देश के बड़े अनौपचारिक कार्यबल को कोविड-19 टीकाकरण में प्राथमिकता दी जानी चाहिए

एक अनुमान के अनुसार लगभग 70% शहरी कार्यबल अनौपचारिक रूप से कार्यरत हैं. अनौपचारिक श्रमिकों के काम की अनिश्चित प्रकृति पहले ही जोखिम भरी होती है, जिससे उनके कोविड-19 के संपर्क में आने का ख़तरा बढ़ जाता है. मौजूदा टीकाकरण ढांचे में कई बाधाओं के चलते ऐसे कामगारों के टीकाकरण की संभावना कम है.

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(फोटो: पीटीआई)

एक अनुमान के अनुसार लगभग 70% शहरी कार्यबल अनौपचारिक रूप से कार्यरत हैं. अनौपचारिक श्रमिकों के काम की अनिश्चित प्रकृति पहले ही जोखिम भरी होती है, जिससे उनके कोविड-19 के संपर्क में आने का ख़तरा बढ़ जाता है. मौजूदा टीकाकरण ढांचे में कई बाधाओं के चलते ऐसे कामगारों के टीकाकरण की संभावना कम है.

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कोविड-19 महामारी और परिणाम स्वरूप लॉकडाउन का भारत के अनौपचारिक क्षेत्र, जो देश के अधिकांश कर्मचारियों को रोजगार देता है, पर काफी विनाशकारी प्रभाव पड़ा है. जहां भारत गंभीर कमी और एक घातक दूसरी लहर के बीच टीकाकरण के विस्तार के लिए संघर्ष कर रहा है, यह महत्वपूर्ण है कि यह प्रक्रिया उन लाखों अनौपचारिक श्रमिकों को प्राथमिकता दे, जिन्हें वायरस के संपर्क में आने का जोखिम है और जो आजीविका के नुकसान का सामना भी करते हैं.

हालांकि इस साल जनवरी और फरवरी में प्रारंभिक अभियान में स्वास्थ्य कर्मियों और अन्य फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं को टीका लगाया गया था, वर्तमान में, टीकाकरण की पात्रता उम्र पर आधारित है. भारी कमी को देखते हुए, अधिकांश राज्य अभी भी 45 वर्ष से अधिक आयु वालों को प्राथमिकता दे रहे हैं.

खराब नियोजन से इसके उत्पादन में बाधा पड़ने के अलावा, भारत की अपनी आबादी को टीका लगाने की दोषपूर्ण रणनीति टेक्नोलॉजी द्वारा संचालित है. इस दृष्टिकोण ने लाखों अनौपचारिक श्रमिकों को टीकाकरण अभियान से बाहर कर दिया है.

यह अनुमान लगाया गया है कि लगभग 70% शहरी कार्यबल, इसमें प्रवासी श्रमिक शामिल हैं, अनौपचारिक रूप से कार्यरत हैं. अनौपचारिक श्रमिकों के काम की अनिश्चित प्रकृति उन्हें असुरक्षित कार्य परिस्थितियों का जोखिम देती है, जिससे उनके कोविड-19 के संपर्क में आने का खतरा बढ़ जाता है. श्रमिक जहां रहते और काम करते हैं, वहां की सघनता और आइसोलेशन सुविधाओं कमी को देखते हुए, फैलाव के जोखिम को रोकना एक चुनौती है.

ऐसे अनौपचारिक श्रमिक, जो निर्माण स्थलों या कपड़ों के कारखानों में काम करते हैं, उन्हें तपेदिक जैसी बीमारियां (को-मॉर्बिडिटी) के आम होती हैं, जो उन्हें वायरस के प्रति और भी अधिक संवेदनशील बनाती हैं. संक्रमित होने पर, उनके पास वैतनिक अवकाश, सामाजिक सुरक्षा या स्वास्थ्य लाभों का सहारा नहीं होता है जो औपचारिक रोजगार में कामगारों को उपलब्ध होते हैं. फिर भी, वे काम करना जारी रखते हैं क्योंकि न तो वे वेतन का नुकसान उठा सकते और न ही वे घर से काम कर सकते हैं.

कोविड-19 वैक्सीन महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान कर सकती है और मृत्यु दर के जोखिम को कम कर सकती है और इसे इस संकट से बाहर निकलने के लिए एक मुख्य प्रतिकारक (एंटीडोट) और एक पूर्वानुमानित तीसरी लहर के खिलाफ एक बचाव के रूप में देखा जा रहा है.

बावजूद इसके मौजूदा टीकाकरण ढांचे में कई बाधाओं के कारण अनौपचारिक श्रमिकों के टीकाकरण की संभावना कम है.

डिजिटल विभाजन

पहला, वैक्सीन की रणनीति टेक्नोलॉजी पर बहुत अधिक निर्भर है और उम्र के हिसाब से सीमित है. 18-45 आयु वर्ग के लोगों के लिए ऑनलाइन पंजीकरण अनिवार्य है. इससे शहरी निवासियों को संसाधनों का लाभ मिलता है, लेकिन श्रमिकों के एक बड़े हिस्से में डिजिटल साक्षरता की कमी है और उनके पास उपकरणों या इंटरनेट तक पहुंच नहीं है.

इसके अलावा, काम की कठिन प्रकृति के कारण अनौपचारिक कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा 18-45 आयु वर्ग में है. आयु वर्ग और टेक्नोलॉजी संचालित-टीकाकरण कार्यक्रमों की प्राथमिकता ने टीकों की असमानताओं को जन्म दिया है. ऐसे घरों में जहां किसी को भी टीकाकरण नहीं मिला है, वहां उम्र और उपकरणों तक पहुंच की परवाह किए बिना परिवार के कमाने वाले सदस्यों का टीकाकरण करना अनिवार्य है, ताकि वे सुरक्षित रहें और काम करना जारी रख सकें.

नियोक्ता की ज़िम्मेदारी

दूसरा, जहां भी संभव हो, श्रमिकों की एक बड़ी आबादी तक टीकाकरण में मदद करने के लिए नियोक्ताओं को शामिल किया जाना चाहिए. कई निजी कॉर्पोरेट संगठनों की तरह, जिन्होंने कर्मचारियों और उनके परिवारों का टीकाकरण करने की प्रतिबद्धता जताई है, कुछ क्षेत्रों में रोजगार के माध्यम से अनौपचारिक श्रमिकों के टीकाकरण का विस्तार करना संभव हो सकता है.

उदाहरण के लिए, निर्माण क्षेत्र में या बड़े उत्पादन/निर्माण समूहों और कपड़ों के कारखानों में, नियोक्ता इस प्रक्रिया को सरल बनाने में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं. इसी तरह, मुंबई जैसे शहरों में, जहां नगर निगम आवासीय क्षेत्रों में टीकाकरण अभियान चलाने की योजना बना रहा है, घरेलू कामगार, ड्राइवर, माली और सुरक्षा गार्ड के रूप में कार्यरत लोगों को भी इसका लाभ मिलना चाहिए. जिन लोगों का काम करने का स्थान दूसरों का घर होता है, उनके लिए वायरस के संपर्क में आने का खतरा अधिक होता है.

मार्च में कन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (क्रेडाई) ने ट्विटर पर घोषणा की कि निकाय के आने वाले अध्यक्ष ने 2.5 करोड़ निर्माण श्रमिकों का मुफ्त में टीकाकरण करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. हालांकि इसके बाद कोई अपडेट नहीं किया गया.

टीकाकरण अभियान के लिए औद्योगिक केंद्र या कार्यस्थल सर्वश्रेष्ठ प्रतीत होते हैं. क्रेडाई के नेटवर्क का उपयोग करना या बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स (बीओसीडब्ल्यू) वेलफेयर बोर्ड द्वारा श्रमिकों के लिए टीकाकरण आयोजित करने की संभावना का पता लगाना भी लाभकर हो सकता है.

हालांकि, टीकों की खरीद और लगाने की लागत या किसी भी संबंधित खर्च को नियोक्ता या प्राधिकरण द्वारा वहन किया जाना चाहिए और इसे श्रमिकों पर नहीं डाला जाना चाहिए. छोटे नियोक्ताओं, जिनके पास ऐसी पहल का समर्थन करने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं है या जो पिछले साल के उत्पादन घाटे से उबरने के लिए संघर्ष कर रहे हैं उनके लिए शायद यह व्यावहारिक न हो.

कई अन्य प्रकार के अनौपचारिक कार्यों जैसे – स्वरोजगार; घरेलू कामगार जो कई नियोक्ताओं के अधीन काम करते हैं; जो स्पष्ट नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों के बिना बड़ी आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा हैं – में नियोक्ताओं के माध्यम से टीकाकरण संभव नहीं हो सकता है.

विकेंद्रीकृत और तत्काल (वॉक-इन) मुफ्त सुविधा केंद्र जो या तो अनौपचारिक बस्तियों में या छोटी इकाइयों के समूहों के पास स्थित हैं, वे श्रमिकों को लाभान्वित कर सकते हैं. इन केंद्रों को ऐसे समय के दौरान भी काम करना चाहिए जो श्रमिकों के लिए सबसे अनुकूल हों ताकि उनके उत्पादक कार्य के समय का नुकसान न हो.

(फोटो: पीटीआई)
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प्रभावी संदेश

तीसरा, टीकाकरण पर ज़ोर देने के लिए अभियान को मज़बूत सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेश पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. चूंकि कई कामगारों के पास समाचार मीडिया या सोशल मीडिया तक पहुंच नहीं है, इसलिए टीकाकरण के बारे में गलतफहमियों को दूर करने के लिए संचार के अन्य तरीकों का पता लगाना आवश्यक है. यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि सहमति की प्रक्रिया से समझौता नहीं किया गया है.

वैक्सीन लेने में हिचकिचाहट है क्योंकि यह संभावित दुष्प्रभावों से जुड़ा हुआ है. टीकाकरण के बाद आराम की आवश्यकता का मतलब मज़दूरी का नुकसान भी है. नियोक्ता और ठेकेदार टीकाकरण को प्रोत्साहित करने से हिचकिचा रहे हैं क्योंकि इससे उत्पादन चक्र बाधित हो सकता है. साथ ही किसी प्रकार की अनहोनी की स्थिति में ज़िम्मेदार ठहराए जाने का डर भी बना रहता है.

टीके के लाभ और आवश्यकता के बारे में स्पष्ट रूप से बताने के साथ-साथ वेतन के नुकसान के बारे में कर्मचारियों की चिंताओं को दूर करने से समर्थन प्राप्त करने में मदद मिल सकती है. जीवन और आजीविका की रक्षा के लिए टीकाकरण एक अधिकार और आवश्यकता है.

समावेशी टीकाकरण

चौथा, टीकों के अधिग्रहण और वितरण की ऊंची लागत के कारण, राज्य सरकारें निवास स्थान की स्थिति से टीकाकरण को प्रतिबंधित करने लगी हैं. उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में घोषणा की कि पहली वरीयता स्थानीय लोगों को दी जाएगी. यह विडंबना है कि उत्तर प्रदेश में जितने प्रवासी आते हैं, उससे अधिक प्रवासी बाहर जाते हैं.

प्रवासियों का एक बड़ा वर्ग वंचित जाति समूहों से संबंधित है जो पहले से ही खराब स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. टीकाकरण कार्यक्रम से बाहर किए जाने से वे और गहरे स्वास्थ्य संकट में पड़ सकते हैं.

2020 के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन का अनुभव हमें बताता है कि किसी भी प्रकार की राहत, राशन या नकद हस्तांतरण प्राप्त करने वालों में प्रवासी श्रमिक अक्सर आखिरी में होते हैं. टीकों के मामले में इसे दोहराया नहीं जाना चाहिए. प्रवासियों को उनके रहने का स्थान जो भी हो, खुराक लेने में सक्षम होना चाहिए.

अनौपचारिक श्रमिक पहले से ही कम अवसरों और कम मज़दूरी के साथ एक बदले हुए श्रम बाज़ार का सामना करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इसलिए, अनौपचारिक श्रमिकों का टीकाकरण केवल इसलिए प्राथमिकता नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि वे हमारे शहरों का निर्माण और रखरखाव करते हैं, बल्कि इसलिए भी कि टीकों की असमानताओं को कम करने का यही एकमात्र तरीका है.

जैसा कि ‘अनौपचारिक रोजगार में महिलायें: वैश्वीकरण और आयोजन’ (WEIGO) द्वारा देखा किया गया है, टीकों तक पहुंच को आर्थिक न्याय से अलग नहीं किया जा सकता है और यह ‘तिहरे स्वास्थ्य-आर्थिक-देखभाल संकट के ‘झटके को कम’ करने के लिए महत्वपूर्ण है.’

(दिव्या रवींद्रनाथ इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स में शोधार्थी हैं. विकास कुमार आजीविका ब्यूरो में श्रम नीति विश्लेषक हैं. लेखक आजीविका ब्यूरो के महेश गजेरा के सुझावों के लिए उनके आभारी हैं.)

(मूल अंग्रेज़ी लेख से सुनीता भदौरिया द्वारा अनूदित)