भारत की बदहाल जेलों पर कोई बात क्यों नहीं करता?

जेलों पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ और कर्मचारियों की कमी के चलते भारतीय जेलें राजनीतिक रसूख वाले अपराधियों के लिए एक आरामगाह और सामाजिक-आर्थिक तौर पर कमज़ोर विचाराधीन कैदियों के लिए नरक हैं.

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(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

जेलों पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ और कर्मचारियों की कमी के चलते भारतीय जेलें राजनीतिक रसूख वाले अपराधियों के लिए एक आरामगाह और सामाजिक-आर्थिक तौर पर कमज़ोर विचाराधीन कैदियों के लिए नरक हैं.

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बीते दिनों आईएडीएमके नेता वीके शशिकला को बेंगलुरु सेंट्रल जेल में विशेष सुविधाएं दिए जाने और केंद्रीय कारागार में हो रहे भ्रष्टाचार को लेकर कर्नाटक की एक आईपीएस अधिकारी ने आरोप लगाए थे. (बाएं) जेल के सीसीटीवी फुटेज में दिखती शशिकला (साभार: एनडीटीवी) (दाएं) जेल में भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाली अधिकारी डी रूपा (फोटो:पीटीआई)

बेंगलुरु सेंट्रल जेल में अनियमितता की शिकायतों को लेकर हाल ही में मीडिया में काफी शोर-शराबा मचा, जिसके बाद दो वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों का तबादला कर दिया गया. यह देखते हुए उम्मीद की जा सकती थी भारत में जेलों की हालत को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर एक गंभीर बहस की शुरुआत होगी, लेकिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ.

संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत जेलों का रख-रखाव और प्रबंधन पूरी तरह से राज्य सरकारों का विषय है. हर राज्य में जेल प्रशासन तंत्र चीफ ऑफ प्रिज़न्स (कारागार प्रमुख) की देखरेख में काम करता है, जो वरिष्ठ रैंक का आईपीएस अधिकारी होता है.

भारत की जेलें तीन ढांचागत समस्याओं से जूझ रही हैं: एक, जेलों में क्षमता से ज़्यादा कैदी, जिसका श्रेय जेल की आबादी में अंडरट्रायल्स (विचाराधीन कैदियों) के बड़े प्रतिशत को जाता है; दो, कर्मचारियों का टोटा; तीन, फंड की कमी. इसका अनिवार्य तौर पर नतीजा लगभग अमानवीय जीवन स्थितियों, गंदगी और कैदियों और जेल अधिकारियों के बीच हिंसक झड़पों के तौर पर निकला है.

जेलों में ठूंस-ठूंस कर भरे कैदी

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के प्रिजन स्टैटिस्टिक्स इंडिया, 2015 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की कई जेलें, कैदियों की संख्या के लिहाज से छोटी पड़ रही हैं. भारतीय जेलों में क्षमता से 14 फीसदी ज़्यादा कैदी रह रहे हैं. इस मामले में छत्तीसगढ़ और दिल्ली देश में सबसे आगे हैं, जहां की जेलों में क्षमता से दोगेुने से ज़्यादा कैदी हैं.

मेघालय की जेलों में क्षमता से 77.9 प्रतिशत ज़्यादा, उत्तर प्रदेश में 68.8 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 39.8 प्रतिशत ज़्यादा कैदी हैं. शुद्ध संख्या के हिसाब से उत्तर प्रदेश में विचाराधीन कैदियों की संख्या सबसे ज़्यादा (62,669) थी. इसके बाद बिहार (23,424) और महाराष्ट्र (21,667) का स्थान था. बिहार में कुल कैदियों के 82 फीसदी विचाराधीन कैदी थे, जो सभी राज्यों में सबसे ज़्यादा था.

भारतीय जेलों में बंद 67 फीसदी लोग विचाराधीन कैदी हैं. यानी वैसे कैदी, जिन्हें मुकदमे, जांच या पूछताछ के दौरान हवालात में बंद रखा गया है, न कि कोर्ट द्वारा किसी मुकदमे में दोषी क़रार दिए जाने की वजह से.

अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से भारत की जेलों में ट्रायल या सज़ा का इंतजार कर रहे लोगों का प्रतिशत काफी ज़्यादा है. उदाहरण के लिए इंग्लैंड में यह 11% है, अमेरिका में 20% और फ्रांस में 29% है.

2014 में देश के 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से 16 में 25 प्रतिशत से ज़्यादा विचाराधीन कैदी एक साल से ज़्यादा वक्त से हवालात में बंद थे. जम्मू-कश्मीर 54% के साथ इस सूची में सबसे ऊपर है. उसके बाद गोवा (50%) और गुजरात (42%) का स्थान है. शुद्ध आंकड़ों के लिहाज से उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है जहां विचाराधीन कैदियों की संख्या सबसे ज़्यादा (18,214) थी.

देश की विभिन्न अदालतों में 31 मार्च, 2016 तक लंबित पड़े मामलों की संख्या 3.1 करोड़ थी, जिसे किसी भी लिहाज से बहुत बड़ा आंकड़ा कहा जा सकता है.ऐसे में यह मान कर चला जा सकता है कि किसी प्रभावशाली हस्तक्षेप की ग़ैर-मौजूदगी में भारत की जेलें इसी तरह भरी रहेंगी.

2014 के अंत तक कुल विचाराधीन कैदियों में से 43 फीसदी, यानी करीब 1.22 लाख लोग छह महीने से ज़्यादा से लेकर पांच साल से ज़्यादा वक्त से विभिन्न हवालातों में बंद थे. इनमें से कइयों ने जेल में इतना समय बिता लिया है जितना उन्हें दोषी होने की वास्तविक सज़ा के तौर पर भी नहीं बिताना पड़ता.

एनसीआरबी के रिकॉर्ड के मुताबिक 2.82 लाख विचाराधीन कैदियों में 55% से ज़्यादा मुस्लिम, दलित और आदिवासी थे. 2011 की जनगणना के मुताबिक देश की कुल जनसंख्या में इन तीन समुदायों का सम्मिलित हिस्सा 39% है, जिसमें मुस्लिम, दलित और आदिवासी क्रमशः 14.3%, 16.6% और 8.6% हैं. लेकिन कैदियों के अनुपात के हिसाब से देखें, जिसमें विचाराधीन और दोषी क़रार दिए गए, दोनों तरह के कैदी शामिल हैं, इन समुदायों के लोगों का कुल अनुपात देश की आबादी में इनके हिस्से से ज़्यादा है.

जहां तक दोषसिद्ध अपराधियों का सवाल है, ऐसा लगता है कि बाकियों की तुलना में इन्हें ज़्यादा जल्दी अपराधी क़रार दिया जाता है, क्योंकि कुल दोषसिद्ध अपराधियों में इनका अनुपात 50.4% है. मुस्लिमों की बात करें, तो इस समुदाय में सज़ायाफ्ता कैदियों का अनुपात 15.8% है, जो जनसंख्या में उनकी भागीदारी से थोड़ा सा ज़्यादा है.

लेकिन विचाराधीन कैदियों में उनका हिस्सा कहीं ज़्यादा (20.9%) है. सारे दोषसिद्ध अपराधियों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की आबादी क्रमशः 20.9% और 13.7 प्रतिशत है, जिसे काफी ज़्यादा कहा जा सकता है.

Inmates rest behind bars in a barrack at Kotbhalwal central jail in Jammu May 18, 2011. Jail authorities have formed a 20-member pipe band of a team of prisoners who are being trained to play and perform musical instruments. Once the band is ready, they will be sent to perform at weddings and other social functions, a jail superintendent said. The main aim of creating the pipe band is to develop relations of these prisoners with the rest of the outside world and to involve them in various social functions so as to change their mindset, the superintendent added. Picture taken May 18, 2011. REUTERS/Mukesh Gupta (INDIAN-ADMINISTERED KASHMIR - Tags: CRIME LAW SOCIETY ENTERTAINMENT)
भारतीय जेलों में बंद 67 फीसदी लोग विचाराधीन कैदी हैं. यानी वो कैदी, जिन्हें मुकदमे, जांच या पूछताछ के दौरान हवालात में बंद रखा गया है, न कि मुकदमे में दोषी क़रार दिए जाने पर. अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से भारतीय जेलों में ट्रायल या सज़ा का इंतजार कर रहे लोगों का प्रतिशत काफी ज़्यादा है. (फाइल फोटो: रॉयटर्स/मुकेश गुप्ता)

अगर भारतीय संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों की बात करें, तो विचाराधीन कैदियों को उनके दोषी सिद्ध होने से पहले तक निर्दोष माना जाता है. लेकिन जेल में बंद किए जाने के दौरान उन्हें अक्सर मानसिक और शारीरिक प्रताड़नाएं दी जाती हैं और लगभग अमानवीय-सी जीवन स्थितियों और जेल में होनेवाली हिंसा का सामना करना पड़ता है.

इनमें से कई अपने पारिवारिक, आस-पड़ोस और समुदाय के रिश्तों के साथ-साथ प्रायः अपनी आजीविका भी गंवा देते हैं. इससे भी ज़्यादा बड़ी बात ये है कि जेल में बिताया गया समय उनके माथे पर एक व्यक्तिगत इकाई के तौर पर ही नहीं, समुदाय के सदस्य के तौर पर भी सामाजिक कलंक लगा देता है. यहां तक कि उनके परिवार, सगे-संबंधियों और समुदाय को भी उनकी बिना किसी ग़लती के शर्मिंदगी और अपमान झेलना पड़ता है.

विचाराधीन कैदियों की क़ानूनी प्रतिनिधियों तक पहुंच काफी कम होती है. कई विचाराधीन कैदी काफी गरीब हैं, जो मामूली अपराधों के आरोपी हैं. अपने अधिकारों की जानकारी न होने और क़ानूनी सहायता तक पहुंच नहीं होने के कारण उन्हें लंबे समय तक जेलों में बंद रहना पड़ रहा है.

वित्तीय संसाधनों और मजबूत सपोर्ट सिस्टम के अभाव और जेल परिसर में वकीलों से संवाद करने की ज़्यादा क्षमता न होने के कारण क़ानून की अदालत में अपना बचाव करने की उनकी शक्ति कम हो जाती है. यह स्थिति सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले के बावजूद है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह तजवीज दी थी कि संविधान का अनुच्छेद 21 बंदियों को प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के तहत निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई का अधिकार देता है.

2005 से प्रभाव में आनेवाले अपराध प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के अनुच्छेद 436 (ए) के प्रावधानों के बावजूद विचाराधीन कैदियों को अक्सर अपने जीवन के कई साल सलाखों के पीछे गुजारने पर मजबूर होना पड़ रहा है. इस अनुच्छेद के मुताबिक अगर किसी विचाराधीन कैदी को उस पर लगे आरोपों के लिए निर्धारित अधिकतम कारावास की सज़ा के आधे समय के लिए जेल में बंद रखा जा चुका है, तो उसे निजी मुचलके पर जमानत के साथ या बिना जमानत के रिहा किया जा सकता है.

यह अनुच्छेद उन आरोपियों पर लागू नहीं होता, जिन्हें मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सज़ा दी जा सकती है. लेकिन जैसा कि प्रिजन स्टैटिस्टिक्स, 2014 दिखाता है, किसी अपराध के लिए भारतीय दंड संहिता के तहत आरोपित 39 फीसदी विचाराधीन कैदियों को आजीवन कारावास या मृत्युदंड की सज़ा नहीं दी जा सकती थी.

कर्मचारियों का टोटा

जेलों में अधिकारियों की 33 फीसदी सीटें खाली पड़ी हैं और सुपरवाइजिंग अफसरों की 36 फीसदी रिक्तियां नहीं भरी गई हैं. कर्मचारियों की भीषण कमी के मामले में दिल्ली की तिहाड़ जेल देश में तीसरे स्थान पर है. इस जेल के भीतर बहाल कर्मचारियों की संख्या ज़रूरत से तकरीबन 50 प्रतिशत कम है.

देश की राजधानी होने के नाते, दिल्ली की जेलें सबसे ज़्यादा भरी हुई हैं और इनमें जेल सुरक्षाकर्मियों और वरिष्ठ सुपरवाइजरी कर्मचारियों की भारी किल्लत है. उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों की जेलों में सुरक्षाकर्मियों के नाम पर सबसे कम लोग तैनात हैं. यहां जेलरों, जेल सुरक्षाकर्मियों और सुपरवाइजर स्तर पर 65 फीसदी से ज़्यादा रिक्तियां हैं.

जेल कर्मचारियों की अपर्याप्त संख्या और जेलों पर क्षमता से ज़्यादा बोझ, जेलों के भीतर बड़े पैमाने पर हिंसा और अन्य आपराधिक गतिविधियों की वजह बनता है. अलग-अलग घटनाओं में 2015 में पंजाब में 32 कैदी जेलों से फरार हो गए, जबकि राजस्थान में ऐसे मामलों की संख्या बढ़कर 18 हो गई. महाराष्ट्र में 18 कैदी फरार होने में कामयाब रहे.

2015 में हर रोज औसतन 4 कैदियों की मौत हुई. कुल मिलाकर 1,584 कैदियों की जेल में मृत्यु हो गई. इनमें 14,69 मौतें स्वाभाविक थीं, जबकि बाकी मौतों के पीछे अस्वाभाविक कारणों का हाथ माना गया. अस्वाभाविक मौतों में दो तिहाई (77) आत्महत्या के मामले थे, जबकि 11 की हत्याएं साथी कैदियों द्वारा कर दी गई. इनमें से 9 दिल्ली की जेलों में थे. 2001 से 2010 के बीच 12,727 लोगों की जेलों के भीतर मौत होने की जानकारी है.

अगर कोई पेशेवर सरगना या कोई सफेदपोश अपराधी जेल के अधिकारियों की मुट्ठी गरम करने को तैयार है, तो वह जेल परिसर के भीतर मोबाइल फोन, शराब और हथियार तक रख सकता है. जबकि, दूसरी तरफ सामाजिक-आर्थिक तौर पर पिछड़े हुए विचाराधीन कैदियों को सरकारी तंत्र द्वारा उनकी बुनियादी गरिमा से भी वंचित रखा जा सकता है.

इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि जेल विभाग देश के उन कुछ निर्वाचित प्रतिनिधियों की पसंद रहा है जिनके ख़िलाफ़ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं.

मजबूत व्हिसिल ब्लोवर प्रोटेक्शन एक्ट की ग़ैर-मौजूदगी और जेलों पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ और अपर्याप्त कर्मचारियों के चलते भारतीय जेलें राजनीतिक रसूख वाले अपराधियों के लिए एक आरामगाह और सामाजिक-आर्थिक तौर पर कमज़ोर विचाराधीन कैदियों के लिए नरक के समान बनी रहेंगीं. मीडिया में कभी-कभार मचनेवाले शोर-शराबे का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.

(बसंत रथ 2000 बैच के जम्मू-कश्मीर कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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