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योगी सरकार बोली, आदित्यनाथ पर नहीं चलेगा मुक़दमा

गोरखपुर में 2007 में हुए दंगों के मामले में योगी पर भीड़ को उकसाने का आरोप है. कोर्ट ने तलब किया तो मुख्य सचिव बोले, मुक़दमा चलाने की इजाज़त नहीं दी है.

योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश (फोटो: पीटीआई)

योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश (फोटो: पीटीआई)

उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में बताया है कि गोरखपुर में 2007 में हुए दंगों के मामले में उसने वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है.

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा था कि योगी आदित्यनाथ पर मुक़दमा चलाने की अनुमति देने में देर क्यों की जा रही है? इसके जवाब में यूपी सरकार की ओर से कहा गया है कि उसने मुक़दमा चलाने की अनुमति देने से मना कर दिया है.

इससे पहले की सुनवाई में हाईकोर्ट ने सख़्त रुख़ अख़्तियार करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई थी और मुख्य सचिव को तलब किया था. कोर्ट ने मामले की सीआईडी जांच के बाद मुक़दमा चलाने को लेकर आदेश देने में अनावश्यक विलंब को लेकर सरकार पर तल्ख़ टिप्पणी की थी.

उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव ने 11 मई को कोर्ट में बताया कि हमने तीन तारीख़ को ही इस पर कह दिया था कि मुक़दमा चलाने की अनुमति नहीं देंगे. दूसरे, मुख्य सचिव ने कहा कि 2014 में फोरेंसिक जांच में यह कहा गया था कि जो वीडियो सबूत के तौर पर पेश किया गया है, उसके साथ छेड़छाड़ हुई है. कोर्ट ने पूछा कि तो इस बात को कोर्ट में क्यों नहीं बताया गया?

2007 में गोरखपुर और आसपास के इलाक़ो में दंगे हुए थे. योगी आदित्यनाथ पर इसमें शामिल होने और लोगों को भड़काने का आरोप है. यह मामला फ़िलहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट में है. 27 जनवरी को हुए इस सांप्रदायिक दंगे में अल्पसंख्यक समुदाय के दो लोगों की मौत हो गई थी और कई घायल हुए थे.

इस केस में तत्कालीन भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ, विधायक राधा मोहन दास अग्रवाल और तत्कालीन मेयर अंजू चौधरी पर भड़काऊ भाषण देने का आरोप है, जिसके बाद यह दंगा भड़का.

योगी पर मेहरबान हुई अखिलेश सरकार

इस मामले में पिछली अखिलेश सरकार के पास वह फाइल गई थी, जिसमें आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की अनुमति मांगी गई थी, लेकिन सरकार ने यह अनुमति नहीं दी. अखिलेश सरकार ने इस मामले को बिना वजह लटकाये रखा और मुक़दमा चलाने की अनुमति नहीं दी थी.

अखिलेश सरकार की टालमटोल से यह मामला और भी पेचीदा हो गया. अब यह हालत है कि योगी आदित्यनाथ ख़ुद ही मुख्यमंत्री हैं, उन्हीं के ख़िलाफ़ यह केस है और उन्हीं को मुक़दमा चलाने का आदेश देना है.

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने 28 अप्रैल को टिप्पणी की, ‘दस्तावेज़ों के मद्देनज़र ऐसा प्रतीत होता है आरोपी व्यक्ति पर मुक़दमा चलाने की अनुमति देने का मामला राज्य सरकार के समक्ष लंबित है. सवाल यह है कि मुक़दमा चलाने की अनुमति राज्य सरकार के प्रमुख को देना है, जो कि इस मामले में ख़ुद ही मुख्य आरोपी हैं.’

कोर्ट ने पूछा था देर क्यों की जा रही है

गोरखपुर दंगा मामले में गोरखपुर के पत्रकार परवेज़ परवाज़ और सामाजिक कार्यकर्ता असद हयात ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. याचिकाकर्ताओं की मांग है कि इस मामले की जांच सीबीसीआईडी के बजाय सीबीआई या दूसरी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए.

इस मामले की पिछली सुनवाई 4 मई को हुई थी जिसमें हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से पूछा था कि भड़काऊ भाषण मामले में योगी के ख़िलाफ़ जांच की अनुमति देने में देर क्यों की जा रही है? कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस चिंताजनक मामले में राज्य सरकार और इसकी एजेंसियां कितनी गंभीर हैं, जिसमें बेगुनाह लोगों ने अपनी जान गवांई.

हाईकोर्ट की दो न्यायाधीशों- जस्टिस रमेश सिन्हा और उमेश चंद्र श्रीवास्तव- की पीठ योगी के ख़िलाफ़ जांच का आदेश देने संबंधी इस मामले की सुनवाई कर रही है.

तलब हुए यूपी के मुख्य सचिव

हाईकोर्ट ने 4 मई, 2017 को अपने एक आदेश में कड़ा संज्ञान लिया कि उत्तर प्रदेश की सीआईडी दो साल से इस मामले में चार्जशीट पेश करने के आदेश दिए जाने का इंतज़ार कर रही है. साथ ही कोर्ट ने यूपी के मुख्य सचिव को आदेश दिया कि 11 मई को सारे दस्तावेज़ों और अपनी सफाई के साथ पेश हों.

अपने आदेश में कोर्ट ने यह भी ज़िक्र किया कि सीआईडी अफसर चंद्र भूषण उपाध्याय ने अपनी जांच पूरी कर ली है और ड्राफ्ट फाइनल रिपोर्ट (DFR) में सभी पांच आरोपियों के ख़िलाफ़ अभियोग दाख़िल करते हुए अप्रैल, 2015 में मुख्य सचिव के पास अप्रूवल के लिए भेज दी थी. इंडियन पैनल कोड की धारा 153-ए के तहत सीआइडी को कोई भी अभियोग चलाने के लिए राज्य सरकार से अनुमति लेनी होती है.

बेंच ने अपने आदेश में कहा था, ‘हम आदेश देते हैं कि उत्तर प्रदेश राज्य के मुख्य सचिव सारे रिकॉर्ड और सीबीसीआईडी की जांच रिपोर्ट व डीएफआर के साथ अगली सुनवाई पर अदालत में पेश हों. कोर्ट ने यह भी कहा कि मुख्य सचिव निजी हलफ़नामा देकर स्थिति साफ करें ताकि मामले को जल्द से जल्द निपटाया जा सके. यह घटना 2007 में हुई थी और 2008 में याचिका डाली गई तब से लंबित है.’

2008 से लटका है मामला

परवेज़ परवाज़ और असद हयात ने यह याचिका 2008 में डाली थी, जिसपर हाईकोर्ट सुनवाई कर रहा है. ये दोनों याचिकाकर्ता गोरखपुर दंगों के गवाह हैं.

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि तत्कालीन भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ, तत्कालीन भाजपा विधायक राधामोहन दास अग्रवाल, सांसद शिव प्रताप शुक्ला, मेयर अंजू चौधरी और एक अन्य भाजपा कार्यकर्ता वाइडी सिंह ने भीड़ को मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा के लिए उकसाया था. इसके बाद भड़के दंगे में कई जानें गई थीं और बड़ी संख्या में मुसलमानों की संपत्तियों का नुकसान हुआ था.

क्या है पूरा मामला

जनवरी, 2007 में राजकुमार अग्रहरि नाम के एक लड़के की हत्या हुई थी. इसके बाद जगह जगह तोड़फोड़ और हिंसा हुई. एक मज़ार पर तोड़फोड़ हुई और धार्मिक पुस्तकों का अपमान किया गया. इस उपद्रव में योगी आदित्यनाथ अभियुक्त बने.

इसके बाद 27 जनवरी को योगी ने गोरखपुर रेलवे स्टेशन के सामने भाषण दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि अब हम किसी हिंदू के मारे जाने पर एफआईआर नहीं करवाएंगे. सीधी कार्रवाई प्रारंभ करेंगे. यह बात मोबाइल से फैला दीजिए. इसके बाद पूरे गोरखपुर और बस्ती मंडल में दंगा फैला.

याचिकाकर्ता असद हयात का कहना है, ‘आदित्यनाथ ने 27 जनवरी को गोरखपुर रेलवे स्टेशन के सामने मुस्लिमों के ख़िलाफ़ बेहद भड़काने वाला भाषण दिया था. उस दौरान कई अन्य भाजपा नेता मौजूद थे. वह भाषण यूट्यूब पर मौजूद है जिसमें उन्होंने कहा था कि अब कोई घटना होने पर हम एफआईआर नहीं दर्ज कराएंगे. अगर एक हिंदू मारा जाता है तो उसके बदले दस मुसलमान मारेंगे. ज़िला मजिस्ट्रेट हरिओम के आदेश पर उन्हें अगले दिन गिरफ़्तार भी किया गया था.’

इस मामले को क़रीब से देख रहे रिहाई मंच के राजीव यादव कहते हैं, ‘यह पूरा केस इसी बात पर है कि योगी आदित्यनाथ ने राणा प्रताप की मूर्ति के पास सभा की और भड़काने वाला भाषण दिया. इस मामले में कोर्ट में इस भाषण का वीडियो पेश किया गया है. वीडियो में वह भाषण है जिसमें योगी आदित्यनाथ लोगों से कह रहे हैं कि ‘फोन से सूचना दीजिए और अब तत्काल कार्रवाई प्रारंभ कर दीजिए’ और ‘अब इलाक़े में कहीं भी ताजिया नहीं उठने देंगे.’

अगले दिन योगित्यनाथ ने कुशीनगर में ऐसा ही भाषण दिया. वहां से गोरखपुर लौटने के दौरान उन्हें गिरफ़्तार किया गया, लेकिन उनकी गिरफ़्तारी के बाद हालात और तनावपूर्ण हो गए. फिर से धार्मिक स्थलों समेत पूरे इलाक़े में तोड़फोड़ और आगज़नी हुई.

दो बार गए हाईकोर्ट तब दर्ज हुई थी एफआईआर

इस दंगे में योगी की भूमिका को लेकर पत्रकार परवेज़ परवाज़ और सामाजिक कार्यकर्ता असद हयात ने गोरखपुर और बस्ती मंडल के ज़िला अधिकारियों को एफआईआर दर्ज करने के लिए कई प्रार्थना पत्र भेजे. लेकिन कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई.

इसके बाद दोनों कार्यकर्ताओं ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाख़िल की गोरखपुर प्रशासन को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया जाए. हालांकि, इस याचिका को हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया और कहा कि याचिकाकर्ता गोरखपुर के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के यहां जाकर अपील करें.

याचिकाकर्ताओं ने लौट कर गोरखपुर के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के यहां याचिका दाख़िल की. दस महीने सुनवाई हुई और फिर जुलाई, 2008 में यह केस निरस्त कर दिया गया. दोनों याचिकाकर्ता फिर से हाईकोर्ट गए. कोर्ट ने सितंबर, 2008 को कोर्ट ने एफआईआर दर्ज कर जांच करने का आदेश दिया.

सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा था मामला

जब एफआईआर दर्ज हो गई तब आरोपी अंजू चौधरी ने इस एफआईआर के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट चली गईं और सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे ले लिया.

असद हयात बताते हैं, ‘पहले तो पुलिस ने भाजपा नेताओं के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने से ही मना कर दिया था. लेकिन निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक चक्कर काटने के बाद 2008 में एफआईआर दर्ज हो पाई. इस केस के हर पड़ाव पर भाजपा नेताओं की तरफ से व्यवधान खड़ा करने की कोशिश की गई.’

उदाहरण देते हुए असद हयात कहते हैं, ‘अंजू चौधरी ने कोर्ट को गुमराह करके एफआईआर पर स्टे लिया था. असल में उन्होंने दावा किया कि पहले एक एफआईआर दर्ज है, और उसी केस में यह दूसरी एफआईआर है, क़ानून इसकी अनुमति नहीं देता. यह पूरी तरह झूठ था. पहली एफआईआर बिस्मिल्लाह नामक व्यक्ति ने दर्ज कराई थी. वह उसके होटल में दंगे के दौरान तोड़फोड़ को लेकर थी. वह दीगर मसला था. अंजू के स्टे के कारण यह मसला चार साल तक खिंचा.’

‘सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हमारी याचिका वैध है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर, 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने अंजू चौधरी की याचिका को ख़ारिज कर दिया और राज्य सरकार को जांच कराने का आदेश दिया.’

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंजू चौधरी की अपील को ख़ारिज करने और जांच के बाद केस में विवेचना का मामला खुल जाता है और सीआईडी जांच करती है. जांच के बाद सीआईडी को चार्जशीट दाख़िल करने की अनुमति ही नहीं मिली.

जांच शुरू होने में लगे 6 साल

अंतत: जनवरी, 2013 में योगी आदित्यनाथ और अन्य के ख़िलाफ़ जांच शुरू हुई. असद हयात बताते हैं, ‘जब जांच चल रही थी, उसी दौरान योगी आदित्यनाथ ने इंडिया टीवी पर ‘आप की अदालत‘ में स्वीकार्य किया कि वीडियो में वह भाषण उन्हीं का है जो उन्होंने गोरखपुर दिया था. उन्होंने उस भाषण को अपना तो कहा ही, उसपर गर्व भी जताया.’

इसके बाद हयात ने डीजीपी को पत्र लिखकर कहा कि यह गैर न्यायिक स्वीकारोक्ति है, उनके इस इंटरव्यू को सबूत के तौर पर लिया जाए. लेकिन राज्य की पुलिस ने उनके इस पत्र का कोई संज्ञान नहीं लिया. इसके बाद परवेज़ और हयात ने हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की कि इस केस को सीबीआई को सौंपकर उससे जांच कराई जाए.

2015 में राज्य सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि सीआईडी ने जांच पूरी कर ली है, अब राज्य सरकार को मुक़दमा चलाने का आदेश देना है. वकील ने यह भी कहा कि सरकार ने डीएफआर को अप्रूव कर दिया है, बस मुक़दमा चलाने की इजाज़त मिलनी बाक़ी है.

योगी पर आरोप, उन्हीं को देनी थी अनुमति

अखिलेश सरकार ने मामले को लटकाए रखा और फिर राज्य में प्रचंड बहुमत से भाजपा सत्ता में आई. चुनाव में जीत के बाद भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को ही मुख्यमंत्री बना दिया. अब इस मामले में योगी आदित्यनाथ ही मामले के मुख्य आरोपी हैं और वे ही वह अथॉरिटी हैं जिन्हें मुक़दमा चलाने का आदेश देना है.

इस मामले में परवेज़ और हयात के वकील एस फ़रमान नक़वी का कहना है, ‘सरकार बदलने के साथ सरकारी वकील की ज़बान भी बदल जाती है. सरकारी वकील विमलेंदु त्रिपाठी जो कभी कोर्ट में कह रहे थे कि सीआईडी ने जांच पूरी कर ली है और सरकार ने डीएफआर को भी अप्रूव कर दिया है, अब सिर्फ़ मुक़दमा चलाने के आदेश का इंतज़ार है, अब कोर्ट में कह रहे हैं कि डीएफआर फाइनल नहीं है.’

नक़वी का कहना है, ‘जिसके ख़िलाफ़ यह गंभीर आरोप है, उसी को मुक़दमा चलाने की अनुमति देनी है. अब मौजूदा सरकार तो यह कभी नहीं करेगी. हम कोर्ट में अपील करेंगे कि वह अपने विशेषाधिकार के तहत मुक़दमा चलाने की अनुमति देने का अधिकार अपने पास ले ले और मुक़दमा चलाने का आदेश दे.

अब देखना यह है कि यूपी में क़ानून व्यवस्था सख़्त रखने और गुंडों को प्रदेश छोड़कर चले जाने की धमकी देने वाले योगी आदित्यनाथ इस मामले में ख़ुद को क़ानून के समक्ष पेश करते हैं या नहीं.