क्या विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी का ब्रह्मास्त्र साबित होगा नंदीग्राम

टीएमसी नेताओं के लगातार पार्टी छोड़ने के बीच ममता बनर्जी अपने प्रतिद्वंदियों से बुरी तरह घिरी नज़र आ रही हैं. भाजपा के आक्रामक हमलों के बीच ममता ने टीएमसी के गढ़ नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. क्या यह दांव उनके राजनीतिक विरोधियों को पस्त कर पाएगा?

(फोटो: पीटीआई/रॉयटर्स)

टीएमसी नेताओं के लगातार पार्टी छोड़ने के बीच ममता बनर्जी अपने प्रतिद्वंदियों से बुरी तरह घिरी नज़र आ रही हैं. भाजपा के आक्रामक हमलों के बीच ममता ने टीएमसी के गढ़ नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. क्या यह दांव उनके राजनीतिक विरोधियों को पस्त कर पाएगा?

(फोटो: पीटीआई/रॉयटर्स)
(फोटो: पीटीआई/रॉयटर्स)

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आगामी विधानसभा चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तरह ही अपने विरोधियों से बुरी तरह घिरी दिख रही हैं.

जिस तरह इंदिरा का साथ जनवरी 1978 में सत्ता से बाहर और शाह आयोग आदि के घेरे में होने के बावजूद उनके मंत्रिमंडल के पुराने वरिष्ठ नेताओं ने छोड़ दिया था, उसी तरह ममता के खेमे से भी अनेक वरिष्ठ नेता एवं जमीनी कार्यकर्ता भाजपा के पाले में घुसे जा रहे हैं.

भाजपा भी दल-बदल के जरिये ममता को घेरकर सत्ता से उखाड़ने तथा मतदाता के मन पर अपना सिक्का जमाने का शातिर दांव चल रही है.

उसके बावजूद ममता ने अचानक नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का ऐलान करके इंदिरा गांधी की तरह ही इंदिरा कांग्रेस की घोषणा जैसा धोबीपाट अपने विरोधियों पर लगा दिया है.

हालांकि दल-बदलू पूर्व मंत्री सुवेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम से भाजपा के कमल छाप पर लड़कर ममता को 50 हजार वोट से हराने की चुनौती दे दी है.

नंदीग्राम और सिंगूर वो दो प्रतीक हैं जिनकी बदौलत ममता का पश्चिम बंगाल की राजनीति में वाम मोर्चे के विरुद्ध ढाई दशक लंबा संघर्ष रंग लाया था.

दोनों गांवों में उद्योगों के लिए वाम मोर्चा की बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के आंदोलन में हुई किसानों की हत्या के जीवंत विरोध के बूते ममता को 2011 के विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल हुआ था.

उसके बाद पांच साल में अस्पताल से लेकर किसानों, बेटियों और महिलाओं आदि के लिए अनेक कल्याणकारी सरकारी उपाय करने के एवज में ममता को 2016 के चुनाव में 45 फीसदी वोट देकर जनता ने 295 सदस्यीय सदन में 211 सीट से नवाज कर राज्य की सबसे लोकप्रिय नेता बना दिया.

उसी चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत भी 10.5 प्रतिशत रहा और तीन सीट जीत विधानसभा में प्रवेश पा लिया. तभी से भाजपा ने योजनाबद्ध होकर अपने कैडरों को राज्य के कोने-कोने में फैलाया और ममता पर मुसलमानपरस्त होने का आरोप लगातार लगा कर ध्रुवीकरण किया.

इसके लिए स्थानीय सांस्कृतिक क्लबों, धार्मिक उत्सवों आदि में भी भाजपा ने बड़े पैमाने पर घुसपैठ की. साथ ही राज्य में उद्योगों के अभाव में बेरोजगार युवाओं को भी भाजपा के कारण राजनीति से रोजगार मिला, तो वे उसी के साथ रम गए और उसकी स्वीकार्यता बढ़ने लगी.

अंततः साल 2019 के आम चुनाव में भी भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी जिससे उसे एकदम से 41 फीसदी वोट के साथ लोकसभा की 42 में से 18 सीट जीतने में कामयाबी मिल गई.

मीडिया सहित चुनावी हलचल में भाजपा द्वारा ममता और उनके दल तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी पर लगातार शिकंजा कसने के कारण अप्रैल-मई में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव उनके लिए अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने की लड़ाई में बदल गया.

इससे जमीनी स्तर पर हालात ममता के इतने विपरीत न होने के बावजूद चुनाव से छह महीने पहले से ही धुआंधार प्रचार और भाजपा अध्यक्ष सहित अनेक राज्यों के मंत्रियों, उपमुख्यमंत्रियों एवं मुख्यमंत्रियों को पश्चिम बंगाल में झोंकने का दिखनौटा मकसद भी पूरा हो रहा है.

भाजपा और उसकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस की यही चिरपरिचित शैली भी है कि पहले प्रचार और दिखावे में जीतो फिर अपने स्वयंसेवकों की फौज को जड़ों की ओर दौडा़ दो.

हालांकि आरएसएस/भाजपा की यह रणनीति गुजरात, ओडिशा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड आदि राज्यों के विधानसभा चुनाव में दोबारा कामयाब नहीं हो पाई. इन सभी राज्यों में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी है.

अलबत्ता हरियाणा में जेजेपी से गठबंधन करके और मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया का वंशवाद भूलकर उनकी मार्फत कांग्रेस विधायकों के थोक दल-बदल के बूते भाजपा ने दोबारा सरकार बना ली है.

यह दीगर है कि किसान आंदोलन के कारण हरियाणा की भाजपा-जेजेपी गठबंधन सरकार लड़खड़ा रही है. किसानों के आगे मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर की भी एक नहीं चली और उन्हें कृषि कानून समर्थक अपनी सभा रद्द करनी पड़ी.

पश्चिम बंगाल में गृहमंत्री अमित शाह ने 200 सीट जीतने का दावा किया है. गुजरात में भी कांग्रेस एवं माधवसिंह सोलंकी का 149 सीट का 1985 का रिकॉर्ड तोड़ने के लिए शाह ने 2017 में 150 सीट जीतने का दावा किया था.

उनके एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरातियों के चरणों में अपनी पगड़ी रखा देने के बावजूद भाजपा का दम 99 सीट पर ही फूल गया था.

2019 में हरियाणा में भाजपा बहुमत से छह सीट कम 40 सीट ही जीत पाई जबकि 2014 में 47 जीत कर बहुमत से पहली बार भाजपा ने राज्य में अपनी सरकार बनाई थी.

मध्य प्रदेश में भाजपा को 2018 में जनता ने 109 पर अटका कर कांग्रेस को सत्ता सौंपी. महज सवा साल बाद ही जोड़तोड़ से फिर सरकार बना ली.

राजस्थान में भी 200 में से 73 सीट ही जीतने पर भाजपा को सत्ता कांग्रेस को सौंपनी पड़ी थी. छत्तीसगढ़ में 90 सीट के सदन में कांग्रेस की 68 सीटों के आगे सिर्फ 15.सीट पर अटकी भाजपा को 15 साल बाद सत्ता गंवानी पड़ी.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने भाजपा से उत्तराखंड में उसकी जीत का बदला निकाल लिया. साल 2017 में भाजपा ने उत्तराखंड में 70 में 57 सीट जीत कर, 11 सीट पाने वाली कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया था.

पश्चिम बंगाल की राजनीति में वामपंथियों ने जो मुहल्लों के स्तर पर सांगठनिक शिकंजा कसने का रिवाज डाला था टीएमसी ने भी उसे ही अपना लिया. उसकी वजह से टीएमसी के स्थानीय नेताओं की दादागिरी चलती है.

उसी से बचने के लिए लोकसभा चुनाव में वाम मोर्चे के समर्थकों ने भी भाजपा को वोट दिया. उसके अलावा असम, ओडिशा और दीगर राज्यों की तरह कांग्रेस का वोट भी उसकी सांगठनिक कमजोरी के कारण भाजपा की ही झोली में जा गिरा.

टीएमसी ने हालांकि 43.7 फीसदी वोट पाकर 22 सीट जीत लीं और बाकी दो सीट कांग्रेस की झोली में गिरीं, मगर उसके बाद से सत्ता हथियाने की भाजपा की भूख लगभग अनियंत्रित है. उसके प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने तो भाजपा कार्यकर्ताओ से टीएमसी के खिलाफ हथियार उठाने तक आह्वान कर दिया है.

इसके बावजूद विपक्षियों को अर्बन नक्सल एवं देशद्रोही कह कर बात-बात पर जेल में डालने वाले गृहमंत्री अमित शाह अथवा भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने दिलीप घोष पर कोई कार्रवाई नहीं की.

भाजपा लगातार टीएमसी पर अपने कैडरों पर हिंसा और उनकी हत्या का आरोप लगा रही है जबकि पुलिस ने अधिकतर हत्याओं को स्थानीय रंजिश का नतीजा बताया है.

अपने कैडर को भाजपा में जाने अथवा उसके लिए वोट डालने से रोकने के लिए कांग्रेस और वाम मोर्चे ने पश्चिम बंगाल में 2016 की तरह फिर से मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है.

केरल में आमने-सामने होने के बावजूद दोनों पार्टियां अपना अस्तित्व बचाने के लिए गठबंधन को मजबूर हैं. ममता चूंकि एक दशक से सरकार चला रही हैं इसलिए उनके खिलाफ मतदाता को शिकायत होना स्वाभाविक है.

फिर भी ममता ने लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद से अपना रुख बहुत बदला है. भाजपा के ध्रुवीकरण की काट के लिए दुर्गा पूजा समितियों, एवं काली पूजा के लिए भी 180 करोड़ रुपये नकद राशि दी है.

इसके अलावा किसानों को कृषक बंधु योजना के तहत इस साल 2,642 करोड़ रुपये देकर प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि तथा पांच लाख रुपये तक हरेक को स्वास्थ्य बीमा देकर केंद्र की उतनी ही राशि की आयुष्मान स्वास्थ्य बीमा योजना को धता बता रखा है.

ममता ने राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का जबरदस्त विस्तार किया है. साथ ही महामारी काल में गरीबों एवं घर लौटे प्रवासियों को मुफ्त राशन के साथ ही नकद सहायता के लिए 200 करोड़ रुपये का प्रावधान करके सरकार की छवि सुधारने की कोशिश की है.

8,000 गरीब पुजारियों को 1,000 रुपये मासिक वजीफा भी दिया जा रहा है. अधिमान्यता प्राप्त पत्रकारों को कोलकाता में 2,000 रुपये की दर से तथा राज्य में अन्य जिलों में 1,000 रुपये की दर से दुर्गा पूजा बोनस ममता सरकार ने दिया.

फिर भी तृणमूल कांग्रेस के 15 विधायक एवं एक लोकसभा सांसद, वाम मोर्चे के तीन विधायक तथा तीन ही कांग्रेस के विधायक भाजपा में शामिल हो चुके.

दल-बदल के जरिये भाजपा ने कांग्रेस एवं दूसरे दलों से नेताओं को तोड़कर उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक और ओडिशा आदि राज्यों में अपना जनाधार बढ़ा कर चुनाव जीतने अथवा सरकार बनाने में कामयाबी पाई है.

पश्चिम बंगाल में चूंकि तृणमूल का जनाधार सबसे व्यापक है इसलिए भाजपा ने भंग होने जा रही विधानसभा में उसके विधायकों पर सबसे बड़ा दांव लगाया है. कांग्रेस एवं वाम मोर्चा के जनाधार को तो वह पूरा ही हड़प लेना चाहती है.

तृणमूल कांग्रेस विधायकों के भाजपा में लगातार शामिल होने का बड़ा कारण मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा अपनी पार्टी में सफाई अभियान चलाना भी है.

दीदी ने जब साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 40 फीसदी वोट पड़ने से अपनी गद्दी खिसकते देखी तो प्रशांत किशोर को उसके कारणों की पड़ताल तथा 2021 के विधानसभा चुनाव में जिताने का फार्मूला सुझाने का जिम्मा सौंपा.

प्रशांत की गांव-गांव तक पहुंची सर्वेक्षण मंडली द्वारा जमा उनके वर्करों के जनविरोधी और भ्रष्ट कारनामों की फेहरिस्त गिनाई गई. इस पर तृणमूल कांग्रेस को बचाने के लिए उन्हें नीचे से उपर तक पार्टी संगठन में फेरबदल करना पड़ा.

ममता को यह भी पता चल गया कि बंगाली भी ध्रुवीकरण की चपेट में आ चुके. साथ ही तृणमूल नेताओं और कैडरों की धौंस-डपट को रोकने तथा स्थानीय राजनीति में अपने पैर फिर से जमाने के लिए वामपंथी दलों एवं कांग्रेस के भी निचले स्तर के अनेक नेताओं ने अपने समर्थकों सहित भाजपा को वोट दे दिया.

बताया जा रहा है कि पुलिस को भी तृणमूल के दबंग नेताओं की बात आंख मूंदकर मानने की मनाही कर दी गई. इसके अलावा ब्लाॅक एवं जिला अध्यक्षों से लेकर पार्टी के विधायकों एवं सांसदों के भी पर कतरे जाने लगे.

सुगबुगाहट तो यह भी है कि प्रशांत किशोर की रिपोर्ट के आधार पर दीदी ने आगामी विधानसभा चुनाव में अपने कम से कम एक-तिहाई उम्मीदवार बदल देना तय किया है.

संगठन के स्तर पर मुश्कें कसी जाने से पैदा बौखलाहट और भाजपा के साम, दाम, दंड, भेद के संजाल में फंसकर भी तृणमूल के विधायक एवं मंत्री भाजपा का रुख कर रहे हैं.

देखना यही है कि इस कार्रवाई तथा नंदीग्राम के बूते और मोदी-शाह को बाहरी बताने के दांव से ममता दीदी हरेक चुनाव को युद्ध की तरह लड़ने वाली भाजपा से अपनी सत्ता बचाने में कामयाब हो पाएंगी?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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