राजनीति

राजस्थान: क्या वोटरों ने ‘मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी ख़ैर नहीं’ के नारे को दोहराया है?

महज़ पांच महीने पहले राजस्थान की सत्ता पर काबिज हुई कांग्रेस लोकसभा चुनाव में प्रदेश की एक भी सीट नहीं जीत पाई है.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

अब तमाम विश्लेषण होंगे, हार की समीक्षाएं होंगी और ‘कहां कमी रह गई’ जैसे सनातन बयान होंगे, लेकिन सच यही है कि भारतीय जनता पार्टी ने राजस्थान में एक बार फिर सारे समीकरणों को धता बताते हुए 2014 से भी बड़ी जीत दर्ज की है.

महज पांच महीने पहले प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुई कांग्रेस पिछली बार की तरह एक भी सीट नहीं जीत पाई है. बीजेपी के राष्ट्रवाद के नारे को प्रदेश के 4.86 करोड़ मतदाताओं ने पूरी तरह से स्वीकार किया और राजस्थान की जाति आधारित राजनीति में सभी रिकॉर्ड तोड़ते हुए भारतीय जनता पार्टी को सभी 25 सीटें दे दीं.

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि बीजेपी ने एंटी इन्कम्बेंसी के चलते इस बार अपने नौ सांसदों के टिकट काटे और नए लोगों पर भरोसा जताया था. इसके बावजूद बीजेपी को मोदी के नाम ने सभी जगहों पर पिछली बार से ज्यादा वोटों से जीत दिलाई है.

कांग्रेस को प्रदेश में सत्ता में होने का इतना ही फायदा हो सका कि उसका वोट शेयर 2014 की तुलना में 1.65 प्रतिशत बढ़ गया, लेकिन सीटों में वह कोई इज़ाफा नहीं कर पाई.

कांग्रेस 2018 में अलवर और अजमेर लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनावों में जीतने और उसके बाद विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उत्साहित जरूर थी, लेकिन इतनी बड़ी हार का अंदाजा शायद पार्टी को नहीं था.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने हार स्वीकार की और नरेंद्र मोदी एवं बीजेपी को जीत की बधाई दी है. गुरुवार शाम को ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट हार के कारणों को बताने के लिए दिल्ली रवाना हो गए.

प्रदेश में बीजेपी 24 सीट और एक नागौर सीट पर भाजपा से गठबंधन कर चुके राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल के हनुमान बेनीवाल जीते हैं.

2014 की तुलना में बीजेपी ने 3.94 प्रतिशत ज्यादा वोट लिए हैं. वहीं, उम्मीदवारों की जीत का अंतर भी पिछले चुनावों से कहीं ज्यादा है.

2014 में बीजेपी को राज्य में 1,58,68,126 वोट मिले थे और इस बार 1,89,687,392 वोट मिले हैं. हालांकि कांग्रेस का वोट भी 2014 की तुलना में 1.65 प्रतिशत बढ़ा है लेकिन इससे सीटों पर कोई असर नहीं पड़ा है.

2014 में कांग्रेस पार्टी को 94,84,094 वोट मिले थे और इस बार 1,11,07,910 वोट मिले हैं. अन्य दलों को 4.81 प्रतिशत यानी 15,59,796 वोट मिले हैं. वहीं, नोटा को 1.01 प्रतिशत (3,27,559) लोगों ने चुना. 2014 की तुलना में नोटा वोटों की संख्या में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है. तब नोटा वोट प्रतिशत 1.12 प्रतिशत यानी (3,27,911) था.

राजस्थान में सबसे ज्यादा वोटों से भीलवाड़ा लोकसभा सीट से बीजेपी के सुभाष चन्द्र बहेड़िया (6,12,000) जीते हैं और जीत का सबसे कम अंतर दौसा लोकसभा सीट (78,444) जसकौर मीणा का है. हालांकि 2014 की तुलना में यह अंतर 33,040 वोट ज्यादा है.

विधानसभा चुनावों में भीलवाड़ा में कांग्रेस ने सात में से 2 सीट पर ही जीत दर्ज की थी. वहीं, दौसा की 5 में से 4 सीटों पर कांग्रेस और एक पर निर्दलीय उम्मीदवार ने चुनाव जीता था.

इतना ही नहीं कांग्रेस की नाक का सवाल बनीं कुछ सीटों पर भी उसकी बुरी तरह हार हुई है. जोधपुर से प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत बीजेपी के गजेंद्र सिंह शेखावत से 2,74,440 वोट से हारे हैं.

जयपुर ग्रामीण में जाट बनाम राजपूत की लड़ाई में फायदा देख रही कांग्रेस की कृष्णा पूनिया को बीजेपी सरकार में मंत्री रहे राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के हाथों 3,89,403 से शिकस्त झेलनी पड़ी है. 2014 में राठौड़ ने कांग्रेस के सीपी जोशी को 3,32,896 वोट से हराया था.

राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ का चुनाव परिणामों को लेकर कहना है, ‘तीन तरह के वोटर थे. पहले, बीजेपी के आक्रामक सपोर्टर, दूसरे कांग्रेसी और तीसरे कन्फ्यूज्ड वोटर थे. पहले और तीसरे वोटर ने पूरी तरह से बीजेपी को वोट किया है. अब कांग्रेस को सोचना चाहिए कि उसके टिकट बंटवारे में कहां कमी रह जाती है.’

चुनाव परिणामों में कांग्रेस की विधानसभा चुनावों में जीती हुई सीटों पर भी भाजपा का ही दबदबा रहा है. इस तरह देखा जा सकता है कि प्रदेश के वोटरों ने ‘मोदी तुझसे बैर नहीं’ के नारे को हकीकत में बदला है.

राजस्थान के चुनावी परिदृश्य से लगभग गायब रही प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता वसुंधरा राजे सिंधिया ने परिणामों पर ट्वीट कर कहा, ‘भाजपा पर अपना अटूट विश्वास कायम रखकर ‘मिशन 25’ के हमारे लक्ष्य को साकार करने के लिए राजस्थान के सभी मतदाताओं का हृदय से आभार. साथ ही बीजेपी के सभी विजयी प्रत्याशियों को जीत की अनंत शुभकामनाएं.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)