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उपासना स्थलों पर 1991 के क़ानून के ख़िलाफ़ याचिका के विरोध में याचिका दायर

सुप्रीम कोर्ट में भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने याचिका दायर कर उपासना स्थल अधिनियम, 1991 को चुनौती दी है, जिसके तहत राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को छोड़कर अन्य धार्मिक स्थल से संबद्ध ऐसे किसी भी विवाद को अदालत नहीं लाया जा सकता. लखनऊ की 350 साल पुरानी टीलेवाली मस्जिद से जुड़े वसीफ़ हसन ने इसे चुनौती दी है.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: लखनऊ में 350 साल पुरानी टीले वाली मस्जिद के न्यासी (ट्रस्टी) ने उपासना स्थलों से संबंधित 1991 के एक कानून को चुनौती देने वाली जनहित याचिका का विरोध करने के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख किया है.

इस कानून के प्रावधान किसी उपासना स्थल पर फिर से दावा करने या 15 अगस्त 1947 को मौजूद स्थिति से इसके स्वरूप में बदलाव करने की मांग करने के लिए मुकदमा दायर करने पर रोक लगाते हैं.

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने 12 मार्च को उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के विवादास्पद प्रावधानों की पड़ताल करने पर सहमति दी थी.

इसके प्रावधान के मुताबिक राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को छोड़कर अन्य धार्मिक स्थल से संबद्ध इस तरह के किसी भी विवाद को अदालत में फिर से नहीं खोला जा सकता है.

भाजपा नेता एवं अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने यह याचिका दायर कर दावा किया है कि सरकार धार्मिक स्थल पर फिर से दावा करने के लिए अदालत का रुख करने के अधिकार पर रोक लगाने के वास्ते कानून नहीं बना सकती है.

अब लखनऊ की 350 साल पुरानी टीलेवाली मस्जिद के सह-मुतवल्ली और देखरेख करने वाले वसीफ हसन ने लंबित पीआईएल में एक अर्जी लगा कर इस जनहित याचिका पर भविष्य में होने वाली सुनवाई में पक्षकार के तौर पर हस्तक्षेप करने देने की अनुमति मांगी है.

हसन का आरोप है कि भाजपा धर्म के आधार पर लोगों के बीच विवाद पैदा करना चाह रही है.

उन्होंने द वायर को बताया, ‘जब अयोध्या फैसला आया था तो पूरे भारत के मुसलमानों ने धैर्य के साथ काम लिया और इसे स्वीकार किया. हमें लगा कि अब इन सब को लेकर कोई झगड़ा नहीं होगा. मेरा मानना है कि इस पीआईएल के जरिये एक बार फिर से समस्या पैदा करने की कोशिश की जा रही है.’

उन्होंने अपने आवेदन में कहा, ‘याचिका की भाषा बेहद चौंकाने वाली है. याचिकाकर्ता ने बिना किसी तथ्य या स्रोत के एक तथाकथित मामला बनाने की कोशिश की है कि कट्टरपंथी बर्बर लोगों ने भारत में आकर धार्मिक स्थलों को नष्ट किया था.’

हसन ने कहा कि याचिका में बार-बार हिंदू, जैन, सिख, बौद्ध के अधिकारों की रक्षा करने की बात की गई है और जान-बूझकर मुसलमान तथा ईसाइयों को इससे अलग किया गया है, ताकि एक झूठा माहौल बनाया जा सके कि मुसलमान और ईसाई आक्रमणकारी थे.

क्या है ये विवादित याचिका?

भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम,1991 की धारा 2, 3 और 4 को चुनौती दी है और कहा है कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (जाति, धर्म, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव पर रोक), अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार), अनुच्छेद 25 (धार्मिक प्रचार-प्रसार का अधिकार), अनुच्छेद 26 और अनुच्छेद 29 (अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा) का उल्लंघन है.

उपाध्याय ने कहा कि ये प्रावधान संविधान में निहित धर्म निरपेक्षता के सिद्धांत का भी उल्लंघन हैं.

अपनी याचिका में भाजपा नेता ने कानून में दी गई कट-ऑफ तारीख 15 अगस्त 1947 को चुनौती दी है और कहा है कि ये अतार्किक और मनमाना है. उन्होंने कहा कि सरकार ने इसके जरिये हिंदुओं, जैन, बौद्ध और सिख के धार्मिक स्थलों पर किए गए कब्जे के खिलाफ कानूनी मदद लेने पर रोक लगा दी है.

अश्विनी उपाध्यान ने कहा है कि किसी भी उपासना स्थल की 15 अगस्त 1947 को मौजूद स्थिति से इसके स्वरूप में बदलाव करने की मांग करने के लिए मुकदमा दायर करने पर रोक लगाना हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन समुदाय के लिए करारा झटका है.

उन्होंने कहा कि ब्रिटिश और मुगलकाल में हिंदुओं की दयनीय स्थिति का फायदा उठाते हुए अन्य धर्म के लोगों ने उनके धार्मिक स्थलों पर कब्जा किया था.

याचिका में यह भी कहा गया है कि केंद्र को उन अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का सम्मान करना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि नागरिकों को क्षतिग्रस्त स्थानों को बहाल करने का अधिकार है, जो कि 1192 से 1947 तक भारत की गुलामी के दौर में किया गया था. 15 अगस्त 1947 को कट-ऑफ तारीख घोषित करना, ऐसे बर्बर आक्रमणकारियों और विदेशी शासकों के गैरकानूनी कार्य को जायज ठहराने जैसा है.

भाजपा नेता ने कहा कि यह ऐतिहासिक तथ्य है कि साल 1192 में आक्रमणकारी मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराकर इस्लामी राज्य की स्थापना की थी. नागरिकों का ये अधिकार है कि वे गुलामी और प्रताड़ना के प्रतीकों को खत्म कर अतीत के गौरव को फिर से बहाल कर सकें.

अयोध्या फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को सही ठहराया था

सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद मामले में दिए अपने ऐतिहासिक फैसले में उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम,1991 को जायज ठहराते हुए इसे संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता का रक्षक बताया था.

दिल्ली स्थित वकील सरीम नावेद ने कहा कि इस याचिका के चलते अयोध्या फैसले पर भी नए सिरे से विवाद शुरू हो जाएगा, जिसे सभी पक्षों ने शांतिपूर्वक स्वीकार किया है.

उन्होंने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुसलमानों को दी गई पांच एकड़ जमीन के प्रबंधन के लिए गठित इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन ट्रस्ट ने इस समझ के साथ अपना काम शुरू किया है कि अयोध्या का फैसला अंतिम है, जो उपासना स्थल कानून को भी जायज ठहराता है. यदि इसके साथ कोई छेड़छाड़ की जाती है तो फिर से सारी चीजें संदेह में आ जाएंगी.’

(इस रिपोर्ट के अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)