कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: फ़िराक़ की कविता का वितान कॉस्मिक से लेकर निपट स्थानीय तक फैला हुआ है. उसमें प्रेम, विरह, लगाव-अलगाव, सौन्दर्य और संघर्ष, हिंदी और संस्कृत की अंतर्ध्‍वनियां, परंपरा की अनेक दुर्लभ स्मृतियां सब समायी हुई हैं. वे बरसों स्वतंत्रता-संग्राम और राजनीति में सक्रिय रहे. इस अनुभव ने उनकी कविता की अनुभव-संपदा में इज़ाफ़ा तो किया मगर उसके सौष्ठव और परिष्कार को रुखा-खुरदरा नहीं किया.