क्यों मेजर गोगोई को सम्मानित करना सेना के नैतिक स्वरूप के ख़िलाफ़ है

किसी भी पेशेवर सेना के लिए उसकी प्रतिष्ठा सबसे ज़रूरी होती है पर ऐसा लगता है कि भारतीय सुरक्षा के शीर्ष पद पर बैठे लोग चाहे वे मंत्रालय में हों या सेना में, ये बात भूल गए हैं.

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किसी भी पेशेवर सेना के लिए उसकी प्रतिष्ठा सबसे ज़रूरी होती है पर ऐसा लगता है कि भारतीय सुरक्षा के शीर्ष पद पर बैठे लोग चाहे वे मंत्रालय में हों या सेना में, ये बात भूल गए हैं.

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सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत और रक्षा मंत्री अरुण जेटली. (फोटो: पीटीआई)

बीते दिनों भारतीय सेना के मेजर लीतुल गोगोई को एक कश्मीरी नागरिक को सेना की जीप पर बतौर ‘मानव ढाल’ बांधने के उनके फैसले पर उन्हें प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया. दिलचस्प ये है कि इस तरह के सम्मान आमतौर पर स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर दिए जाते हैं, पर मेजर गोगोई को यह सम्मान उन्हें पारंपरिक तारीखों से हटकर दिया गया-

साथ ही इसके लिए उनकी यूनिट से किसी भी तरह का साइटेशन (संदर्भ) नहीं भेजा गया था. मेजर गोगोई के इस फैसले पर बोलते हुए रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि ऐसे किसी युद्ध क्षेत्र में सैनिक को उसकी सहूलियत के अनुसार क़दम उठाने की इजाज़त होनी ही चाहिए.

मेरी राय में ये दोनों ही घटनाएं बिल्कुल साफ संकेत हैं कि किस तरह देश का वर्तमान नेतृत्व सेना को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है, वो भी ऐसी सेना जो पहले से ही संस्थागत मूल्यों की कमी से जूझ रही है.

सुनने में भले ही यह बात छोटी लग रही हो पर अगर इसे गहराई से देखा जाए तो पता चलता है कि सेना को अब तक इस तरह का कोई अनुभव नहीं है. अगर रक्षा मंत्रालय और सेना दोनों के ही शीर्ष पदों पर बैठे लोग इसी तरह काम करते रहे तो ये घातक साबित हो सकता है.

किसी आम व्यक्ति को मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल करने के क़ानूनी और नैतिक पहलू पर मीडिया में काफी बात हो चुकी है. इसमें कोई शक नहीं है कि ऐसा करना ग़लत है. पर क़ानूनी और मानवाधिकार पहलू के इतर यह समझना भी ज़रूरी है कि इस तरह के बदलावों से सेना के सामूहिक सामंजस्य और लड़ने की प्रभावशीलता पर क्या संभावित प्रभाव पड़ सकते हैं.

अब तक इन घटनाओं के बारे में जो कुछ भी कहा गया उसमें कई तरह की ग़लतफहमियां शामिल हैं. पहली तो यही कि जिस परिस्थिति में यह घटना हुई वो कोई वास्तविक युद्ध की स्थिति नहीं थी.

किसी काफिले को पत्थरबाज़ों के समूह के बीच से निकालकर ले जाना लाहौर की सीमा लांघकर कारगिल के टाइगर हिल पर चढ़ाई करने जैसा नहीं है और न ही इस स्थिति की तुलना ऐसे किसी ऐसे समय से कर सकते हैं जहां किसी घर में बंद दो हथियारबंद आतंकियों पर गोलियां चलाई जा रही हों.

कश्मीर में जो माहौल चल रहा है, उसमें पत्थरबाज़ी का सामना करना सबसे कम जोखिम भरा है. अब तक पत्थरबाज़ी से किसी सैनिक की मौत का कोई उदाहरण सामने नहीं आया है.

दूसरी, यह कोई अचानक पैदा हुई परिस्थिति नहीं थी, जिसमें मेजर को बिल्कुल अलग किसी रास्ते के बारे में सोचना पड़े. घाटी में तैनात राष्ट्रीय राइफल के अधिकारी तकरीबन रोज़ ही पत्थरबाज़ी का सामना कर रहे हैं, ऐसे में सेना में इससे निपटने को लेकर ज़रूर ही विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए होंगे. क्या किसी इंसान को जीप पर बांधना ऐसी ही किसी दिशा-निर्देश का हिस्सा है? अगर नहीं, तो वे दिशा-निर्देश क्या हैं?

और तीसरी यह कि सेना को मेजर गोगोई के इस क़दम से जितना नुकसान नहीं पहुंचा, उससे ज़्यादा नुकसान इस घटना के बाद सेना प्रमुख और रक्षा मंत्री के बयान से हुआ है.

प्रतिष्ठा की लड़ाई

प्राचीनकाल से ही किसी भी पेशेवर सेना के लिए प्रतिष्ठा सबसे महत्वपूर्ण होती है. संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का तो मिलिट्री कोड है ड्यूटी (फ़र्ज़). ऑनर (प्रतिष्ठा). कंट्री (देश). हमारी अपनी भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) के चेटवुड मोटो में किसी भी सैन्य अधिकारी की शीर्ष प्राथमिकताओं में ‘ऑनर’ यानी प्रतिष्ठा शामिल है.

‘The safety, honour and welfare of your country come first, always and every time. The honour, welfare and comfort of the men you command come next (emphasis added).’ यानी हमारे देश की सुरक्षा, प्रतिष्ठा और भलाई हमेशा और हर हाल में सबसे ऊपर रहेंगी. जिन लोगों को आप आदेश दे सकते हैं, उनकी प्रतिष्ठा, भलाई और सहूलियतें इसके बाद आएंगी. भारतीय सैन्य अकादमी की तरह ही राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) के भी अपने ऑनर कोड और ऑनर कोड कमेटी हैं.

इन कमीशनिंग अकादमियों में आने वाले किसी भी ऑफिसर कैडेट को केवल कैडेट नहीं बल्कि ‘जेंटलमैन कैडेट’ कहा जाता है. कई लोगों को लगता है कि कोई व्यक्ति जिसे मारने के लिए प्रशिक्षित किया गया है और जिसे समाज द्वारा भी मारने का लाइसेंस प्राप्त है, उसे ‘जेंटलमैन’ कहना उचित नहीं है.

इनके इतर जिस व्यक्ति को यही समान ताकत मिली हुई है, उसे जेल का जल्लाद कहा जाता है. पर उसे हम ‘जेंटलमैन जल्लाद’ नहीं कहते. ऐसा इसलिए क्योंकि उसकी जान लेने की ताकत सीमित है और इस काम में वह अकेला होता है.

वहीं किसी सेना के किसी अफसर के किसी को मारने के आदेश की ताकत इससे कहीं ज़्यादा बड़ी है और समूह पर काम करती है. यही वजह है कि इस ताकत की इस तलवार को प्रतिष्ठा की रेशमी म्यान में रखा जाता है. ये तलवार बस उन अच्छे इंसानों द्वारा ही इस्तेमाल की जा सकती है, जिनके इरादे नेक हों, वरना परिणाम सिर्फ उपद्रव और अशांति ही होंगे.

सेना की इकाइयों में सुव्यवस्था बनाए रखना इतना महत्वपूर्ण है कि वहां कुछ ऐसे नियम (आर्मी एक्ट, सेक्शन 63) भी हैं, जहां किसी छोटी से छोटी गलती को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जाता, जैसा किसी और क्षेत्र में नहीं देखा जाता. किसी अधिकारी के लिए उसके सामान्य व्यवहार के नियम और भी कड़े होते हैं.

सेना में इस तरह के नियमों के होने से ‘बतौर सैन्य अधिकारी अनुकूल आचरण’ न करने को लेकर सज़ा दी जाती और इस ‘प्रतिकूल आचरण’ के मानक में सैन्य अधिकारी द्वारा की गई कोई सामान्य दिखने वाली बात भी आ सकती है. इससे यह तो साफ है कि भारतीय सेना सिर्फ इतना नहीं चाहती कि इसके अफसर केवल कुशल और अनुशासित हों, बल्कि यह चाहती है कि वे प्रतिष्ठित और सज्जन भी हों.

भारतीय सेना के लिए सम्मान इतना ज़रूरी है कि कई बार तो मेरी रेजिमेंट के अफसरों को ‘मैं 4 गोरखा राइफल्स से आने में गर्वान्वित महसूस करता हूं’ कहने की बजाय ‘मैं 4 गोरखा राइफल्स से आता हूं’ कहने पर सज़ा मिली.

पर इसकी ज़रूरत क्या है? क्यों भारतीय सेना में प्रतिष्ठा को इतना महत्व मिलता है, क्यों इसके यही मायने भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय विदेश सेवा या भारतीय प्रबंधन संस्थान से निकलने वाले छात्रों के लिए नहीं हैं?

चार्ल्स मोस्कोस और फ्रैंक वुड की क़िताब द मिलिट्री: मोर दैन जस्ट जॉब  विभिन्न व्यवसायों और संस्थानों के बीच अंतर को साफ करती है. किसी भी संस्थान को उसके मूल्यों और मानकों के आधार पर वैधता मिलती है- जिसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को उसके आत्महित से ऊपर उठाकर बेहतर की ओर बढ़ाना होता है.

वही दूसरी तरफ किसी व्यवसाय को वैधता उसके बाज़ार से तय होती है. वहां मांग और पूर्ति किसी भी मानक से ऊपर है. व्यावसायिक मॉडल में आत्महित को संस्थान में काम करने वालों के मुकाबले प्राथमिकता दी जाती है.

कड़े नियमों की ज़रूरत

मैंने क्यों कहा कि भारतीय सेना की साख़ में कई दरारें आ चुकी हैं? शुरू से देखें तो आईएमए और एनडीए की ऑनर कोड कमेटियां कभी ज़्यादा सफल नहीं रहीं. ऐसा अमेरिका या ब्रिटेन की सेनाओं के साथ नहीं है.

1970 के दशक आख़िरी सालों में अमेरिकी मिलिट्री अकादमी के वेस्ट पॉइंट में दो कैडेटों को इम्तेहान में नक़ल करते पकड़ा गया था. तब अमेरिकी सेना द्वारा पूरे हज़ार कैडेटों के बैच को वापस घर भेज दिया गया था क्योंकि वहां के ऑनर कोड में लिखा है thou shall not lie, steal or cheat or tolerate others who do so यानी हम झूठ नहीं बोलेंगे, चोरी या धोखा नहीं करेंगे और न ही किसी का ऐसा करना बर्दाश्त करेंगे.

वहीं भारत में आईएमए 1932 से अब तक तीन बार ऑनर कोड अपनाने का प्रयास कर चुकी है पर तीनों बार असफल हुई है. एनडीए में ऑनर कोड कमेटी तो है पर उसे जितने अधिकार होने चाहिए वो प्राप्त नहीं हैं. और हो भी कैसे सकते हैं? कुछ सालों पहले की ही बात है जब एनडीए के एक अधिकारी को जल्दबाजी में जूनियर कर्मचारी से पैसे वसूलने के आरोप में उसके पद से हटाया गया था.

हम यह भी जानते हैं कि एक भारतीय वायु सेना प्रमुख का नाम वीवीआईपी हेलीकॉप्टरों की खरीद से जुड़े एक भ्रष्टाचार घोटाले में आ चुका है. जब किसी लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के किसी अधिकारी पर ऐसे आरोप लगते हैं, जब कोई कार्यरत सेना प्रमुख अपने निजी मसले को लेकर अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ कोर्ट में पहुंच चुका हो, तब समझ लेना चाहिए कि साख़ या ऑनर के इस विचार पर नीचे से नहीं बल्कि शीर्ष पदों से ही हमला किया जा रहा है.

रिचर्ड ए. गैब्रियल और पॉल एल. सैवेज ने अपनी एक क़िताब में बताया है कि किसी अधिकारी का नैतिक पतन केवल उस अधिकारी के ग़लत आचरण का परिणाम नहीं है. यह एक संस्थान के रूप में सेना की विफलता है, जो नैतिकता की एक संस्थागत भावना को विकसित नहीं कर सका, जो ईमानदारी और निष्ठा के विभिन्न विचारों के साथ खड़ी हो सके, वो इस एक ऐसी व्यवस्था बनाने में नाकाम रहा जहां किसी अधिकारी को मिलिट्री संस्थान के नैतिक मानकों के अनुरूप प्रशिक्षण दिया जाए.

ऐसा सोचना बिल्कुल ग़लत होगा कि अधिकारियों का कोई समूह, जिनकी नैतिकता की परिभाषा एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हो सकती है, साथ मिलकर समाज के लिए नैतिकता के किसी एक तय पैमाने पर काम करेगा. वास्तव में इसके उलट होने की पूरी संभावना है.

किसी समूह में अलग-अलग व्यक्तियों को साथ ले आने के लिए नैतिकता का कोई एक मानक तय किया जा सकता है और इसी कारण ऐसे किसी समूह में एकजुटता आती है, साथ होने को लेकर गर्व की भावना पैदा होती है. ग्रेशम के एक नियम के अनुसार बुरा धन अच्छे धन के महत्व को ख़त्म कर देता, ठीक यही असर किसी ग़लत या बुरे अफसर के होने से से किसी अच्छे अफसर पर पड़ता है.

ये तो साफ है कि भारतीय सेना का नैतिक स्वरूप ख़तरे में है. अगर ये किसी अधिकारी को उसके जैसे ही किसी और हिंदुस्तानी को पत्थरों से बचने के लिए ‘ढाल’ के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति दे रही है, तो अगला क़दम क्या होगा?

अगर कभी लाहौर की सुरक्षा में सेंध लगेगी तब पाकिस्तानी महिलाओं को ढाल के बतौर इस्तेमाल किया जाएगा? और अगर इस तरह के कृत्यों के लिए उन्हें सम्मानित किया जाएगा, रक्षा मंत्री आश्वासन देंगे कि युद्ध क्षेत्र में वे कुछ भी कर सकते हैं, तब सेना जल्दी ही अपना महत्व खो देगी. इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, इस बारे में क़दम उठाना ही होगा.

(कर्नल आलोक अस्थाना भारतीय सेना से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं.)

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