कोविड-19

केंद्र को वैक्सीन खरीद नीति पर जस्टिस चंद्रचूड़ के सवालों का जवाब देना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट को इस बात की विस्तृत जांच करनी चाहिए कि कैसे नवंबर से लेकर मार्च तक घरेलू उत्पादकों को पर्याप्त ऑर्डर या क्षमता विस्तार के लिए पूंजीगत मदद न दिए जाने के कारण गंवा दिए गए. अदालत को इस संबंध में एसआईआई और भारत बायोटेक से संबंधित ब्यौरा मांगना चाहिए, जिससे यह पता लग सके कि पिछले साल दिसंबर से अब तक उनके और पीएमओ के बीच क्या बातचीत हुई.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट ने 18 से 44 आयुवर्ग के लिए केंद्र की वैक्सीन नीति को ठीक ही ‘प्रथमदृष्टया मनमाना और अतार्किक’ बताया है. लेकिन, बेहद महत्वपूर्ण तरीके से सर्वोच्च न्यायालय ने उन अहम सवालों का जवाब मांगा है, जो नागरिकों द्वारा महीनों से पूछे जा रहे हैं.

सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने केंद्र को अतीत में वैक्सीन की खरीद के लिए की गई सभी वार्ताओं का पूरा ब्यौरा इसके समक्ष पेश करने का निर्देश दिया है.

सरकार ने हाल ही में यह दावा किया है कि वह अमेरिकी फार्मा कंपनियों के साथ जुलाई, 2020 से ही बातचीत कर रही है. अगर ऐसा है तो नौ महीने से ज्यादा समय में क्या प्रगति हुई यह एक काबिलेबहस सवाल है. इससे भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है प्रधानमंत्री द्वारा दोनों घरेलू उत्पादकों- सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) और भारत बायोटेक के साथ नवंबर, 2020 से गोपनीय तरीके से की गई वार्ताओं का ब्यौरा.

यह बात हर किसी को पता है कि पिछले साल से ही एसआईआई और भारत बायोटेक दोनों ही प्री-ऑर्डर और तेजी से क्षमता को बढ़ाने के लिए जरूरी आर्थिक सहायता को लेकर साफ तस्वीर पेश करने की मांग कर रहे हैं. उस समय अगर त्वरित तरीके से फैसला लिया गया होता तो मार्च तक ज्यादा उत्पादन की क्षमता तैयार की जा सकती थी, जो अब जुलाई के अंत तक ही संभव है.

सुप्रीम कोर्ट को इस बात को लेकर एक विस्तृत जांच करनी चाहिए कि कैसे पांच महीने- नवंबर से लेकर मार्च तक- घरेलू उत्पादकों को कोई पर्याप्त ऑर्डर या क्षमता विस्तार के लिए पूंजीगत मदद न दिए जाने के कारण गंवा दिए गए.

वास्तव में सर्वोच्च अदालत को इस संबंध में एसआईआई और भारत बायोटेक से संबंधित ब्यौरा मांगना चाहिए, जिससे यह पता लग सके कि पिछले साल दिसंबर से अब तक उनके और पीएमओ के बीच क्या बातचीत हुई?

सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे ब्यौरे मांग कर अच्छा किया है, क्योंकि वे आने वाले निकट भविष्य में वैक्सीनों की भारी कमी- जो जीवन और आजीविका, दोनों के लिए बड़ा खतरा है- की बुनियाद में है.

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के डायरेक्टर जनरल बलराम भार्गव ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि प्रति दिन एक करोड़ खुराक की उपलब्धता जुलाई के अंत तक या अगस्त के शुरू तक ही हो पाएगी. कई विशेषज्ञों को इस लक्ष्य के पूरा होने पर भी शक है.

अगर एसआईआई और भारत बायोटेक को एक साथ प्रति महीने तीन करोड़ वैक्सीन प्रति महीने का प्री-ऑर्डर दिसंबर में ही दे दिया गया होता, तो भारत मार्च से ही उस दर से टीकाकारण कर रहा होता, जिस दर को अगस्त से हासिल करने की अभी योजना बनाई जा रही है.
यह प्रधानमंत्री मोदी की सबसे बड़ी विफलता है.

नवंबर से मार्च के बीच केंद्र और स्वदेशी वैक्सीन कंपनियों के बीच क्या बातचीत हुई, इससे राज्यों का कोई लेना-देना नहीं है. इस पूरी कहानी में राज्यों का आगमन ही 1 मई को हुआ जब केंद्र ने मनमाने तरीके से 18-44 साल के आयुवर्ग के टीकाकरण का निर्णय लिया.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से इस आयुवर्ग के लिए एक भेदभावपूर्ण मानदंड बनाने का कानूनी औचित्य समझाने के लिए कहकर सही किया है. अगर केंद्र सरकार ने 45 वर्ष और उससे अधिक आयुवर्ग, फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कर्मियों और अन्य जोखिमग्रस्त समूहों का मुफ्त टीकाकरण करवाया, तो ये नियम ही 18-44 आयुवर्ग के लिए क्यों नहीं लागू किए गए.

कोर्ट ने यह भी पूछा कि आखिर केंद्र ने राज्यों के लिए घरेलू वैक्सीन की खरीद के लिए ज्यादा मूल्य कैसे निर्धारित किया, जबकि खुद इसने पहले राउंड में उन्हीं वैक्सीनों की खरीद काफी कम कीमत पर की थी? और साथ ही यह भी पूछा कि राज्यों और प्राइवेट अस्पतालों के लिए कोटा निर्धारित करने का क्या आधार था?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को आनेवाले हफ्तों और महीनों में टीकाकरण की स्पष्ट रणनीति और इस उद्देश्य के लिए बजट में आवंटित 35,000 करोड़ रुपये को खर्च करने की योजना के बारे में भी बताने के लिए कहा. यह कहने की जरूरत नहीं है कि इन मसलों पर बिल्कुल भी पारदर्शिता नहीं है.

संक्षेप में कहें तो सुप्रीम कोर्ट ने वे सारे सवाल पूछे हैं जो कि इस देश के चिंतित नागरिक पूछ रहे हैं. जब केंद्र के कानून अधिकारी ने कोर्ट को यह सलाह दी कि नीति निर्माण का काम कार्यपालिका पर ही छोड़ देना अच्छा है, तब सुप्रीम कोर्ट ने नरमी से मगर दृढ़ता के साथ कहा, ‘नीति निर्माण कार्यपालिका का ही एकमात्र अधिकार क्षेत्र है. न्यायपालिका के पास कार्यपालिका की भूमिका अख्तियार करने का अधिकार या योग्यता नहीं है…. शक्तियों के इस बंटवारे का अर्थ यह नहीं है कि इन नीतियों की न्यायिक समीक्षा करना न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र के भीतर नहीं आता है.’

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अतीत में भारत में सर्वटीकाकरण की प्रथा की रोशनी में, जो केंद्र पर जीवन के अधिकार की रक्षा करने के संवैधानिक उत्तरदायित्व के निर्वाह की अपेक्षा करता है, केंद्र सरकार की वैक्सीन नीति की पड़ताल करता रहेगा. खासकर एक विनाशकारी वैश्विक महामारी के दौर में, जिसने पहले ही अभूतपूर्व कहर बरपाया है.

यह देखना बाकी है कि क्या केंद्र कोर्ट द्वारा पूछे गए सभी सवालों का पारदर्शितापूर्ण जवाब देगा? या फिर यह बंद लिफाफे में ही अपना जवाब देना पसंद करेगा.

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