल के मध्य से तीन महीने तक चलने वाले दंगों को देखने का तरीका मार्च, 2015 में इन्हें देखने के तरीके से एकदम अलग है, जब दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट ने पुलिस हिरासत में न्यायेत्तर हत्याओं (एक्स्ट्रा जूडिशियल किलिंग) के सबसे निंदनीय प्रकरण के सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया था.

अप्रैल-जून, 1987 के दौरान मेरठ में हुए सांप्रदायिक बलवे जिसमें मुस्लिमों को निशाना बनाने में राज्य की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही, अयोध्या विवाद पर परस्पर विरोधी दावों के कारण होने वाले पहले बड़े दंगे थे. जो विवाद धीमी आंच पर पक रहा था, उसमें उबाल आ गया, जो फिर कभी शांत नहीं हुआ.

बाबरी मस्जिद का ताला खोलने के बाद देश के कई हिस्सों में खासकर उत्तरी भारत में लपटें उठीं, लेकिन इन सबमें मेरठ दंगों का अपना खास महत्व है.

इन दंगों के साथ अयोध्या विवाद देश के सांप्रदायिक संघर्षों के केंद्रीय मुद्दे के तौर पर उभरा. हम कह सकते हैं कि 1987 के मेरठ के दंगों के साथ देश के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल देने वाला अयोध्या विवाद नये युग में दाखिल हो गया.

1987 की गर्मियों तक यह विवाद मंदिर-मस्जिद संघर्ष तक सीमित था. लेकिन, इसके बाद इसने एक राष्ट्रीय और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य ग्रहण कर लिया और इसने आक्रामक हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलन के उभार का शुरुआती संकेत दिया.

लेकिन, सेकुलर ताकतों की अयोग्यता के कारण लोग इसके सही रूप को नहीं देख पाये और बदकिस्मती से इन दंगों पर भी सबकी प्रतिक्रिया दूसरे दंगों पर होनेवाली रटी-रटायी, रूटीन प्रतिक्रियाओं से अलग नहीं रही.

मेरठ में खूनी दंगों का इतिहास आजादी से पहले से ही शुरू होता है. आजादी के बाद भी यह शहर 1961, 1968, 1973 और 1982 में ऐसे रक्तरंजित अध्यायों का गवाह रहा.

इनमें से अधिकतर दंगों की वजह अक्सर और सामान्य तौर पर बेहद मामूली थे. हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच गहरा जमा आपसी पूर्वाग्रह बार-बार दोहराये जानेवाले इन हिंसक अध्यायों की मूल वजह था.

लेकिन, 1987 का दंगा, अब तक के दंगों से अलग था. इसके पीछे अयोध्या की घटनाओं का हाथ था. सैयद शहाबुद्दीन ने 30 मार्च को दिल्ली में रैली बुलायी थी.

इस रैली से लौटकर जब हजारों मुस्लिम मेरठ सहित अपने घरों को लौटे तो समुदाय के भीतर उनका स्वागत किया गया मगर उन्हें देख कर हिंदुओं की त्योरियां चढ़ गयीं. मुस्लिमों द्वारा लगाए गये हर काले झंडे के जवाब में विश्व हिंदू परिषद के पास भगवा झंडा था.

नुक्कड़ सभाएं और भड़काऊ नारे आम बात हो गये. राज्य के इंटेलीजेंस ब्यूरो ने चेतावनी दी थी कि एक दूसरे को भड़काने वाली घटनाएं ‘संवेदनशील जिलों में सांप्रदायिक हिंसा को जन्म दे सकती हैं’.

मुस्लिमों पर हिंदुओं के क्रोध का कारण यह था कि वे इबादत स्थल का ताला खोलने के फैसले का विरोध कर रहे थे. मुस्लिमों की नाराजगी मजिस्ट्रेट के निर्देश और युद्धप्रिय हिंदुओं द्वारा जश्न मनाने के कारण थी.

युद्धोन्माद सिर्फ हिंदुओं तक ही सीमित नहीं था. नए नेतृत्व की शह पर जो हर सीमा लांघने को तैयार था और समुदाय का नुमाइंदा बन कर उभरने के लिए बेचैन था, यह मुस्लिमों में भी व्याप्त हो गया था. राज्य के इंटेलीजेंस ब्यूरो ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी थी:

‘‘इस सवाल पर (अयोध्या मुद्दे) पर मुस्लिमों में उग्रवादी प्रवृत्ति बढ़ रही है. हिंदू भी किसी भी मायने में कम आक्रामक नहीं हैं. शायद वे मुस्लिमों से भी एक कदम आगे हैं. अगर मुस्लिम यह नारा लगाते हैं कि ‘हम मुसलमान 30 करोड़ हैं, हम तुम्हारा खून निकाल देंगे’, तो जवाब में हिंदू चिल्लाते हैं, ‘हिंदू और सिख भाई हैं, ये मुस्लिम समुदाय कहां से आ गया?’ और ‘अगर भारत में रहना है, तो हिंदू की तरह रहना होगा’. मेरठ शहर की दीवारें इन नारों से पट गयी हैं.’’

वास्तव में शहाबुद्दीन के मुस्लिमों से गणतंत्र दिवस समारोहों का बहिष्कार करने और अयोध्या के लिए ‘लांग मार्च’ के लिए तैयार रहने के आह्वान के कारण उस साल की शुरुआत ही विवादों से हुई.

हालांकि, कई लोग बाबरी मस्जिद के ताले को खोलने को लेकर उनके गुस्से को साझा करते थे, लेकिन कांग्रेस विरोधी सेकुलर राजनीतिक दलों से उन्हें बहुत कम समर्थन मिला. परिणामस्वरूप भाजपा ने भी अपने तेवर कड़े कर दिये.

महज कुछ महीने पहले पार्टी के अध्यक्ष चुने गए आडवाणी ने शहाबुद्दीन को ‘देशद्रोही’ करार दिया- यह शायद पहली दफा था जब किसी राजनीतिक विरोधी पर इस तरह का आरोप लगाया गया था.

उन्होंने घोषणा की कि अयोध्या तक मार्च करने का विचार ‘देश को हिंसा की धमकी से डराने का एक निर्लज्ज प्रयास है’. विहिप ने ‘देश के ऊपर धर्म को रखने’ के लिए मुस्लिमों की तीखी आलोचना की.

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(फाइल फोटो: पीटीआई)

शहाबुद्दीन के कार्यक्रम से उपजे विवाद के बीच में आडवाणी ने एक ऐतिहासिक बयान दिया. इसमें संघ परिवार की भविष्य की दलीलों का सूत्र छिपा था.

हालांकि, भाजपा के विरोधी उस समय यह समझने में नाकाम रहे कि अयोध्या में राम मंदिर के लिए अंदोलन महज एक एक पर्दा था और उनका एजेंडा कहीं ज्यादा डरावना था!

आडवाणी ने कहा कि यह विवाद, ‘सिर्फ कानूनी मसला नहीं है, न ही यह सिर्फ इतिहास की सवाल है. यह दर हकीकत एक देश की अस्मिता का सवाल है. सवाल है कि यह देश किसके साथ अपनी अस्मिता को जोड़ेगा; राम के साथ या बाबर के साथ?’

उन्होंने दावा किया कि ताला खोलने को लेकर मुस्लिमों का विरोध यह दिखाता है कि जहां हिंदू अपनी अस्मिता को भगवान राम के साथ जोड़ते हैं और उनकी जन्मभूमि को ‘मुक्त’ कराना चाहते हैं, वहीं मुस्लिम उनकी भावनाओं का सम्मान करने की जगह बाबर को अपना आइकॉन मानते हैं.

उन्होंने कहा कि भाजपा, ‘इस भ्रष्ट और अलगाववादी रवैये को खारिज करती है और यह विश्वास करती है कि सभी देशभक्त, चाहे वे हिंदू हों या मुस्लिम राम के अलावा किसी के साथ अपनी अस्मिता नहीं जोड़ सकते हैं और बाबर को एक हमलावर के तौर पर देखते हैं, जो वह था.’

तब से लेकर अब तक यह दलील अनगिनत बार दोहरायी जा चुकी है. लेकिन, 1987 में किसी के पास इतनी क्षमता नहीं थी कि वह राम मंदिर आंदोलन के पीछे की असली मंशा को भांप सके.

1987 में मेरठ में हुए दंगे शहर मे या देश के दूसरे हिस्सों में हुए दंगों की तुलना में कहीं ज्यादा गंभीर थे. मेरठ में हुए दंगों को इस तथ्य ने और भी बदतर बना दिया कि इस बार मेरठ ने अमेरिकी राजनीतिशास्त्री पॉल ब्रास के शब्दों में दंगा उत्पादन का एक संस्थागत तंत्र (इंस्टीट्यूशनलाइज्ड सिस्टम ऑफ़ रॉयट प्रोडक्शन या आईआरएस) विकसित कर लिया था.

लेकिन अतीत के उदाहरणों से अलग, जब दो समुदायों के दो व्यक्तियों के बीच के झगड़े या म्युनिसिपल जमीन से जुड़े छोटे मुद्दे और इनके परंपरागत उपयोग को लेकर परस्पर विरोधी दावे हिंसक सामाजिक संघर्ष का रूप ले लेते थे, इस बार के दंगों का बीज एक ऐसे संघर्ष में छिपा था जो जल्द ही महाकाव्यात्मक रूप ग्रहण कर लेनेवाला था.

यह वास्तव में एक त्रासदी है कि जिन लोगों के पास यह सुनिश्चित करने की क्षमता थी कि भारत सांप्रदायिकता के बवंडर में न फंस जाये, उनमें से कोई भी मेरठ हिंसा के असली रूप को पहचानने में कामयाब नहीं रहा.

(नीलांजन मुखोपाध्याय लेखक व पत्रकार हैं. वे नरेंद्र मोदी : द मैन, द टाइम्स और सिख्स: द अनटोल्ड एगोनी ऑफ़ 1984 किताबों के लेखक हैं.)

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