भारत जैसे आर्थिक असमान समाज में जब त्याग की भाषा आती है तो सबसे पहले पूछा जाना चाहिए कि त्याग कौन करेगा? वह जो पहले से ही राशन, किराया, फीस, ईएमआई के बीच फंसा है या वह जो संपत्ति को वस्त्र की तरह पहन सकता है? यह प्रश्न ईर्ष्या का नहीं, नैतिक अनुपात का है. यह द्वेष नहीं, सार्वजनिक न्याय का प्रश्न है.