रामाश्रय राय: देश के चुनाव संबंधी अध्ययनों को दिशा देने वाले राजनीतिशास्त्री

प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री और सीएसडीएस के संस्थापक सदस्यों में से एक रामाश्रय राय के लेखन में सैद्धांतिक गहराई और व्यावहारिक समझ का अनूठा संगम देखने को मिलता है. एक ओर वे समकालीन विचारकों से संवाद करते हैं, वहीं दूसरी ओर पाठकों को भारतीय राजनीति की ज़मीनी हक़ीक़त से भी रूबरू कराते चलते हैं.

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रामाश्रय राय. (फोटो साभार: सीएसडीएस)

प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री और सीएसडीएस के संस्थापक सदस्यों में से एक रामाश्रय राय के लेखन में सैद्धांतिक गहराई और व्यावहारिक समझ का अनूठा संगम देखने को मिलता है. एक ओर वे समकालीन विचारकों से संवाद करते हैं, वहीं दूसरी ओर पाठकों को भारतीय राजनीति की ज़मीनी हक़ीक़त से भी रूबरू कराते चलते हैं.

रामाश्रय राय. (फोटो साभार: सीएसडीएस)
रामाश्रय राय. (फोटो साभार: सीएसडीएस)

भारत में चुनाव संबंधी अध्ययनों को दिशा देने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री रामाश्रय राय का 10 अगस्त 2020 को 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया.

कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी (बर्कली) से राजनीति विज्ञान में पीएचडी करने वाले प्रो. रामाश्रय राय दिल्ली स्थित विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) के संस्थापक-सदस्य थे.

सीएसडीएस की स्थापना 1963 में हुई थी और इससे रजनी कोठारी, धीरूभाई शेठ, आशीष नंदी सरीखे समाज-वैज्ञानिक जुड़े रहे. रामाश्रय राय वर्ष 1976 से 1981 तक इसके निदेशक भी रहे.

वे भारतीय समाज विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर), जिसकी स्थापना वर्ष 1969 में हुई थी, के निदेशक भी रहे थे.

दिल्ली विश्वविद्यालय, यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सस-ऑस्टिन और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (लॉस एंजेल्स) में अध्यापन कार्य करने के साथ ही रामाश्रय राय भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (शिमला), गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान (इलाहाबाद) और भारतीय समाज विज्ञान अनुसंधान परिषद के फेलो भी रहे.

रामाश्रय राय के अकादमिक अध्ययन, चिंतन और शोध का दायरा कितना विस्तृत था, इसका अंदाजा उनके द्वारा लिखित और संपादित किताबों से लगाया जा सकता है, जिनकी संख्या चालीस से अधिक है.

रामाश्रय राय ने राजनीतिक दर्शन, विकास व अर्थशास्त्रीय अध्ययन, गांधी दर्शन व विचार, वैदिक दर्शन, भारतीय परंपरा व संस्कृति जैसे बहुविध विषयों पर अपनी लेखनी चलाई.

भारतीय चुनावों और मतदाताओं का अध्ययन

‘पॉलिटिक्स इन इंडिया’ सरीखी चर्चित पुस्तक लिखने वाले राजनीति शास्त्री रजनी कोठारी, धीरूभाई शेठ, गोपाल कृष्ण जैसे विद्वानों के साथ मिलकर रामाश्रय राय ने भारत में चुनावों, निर्वाचन-प्रक्रिया और मतदाताओं के रुझानों के विश्लेषण की सैद्धांतिकी विकसित की, जो अपनी सिद्धांत-रचना व परिकल्पना में भारतीय समाज व लोकतंत्र के अनुरूप थी.

वर्ष 1969 के मध्यावधि चुनावों का अध्ययन करते हुए रामाश्रय राय ने एक किताब लिखी ‘द अनसर्टेन वर्डिक्ट.’ भारत के चार राज्यों बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में हुए मध्यावधि चुनावों में सामने आए रुझानों का विश्लेषण करती यह किताब वर्ष 1972 में छपी.

इस किताब की भूमिका सीएसडीएस के संस्थापक रजनी कोठारी ने लिखी थी, जिसमें उन्होंने साठ के दशक में सीएसडीएस द्वारा शुरू किए चुनाव विश्लेषण, मतदाताओं के व्यवहार में आते बदलावों और भारतीय लोकतंत्र के स्वरूप के विस्तृत अध्ययन के महत्व पर प्रकाश डाला.

उल्लेखनीय है कि सीएसडीएस द्वारा इसी दौरान भारत में राजनीतिक दलों, चुनाव संबंधी अध्ययन और निर्वाचक मंडल में आई तब्दीलियों पर दो अहम किताबें प्रकाशित की गईं.  ये किताबें थीं : ‘पार्टी सिस्टम एंड इलेक्शन स्टडीज़’ (1967) और ‘कांटेक्स्ट ऑफ इलेक्टोरल चेंजेज़ इन इंडिया’ (1969).

इन अध्ययनों का उद्देश्य आम चुनावों में अभिव्यक्त होने वाली क्षेत्रीय विविधता और सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ को बारीकी से समझना था.

वर्ष 1967 के चुनावों के दौरान सीएसडीएस द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर किए गए अध्ययन के अंतर्गत रामाश्रय राय ने बिहार में चुनावों और मतदाताओं के सर्वेक्षण की ज़िम्मेदारी संभाली थी.

67 के ये आम चुनाव भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुए थे, जिनमें कई राज्यों में कांग्रेस पार्टी बहुमत हासिल करने में असफल रही.

1969 के मध्यावधि चुनावों में जिन राज्यों में कांग्रेस की हार हुई, वहां चुनाव जीतने वाले दलों को भी पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका था,जिससे राजनीतिक अनिश्चितता व अस्थिरता की स्थिति पैदा हुई.

रामाश्रय राय ने अपनी पुस्तक ‘द अनसर्टेन वर्डिक्ट’ में इसी अनिश्चितता और स्थायित्व के अभाव की परिघटना का विश्लेषण किया था.

इसी क्रम में उन्होंने भारतीय मतदाताओं की समझ, मतदाता और राजनीतिक प्रणाली, चुनावी संदर्भों और मतदाताओं के चयन के पीछे काम करने वाले सामाजिक-आर्थिक कारकों के बारे में भी विस्तार से लिखा.

जाहिर है कि इसमें भारतीय लोकतंत्र के तमाम संघटक तत्वों मसलन, राजनीतिक अभिजन, राजनीतिक दलों की भूमिका और मतदाताओं व निर्वाचक मंडलों के सामाजिक संदर्भों का भी गहन विश्लेषण शामिल था.

लोकतंत्र और भारतीय समाज

चुनावों के विश्लेषण के साथ-साथ रामाश्रय राय ने आज़ादी के बाद के दशकों में भारतीय समाज के स्वरूप में आते बदलावों का भी गहराई से अध्ययन किया.

प्रतिनिधि-मूलक लोकतंत्र, अस्मिता की राजनीति और हाशिये के समुदायों की लोकतंत्र में भागीदारी की प्रक्रिया को भी उन्होंने अपने अध्ययन का विषय बनाया.

उनके लेखन में सैद्धांतिक गहराई और व्यावहारिक समझ का अनूठा संगम देखने को मिलता है.

अपनी कृतियों में जहां एक ओर वे चार्ल्स टेलर, हैबरमास, फ्रांसिस फुकुयामा जैसे समकालीन राजनीतिक विचारकों से संवाद करते नज़र आते हैं, वहीं दूसरी ओर, वे अपने पाठकों को भारतीय राजनीतिक परिदृश्य की ज़मीनी हक़ीक़त और लोकतंत्र के यथार्थ से भी रूबरू कराते चलते हैं.

उनकी पुस्तक ‘दलित्स, डिवेलपमेंट एंड डेमोक्रेसी’ इसका एक बेहतरीन उदाहरण है, जो साल 1999 में छपी थी.

रामाश्रय राय ने लिखा है कि भारतीय लोकतंत्र में दलितों की भागीदारी और उनकी राजनीतिक नियति पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है. उनका मानना था कि भारत में दलितों की दयनीय सामाजिक-आर्थिक स्थिति लोकतंत्र और विकास के अंतरसंबंधों पर सवाल भी खड़े करती है.

आर्थिक विषमता और सामाजिक वंचना से जूझ रहे दलित समुदायों के लिए लोकतंत्र कितना प्रभावशाली साबित हुआ और दलितों के लिए लोकतंत्र के निहितार्थ क्या हैं, इसकी पड़ताल रामाश्रय राय ने इस किताब में बखूबी की.

रामाश्रय राय के अनुसार, राजनीतिक रूप से एकजुट शक्ति के रूप में दलितों के न उभर पाने और दलित समुदाय के भीतर भी बिखराव की वजह से कई बार दलित समुदाय सार्वजनिक निर्णय-प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर पाते. ये निर्णय अगर उनके हित को ध्यान में रखकर बनाए गए हों, तब भी भारतीय लोकतंत्र की विसंगतियों और सरकारी मशीनरी की खामियों के चलते उनका लाभ दलित समुदाय को नहीं मिल पाता.

उन्होंने दलित समुदायों को ‘चौथी दुनिया’ के रूप में देखा, जिनके नाम पर सरकार द्वारा नीतियों का निर्माण तो ज़रूर होता है, लेकिन हक़ीक़त में वे इन विकास योजनाओं के लाभ से वंचित रहने को अभिशप्त होते हैं.

रामाश्रय राय ने बिहार की अनुसूचित जातियों की सामाजिक-आर्थिक दशा में सुधार में पेश आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण किया और इसके समाधान भी सुझाए.

इस क्रम में उन्होंने देहातों की अर्थव्यवस्था में सुधार, रोजगार के अवसर पैदा करने और सामुदायिक सशक्तिकरण पर जोर दिया.

भारत में लोकतंत्र पर लिखी गई अपनी एक अन्य महत्वपूर्ण किताब ‘डेमोक्रेसी इन इंडिया’ (2005) में रामाश्रय राय ने भारत में लोकतंत्र की विकास-यात्रा, सामाजिक क्रांति, संघीय राज्य के अनुभवों, मौलिक अधिकारों और न्यायपालिका के साथ-साथ भारत में राजनीति और राजनीतिक दलों की भूमिका के बारे में विस्तारपूर्वक लिखा.

लोकतंत्र में भागीदारी और समानता सुनिश्चित न हो पाने पर उपजने वाले असंतोष की ओर भी उन्होंने ध्यान दिलाया.

साथ ही, प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र के राजनीतिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव और ‘संप्रभु नागरिक’ की छीजती हुई शक्ति को भी उन्होंने रेखांकित किया.

विकास की अवधारणा और उसकी सीमाएं

लोकतंत्र को उसकी समग्रता में जानने-समझने के क्रम में रामाश्रय राय ने विकास की अवधारणा और उसकी विसंगतियों का भी विश्लेषण किया.

नब्बे के दशक के आरंभिक वर्षों में प्रकाशित किताब ‘द वर्ल्ड ऑफ डेवेलपमेंट’ में रामाश्रय राय ने ‘विकास’ की आधुनिक धारणा, व्यक्ति व समाज के लिए उसके तात्पर्य की गहन चर्चा की.

हॉब्स, लॉक व रूसो सरीखे विचारकों की चिंतन प्रक्रिया से गुजरते हुए रामाश्रय राय ने दिखाया कि ‘विकास’ की धारणा कैसे बीसवीं सदी तक आते-आते एक विश्व-दृष्टि के रूप में उभरी, जिसमें व्यक्ति, समुदाय, उनके सरोकार व आकांक्षाएं, सामाजिक व्यवहार एवं राजनीतिक संस्थाएं सभी शामिल थीं.

विकास की यह धारणा आधुनिक मनुष्य के चिंतन व व्यवहार को आकार देने लगी.

रामाश्रय राय ने विकास की आधुनिक धारणा की सीमाओं को उजागर करते हुए लिखा कि यह मनुष्य और मनुष्य, मनुष्य और समाज, मनुष्य और प्रकृति के बीच भेद करते हुए उनमें अलगाव पैदा करती है.

विकास की धारणा का मूल्यांकन करते हुए उन्होंने सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया, सामाजिक न्याय, ज़रूरतों के सिद्धांत और सामाजिक तनाव, व्यक्तिगत और सामुदायिक हित, सामाजिक विविधता, आधुनिकीकरण और राष्ट्रीय एकीकरण की ऐतिहासिक प्रक्रिया को भी रेखांकित किया.

विकास की धारणा की विसंगतियों को इंगित करने के लिए जहां एक ओर उन्होंने राजनीतिक विचारकों और चिंतकों का सहारा लिया, वहीं दूसरी ओर आम लोगों से संवाद करते हुए भी उन्होंने विकास की अवधारणा की खामियों को समझने की कोशिश की.

संवाद की इस समाज-वैज्ञानिक शोध-पद्धति का बेहतरीन उदाहरण है, उनकी किताब ‘डायलॉग्स ऑन डिवेलपमेंट’ (1986). यह पुस्तक बिहार के वैशाली जिले के महनार विकास-खंड के बीस ग्रामीणों के साथ लोकतंत्र और विकास के अहम सवालों पर हुए संवाद का नतीजा थी.

उक्त किताब में रामाश्रय राय ने आम लोगों को अध्ययन का विषय (ऑब्जेक्ट) बनाने की बजाय उन्हें सत्य के अन्वेषण/खोज की प्रक्रिया का भागीदार बनाया.

आर.के. श्रीवास्तव के साथ लिखी गई इस किताब में रामाश्रय राय ने विकास और सामाजिक व्यवस्था, सरकार व समाज, समाज और आम लोगों की दृष्टि (विजन) और उनके सरोकारों के बारे में वैशाली के उन ग्रामीणों से संवाद किया और उनके द्वारा कही गई बातों के आधार पर अपने निष्कर्ष निकाले.

रामाश्रय राय ने लिखा कि ये ग्रामीण विकास की वर्चस्वशाली धारणा से असंतुष्ट थे और उनका पूरा जोर वर्तमान स्थिति को बदलने, जड़ता को तोड़ने और समाधान निकालने पर था.

गांधी और मौजूदा वैश्विक संकट

रामाश्रय राय की पहल पर भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान और नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय ने 1994 में ‘गांधी और वर्तमान वैश्विक संकट’ विषय पर एक सेमिनार आयोजित किया, जिसमें आधुनिकता की सभ्यता-समीक्षा करते हुए विद्वानों ने गांधी के विचारों को समग्रता में समझने का प्रयास किया.

इन विद्वानों में मृणाल मिरी, रामाश्रय राय, डीआर नागराज, रामचंद्र गुहा, अम्लान दत्त, ए. रघुरामराजू, थॉमस पैंथम, एके शरण, मीरा सिन्हा भट्टाचार्य, सीडी.नरसिंहैया, के. राघवेंद्र राव, केजे शाह शामिल थे.

बाद में रामाश्रय राय ने इस सेमिनार में प्रस्तुत लेखों का संपादन ‘गांधी एंड द प्रजेंट ग्लोबल क्राइसिस’ शीर्षक से किया था.

इस पूरे प्रयास में तीन मुख्य तत्व अंतर्निहित थे : पहला, आधुनिक संकट की प्रकृति और उसके स्वरूप की पहचान, उसकी व्याख्या और हमारे जीवन पर उसके प्रभाव का गहन विश्लेषण.

दूसरा, वैश्विक संकट के परिप्रेक्ष्य में और उससे उबरने की राह तैयार करने हेतु गांधी-विचार की प्रासंगिकता.

तीसरा, युवा पीढ़ी में गांधी दर्शन के प्रति लगाव पैदा करना और उनमें विवेकसंपन्न सृजनशीलता का विकास.

हिंदी में समाज-वैज्ञानिक लेखन को बढ़ावा देने पर उनका जोर रहा. उन्होंने ख़ुद भी हिंदी में ‘सामुदायिकता का आधार : एक अनुशीलन’ (1994) जैसी महत्वपूर्ण किताब लिखी.

कहना न होगा कि रामाश्रय राय ने भारतीय लोकतंत्र, चुनाव-प्रक्रिया, मतदाताओं के व्यवहार को समझने की सैद्धांतिकी विकसित करने के साथ ही आधुनिकता और परंपरा के अंतर्द्वंद्व, हाशिये के समुदायों की लोकतंत्र में भागीदारी, विकास की धारणा की विसंगतियों पर भी अपने विचारोत्तेजक लेखन से लोगों का ध्यान खींचा.

भारतीय समाज-विज्ञान में उन्होंने संवाद की प्रक्रिया पर आधारित जिस शोध-पद्धति का सूत्रपात किया, वह आज और भी प्रासंगिक हो चली है.

(लेखक बलिया के सतीश चंद्र कॉलेज में पढ़ाते हैं.)