एक दौर में फेक न्यूज़ के सहारे हिंदुओं को बीमारी फैलाने का ज़िम्मेदार ठहराया गया था

अमेरिकी इतिहास से जुड़ा एक पन्ना बताता है कि मीडिया और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग द्वारा समर्थित जातिवादी और सांप्रदायिक ज़हर लंबे समय से राजनीति का खाद-पानी है.

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अमेरिकी इतिहास से जुड़ा एक पन्ना बताता है कि मीडिया और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग द्वारा समर्थित जातिवादी और सांप्रदायिक ज़हर लंबे समय से राजनीति का खाद-पानी है.

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16 सितंबर 1906 को बेलिंघम का द संडे प्यूजेट. (साभार: The Sunday Puget Sound, Bellingham)

कोविड-19 के इन दिनों में मैं अपना काफी समय इतिहास के पन्ने पलटने में खर्च कर रही हूं और यह साफ है कि हमारे मौजूदा समय की बुराइयों का गहरा रिश्ता अतीत में हुई घटनाओं से है.

सच्चाई और विश्वास के बीच संघर्ष हमेशा सबसे बुरी किस्म की राजनीति को जन्म देता है. अपने पर्चे द हिस्टॉरिकल पर्सपेक्टिव ऑफ अमेरिकंस ऑफ एशियन इंडियन ओरिजिन : 1790-1997, में राजशेखर बॉबी कोरीताला ने संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीयों के आप्रवास के इतिहास का खाका पेश किया है.

कैसे प्रवासियों ने उस विदेशी जमीन पर अपने पैर जमाए और वहां उनको लेकर अजीबो-गरीब मान्यताओं के कारण उन्हें किस तरह के शत्रुतापूर्ण रवैये का सामना करना पड़ा.

वे लोगों की दो श्रेणियों का जिक्र करते हैं : महान अमेरिकी (ग्रेट अमेरिकंस) जिन्होंने अमेरिका में भारतीयों की मदद की और दूसरी है दुष्टों की दीर्घा, जिनमें वे अन्य लोगों के साथ थियोडोर रूजवेल्ट को शामिल करते हैं, जो ‘नस्लवादी, साम्राज्यवादी, उपनिवेशवादी, एशियाइयों के विरोधी, भारतीयों के विरोधी’ थे.

यह किस्मत की बात है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति की ‘ऐतिहासिक तौर पर सम्माननीय‘ व्यक्ति की आधिकारिक छवि होने के बावजूद, अमेरिका में किसी ने भी अब तक कोरीताला को देशद्रोही करार नहीं दिया है.

कारोबार से श्रम तक

1880 के दशक में भारतीय सैकड़ों की संख्या में अमेरिका पहुंचे. नस्लवाद का शिकार होने से पहले के सामान्य दिनों में इन भारतीयों का मुख्य पेशा व्यापार करना था.

उन्होंने इतनी ख्याति अर्जित कर ली थी कि ‘द राजाज़ डॉटर’, कैटेरेक्ट ऑफ गैंगेज’ जैसे नाटकों का मंचन किया गया था और ‘द हिंदू गर्ल’ शीर्षक से एक गाना काफी लोकप्रिय हुआ था.

लेकिन कुछ सालों के बाद हालात बदलने लगे, जब बड़ी संख्या में भारतीय उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट के साथ-साथ कैलिफोर्निया से कनाडा तक बस गये.

इनमें ज्यादातर सिख थे, जिन्होंने ब्रिटिश उपनिवेशी सरकार के अन्यायपूर्ण व्यवहार के कारण पंजाब से प्रवास किया था. इनमें से ज्यादातर ब्रिटिश कोलंबिया और वाशिंगटन में इमारती लकड़ी के मिलों में और रेलरोडों पर काम किया करते थे.

उन्होंने कैलिफोर्निया के सैक्रामेंटो क्षेत्र में खेतों में खासतौर पर अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन उन्हें शक की नजर से देखा जाने लगा और उन्हें अधर्मी, गंदा, तिरस्कार के योग्य नस्ल, गंदे तरीके से रहने वाला और प्राणघातक बीमारियों का वाहक करार दिया गया.

जाहिर तौर पर उनका रूप-रंग सामाजिक रीति-रिवाज और धर्म वहां पहले से रह रहे लोगों के लिए स्वीकार्य नहीं थे, जो वैसी हर चीज को अविश्वास की नजर से देखते थे, जिनसे उनका परिचय न हो और जो उनके समान न हो.

सारा इसाबेल वॉलेस ने अपनी किताब ‘नॉट फिट टू स्टे : पब्लिक हेल्थ पैनिक्स एंड साउथ एशियन एक्सक्लूजन में लिखा है कि बहिष्कार करने वाली नीतियों के पीछे मुख्य तौर पर नस्लवाद और श्रम प्रतिस्पर्धा’ का हाथ था, मगर डॉक्टरों, श्रम संगठनों के नेताओं, लोकसेवकों, पत्रकारों अैर नेताओं ने दक्षिण एशियाई लोगों के बहिष्कार को जायज ठहराने के लिए स्वास्थ्य संबंधी अप्रमाणिक चिंताओं को दोनों हाथों से लपक लिया.

वे लिखती हैं कि इस प्रक्रिया की शुरुआत 1907 के पतझड़ में ब्लेन रिव्यू में एक स्टोरी के छपने के बाद हुई कि मिलों में काम करने वाले नए-नए आये दक्षिण एशियाई पिछले वसंत में मेनिंगजाइटिस के फैलाव के लिए जिम्मेदार हैं.

भारत में 30 साल रहने के बाद हाल ही में लौटे एक मेथोडिस्ट बिशप, जेम्स मिल्स थोबर्न ने कहा कि (पश्चिमी) तट पर आ बसे हिंदू आप्रवासी देश में फैले प्लेग, सेरो ब्रो मेंनिंगजाइटिस और अन्य बीमारियों के लिए जिम्मेदार हैं.

दक्षिण एशियाई प्लेग से बचने की उम्मीद में भारत छोड़ रहे हैं, मगर उसके कीटाणु वे अपने साथ लेकर आ रहे हैं.

थोबर्न ने जो कहा वह एक तरह से फेक न्यूज की श्रेणी में आता है, क्योंकि यह किसी वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित नहीं था, लेकिन इसने अमेरिकी जनता को प्रभावित किया, जो वैसे भी किसी भी सूरत में प्रवासियों के खिलाफ थे.

परंपरागत तौर पर लंबे बालों, पगड़ी और दाढी वाले सिख, जिन्हें प्रायः हिंदू कहकर पुकारा जाता था, खासतौर पर अस्वीकार्य थे. और इसके साथ ही था नौकरियां गंवा देने का खतरा, क्योंकि जैसा कि प्रकट होता है ये ‘दरिद्र श्रमिक’ उन्हें टिकने नहीं दे रहे थे.

दिलचस्प यह है कि अमेरिकी अधिकारियों को भारत के धर्मो के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और यह कहा जाता है कि अदालतों में ‘हिंदुओं’ के शपथ लेने के लिए कुरान की प्रति रखी गयी थी.

धीरे-धीरे कनाडा और अमेरिका में प्रशांत तट वाले हिस्सों में एशियाइयों के खिलाफ जनभावना तैयार होने लगी.

1905 में, नस्लवादी अमेरिकियों ने जैपेनीज एंड कोरियन एक्सक्लूजन लीग (जापानियों और कोरियनों के बहिष्कार के लिए लीग) का गठन किया और 1907 में एक कनाडाई एशिया एक्सक्लूजन लीग (एईएल) (एशिया बहिष्कार लीग) प्रकट हुआ.

1906 में वैंकूवर में रहने वाली मैरी विल्सन ने एक स्थानीय अखबार में यह कहते हुए एक चिट्ठी लिखी, ‘हमारा हिंदू शहर या बाजार के निर्माण का कोई प्रस्ताव नहीं है, बल्कि अगर इसे समय रहते नहीं रोका गया तो, इसकी बुराइयों और अवांछनीय विशेषताओं के कारण हमारे बीच भी प्लेग, कॉलेरा और अन्य प्राणघातक बुखार और बीमारियां फैलेंगी.’

भारतीयों के प्रति शत्रुता के भाव ने प्रेस पर उसी तरह से जादू किया, जैसा कि अक्सर नकारात्मकता का होता है.

1906 में प्यूजेट साउंड अमेरिकन  शीर्षक एक लेख में यह पूछा गया कि ‘क्या हम पर सांवली विपत्ति आ गयी है?’ अर्थ को स्पष्ट करते हुए आगे जोड़ा गया कि-‘हिंदुओं का कारवां राज्य पर चढ़ाई कर रहा है.’

एक पाठक ने लिखा, ‘मेरे हिसाब से इस देश में हिंदुओं का आगमन बिल्कुल अवांछनीय है…उनकी नैतिक संहिता खराब है (हमारे दृष्टिकोण से) और अगर उन्हें छूट मिलती है, जिसकी उम्मीद वे अमेरिका में स्वाभाविक तौर पर करते हैं, तो आखिरकार वे मुसीबत का सबब साबित होंगे.’

The Hindu Invasion Pacific
1907 में पैसिफिक में द हिंदू इनवेज़न : अ न्यू इमिग्रेशन प्रॉब्लम’ शीर्षक से प्रकाशित लेख.

मई, 1907 में पैसिफिक मंथली  पत्रिका के लिए द हिंदू इनवेज़न : अ न्यू इमिग्रेशन प्रॉब्लम शीर्षक वाले लेख में एक शीर्ष अमेरिकी पत्रकार फ्रेड लॉकली ने लिखा, ‘सुदूर पूर्व के हमारे बंधुओं (हिंदुओं) ने पश्चिम की तरफ रुख कर लिया है. उन्हें अब तक रोककर रखने वाले बांध में यहां-वहां छोटी-छोटी दरारें दिखने लगी हैं. वे बहुत कम मात्रा में रिस-रिस कर आ रहे हैं. सामने से देखने पर पश्चिमी भूमि में आ रही उनकी धारा अभी महत्वहीन है, लेकिन क्या यह धारा धीरे-धीरे चौड़ी होती जाएगी और हमारी धरती पर छा जाएगी और हमारे संस्थानों को संकट में डाल देगी?’

लेकिन यहां यह उल्लेखनीय है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने उस समय वहां राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाने का आदेश नहीं दिया और अमेरिका में आज तक ऐसा कोई रजिस्टर नहीं है.

लेकिन आगे बढ़ते हुए एईएल की पहली सार्वजनिक सभा 12 अगस्त, 1907 को हुई, जिसमें वैंकूवर के सांसद ने ‘हर महीने हमारे देश में बड़ी संख्या में मधुमक्खियों की झुंड की तरह चले आ रहे एशियाइयों’ को हमले की चेतावनी दी.

उन्होंने यह भी जोड़ा कि ‘पीली नस्ल के बड़ी संख्या में आप्रवास के नतीजे के तौर पर अनिवार्य रूप से यहां पहले से रह रहे श्वेत नस्लों को पीछे हटना पड़ेगा.’

अगले दिन वैंकूवर वर्ल्ड अखबार ने अपने पहले पन्ने की सुर्खी इस खबर को बनाई : ‘ऑल पार्टीज अपोज्ड टू एशियाटिक्स’ (एशियाइयों के विरोध में सभी पक्ष) और अपने संपादकीय में यह गलत रिपोर्टिंग की कि, ‘एथेनियन स्टीमर पर 160 हिंदुओं का आगमन हुआ है. 2000 जापानियों के इंडियाना जहाज पर होने की खबर है, जो पिछले गुरुवार को होनोलुलु से वैंकूवर की तरफ चला है. यह इस बात का सबूत है कि एशियाइयों का बड़ी संख्या में ब्रिटिश कोलंबिया पर धावा बोलना जारी है.

आज की शब्दावली मे कहें जो यह दावा एक फेक न्यूज था, क्योंकि इंडियाना पर सिर्फ 275 जापानी थे. लेकिन उस अखबार ने कभी माफी नहीं मांगी.

भारतीयों के खिलाफ दंगे

लोगों को मेहनत करने के लिए प्रेरित करने के लिए यह अक्सर कहा जाता है कि रोम का निर्माण एक दिन मे नहीं हुआ था. इस तरह से यह भी सच है कि दंगे भी एक दिन में नहीं होते हैं.

दंगे तभी होते हैं, जब लोगों के दिमाग को खास तरह की भावना और जहर से भर दिया जाता है. इसलिए 4 सितंबर 1907 को रविवार के दिन, वाशिंगटन प्रांत के बेलिंघम में जो हुआ वह कोई असंबद्ध घटना नहीं थी, जब करीब 500 श्वेत लोगों के एक समूह ने हिंदुओं को बाहर भगाओ का नारा लगाते हुए लगभग पांच घंटे तक दंगा-फसाद किया.

उनके घरों और उनके सामानों की तोड़-फोड़ की गई, कई लोगों को बाहर निकालकर पीटा गया. उस रात 200 भारतीयों ने सिटी हॉल में शरण ली और बाकी वहां से भाग गए और कभी वापस नहीं लौटे.

लेकिन उनका भागकर एवेरेट में शरण लेना उनकी मदद नहीं कर सका और 5 नवंबर 1907 को वहां भी दंगे हुए. इसका पैटर्न भी वही था और पुलिस बस तमाशबीन बनकर देखती रही.

अगले दिन स्थानीय अखबारों में छापा गया कि ‘पुलिस असहाय थी’ और ‘पूरे प्रशासन को लकवा मार गया था.’

बलवाई भीड़ के एक भी सदस्य पर मुकदमा नहीं चला. हो सकता है यह सब आपको जाना-पहचाना लग रहा हो, लेकिन मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है. जैसा कि मैंने कहा, पाठक अपना निष्कर्ष खुद निकाल सकते हैं और उनकी इस आजादी का मैं सम्मान करूंगी.

Orientals Buy Arms
हथियारों की खरीद के बारे में प्रकाशित खबर.

चार दिन बाद, 10 सितंबर 1907 को वैंकूवर के द वर्ल्ड में एक रिपोर्ट छपी जिसमें कहा गया कि ‘पूरब के लोगों ने हथियार खरीदे हैं. सैकड़ों एशियाइयों ने बंदूकें खरीदी हैं.’ और उसके बाद हथियारों की बिक्री रोक दी गई.

मैं यहां खुद को यह कहने से नहीं रोक नहीं पा रही हूं कि आत्मरक्षा का रास्ता अक्सर हिंसक साधनों से होकर गुजरता है.

मीडिया की दलील

दंगों के बाद बेलिंघम हेराल्ड  ने 10 सितंबर, 1907 ने लिखा कि ‘हिंदू हम में से नहीं हैं और वे कभी नहीं हो सकते हैं… वे हमारे देश में रोगों, गंदगी और थोड़े से श्रम के अलावा कुछ भी लेकर नहीं आ रहे हैं, जिसके बदले में वे हमसे हमारी थोड़ी पूंजी लेते हैं.’

हालांकि अखबार ने हिंसा की निंदा की, लेकिन निष्कर्ष के तौर पर कहा, ‘हिंदू अच्छे नागरिक नहीं हैं.

द रिवैली ने लिखा, ‘हालांकि किसी भी अच्छे नागरिक को इस्तेमाल किए गये साधनों का विरोध करना चाहिए, मगर हिंदुओं के खिलाफ धर्मयुद्ध एक सामान्य तौर पर गहरी संतुष्टि का भाव जगाने वाला है और हिंदुओं के यहां से जाने से किसी को अफसोस नहीं होगा.’

सीएटेल मॉर्निंग टाइम्स  ने यह तर्क दिया कि यह ‘कोई नस्ल का सवाल नहीं है, बल्कि वेतन का सवाल है. यह लोगों का सवाल नहीं है, बल्कि जीवन पद्धति का सवाल है. यह देशों का मामला नहीं है, बल्कि जीवन की आदतों का मामला है… जब ऐसे लोग जिन्हें खाने के लिए मांस और सोने के लिए असली बिस्तरों की जरूरत होती है, उन्हें उनके रोजगार से उन शाकाहारियों के लिए जगह बनाने के लिए हटा दिया जाता है, जो किसी गंदे कोने में भी नींद का सुख ले सकते हैं, तब यह कहना मुश्किल हो जाता है कि आखिर किस सीमा पर क्रोध नैतिक नहीं रह जाता है.’

यहां यह स्पष्ट कर देना सही होगा कि हिंदुओं (वास्तव में सभी भारतीयों) को हाशिए पर डालने का काम सिर्फ तीन अक्षरों के संक्षिप्त नामों वाले एईएल जैसे नस्लवादी या सांप्रदायिक संगठन ही नहीं कर रहे थे.

व्यापक बुद्धिजीवी समाज भी इस गुनाह मे भागीदार था और उसने इन मान्यताओं को बड़े पैमाने पर वैधता देने का काम किया.

यह नफरत कितनी गहरी थी, इसका अंदाजा 1908 के एक कार्यक्रम के लिए बेचे गए टिकट में छपे हुए इन शब्दों से लगाया जा सकता है- ‘अपने बच्चों के लिए, एशियाटिक एक्सक्लूजन लीग टिकट… अच्छे लोगों और एक अच्छे मकसद के लिए वोट दीजिए.’

इस तरह से हिंसा और बच्चों को तराजू के दो पलड़ों पर रखा गया और हिंसा को अच्छे मकसद के नाम पर जाजय ठहराया गया.

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एशियाटिक एक्सक्लूजन लीग टिकट.

अगर आपको यह सब सुना-सुना सा लग रहा है, तो मुझे दोष मत दीजिए. मैं बस लिखे हुए शब्दों पर भरोसा करते हुए वही सामने रख रही हूं, जो इतिहास कहता है.

मैं अब उस बिंदु पर लौटती हूं, जहां से मैंने अपनी बात शुरू की थी. जब भी विश्वास और सच्चाई के बीच संघर्ष होता है, तब राजनीति अपनी भूमिका अदा करती है.

इस तरह से 4 फरवरी, 1917 को एशियाटिक बार्ड जोन एक्ट (एशियाई प्रतिबंधित क्षेत्र कानून) लागू किया गया, जिसका मतलब था कि प्रतिबंधत क्षेत्रों (जिनमें भारत भी शामिल था) का कोई व्यक्ति संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में दाखिल नहीं हो सकता था.

इस तरह से सभी भारतीयों- सिर्फ अकेले ‘हिंदू’ ही नहीं- को आव्रजन के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया गया जिसका आधार ऐसे विश्वास थे, जिनका सच से कोई लेना-देना नहीं था.

हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए. हमें गलतियों को नहीं दोहराना चाहिए, खासतौर पर तब मानवीय जीवन दांव पर लगा हुआ हो. हमें बेशकीमती इंसानी जिंदगियों के साथ राजनीति नहीं करनी चाहिए.

अंजना प्रकाश पटना हाईकोर्ट की पूर्व जज हैं और वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में वकालत करती हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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