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केंद्र की रबी एमएसपी में ‘ऐतिहासिक’ बढ़ोतरी को कई राज्यों ने किया था ख़ारिज, वृद्धि की थी मांग

विशेष रिपोर्ट: सितंबर में विवादित कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों के बीच मोदी सरकार ने छह रबी फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा करते हुए इसे ऐतिहासिक कहा था. हालांकि आधिकारिक दस्तावेज़ बताते हैं कि भाजपा शासित राज्यों समेत कई राज्य सरकारों ने इसे मामूली वृद्धि बताते हुए इसका विरोध किया था.

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पंजाब के मुख्तसर जिले में बादल गांव में कृषि विधेयकों के खिलाफ किसानों का धरना प्रदर्शन जारी है. (फोटो: पीटीआई)

विशेष रिपोर्ट: सितंबर में विवादित कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों के बीच मोदी सरकार ने छह रबी फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा करते हुए इसे ऐतिहासिक कहा था. हालांकि आधिकारिक दस्तावेज़ बताते हैं कि भाजपा शासित राज्यों समेत कई राज्य सरकारों ने इसे मामूली वृद्धि बताते हुए इसका विरोध किया था.

पंजाब के मुख्तसर जिले में बादल गांव में कृषि विधेयकों के खिलाफ किसानों का धरना प्रदर्शन जारी है. (फोटो: पीटीआई)
कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन करते किसान. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: मोदी सरकार ने सितंबर महीने में तीन विवादित कृषि कानूनों को पारित करने के तुरंत बाद छह रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा की थी.

सरकार का ये निर्णय ऐसे समय पर आया था, जब देश के विभिन्न हिस्सों में किसान नए कानूनों का विरोध कर रहे थे. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एमएसपी में बढ़ोतरी को अपनी सरकार का ‘ऐतिहासिक निर्णय’ करार दिया और कहा कि इससे करोड़ों किसानों को लाभ मिलेगा.

हालांकि हकीकत यह है कि रबी 2020-21 सीजन की फसलों (गेहूं, जौ, चना, मसूर, सरसों, कुसुम) के लिए तय की गई एमएसपी पर कई राज्यों ने सहमति नहीं जताई थी.

इनमें गेहूं का सबसे बड़ा उत्पादक और भाजपा शासित उत्तर प्रदेश भी शामिल है, जिसने राज्य में बढ़ी हुई उत्पादन लागत के हिसाब से एमएसपी घोषित करने की मांग की थी.

द वायर  द्वारा प्राप्त आधिकारिक पत्राचारों से पता चलता है कि झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को पत्र लिखकर रबी फसलों की मौजूदा एमएसपी पर विरोध दर्ज कराया था और मांग की थी कि किसानों को उचित लाभ पहुंचाने के लिए राज्यवार खेती में सभी तरह के लागत को शामिल कर न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा होनी चाहिए.

राज्यों ने कहा था कि भारत सरकार द्वारा एमएसपी में मामूली बढ़ोतरी से किसानों को कोई फायदा नहीं होगा और वे बदहाली के दुष्चक्र से निकल नहीं पाएंगे. हालांकि केंद्र सरकार ने इन सभी प्रस्तावों को खारिज कर दिया.

झारखंड

झारखंड सरकार ने कोरोना महामारी के चलते उत्पन्न हुई विषम परिस्थितियों एवं राज्य में बड़ी संख्या में लौटे प्रवासियों की समस्या का हवाला देते हुए एमएसपी बढ़ाने की मांग की थी, ताकि किसानों को आर्थिक मदद पहुंचाई जा सके.

18 अगस्त 2020 को केंद्रीय कृषि सचिव संजय अग्रवाल को लिखे पत्र में राज्य के कृषि सचिव अबूबकर सिद्दीकी ने गेहूं की एमएसपी 4,254 रुपये, मसूर की 6,118 रुपये और सरसों की एमएसपी 6,517 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की मांग की थी.

हालांकि भारत सरकार ने गेहूं की एमएसपी 1,975 रुपये प्रति क्विंटल तय की है, जो झारखंड सरकार के प्रस्ताव की तुलना में 2,279 रुपये कम है.

इसी तरह मसूर व सरसों की एमएसपी राज्य सरकार के प्रस्ताव की तुलना में 1,018 रुपये और 1,867 रुपये प्रति क्विंटल तक कम है.


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कृषि सचिव सिद्दीकी ने अपने पत्र में कहा, ‘कृषि झारखंड के अर्थव्यवस्था की नींव है. यहां की करीब 70 फीसदी आबादी रोजगार के लिए कृषि पर निर्भर है. यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि कोविड-19 के चलते कई किसान राज्य में वापस आ गए हैं और कृषि क्षेत्र में रोजगार तलाश रहे हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘राज्य कृषि क्षेत्र में मौके पैदा करने के लिए रोडमैप तैयार कर रहा है, ऐसे में एमएसपी में किसी भी तरह की कटौती खेती में संकट को और बढ़ा देगी. राज्य के कई किसानों ने फसल ऋण ले रखा है लेकिन मौसम सही नहीं होने के कारण उन्हें लोन चुकाने में गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है.’

लेकिन केंद्र ने राज्य के प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

उत्तर प्रदेश

देश में कुल गेहूं उत्पादन में सर्वाधिक 31.5 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भी मोदी सरकार द्वारा घोषित एमएसपी को लेकर आपत्ति दर्ज कराई थी और किसानों को संकट से निकालने के लिए इसमें बढ़ोतरी की मांग की थी.

राज्य के विशेष सचिव विद्या शंकर सिंह द्वारा 18 अगस्त 2020 को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के सचिव को लिखे गए गोपनीय पत्र के मुताबिक उत्तर प्रदेश सरकार ने गेहूं की एमएसपी 2,710 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की मांग की थी.

यह केंद्र द्वारा घोषित गेहूं की एमएसपी से 735 रुपये अधिक है. इसी तरह राज्य सरकार ने जौ की एमएसपी 2,380 रुपये, चने की 5,500 रुपये, मटर की 4,365 रुपये, मसूर की 5,150 रुपये और सरसों की एमएसपी 5,205 रुपये प्रति क्विंटल घोषित करने की मांग की थी.

इसमें मसूर को छोड़कर बाकी सभी फसलों के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तावित एमएसपी काफी अधिक है.

सिंह ने अपने पत्र में कहा था, ‘फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों के निर्धारण का मुख्य आधार उनकी उत्पादन लागत होती है. फसलों के उत्पादन लागत मूल्य उनकी उपज में शामिल मानव श्रम, पशु श्रम, मशीन श्रम, भूमि का किराया तथा कृषि निवेश आदि पर किए गए खर्च पर निर्भर करता है. कृषि निवेशों के मूल्यों में सामान्यत: वृद्धि हुई है.’

उत्पादन लागत का आकलन करने के लिए उत्तर प्रदेश के कृषि विभाग ने सर्वे कराया था, जिससे पता चला कि राज्य द्वारा अनुमानित उत्पादन लागत केंद्र के कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के आकलन से काफी ज्यादा है.

राज्य सरकार ने कहा, ‘प्रदेश की अधिकांश जनसंख्या कृषि एवं कृषि से संबंधित व्यवसाय पर निर्भर है, इसको ध्यान में रखते हुए प्रदेश सरकार सिफारिश की गई मूल्यों के अनुसार फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किए जाने चाहिए, जिससे प्रदेश के किसानों को लाभकारी मूल्य प्राप्त हो सकेंगे.’


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उन्होंने आगे कहा, ‘राज्य सरकार की सिफारिश के अनुसार एमएसपी घोषित करने पर किसानों को कृषि क्षेत्र से पलायन करने से भी रोका जा सकेगा. इसके साथ ही फसलों के उत्पादन में वृद्धि करते हुए कृषकों की आय में भी वृद्धि की जा सकेगी.’

उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी सिफारिश को लागू करने की गुजारिश करते हुए इन तथ्यों का भी हवाला दिया कि राज्य के कुल किसानों में से लगभग 92.8 फीसदी हिस्सा लघु एवं सीमांत श्रेणी के हैं, जिनके पास कुल जोत का लगभग 65.8 प्रतिशत कृषि क्षेत्र उपलब्ध है.

राज्य ने यह भी कहा कि प्रदेश में औसत जोतों का आकार मात्र 0.73 हेक्टेयर है, जिसमें से सीमांत किसानों के पास औसत कृषि भूमि महज 0.38 हेक्टेयर है. इनकी अन्न संग्रहण क्षमता भी बहुत कम है.

योगी सरकार ने कहा, ‘जोतों का आकार कम होने के कारण इनकी संसाधन तथा कृषि निवेशों के उपयोग की क्षमता भी कम है, इसलिए कृषक हित में किसानों को उनकी उपज का समुचित मूल्य मिलना आवश्यक है.’

लेकिन मोदी सरकार ने उत्तर प्रदेश का भी प्रस्ताव स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

बिहार

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई वाली भाजपा समर्थित बिहार सरकार ने भी केंद्र द्वारा घोषित रबी फसलों की एमएसपी पर विरोध दर्ज कराया था और इसे बढ़ी हुई उत्पादन लागत के हिसाब से घोषित करने की मांग की थी.

21 अगस्त 2020 को राज्य के कृषि सचिव डॉ. एन. सरवना कुमार द्वारा भारत सरकार के कृषि सचिव संजय अग्रवाल को लिखे गए पत्र के मुताबिक बिहार सरकार ने गेहूं की एमएसपी 2,583 रुपये, चने की 5,538 रुपये, मसूर की 5,541 रुपये और सरसों की एमएसपी 5,919 रुपये प्रति क्विंटल घोषित करने की मांग की थी.

यह प्रस्ताव केंद्र सरकार द्वारा घोषित गेहूं की एमएसपी 1,975 रुपये, चने की 5,100 रुपये, मसूर की 5,100 रुपये और सरसों की एमएसपी 4,650 रुपये प्रति क्विंटल से काफी ज्यादा है.

Bihar Rabi MSP
बिहार सरकार द्वारा भेजा गया प्रस्ताव.

एमएसपी बढ़ाने की दलील देते हुए कुमार ने अपने पत्र में कहा, ‘कई सारी वजहें हैं जिसके चलते उत्पादन लागत में बढ़ोतरी हुई है. इसमें मानव श्रम पर अत्यधिक निर्भरता, छोटे एवं सीमांत किसानों की संख्या अत्यधिक होना, नई तकनीकी अपनाने की रफ्तार धीमी होना, किसानों की दयनीय सामाजिक-आर्थिक स्थिति, सिंचाई के लिए डीजल पंपसेट पर अत्यधिक निर्भरता और फॉस्फेटिक एवं पोटाश उर्वरक तथा बीज के मूल्यों में बढ़ोतरी होने जैसी चीजें शामिल हैं.’

उन्होंने कहा कि राज्य की इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करें. हालांकि भारत सरकार ने इस प्रस्ताव को भी दरकिनार कर दिया.

छत्तीसगढ़

इसी तरह पांच सितंबर 2020 को भेजे प्रस्ताव में छत्तीसगढ़ सरकार ने भी केंद्र से एमएसपी बढ़ाने की मांग की थी. राज्य के कृषि विभाग ने रबी फसलों की लागत का विस्तार से गणना करते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए कहा था.

राज्य सरकार ने लागत में श्रम लागत, ऋणों पर ब्याज, लगान भूमि भाड़ा, रखवाली पर व्यय, परिवहन पर व्यय समेत कई बिंदुओं को शामिल करते हुए गेहूं की एमएसपी 2,100 रुपये, जौ की 1,650 रुपये, चना की 5,000 रुपये, मसूर की 5,000 रुपये, सरसों की 4,600 रुपये और कुसुम की एमएसपी 5,400 रुपये प्रति क्विंटल घोषित करने की मांग की थी.

हालांकि गेहूं, जौ और कुसुम के लिए केंद्र द्वारा घोषित एमएसपी छत्तीसगढ़ के प्रस्ताव के तुलना में कम है. राज्य सरकार ने कहा कि यह किसानों द्वारा विभिन्न मदों पर किए गए व्यय एवं कृषि लागत के अनुसार नहीं है.

बता दें कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधीन संस्था कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) फसल लागत का आकलन कर न्यूनतम समर्थन मूल्य को सिफारिश करने का काम करती है.

सीएसीपी सभी राज्यों की फसल लागत का औसत निकालकर उसके आधार पर एमएसपी तय करती है. इसके कारण कुछ राज्यों के किसानों को तो ठीक-ठाक दाम मिल जाता है लेकिन कई सारे राज्यों के किसानों को फसल लागत के बराबर भी एमएसपी नहीं मिलती है.

इसे लेकर गंभीर चिंता जाहिर करते हुए भाजपा शासित समेत विभिन्न राज्य सीजन-दर-सीजन फसलों की एमएसपी राज्यवार लागत के हिसाब से निर्धारित करने के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेज रहे हैं.

सीएसीपी की विभिन्न रिपोर्टों का भी अध्ययन करने से पता चलता है कि फसलों के लिए तय की गई एमएसपी कई राज्यों की उत्पादन लागत से भी कम है या फिर मामूली बढ़ोतरी हुई है.

द वायर  ने अपनी पिछली रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह खरीफ फसलों के लिए केंद्र द्वारा घोषित एमएसपी और इसे लेकर राज्यों के प्रस्ताव में बड़ा अंतर है.

आधिकारिक दस्तावेज दिखाते हैं कि भाजपा शासित राज्यों समेत विभिन्न राज्य सरकारों ने केंद्र से बढ़ी उत्पादन लागत के हिसाब से एमएसपी घोषित करने की मांग की थी, जिसे नहीं माना गया.

इसके अलावा द वायर ने पूर्व में रिपोर्ट किया था कि किस तरह पूरे देश में फसलों का एक न्यूनतम समर्थन मूल्य होने से किसानों को नुकसान है और किस तरह भाजपा शासित राज्यों समेत कई प्रदेश की सरकारों ने भारत सरकार से राज्य आधारित एमएसपी की घोषणा करने की मांग की थी.