क्या नीतीश ने मोदी के 2019 के चुनावी सपने में रंग भरने की शुरुआत कर दी है?

नीतीश मुख्यमंत्री पद के तथाकथित ‘बलिदान’ के कुछ ही घंटों के भीतर भाजपा के समर्थन से फिर उसी कुर्सी पर काबिज़ हो गए, जो प्रदेश की जनता द्वारा दिए गए जनादेश से धोखा करने जैसा है.

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The Prime Minister, Shri Narendra Modi being welcomed by the Governor of Bihar, Shri Keshari Nath Tripathi and the Chief Minister of Bihar, Shri Nitish Kumar, on his arrival, at Patna Airport, Bihar on July 25, 2015.

नीतीश मुख्यमंत्री पद के तथाकथित ‘बलिदान’ के कुछ ही घंटों के भीतर भाजपा के समर्थन से फिर उसी कुर्सी पर काबिज़ हो गए, जो प्रदेश की जनता द्वारा दिए गए जनादेश से धोखा करने जैसा है.

(फाइल फोटो: पीआईबी)

नीतीश कुमार ने महागठबंधन तोड़कर भाजपा से हाथ मिलाकर 2019 में पूरे विपक्ष के साथ आने की संभावनाओं को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया है. और यह बात सबके सामने है.

पर जो स्पष्ट नहीं है वो ये कि नीतीश के ‘राजनीतिक विश्वासघात’ के इस कदम में उन सभी मुद्दों पर समझौता छिपा हो सकता है, जिन पर एनडीए को घेरा जा सकता था: एनडीए सरकार की आर्थिक असफलता, बढ़ती बेरोजगारी, किसान असंतोष, साथ ही ज़्यादातर भाजपा शासित राज्यों में पशु वध और अल्पसंख्यकों के साथ हो रही हिंसा के बढ़ते मामले, जिसने पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इसकी निंदा करने पर मजबूर कर दिया था.

नीतीश का लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते इस्तीफा देना मोदी और अमित शाह को विपक्ष पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को फिर से सामने लाने में मदद करेगा. सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और अन्य जांच एजेंसियां भी ये बात साबित करने के अभियान में मदद कर रही हैं कि विपक्ष के सभी नेता भ्रष्ट हैं, जबकि केंद्र और राज्य सरकारें बिल्कुल पाक़-साफ हैं.

प्रधानमंत्री ने नीतीश के ‘भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई में जुड़ने’ के फैसले का स्वागत करने में बिल्कुल देर नहीं की. ये बिल्कुल खोखली बात है क्योंकि ये वही प्रधानमंत्री हैं, जिनके पास मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्रियों के बारे में यही बात कहने का साहस नहीं है. इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के ऊपर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं, जिस पर ध्यान देने का सीबीआई के पास कोई वक़्त नहीं है!

नीतीश कुमार ने मुख्य रूप से दो तरह से भाजपा की मदद की है. पहला, विपक्षी दलों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान  की आंच को हवा देकर. दूसरा, ख़ुद अपनी ही पार्टी (जदयू) की कभी भाजपा के साथ न आने की बात पर अपना रुख बदलकर. जदयू का कहना था कि वो भाजपा से कभी हाथ नहीं मिलाएगी क्योंकि भाजपा ने औपचारिक रूप से विभाजनकारी हिंदुत्व एजेंडा जैसे अयोध्या में राम मंदिर बनाने और कश्मीर से धारा 370 हटाने की बात का समर्थन किया था.

महज तीन हफ़्तों पहले द वायर  के साथ एक इंटरव्यू में जदयू नेता और प्रवक्ता केसी त्यागी ने कहा था कि पार्टी का भाजपा के साथ दोबारा साथ आने का सवाल ही नहीं उठता. त्यागी ने इसकी वजह बताई, ‘हम वाजपेयी के एनडीए के साथ सिर्फ इसलिए थे क्योंकि उस समय अयोध्या राम मंदिर, यूनिफार्म सिविल कोड और कश्मीर से धारा 370 हटाने जैसे विवादास्पद मुद्दों को गठबंधन से दूर रखा गया था. पर वर्तमान भाजपा, जो केंद्र और उत्तर प्रदेश में बहुमत में है, इन्हीं मुद्दों को ज़ोर-शोर से उठा रही है. तो हम वैचारिक सिद्धांतों के आधार पर कभी भाजपा के साथ नहीं जाएंगे.’

त्यागी ने आगे यह भी कहा कि जदयू की प्रेरणा रहे राममनोहर लोहिया हिंदुत्व बहुसंख्यकवाद के बिल्कुल ख़िलाफ़ थे. और अगर वे होते तो मोदी के नेतृत्व में भाजपा की कट्टर हिंदुत्ववादी नीतियों को कभी नहीं स्वीकारते. सवाल ये है कि बीते तीन हफ़्तों में ऐसा क्या हो गया कि त्यागी और उनकी पार्टी ने लोहिया और उनके आदर्शों को इतने ग़ैर-ज़िम्मेदार तरीके से भुला दिया?

इतना तो साफ है कि निजी महत्वाकांक्षाएं इन उच्च आदर्शों से जीत गईं. ये सच है कि किसी नेता की निजी आकांक्षाओं की उसकी राजनीति में बड़ी भूमिका होती है, लेकिन वो इन्हें नैतिकता के एक पर्दे में रखता है, जिस वजह से ऐसे ‘धोखे’ भी देखने को मिल जाते हैं.

नीतीश इस इम्तिहान में फेल हुए हैं क्योंकि उनके मुख्यमंत्री पद के तथाकथित ‘बलिदान’ के कुछ ही घंटों के भीतर वे भाजपा के समर्थन से फिर उसी कुर्सी पर काबिज़ हो गए, जो एक तरह से प्रदेश की जनता द्वारा दिए गए जनादेश से धोखा करने जैसा है.

इस वक़्त कम से कम नीतीश इतना तो कर सकते थे कि वे नए सिरे से चुनाव करवाने की सोचते, जिससे उन्हें अपने राजनीतिक और सैद्धांतिक नज़रिए में हुए बदलाव पर जनता की मर्ज़ी के बारे में तो पता चल जाता.

ये भी देखें: ‘आज लोहिया होते तो भाजपा के ख़िलाफ़ वैसा ही मोर्चा बनाते जैसा कांग्रेस के विरुद्ध बनाया था’

जहां तक मोदी और शाह की बात है, वे इसी बात पर ख़ुश होंगे कि चुनाव हारने के बाद भी पार्टी ने बिहार में जीत हासिल की है. 2019 के आम चुनावों से पहले उनका बिहार को अपने कब्ज़े में लेना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि लोकसभा में बहुमत में आने के लिए पार्टी की नींव सात राज्यों- उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड में मज़बूत होनी चाहिए, जहां से कुल मिलकर 205 लोकसभा सीटें आती हैं.

इन्हीं राज्यों में भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति राम मंदिर और बीफ मुद्दों पर केंद्रित है. नीतीश का ऐसी राजनीति के साथ खड़े होना इस तरह की राजनीति को वैधता देने जैसा होगा, भले ही इससे लोहिया के आदर्शों को कितनी भी ठेस लगती हो!

अब विपक्ष को, जिसका नेतृत्व भ्रमित और घबरायी हुई कांग्रेस कर रही है, को दोबारा शुरू से ये सोचने की ज़रूरत है कि इन राज्यों में भाजपा की बढ़ती राजनीतिक पैठ से वो कैसे निपटेगा. हिंदुत्व के संदेश के अलावा ‘पिछड़ी’ जाति के प्रधानमंत्री और ‘दलित’ राष्ट्रपति के जोड़ को निश्चित रूप से इन क्षेत्रों में पूरे उत्साह के साथ पेश किया जाएगा.

2014 के आम चुनावों में ‘मंडल’ के ‘कमंडल’ के साथ गठजोड़ की शुरुआत मात्र ही थी. 2019 में भाजपा उत्तर प्रदेश और बिहार में पूरे ज़ोर-शोर से लालू, अखिलेश और मायावती जैसे ताकतवर पिछड़ी जाति के और दलित नेताओं के वोट बैंक पर हमला करने के इरादे से उतरेगी. और यक़ीनन नीतीश की ‘घर वापसी’ इसमें मददगार ही साबित होगी.

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