लोकतंत्र बचा सकने वाली अकेली संस्था ही इसका गला घोंटने में मदद कर रही है

भारत में अक्सर न्यायिक आज़ादी के रास्ते में कार्यपालिका और कभी-कभी विधायिका द्वारा बाधा डालने की संभावनाएं देखी जाती हैं, लेकिन जब न्यायपालिका के भीतर के लोग ही अन्य शाखाओं के सामने झुक जाते हैं, तो स्थिति बिल्कुल अलग हो जाती है.

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(फोटो: रॉयटर्स)

भारत में अक्सर न्यायिक आज़ादी के रास्ते में कार्यपालिका और कभी-कभी विधायिका द्वारा बाधा डालने की संभावनाएं देखी जाती हैं, लेकिन जब न्यायपालिका के भीतर के लोग ही अन्य शाखाओं के सामने झुक जाते हैं, तो स्थिति बिल्कुल अलग हो जाती है.

(फोटो: रॉयटर्स)
(फोटो: रॉयटर्स)

आज मैं जिस विषय पर बोलने आया हूं, मेरा मानना है वह हमारे समय का सबसे परेशान करनेवाला सवाल बनकर उभरा है: भारत के सुप्रीम कोर्ट का पतन. एक पूर्व जज के तौर पर, और कुछ नहीं तो, कम से कम ख़तरे की चेतावनी देना मेरा फर्ज बनता है.

राजनीतिक विचारक एंडमंड बर्क ने कहा था कि जजों को इसलिए प्रशिक्षित किया जाता है, ताकि वे कुशासन की पहचान कर पाएं और ख़ासतौर पर हर सियासी बयार में छिपी दमन की आहट को सूंघ सकें.’

हमें ऐसे ही कोर्ट की जरूरत है, लेकिन बदकिस्मती से आज हमारे पास ऐसा कोर्ट नहीं है. भारत के सुप्रीम कोर्ट का इतिहास काफी शानदार रहा है जिस पर इसे गर्व होना चाहिए.

केशवानंद भारती मामले में 13 जजों की संवैधानिक पीठ ने जैसी नेतृत्व क्षमता दिखाई, जिसमें बुनियादी ढांचे (बेसिक स्ट्रक्चर) का सिद्धांत दिया गया था और संविधान को फिर से न्यायिक निगरानी में ले आया गया था, वह कोर्ट की क्षमता का बस एक चमकदार उदाहरण है.

निश्चित ही, ग्रैनविल ऑस्टिन ने कहा कि कोर्ट ने खुद को संविधान के ‘तार्किक, प्राथमिक रक्षक’ और ‘इसके व्याख्याकार और अभिभावक’ के तौर पर स्थापित किया था.

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी शुरुआत एक निष्क्रिय कोर्ट के तौर पर की. धीरे-धीरे मगर यकीनी तौर पर एक संस्थान के तौर पर राष्ट्र के प्रशासन में अपनी भूमिका समझकर इसने अपने प्राधिकार का विस्तार किया और इस तरह से भविष्य में एक एक्टिविस्ट की भूमिका के लिए खुद को तैयार किया.

केशवानंद भारती मामला इन सबका प्रस्थान बिंदु था. बाद के वर्षों में ऐसे कई फैसले आए जिसने सुप्रीम कोर्ट की पहचान को और पुख्ता किया. इनमें से कुछ उल्लेखनीय वाद थे मेनका गांधी, फ्रांसिस कोरेली मलिन, इंटरनेशनल एयरपोर्ट अथॉरिटी आदि, जिनमें अनेक प्रकार से सम्यक प्रक्रिया (ड्यू प्रोसेस) का सिद्धांत स्थापित किया गया और संविधान के अनुच्छेद 21 में शामिल अधिकारों के दायरे को बढ़ाया गया.

जनहित याचिका (पीआईएल) के ‘आविष्कार’ ने एक नए युग की शुरुआत की जिसे ‘समाजवादी न्यायिक’ युग कहा जाता है, जहां कोर्ट की एक्टिविस्ट की भूमिका अहम हो गई.

1990 के उत्तरार्द्ध में अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इसने पर्यावरणीय सुरक्षा जैसे क्षेत्रों के अहम सवालों का निपटारा करने के लिए अपेक्षाकृत अनदेखे इलाकों में पहल की.

ऐसा करते हुए यह कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में भी दाखिल हुआ जिसके लिए इसकी चौतरफा आलोचना हुई. यह आलोचना गैरजरूरी नहीं है.

और भले इसके अपने फायदे हैं, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि कुछ मौकों पर पीआईएल का दुरुपयोग भी किया गया. मगर यह इस बारे में बात करने की जगह नहीं है.

ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के खाते में उतार-चढ़ाव नहीं आए. सबसे कुख्यात तरीके से, एडीएम जबलपुर मामला कोर्ट के अपने रास्ते से भटक जाने का क्षण था. उसके बाद के वर्षों में संस्थान की प्रतिष्ठा को फिर से बहाल करने की कोशिश पूरी शिद्दत के साथ की गई.

1980 और 1990 के दशक में इसकी प्रतिष्ठा ने फिर से पलटी खाई और एक संक्षिप्त दौर के लिए ऐसा लगा कि कोर्ट ने एक सजग संतरी की भूमिका फिर से अख्तियार कर ली है, जैसा बने रहने की उम्मीद पहली पीढ़ी के जजों ने की थी.

लेकिन अब ऐसा लगता है कि हम एक बार फिर पीछे की ओर लौट गए हैं और आपातकाल की दुर्घटना फिर से न दोहराई जाए, इसलिए हमें तत्काल नींद से जगाए जाने की जरूरत है.

एक अतिशक्तिशाली कार्यपालिका

आप यह सवाल कर सकते हैं कि यह सब बताने की क्या प्रासंगिकता है? कागज पर हम एक उदारवादी, लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य हैं, जिसके सभी चक्के अपनी जगह पर सलामत हैं.

हमारे पास मौलिक अधिकार हैं जो अभेद्य सी दिखने वाली दीवार के पीछे महफ़ूज हैं. शासन की संसदीय प्रणाली, शक्तियों के विभाजन और केंद्र और राज्यों के बीच जिम्मेदारियों के परिसंघीय बंटवारे के तौर पर हमारे पास एक ऐसा तंत्र है जो अनेक लोगों के लिए ईर्ष्या का कारण है.

कागज पर सर्वशक्तिमान कार्यपालिका को जनता के प्रति विधायिका के मार्फ़त और संविधान और कानून के शासन के प्रति न्यायपालिका के मार्फ़त जवाबदेहद बनाया गया है; साथ ही महालेखा परीक्षक, चुनाव आयोग, मानवाधिकार आयोग, भ्रष्टाचार निरोधी निकायों और इनके अलावा प्रेस, अकादमिक जगत और सिविल सोसाइटी, के मार्फत से भी जवाबदेह बनाया गया है.

लेकिन याद रखिए, दुर्भाग्यजनक ढंग से यह सब सिर्फ कागज पर है.

आज भारत में, हर संस्थान, व्यवस्था या उपकरण जिनकी तामीर कार्यपालिका की जवाबदेही तय करने के लिए की गई थी, उन्हें योजनाबद्ध ढंग से नष्ट किया जा रहा है.

यह ध्वंस 2014 में भाजपा सरकार के शासन में आने के बाद शुरू हुआ. इसकी तुलना अक्सर लोग अतीत में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा किए गए ध्वंस से करते हैं, लेकिन तुलनाएं गलत होती हैं.

आज हमारा सामना एक ऐसी शक्ति से है जिसका मकसद कार्यपालिका में सारी शक्ति निहित करके लोकतांत्रिक शासन को व्यवहार में खोखला और बेजान कर देना है.

हाल के समय में उजागर हुई संसद की विभिन्न कमजोरियों में से कमजोरी यह भी रही है कि कोविड-19 के कारण लगाए गए लॉकडाउन के दौरान इसकी एक भी बैठक नहीं हुई और जब आख़िरकार इसकी बैठक बुलाई गई, तो प्रश्नकाल को समाप्त कर दिया गया.

अगर संसद शक्तिहीन कर दी गई है, तो दूसरी संस्थाओं को कार्यपालिका पर अंकुश लगाए रखने के लिए सामने आना चाहिए था, लेकिन जमाना हो गया हमने लोकपाल के बारे में कुछ भी नहीं सुना है.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नींद में है. हल्का-सा भी मौका मिलने पर जांच एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है. ऐसा लगता है कि भारत के चुनाव आयोग ने भी संदेहास्पद तरीके से घुटने टेक दिए हैं. सूचना आयोग पर लगभग ताला-सा लगा हुआ है.

यह सूची लंबी और परेशान करने वाली है. यहां तक कि अकादमिक जगत, प्रेस और सिविल सोसाइटी को भी सुनियोजित ढंग से नष्ट कर दिया गया है या चुप करा दिया गया है.

विश्वविद्यालयों पर रोज हमले हो रहे हैं. विद्यार्थियों पर दंगे करने के और शिक्षकों पर आपराधिक साजिश रचने का आरोप लगाए जा रहे हैं. लोकतंत्र की पूर्वाग्रह मुक्त मुख्यधारा का चौथा खंभा कब का काल-कवलित हो गया है.

और सिविल सोसाइटी की आवाज को विभिन्न तरीकों से धीरे-धीरे मगर यकीनी तौर पर दबा दिया गया है. लेकिन सबसे ज्यादा चिंताजनक है न्यायपालिका की स्थिति.

ऐसे कई अहम मसले हैं, जिन पर आज बात किए जाने की जरूरत है. ऐसे में जबकि संसद की ताकत पहले ही छीन ली गई है, कश्मीर के तीन हिस्से में विभाजन, नागरिकता संशोधन कानून की संवैधानिक वैधता, इस कानून के विरोधों का दमन और उनका अपराधीकरण, राजद्रोह और गैरकानूनी (गतिविधियां) रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) जैसे दमनकारी कानूनों और चुनावी बॉन्ड्स आदि के बारे में बात करने के लिए दूसरी सबसे अच्छी जगह सुप्रीम कोर्ट ही हो सकता था.

लेकिन दुखद तरीके से इनमें से ज्यादातर को नजअंदाज कर दिया गया है या ख़ारिज कर दिया गया है या रहस्यम तरीके से अनिश्चित काल तक के लिए लंबित छोड़ दिया गया है.

हम भले युद्ध की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन हम एक ऐसी आपातकाल की स्थिति में जरूर हैं, जो कि पीढ़ियों में सुनी या देखी नहीं गई है.

इन सबके केंद्र में, और निश्चित तौर पर जिसको लेकर मैं सबसे ज्यादा चिंतित हूं, वह है सुप्रीम कोर्ट की भूमिका.

सुप्रीम कोर्ट के पतन की शुरुआत

मेरी नजर में कोर्ट के पतन की शुरुआत 2014 में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के बहुमत में आने के साथ हुई.

इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा कि एनडीए सरकार एक नई राजनीतिक लहर साथ लेकर आई: एक विचारधारा जो हमारे अब तक के अनुभवों- जिसके हम आदि हो चुके थे- से कम मध्यमार्गी थी और निस्संदेह यह अपने खुद के पिछले अवतार की तुलना में कहीं ज्यादा दक्षिणपंथी थी.

सुप्रीम कोर्ट की यह फिसलन कोई संयोग नहीं, बल्कि कार्यपालिका द्वारा तैयार की गई एक ज्यादा बड़ी और सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद राज्य के विभिन्न अंगों पर कब्जा करके अपने राजनीतिक एजेंडा को साधना है.

एनडीए के सत्तासीन होने के ठीक बाद 2015 में (न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच) एक टकराव राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (नेशनल जुडिशल अपॉइंटमेंट कमीशन) अधिनियम की संवैधानिक वैधता के सवाल पर हुआ.

कोर्ट ने अपनी आजादख्याली का साहसी इजहार करते हुए इस कानून को निरस्त कर दिया. इसमें शक नहीं कि 2014 में बनी नई सरकार के साथ कोर्ट के रिश्ते की शुरुआत काफी अच्छी रही.

ज्यादातर मामलों में कोर्ट कार्यपालिका के खिलाफ अपनी जमीन पर मजबूती के साथ पांव टिकाए रहा और न्यायिक नियुक्तियों के मामले में इसका प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा. लेकिन अफसोसजनक ढंग से यह बीती हुई बात हो गई है.

यह सबको पता है कि सभी उच्च न्यायालयों में कई बार नए जजों की नियुक्तियां और वर्तमान जजों के तबादलों का फैसला या उसके लिए भूमिका तैयार करने का काम कानून मंत्रालय द्वारा किया जाता है.

जस्टिस अकील क़ुरैशी, जस्टिस मुरलीधर, जस्टिस जयंत पटेल के तबादलों के हालिया मामले हर तरह से सवाल खड़े किए जाने लायक थे, लेकिन कोर्ट ने इनको लेकर एक शब्द भी नहीं कहा और जजों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने पर अपनी रजामंदी दे दी.

एनजेएसी वाले मामले में कोर्ट ने जिस आज़ादख़्याली का इजहार किया था, उससे छुटकारा पा लिया गया है.

जनवरी, 2018 में (जजों के) प्रेस कॉन्फ्रेंस के तौर पर बिजली की कौंध की तरह एक छोटा-सा बदलावकारी क्षण आया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के चार जज इतिहास में पहली बार न्यायिक प्रशासन और प्रबंधन के सवालों को लेकर अपनी शिकायतों के साथ जनता से मुख़ातिब हुए.

जनवरी 2018 में चार वरिष्ठ जजों ने सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक से न चलने को लेकर देश के इतिहास में पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)
जनवरी 2018 में चार वरिष्ठ जजों ने सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक से न चलने को लेकर देश के इतिहास में पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

आत्माभिव्यक्ति की कुछ चिंगारियां कभी-कभी दिखाई दीं, मसलन, पुट्टास्वामी या श्रेया सिंघल वाले मामले में, जिसमें सूचना तकनीकी (इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) अधिनियम की धारा 66 ए को निरस्त कर दिया गया- पहली बार किसी कानून को अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन करने के लिए निरस्त किया गया- या समलैंगिकता को अपराध से मुक्त करनेवाले फैसले में या ट्रांसजेंडरों के अधिकारों की स्वीकृति या लैंगिक (जेंडर) न्याय से संबंधित मामलों में, जैसे व्यभिचार, तीन तलाक और सशस्त्र बलों में प्रमोशन के मामले में.

लेकिन यहां इस बात पर ध्यान दिया जा सकता है कि- अनुच्छेद 66 ए के अपवाद को छोड़कर कार्यपालिका वास्तव में बाकी के किसी मामलों को लेकर चिंतित नहीं है.

लेकिन जहां कार्यपालिका सक्रिय रूप में दिलचस्पी रखता दिखती है और- सामान्य तौर पर राजनीतिक एजेंडा के लिए- जनता के अधिकारों को कमजोर करना चाहती है, आप पाएंगे कि कोर्ट के हाथ बंधे नजर आते हैं.

लेकिन, वैसे मामलों में जिनमें कार्यपालिका एक पक्ष लेती है, उनमें कोर्ट जिस तत्परता से घुटने टेक देती है, उसने लोगों का ध्यान खींचा है.

इंडियन एक्सप्रेस की एक न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सुप्रीम कोर्ट के हाल के दस सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से सिर्फ चार इस आज़ादी के अधिकार का दावा करने वाले व्यक्ति के हक में गए हैं.

ध्यान देने की बात है कि इन चारों मामलों में सरकार ने या तो याचिकाकर्ता का समर्थन दिया या अपनी कोई आपत्ति प्रकट नहीं की.

इसके उलट जिन मामलों में सरकार ने विरोध किया, उन मामलों का फैसला व्यक्ति के पक्ष में न होकर सरकार के पक्ष में हुआ. सारे मामलों में कोर्ट का रवैया कुछ ऐसा ही दिख रहा है.

सामान्य तौर पर अभिव्यक्ति की आज़ादी के मामले में कोर्ट का तेवर काफी सख्त नजर आ रहा है, जैसा कि प्रशांत भूषण वाले मामले में देखा जा सकता है.

अपनी स्वघोषित दरियादिली के प्रदर्शन में कोर्ट ने दो ट्वीट्स को लेकर भूषण के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे अवमानना के मामले में 1 रुपये का जुर्माना लगाकर उन्हें छोड़ भले दिया, लेकिन उनके आचरण की निंदा करने से गुरेज नहीं किया.

इस पूरी सुनवाई के दौरान एक बात साफ थी: कोर्ट ने ख़ुद को एक असहिष्णु संस्थान के तौर पर पेश किया.

सच्चाई यह है कि सुप्रीम कोर्ट के शानदार न्यायशास्त्र का दौर बीत चुका है. लगता है कि आज उस बेहतरीन अतीत की बस यादें ही बाकी हैं.

हमें हाल ही में पुट्टास्वामी मामले में बताया गया कि एडीएम जबलपुर केस अब कहीं गहरे में दफ़न हो चुका है, लेकिन मुझे डर है कि उसके काले साये कभी भी वापस लौट सकते हैं.

भुला दी गईं आजादियां

कोर्ट के पतन का सबसे जीता-जागता सबूत एक बहुसंख्यकवाद प्रतिरोधी कोर्ट के तौर पर काम करने में इसकी नाकामी है. मैं प्रति-बहुसंख्यकवाद पर जोर दे रहा हूं, क्योंकि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा में कोर्ट की भूमिका को स्वीकार करना महत्वपूर्ण है.

एक लोकतंत्र बहुमत की इच्छा की नुमाइंदगी करके अपनी वैधता ग्रहण करता है. लेकिन यह वैधता एक कीमत पर आती है, जिसे हमेशा अल्पसंख्यक समूहों को चुकाना पड़ता है, खासकर उन्हें जो पसंद नहीं किए जाते हैं या पूर्वाग्रह के शिकार होते हैं और जो किसी भी तरह से विधायिका को प्रभावित नहीं कर सकते हैं.

बहुमत की ज्यादतियों से अल्पसंख्यकों की रक्षा करने की शक्ति न्यायिक समीक्षा की शक्ति का आधार है जो कोर्ट को संविधान का उल्लंघन करने वाले कानूनों को निरस्त करने की इजाजत देती है.

अब ऐसा लगता है कि कोर्ट ने अपने ही दशकों के इतिहास को मुंह मोड़ लिया है, बल्कि बिना किसी झिझक के और बगैर कोई सवाल पूछे बहुसंख्यकवादी नजरिये की डफली बजा रहा है.

सबरीमाला और अयोध्या के दो हालिया मामलों ने इस बात को साफतौर पर दिखाया.

सबरीमाला पर 2018 का सुप्रीम कोर्ट का असली फैसला बेहद प्रगतिशील था: इसने केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की इजाजत दे दी.

लेकिन जब केरल की राज्य सरकार ने कोर्ट के फैसले को लागू करने की कोशिश की, तब भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार अयप्पा श्रद्धालुओं के साथ खड़ी हो गई.

सबरीमाला मंदिर (फोटो साभार: facebook.com/sabrimalaofficial)
सबरीमाला मंदिर (फोटो साभार: facebook.com/sabrimalaofficial)

कोर्ट का निर्णय अंतिम होना चाहिए था, लेकिन केंद्र सरकार का ऐसा मानना नहीं था. इसके ठीक बाद समीक्षा याचिकाएं दायर की गईं, लेकिन इन्हें कुछ संदर्भित सवालों का फैसला बड़ी बेंचों द्वारा किए जाने के नाम पर लंबित रखा गया.

मुख्य फैसले को स्थगित नहीं किया गया था, लेकिन कोर्ट ने कहा कि बड़ी बेंच के पास सवालों को भेजने का मतलब था कि फैसला ‘अंतिम नहीं था’ और इसलिए इसने सबरीमाला में सुरक्षित प्रवेश की मांग करने वाली याचिका पर कोई निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया.

इसने दुस्वप्नों के ऐसे मधुमक्खी के छत्ते को खोल दिया, जिसके लिए हमें अपने जीते-जी पछताना पड़ सकता है: इसका मतलब था कि केंद्र सरकार कानून से ऊपर उठकर सुप्रीम कोर्ट की उपेक्षा कर सकती है; और फैसलों को सुविधाजनक ढंग से समीक्षा के नाम पर संदर्भ के जरिये ‘फिर से खोला’ जा सकता है.

कानून के शासन के लिए इसके क्या निहितार्थ  हैं?

कानून के शासन और अंतिमता का सवाल अयोध्या फैसले में भी आया. बुनियादी तौर पर एक राजनीतिक मामले पर अपने सर्वसम्मति के लेकिन असामान्य ढंग के बेनाम फैसले में कोर्ट ने कहा कि संपत्ति को तीन भागों में बांटने का इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला शांति और सौहार्द बनाए रखने के हिसाब से ‘व्यावहारिक’ नहीं था.

लेकिन सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूर्ण न्याय है? यह स्वीकार करने के बावजूद कि 1949 और 1992 में हिंदुओं द्वारा गैरकानूनी कृत्य किए गए, कोर्ट ने प्रभावी ढंग से दोषियों को पुरस्कृत किया.

निश्चित तौर पर यह समता के सिद्धांत के विरुद्ध है, जिसमें कहा गया है कि किसी को पाक-साफ होकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए.

ठीक वैसे ही जैसे कि केंद्र सरकार ने सबरीमाला के मामले में कानून को अंगूठा दिखाया है, अयोध्या मामले में भी हिंदू महासभा ने 1992 के विध्वंस और हिंसा में शामिल कारसेवकों के खिलाफ आपराधिक मामले वापस लेने पर जोर डाला.

इसने कारसेवकों को सरकारी पेंशन देने और मस्जिद की जगह पर बनने वाली मंदिर में इनके नामों की सूची लगाए जाने की मांग भी की! कुछ ऐसे, जैसे कि वे स्वतंत्रता सेनानी हों!

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामला जरूर से चलना चाहिए, लेकिन बड़ी तस्वीर के भीतर रखकर देखें, तो मुझे शक है कि कोई अर्थवान नतीजा निकलेगा.

संवैधानिक प्रतिबद्धताएं

संविधान के प्रति प्रतिबद्ध रहने में नाकामी, जैसा कोर्ट द्वारा अनुच्छेद-21 की न्यायिक व्याख्या में दिखा है, दिन-ब-दिन ज्यादा स्पष्ट होती जा रही है.

कोविड-19 से उपजे भीषण सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट ने प्रवासी मजदूरों के जीवन को उलट-पलट दिया: उनके पास कोई काम नहीं बचा, आमदनी का कोई जरिया नहीं बचा, बुनियादी जरूरतों तक उनकी पहुंच नहीं रही और अपने घरों तक पहुंचने का कोई साधन नहीं रहा.

लेकिन इस हालात पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं को स्वीकार करने की जगह कोर्ट ने या तो इन याचिकाओं को स्वीकार करने से इनकार कर दिया या इन्हें आगे के लिए टाल दिया.

इन याचिकाओं को खारिज करके या आगे के लिए टालते हुए कोर्ट ने कई ऐसी टिप्पणियां कीं, जो सवाल पैदा करते हैं: इसने कहा कि सरकार ने पहले ही मजदूरों के लिए दो शाम के खाने की व्यवस्था कर दी है, तो ऐसे में उनको और किस चीज की (निश्चित ही ‘मजदूरी नहीं ही) जरूरत पड़ सकती है; और रेल की पटरियों पर सोते हुए मजदूरों कर मृत्यु की भयावह घटनाओं को टाला नहीं जा सकता था क्योंकि आखिर ‘ऐसी घटनाओं को कोई कैसे रोक सकता है.’

(फोटो: रॉयटर्स)
(फोटो: रॉयटर्स)

कोर्ट के ऐसे तथाकथित बहानों का जवाब पहले के फैसलों में दिया गया है, खासकर नीति और गैर-न्यायिक हस्तक्षेप के सवाल का. उदाहरण के लिए, भोजन का अधिकार, कई पर्यावरण सुरक्षा नीतियां.

इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने नीतियां बनाईं और राज्यों को उन्हें लागू कराने के लिए कहा.

प्रवासी मजदूरों के मामले में, इसने एक दुर्भाग्यपूर्ण धारणा सामने रखी कि हालात पर सबसे बढ़िया फैसला करने की स्थिति में सरकार है.

कोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लेने में भी जरूरत से ज्यादा देरी कर दी. इसकी जगह इस दौर में उच्च न्यायालय तार्किकता, हिम्मत और संवेदना के साथ सामने आए और उन्होंने प्रवासियों के अधिकारों को लेकर सवाल पूछे.

इसकी तुलना जरा सॉलिसिटर जनरल के अजीब दावे पर सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया से कीजिए. सॉलिसिटर जनरल का कहना था कि श्रमिकों का पलायन की वजह फेक न्यूज है: कोर्ट ने इसे दावे को स्वीकार कर लिया और मीडिया संस्थानों को ज्यादा जिम्मेदारीपूर्वक रिपोर्टिंग करने की सलाह दी.

अफसोसजनक ढंग से आज हमारे सुप्रीम कोर्ट के पास बिलियन डॉलर के भारतीय क्रिकेट प्रशासन के लिए वक्त है या एक बड़े नामचीन पत्रकार की शिकायत के लिए उसके पास वक्त है, लेकिन इसने लाखों प्रवासियों की असली पीड़ा को नजरअंदाज कर दिया, जिनके पास न तो पैसा है, न ही उनकी ऐसी हैसियत है कि वे दूसरे वादियों के साथ कोर्ट के दुर्लभ समय के लिए प्रतियोगिता कर सकें.

अधिकारों का हनन

विरोध करने और अभिव्यक्ति के अधिकार का जिस तरह से गला घोंटा जा रहा है, वह एक अन्य प्रकार का दमन है, जिसकी कोई मिसाल शायद आधुनिक भारत में नहीं मिलती है.

इसकी कमान कार्यपालिका ने संभाली हुई है और न्यायपालिका या तो प्रत्यक्ष तौर कार्यपालिका से से सहमति जता रही है या इस मुद्दे को लेकर चुप्पी ओढ़े हुए है.

अगर हम एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक होने पर गर्व करना चाहते हैं, तो यह पहली चीज है कि जिससे हमें चिंतित होना चाहिए. मिसाल के लिए असंवैधानिक नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को ले सकते हैं.

इस कानून की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन कोर्ट ने तुच्छ कारणों से इस मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया. इस बीच सरकार ने विरोध प्रदर्शनकारियों को चुप कराने की जी-तोड़ कोशिश है.

(फोटो: पीटीआई)
(फोटो: पीटीआई)

निश्चित तौर पर किसी और सभी विरोधी विचारों को चुप कराने और किसी भी संभव वैकल्पिक नजरिये पर लगाम लगाने के लिए सरकार अपने तरकश में मौजूद हर तीर चल रही है.

ज्यादा समस्या की बात यह है कि न्यायपालिका बिना एक भी शब्द कहे मूकदर्शक की तरह यह सब होता हुआ देख रही है. विभिन्न राज्यों में अलग-अलग रणनीतियां अपनाई जा रही हैं.

उत्तर प्रदेश में इसके मुख्यमंत्री ने कहा कि विरोध प्रदर्शनकारियों से ‘बदला’ लेंगे और ‘आज़ादी’ का नारा लगाना राजद्रोह के बराबर माना जाएगा!

पुलिस को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करनेवालों की गिरफ्तारी करने, वाहनों को नष्ट करने और यहां तक कि उनके घरों में घुसकर उनके खिलाफ कोई भी का दमन करने का लाइसेंस दे दिया गया है. उनके निशाने पर सामान्य तौर पर मुस्लिम युवा होते हैं.

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून और गुंडा एक्ट का मिला-जुलाकर इस्तेमाल किया गया. लेकिन इन संदर्भ में सबसे ज्वलंत उदाहरण निश्चित तौर पर दिल्ली के दंगे रहे हैं.

सरकार ईमानदार तरीके से अपनी राय रखने वालों, ईमानदार विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वालों और कुछ मामलों में तो नाटकों का मंचन करने वालों को भी निशाना बना रही है!

निहत्थे विद्यार्थियों पर पुलिस द्वारा हमला किया गया है. निजाम के प्रति आलोचनात्मक रुख रखने वाले किसी भी व्यक्ति, जैसे अपूर्वानंद और योगेंद्र यादव, को हल्का-सा भी मौका पाकर फंसाने की कोशिश की जा रही है, इस बात की परवाह किए बगैर कि उनका इरादा क्या है.

दिल्ली में व्यक्तियों पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (यूएपीए) के अलावा दंगे फैलाने, गैरकानूनी सम्मेलन, आपराधिक साजिश और राजद्रोह, जो कि एक गैरकानूनी औपनिवेशिक धरोहर है, के तहत आरोप लगाने की रणनीति अपनाई गई है.

आम नागरिकों के साथ किए जा रहे इस व्यवहार की तुलना सत्ताधारी भाजपा के प्रमुख नेताओं के साथ किए जा रहे बर्ताव के साथ कीजिए, जिन्होंने सार्वजनिक तौर पर भड़काऊ भाषण दिए. लेकिन दुखद तरीके से उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई.

इसकी जगह कार्रवाई करने की थोड़ी सी मंशा जाहिर करने वाले एक जज का सुविधाजनक ढंग से तबादला कर दिया गया.

गिरफ्तारियों का एक निश्चित पैटर्न रहा है: अगर कोई व्यक्ति सीएए के खिलाफ कोई वैध नजरिया सामने रखता है, तो उस पर तत्काल देशद्रोही का लेबल चिपका दिया जाता है और कानून मशीनरी सक्रिय हो जाती है.

इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि सीएए साफतौर पर एक असंवैधानिक कानून है.

पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों का मकसद एक ‘सशस्त्र क्रांति के द्वारा देश में एक अलगाववादी आंदोलन को अंजाम देना था’ जिसमें ‘सरकार को अस्थिर करने के लिए उचित समय पर मुस्लिमों के मन में सरकार विरोधी भावनाओं का इस्तेमाल किए जाने की योजना थी.’

पूर्व पुलिस अधिकारी जूलियो रिबेरो ने दिल्ली दंगों में निष्पक्ष जांच के अभाव की ओर ध्यान दिलाया है और 1984 के दंगों से इसकी समानता दिखाई है.

उन्होंने ठीक ही कहा है कि ‘भारत में दंगों की पुनरावृत्ति उस समय की सरकार द्वारा एक वर्ग को कानूनी सुरक्षा मुहैया कराने के कारण होती है.’

दंगों में पुलिस की जांच ठोस सबूतों की जगह सिर्फ ‘खुलासों’ पर आधारित रही है. निश्चित तौर पर यह निष्पक्ष जांच के सभी सिद्धांतों के उलट है.

शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने, लेकिन हेट स्पीच देने वालों के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध का आरोप दर्ज करने में जानबूझकर नाकाम रहने के कारण दिल्ली पुलिस पर पक्षपात और राजनीतिक तौर पर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने का आरोप लगे हैं.

पुलिस द्वारा भी बहुसंख्यकवादी पक्ष लेने के कारण बहुसंख्यक समुदाय द्वारा की गई हिंसा के असली गुनहगारों को बच निकलने की इजाज़त मिल गई है.

(फोटो: पीटीआई)
(फोटो: पीटीआई)

आखिर राजनीतिक सत्ता और पुलिस में इतना साहस कहां से आ गया है? इसमें कोई शक नहीं है कि यह भारत की वर्तमान कमजोर न्यायपालिका के कारण है.

अगर सुप्रीम कोर्ट इन सबका मूकदर्शक नहीं रहता और इसने ज्यादा सक्रियता के साथ हस्तक्षेप किया होता तो कहा जा सकता है कि यह सब नहीं हुआ होता.

लेकिन इसकी जगह सुप्रीम कोर्ट ने सुविधाजनक ढंग से हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और उसने इन समस्याओं से निपटने को लेकर कोई तत्परता नहीं दिखाई.

हफ्तों तक इन मसलों से संबंधित मामले (मिसाल के लिए दिल्ली दंगे) बार-बार स्थगित होते रहे. जहां मामलों की सुनवाई हुई और उन पर फैसला लिया गया, वहां भी हमारा सामना एक न्यायिक चुप्पी से हुआ.

जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने होर्डिंग्स पर लगाई गई प्रदर्शनकारियों की तस्वीरों को 24 घंटे के भीतर हटाने का निर्देश दिया, क्योंकि कानून ऐसा करने की इजाज़त नहीं देता, तब सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने राज्य सरकार के इस कदम को गैरकानूनी करार देने के उच्च न्यायालय के फ़ैसले पर सहमति तो जताई, लेकिन रहस्यमय ढंग से इस मामले को एक तीन जजों की बेंच के पास भेज दिया, जिसने प्रभावी रूप में राज्य को उच्च न्यायालय के आदेश को नजरअंदाज करने की इजाज़त दे दी.

जैसे इतना ही काफ़ी न हो, यूएपीए की व्याख्या से संबंधित एनआईए बनाम जहूर वटाली मामले में सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल, 2019 के फ़ैसले ने इस कानून से संबंधित निचले स्तर पर किए जाने वाले सभी फैसलों को प्रभावित किया है.

इस फैसले ने एक नया सिद्धांत गढ़ा है, जिसके मुताबिक प्रभावी तौर पर, एक आरोपी को सुनवाई (ट्रायल) की पूरी अवधि के दौरान हिरासत में ही रहना होगा, भले ही अंत में यह साबित हो जाए कि व्यक्ति के ख़िलाफ़ पेश गया सबूत स्वीकार्य नहीं था और आरोपी को आख़िरकार बरी कर दिया जाए.

यह कुतर्क पूरी तरह से बेतुकेपन पर टिका हुआ है: आखिर एक एक आरोपी को अंततः बरी हो जाने के लिए जेल में क्यों रहना चाहिए?

जस्टिस खानविलकर और जस्टिस रस्तोगी द्वारा यूएपीए के तहत जमानत अर्जियों पर विचार करते हुए दिए गए फैसले के मुताबिक कोर्ट को एफआईआर में लगाए गए सभी आरोपों को सही मानकर चलना चाहिए है.

इतना ही नहीं, इस कानून के तहत व्यक्ति को जमानत तभी मिल सकती है, अगर वह अभियोजन के आरोपों को नकारने वाले सबूत पेश कर दे.

दूसरे शब्दों में आरोपों को गलत साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी पर है, जो ज्यादातर मामलों में एक तरह से नामुमकिन है. इस फैसले ने जमानत के चरण में सबूत की स्वीकार्यता के सवाल को बाहर कर दिया है.

दरअसल ऐसा करते हुए इसने साक्ष्य कानून (एविडेंस एक्ट) को रद्दी की टोकरी में डाल दिया है, जिसके हिसाब से यह फैसला असंवैधानिक ठहरता है.

यूएपीए के तहत अब जमानत याचिकाओं पर सुनवाई एक मजाक के अलावा और कुछ नहीं है. सबूत के ऐसे ऊंचे अवरोध लगा दिए गए हैं कि अब किसी आरोपी के लिए जमानत ले पाना नामुमकिन है और यह कानून वास्तव में किसी व्यक्ति को असीमित समय तक जेल की सलाखों के पीछे डाल देने का सुविधाजनक औजार बन गया है.

यह गिरफ्तार किए जाने वाले लोगों के लिए किसी दुस्वप्न के सच होने सरीखा है. इस कानून का दुरुपयोग सरकार, पुलिस और अभियोजन द्वारा खुले हाथों से किया जा रहा है, अब सभी विरोध करनेवालों पर नियमित तौर पर राजद्रोह या आपराधिक साजिश के (निराधार और असंभव) आरोपों के तहत और यूएपीए के तहत शिकंजा कसा जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उच्च न्यायालयों के हाथ बांध दिए हैं और उनके पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है कि वे जमानत की अर्जी को खारिज कर दें, क्योंकि उनके पास केस को झूठा करार देने का अधिकार नहीं है.

मिसाल के तौर पर फैसले के कारण उच्च न्यायालय का जज अब वास्तव में किसी मामले के सबूत की न्यायिक समीक्षा या उसका आकलन नहीं कर सकता है. सभी मामलों के लिए अब जमानत को ख़ारिज कर देने के तयशुदा फॉर्मूले का पालन करने के अलावा और कोई चारा नहीं है.

इसका असर आपातकाल के दौर के दमनकारी निवारक हिरासत (प्रिवेंटिव डिटेंशन) कानून के लगभग समान है, जिसमें अदालतों ने लोगों को न्यायिक उपचार के अधिकार का इस्तेमाल करने से वंचित कर दिया था.

अगर हम उस दौर की आपदा को टालना चाहते हैं, तो इस फैसले को जल्दी से जल्दी पलटा जाना चाहिए या उसमें नरमी लाई जानी चाहिए, अन्यथा हमारे सामने निजी आज़ादियों के बेहद आसानी से कुचल दिए जाने का ख़तरा है.

यूएपीए का यह दुरुपयोग और विरोधी आवाजों को दबाने के लिए आरोपी की जमानत याचिका को लगातार ख़ारिज किया जाना सबसे ज्यादा भीमा कोरेगांव मामलो में देखा जा सकता है, जहां महज विचार को अपराध की श्रेणी में पहुंचा दिया गया है.

इस मामले में जिसमें कई व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया है, तथाकथित सबूत एक टाइप किया हुआ, बिना दस्तखत और तारीख़ का दस्तावेज था, जो पहले से ही सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध था, जिसे वरवरा राव और गौतम नवलखा के डिवाइस से लिया गया था और जिसे उनका बताया गया.

माओवादियों से कथित संबंधों को लेकर गिरफ्तार किए गए कवि वरावरा राव, सामाजिक कार्यकर्ता और वकील अरुण फरेरा, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वर्णन गोंसाल्विस. (बाएं से दाएं)
माओवादियों से कथित संबंधों को लेकर गिरफ्तार किए गए कवि वरावरा राव, सामाजिक कार्यकर्ता और वकील अरुण फरेरा, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वर्णन गोंसाल्विस. (बाएं से दाएं)

‘स्ट्रेटेजी एंड टैक्टिक्स ऑफ द इंडियन रेवोल्यूशन’ शीर्षक यह दस्तावेज छह साल पहले प्रकाशित एक किताब से लिया गया था. यह दस्तावेज सार्वजनिक तौर पर ऑनलाइन भी उपलब्ध है.

इसमें कोई धारा 161 भी नहीं है, जैसा कि एक गवाह के बयान में कहा गया है, जिस पर सुधा भारद्वाज का मामला तैयार किया गया है. लेकिन यूएपीए लगाए जाने के कारण आरोपी को जमानत भी नहीं मिल सकती है.

अदालतें सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कारण मामले के गुण-दोष में नहीं जा सकती हैं.

इन गिरफ्तारियों में अपनाया गया पैटर्न काफी समान है : सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवी, जिन्होंने देश के कुछ खास हिस्सों में काम किया है, उन पर पहले माओवादी साजिशों का आरोप लगाया जाता है, फिर उन पर दलितों को गुमराह करने का आरोप लगाया जाता है, और उसके बाद यूएपीए के तहत आरोप मढ़े जाते हैं.

सुधा भारद्वाज दो सालों से जेल में हैं. वरवरा राव, जो कोविड-19 से भी संक्रमित हुए, उन्हें बाहर जाने और उचित उपचार पाने की भी इजाज़त नहीं दी गई. हमें नई गिरफ्तारियों की सूचना भी लगातार मिलती रहती है.

नवलखा का मामला इस बात का बढ़िया उदाहरण है कि कैसे न्यायालयों को कुछ भी करने से हतोत्साहित किया जा रहा है. नवलखा ने दिल्ली हाईकोर्ट में जमानत की याचिका दी थी, लेकिन जब मामले पर सुनवाई चल रही थी, तब कोर्ट को कोई सूचना दिए बगैर नवलखा को मुंबई की एक जेल में स्थानांतरित कर दिया गया.

जब जज ने पूछा कि ऐसा कैसे और क्यों किया गया, तब सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं दिया गया. हाईकोर्ट में अपना पक्ष सपष्ट करने की जगह सॉलिसिटर जनरल मामले को सुप्रीम कोर्ट में लेकर गए और सुप्रीम कोर्ट ने सीधे जमानत याचिका को ख़ारिज कर दिया. और इस तरह से हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई का अंत कर दिया.

न्याय से पल्ला झाड़ना

पंच की अपनी भूमिका निभाने में नाकाम रहना सुप्रीम कोर्ट के पतन में योगदान देने वाली अगली चीज है. कश्मीर के मामले में तो इसने एक तरह से कोर्ट के तौर पर अपनी भूमिका से ही मुंह मोड़ लिया है.

इंटरनेट बंदी मामले (अनुराधा भसीन) में कोर्ट का फैसला कई मायनों में प्रशंसायोग्य था, लेकिन यह वास्तव में मामले का समाधान करने में विफल रहा.

यह निर्णय देने के बाद कि संचार सेवाओं पर रोक को अनिवार्य तौर पर आवश्यकता और आनुपातिकता के सिद्धांत का पालन करना चाहिए, कोर्ट इन सिद्धांतों को कश्मीर में संचार सेवा को बंद करने की वैधानिकता पर फैसला करते वक्त लागू नहीं कर पाया.

मई, 2020 के अपने फैसले में इसने अनुच्छेद 14, 19, 21, आनुपातिकता और सख्त जांच के संवैधानिक मसलों पर विचार करने की जगह, 4जी सेवाओं पर पाबंदी और इस सवाल को लेकर कि क्या अनुराधा भसीन वाला फ़ैसला जम्मू-कश्मीर पर लागू होगा, ‘परामर्श देने’ का काम कार्यपालिका के नेतृत्व वाली एक समीक्षा समिति को सौंप दिया.

यह साफतौर पर भटकाव भरा, और निश्चित ही संवैधानिक लिहाज से अस्वीकार्य प्रत्यायोजन (डेलिगेशन) का मामला है: कार्यपालिका से अपने ही कृत्य की समीक्षा करने के लिए कहा गया है जबकि तथ्य यह है कि न्यायपालिका को कार्यपालिका के कदम की न्यायिक समीक्षा करनी चाहिए थी.

उम्मीद के अनुरूप समीक्षा समिति ने आवेदन को ख़ारिज कर दिया और जम्मू-कश्मीर की पूरी आबादी को अनिश्चित समय तक 4जी सेवाओं से महरूम कर दिया. (इसको पहले ही एक साल से ज्यादा हो गया है!).

इंटरनेट बैन के खिलाफ प्रदर्शन करते कश्मीरी पत्रकार (फाइल फोटो: रॉयटर्स)
इंटरनेट बैन के खिलाफ प्रदर्शन करते कश्मीरी पत्रकार. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

क्या मौलिक अधिकार और इंटरनेट की पहुंच से इस तरह से वंचित रखने को इस तरह से देखते-जानते नजरअंदाज किया जा सकता है?

वरिष्ठ वकील अरविंद दतार के शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहें, तो यह न्याय को ‘आउटसोर्स’ करने का मामला है, जो एक तरह से न्याय से वंचित करने के बराबर है.

कोर्ट द्वारा कश्मीर के मामलों में न्यायिक बहानेबाजी का भी एक पैटर्न है: जब इसके सामने यह याचिका रखी गई कि कैसे नेटबंदी जम्मू कश्मीर में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था को प्रभावित कर रही है, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को उचित कानूनी उपचार पाने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने को कहा.

जम्मू-कश्मीर की 1.3 करोड़ से ज्यादा जनता इंटरनेट को बंद रखने के कार्यपालिका के फ़ैसले से स्वास्थ्य, शिक्षा, कारोबार और अर्थव्यवस्था में हो रहे नुकसान के कारण कष्ट झेल रही है.

ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट वास्तविक जगत की समस्या का सामना ही नहीं करना चाहता है.

जैसा कि दातार ने दिखाया है, सुप्रीम कोर्ट के इस रवैये की तुलना अन्य न्यायालयों द्वारा व्यक्तिगत आजादी और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच के द्वंद्व को सुलझाने के तरीके से की जा सकती है.

लिवरसिज और एंडरसन वाले मामले में लॉर्ड मैक्मिलन ने प्रसिद्ध तौर पर कहा था, ‘यह निगरानी करना कोर्ट का काम है कि कानून का सही तरह से पालन हो रहा है. यह तथ्य कि देश युद्ध में है, इसमें ढिलाई बरतने का कोई बहाना नहीं हो सकता है.’

11 सितंबर के हमले के बाद यूनाइटेड किंगडम ने गैर ब्रिटिश नागरिकों को आतंकी रिश्ते के शक पर हिरासत में लेने और उन्हें देश से बाहर भेजने के लिए एक कानून बनाया.

इस कानून को ए बनाम सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर द होम डिपार्टमेंट वाले वाद में भेदभाव करने समेत अन्य आधारों पर निरस्त कर दिया गया और कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत अधिकारों के उल्लंघन के मसले के बीच अंतर किया और कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय कार्यपालिका और संसद के राजनीतिक निर्णय का मामला है और व्यक्तिगत अधिकारों के उल्लंघन का विषय न्यायिक समीक्षा का मामला है.

अन्य जगह की बात करें तो अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने हमदान बनाम रम्सफील्ड वाले वाद में ग्वांतानामो बे में बंदियों पर मुकदमा चलाकर यूनिफॉर्म कोड ऑफ मिलिट्री जस्टिस और जिनेवा कंवेंशन का उल्लंघन करने के लिए सरकार के सैन्य आयोग मिलिट्री कमीशन को भंग कर दिया.

गौरतलब है कि हमदान ओसामा बिन लादेन का ड्राइवर था, लेकिन कोर्ट के कदम नहीं डगमगाए.

इसी तरह से जब इरानियन बैंक मिल्लत पर इरान के मिसाइल कार्यक्रम में मदद देने वाली संस्थाओं की फंडिंग करने का शक गया और ब्रिटिश ट्रेजरी ने बैंक के साथ लेन-देने को प्रतिबंधित करने का निर्देश दिया, तब सुप्रीम कोर्ट ने बैंक मिल्लत बनाम ट्रेजरी वाले मामले में इस निर्देश को रद्द कर दिया क्योंकि यह बैंक के अधिकारों और समुदाय के हितों के बीच संतुलन साध पाने में नाकाम रहा.

निश्चित तौर पर भारतीय सुप्रीम कोर्ट को अमेरिकी और ब्रिटेन के अपने साथी संस्थानों से सीखना चाहिए था और ऐसे मामलों में अपना दिमाग लगाना चाहिए था.

मास्टर ऑफ रोस्टर

एक स्वतंत्र संस्था बने रहने में न्यायपालिका बुरी तरह से नाकाम साबित हो रही है, यह सबके सामने है. यह भी कोई राज की बात नहीं है कि इसके लिए जिम्मेदार कार्यपालिका है.

कार्यपालिका ऐसा कैसे कर रही है यह भी अच्छी तरह से पता है. सुप्रीम कोर्ट को सरकार समर्थक जजों से भरने में ऊर्जा खर्च करने की कोई जरूरत नहीं है.

एक ही जैसे विचार रखने वाले 30 से ज्यादा जजों को खोज पाना असंभव नहीं, तो कठिन जरूर होगा. मास्टर ऑफ रोस्टर जैसी अपारदर्शी व्यवस्था और एक खास तरह के मुख्य न्यायाधीश और मुट्ठीभर विश्वासपात्र जज उन सभी चीजों को नष्ट कर देने के लिए काफी हैं, जिन्हें एक स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए बहुमूल्य माना जाता है.

निश्चित तौर पर यह कोई काल्पनिक स्थिति नहीं है और वास्तव में यह भारत में घटित हो रहा है. कोर्ट के सचमुच के स्वतंत्र और सक्षम जजों को निजी विवादों का निपटारा करने का जिम्मा दे दिया गया है और उन्हें महत्वहीन समझा जाता है.

कई टिप्पणीकारों ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि कैसे पिछले तीन मुख्य न्यायाधीशों ने ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ के जरिये प्रदान की गई शक्तियों का इस्तेमाल राजनीतिक तौर पर संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामलों को हाल ही में सेवानिवृत्त हुए जस्टिर अरुण मिश्रा की सदस्यता वाली बेंच को सौंपा.

भारत में अक्सर न्यायिक आजादी के ख़तरे को कार्यपालिका और कभी-कभी विधायिका की तरफ से आता हुआ देखा जाता है, लेकिन जब न्यायपालिका के भीतर के लोग अन्य शाखाओं के सामने झुक जाते हैं, तो कहानी बिल्कुल अलग हो जाती है.

आज की स्थिति की भविष्यवाणी कई दशक पहले तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वायवी चंद्रचूड़ ने कर दी थी, जब उन्होंने 1985 में कहा, ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता को ज्यादा बड़ा खतरा बाहर के बजाय भीतर से है…’ संसार के  उपदेशों का कोई उपयोग नहीं है, अगर हमारे सोचने के तरीके में वास्तविक बदलाव नहीं आता है.

कैसे मरते हैं लोकतंत्र

अपनी किताब ‘हाऊ डेमोक्रेसीज डाई’ में स्टीवन लेविट्स्की और डेनियल ज़िबलैट लिखते हैं कि कैसे ‘ज्यादातर लोकतंत्रों के पतन का कारण जनरल और सैनिक न होकर चुनी हुई सरकारें रही हैं.’

उन दोनों ऐसी कई घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया है कि कैसे दुनियाभर में ‘चुने हुए नेताओं ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को नष्ट किया है.’

यह विध्वंस मतदान पेटी के संवैधानिक मुहर के साथ और यहां तक कि विधायिका और न्यायपालिका की सहमति से हुआ है. इस पूरे दौरान यह आश्वासन लगातार दिया जाता है कि लोकतंत्र का पहिया अभी भी घूम रहा है.

ऐसे हालातों में फलने-फूलनेवाले नेताओं को लेविट्स्की और ज़िबलैट ने ‘निर्वाचित तानाशाह’ की संज्ञा दी है.

ऐसे निर्वाचित तानाशाह संस्थाओं का शस्त्रीकरण करके उनका इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के तौर पर करते हैं. वे मीडिया और निजी क्षेत्र को चुप करवा देते हैं और कानूनों को इस तरह से फिर से लिखते हैं ताकि वे उनके राजनीतिक विरोधियों की तुलना में उनके हितो को ज्यादा साध सकें.

पीछे से आलोचनात्मक स्वर अब भी उठते रहते हैं, लेकिन सत्ता से सवाल पूछने का साहस करने वालों को सत्ता के कोप का भाजन बनना पड़ता है और हर तरह की परेशानियां उठानी पड़ती हैं.

उन पर राजद्रोही टिप्पणियां करने का आरोप लगाया जाता है या टैक्स चोरी या किसी भी अन्य चीज का आरोप मढ़ दिया जाता है. इस तरह से वे ‘लोकतंत्र नामक संस्था का इस्तेमाल ही लोकतंत्र की हत्या करने के लिए करते हैं.’

बगैर किसी लाग-लपेट के कहा जाए, तो आज भारत में यही हो रहा है. इन सबके बीच बस एक संस्था है, जिसमें इस विनाश को रोकने की क्षमता है, और वह है न्यायपालिका. लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से ऐसा लगता है कि वह रास्ता भटक गई है.

इतिहास में आपातकाल के दौरान एक ऐसा ही दौर आया था जब सुप्रीम कोर्ट देश की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका, लेकिन इसने अपनी गलतियों को महसूस किया और समय के साथ अपने स्वाभाविक रास्ते पर आ गया.

अब भी हमारे यहां कई जज और अनुकरणीय प्रैक्टिस कर रहे वकील हैं, जो संविधानवाद और कानून के शासन के प्रति ईमानदार और प्रतिबद्ध हैं.

मैं उम्मीद करता हूं कि वे चुनौती को स्वीकार करेंगे. इसका समय आ गया है.

70 साल से भी ज्यादा पहले, संविधान सभा में नेहरू ने कहा था कि हमें ‘उच्चतम ईमानदारी’ के जजों की जरूरत है, जो [ऐसे लोग होंगे] जो कार्यपालिका सरकार और जो कोई भी उनकी राह में आएगा, उसके खिलाफ खड़े हो सकेंगे.

मुझे उम्मीद है कि एक बार फिर भारत में ऐसे जजों का दौर आएगा.

(जस्टिस एपी शाह दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश हैं.)

(यह लेख 18 सितंबर, 2020 को जस्टिस सुरेश मेमोरियल लेक्चर के मौके पर फॉरगॉटेन फ्रीडम एंड इरोडेड राइट्स शीर्षक से दिए गए जस्टिस शाह के भाषण पर आधारित है. अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)