एक नई अधिसूचना में भारतीय मानक ब्यूरो ने संकेत दिया है कि सरकार ने ई20 कार्यक्रम से आगे बढ़ते हुए ई22, ई25, ई27 और ई30 ईंधन मिश्रणों के लिए मानक अधिसूचित किए हैं, जिनका अर्थ क्रमशः 22%, 25%, 27% और 30% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल है. पिछले कुछ वर्षों से सरकार ई20 ईंधन को व्यापक रूप से बढ़ावा दे रही है, हालांकि इसे लेकर ईंधन गुणवत्ता, पुराने वाहनों के इंजनों पर असर आदि संबंधी चिंताएं भी सामने आई हैं.
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एक नई अधिसूचना में भारतीय मानक ब्यूरो ने संकेत दिया है कि सरकार ने ई20 कार्यक्रम से आगे बढ़ते हुए ई22, ई25, ई27 और ई30 ईंधन मिश्रणों के लिए मानक अधिसूचित किए हैं, जिनका अर्थ क्रमशः 22%, 25%, 27% और 30% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल है. पिछले कुछ वर्षों से सरकार ई20 ईंधन को व्यापक रूप से बढ़ावा दे रही है, हालांकि इसे लेकर ईंधन गुणवत्ता, पुराने वाहनों के इंजनों पर असर आदि संबंधी चिंताएं भी सामने आई हैं.
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति रहे पत्रकार जगदीश उपासने ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल करने वाली नॉर्वे की पत्रकार हेले ल्यूंग की आलोचना में उनकी निजी तस्वीरें पोस्ट की हैं. अगर सवाल पूछना अपमान है तो फिर पत्रकारिता विश्वविद्यालयों में क्या पढ़ाया जाए? प्रेस नोट का संपादन? नेता की मुस्कान का वर्णन? विद्यार्थी अगर देखें कि एक विदेशी पत्रकार ने प्रश्न पूछा और वरिष्ठों ने उसके व्यक्तित्व पर हमला शुरू किया तो वह क्या सीखेगा?
मीडिया का काम सरकार की तयशुदा बातों को जस का तस दोहराना नहीं, बल्कि सवाल पूछना है. सरकार की बातों का प्रचार करना उसके प्रवक्ताओं का काम है. इस मामले में हेले ल्यूंग बिल्कुल सही हैं, जब वह कहती हैं, ‘पत्रकारिता कभी-कभी टकरावपूर्ण होती है.' अगर नागरिकों को भेड़ों में नहीं बदलने देना है या हमेशा के लिए ख़ामोश नहीं कर देना, तो सवाल ज़रूरी हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मीडिया की आज़ादी पर सवाल पूछने के बाद नॉर्वे की पत्रकार हेले ल्यूंग सोशल मीडिया पर हमलों का सामना कर रही हैं. उन्हें ‘भारत विरोधी’ और ‘एजेंट’ बताया जा रहा है. आलोचना अब पेशेवर असहमति से आगे बढ़कर निजी जीवन और चरित्र पर हमलों तक पहुंच गई है. यहां तक कि पत्रकारिता के पेशे से जुड़े कुछ एंकर उनके प्रधानमंत्री से सवाल किए जाने को लेकर आहत हैं.
आरएसएस से जुड़ा जनजाति सुरक्षा मंच 24 मई को दिल्ली में जनजाति सांस्कृतिक समागम कार्यक्रम आयोजित कर रहा है. झारखंड के सौ से अधिक संगठनों, मूलवासी, जन संगठन के प्रतिनिधि, पारंपरिक स्वशासन प्रतिनिधि, शिक्षाविद व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे बहिष्कार करने की अपील करते हुए कहा कि समागम की मूल सोच आदिवासी विरोधी है.
ख़बरों के अनुसार, लाहौर के मोहल्लों के नाम उनके विभाजन-पूर्व नामों पर दोबारा रखने की इस पहल का उद्देश्य शहर की ऐतिहासिक पहचान को बहाल करना और उसके बहुसांस्कृतिक अतीत को मान्यता देना है. पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की सरकार ने इस प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है.
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