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केन-बेतवा लिंक: 23 लाख पेड़ काटने के बदले ग़ैर-वन भूमि नहीं ढूंढ सकी सरकार, नियम बदलवाने की कोशिश

द वायर द्वारा प्राप्त किए गए दस्तावेज़ों से पता चलता है कि केन-बेतवा प्रोजेक्ट के तहत सरकार जितनी ज़मीन प्रतिपूरक वनीकरण के रूप में दिखा रही है, उसमें से भी काफ़ी स्थानीय निवासियों की निजी भूमि है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान. (फाइल फोटो: पीटीआई)

(इंटरन्यूज़ के अर्थ जर्नलिज्म नेटवर्क के सहयोग से की गई यह रिपोर्ट केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना पर छह लेखों की शृंखला का दूसरा भाग है. पहला भाग यहां पढ़ें.)

छतरपुर/पन्ना: केन नदी से करीब 700 मीटर की दूरी पर गौरी शंकर यादव का दौधन गांव है, जो पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर में स्थित है. यादव और उनका पूरा गांव, जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी भी हैं, इस नदी और इससे सटे जंगल पर निर्भर है.

वे यह बात सुनकर सिहर उठते हैं कि केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के नाम पर अब यहां पर एक बहुत बड़ा बांध बनाया जाएगा, जिसके चलते उन्हें हटाया जाएगा और लाखों की संख्या में पेड़ कटेंगे.

यादव कहते हैं, ‘हमारा जीवन इन्हीं जंगलों से चलता था. महुआ बीनते थे, लकड़िया बेचते थे, बांस काटते थे, जो लोग पलायन करके अब दिल्ली जाते हैं, वे यहीं कमा-खा लेते थे. इन पेड़ों को काटने से जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई नहीं हो सकती.’

जाहिर है कि यादव जैसे उन तमाम लोगों के लिए ये प्रोजेक्ट भयावह है जिनका पेड़ों के प्रति लगाव है और वे इसी पर आश्रित हैं.

लेकिन केंद्र की मोदी सरकार उन शर्तों में भी ढील दिलाने की कोशिश कर रही है, जिसके आधार पर पर्यावरण मंत्रालय ने विवादित केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट को प्रथम स्तर की वन मंजूरी प्रदान की थी.

सरकार को ऐसा इसलिए करना पड़ रहा है क्योंकि वे भरपाई के लिए उतनी उचित जमीन नहीं ढूंढ पाए है, जितने क्षेत्र के पेड़ों को काटा जाएगा. जलशक्ति मंत्रालय के मंत्री से लेकर वरिष्ठ अधिकारी तक ‘राष्ट्रीय महत्ता’ का हवाला देते हुए इस प्रवधान को बदलने के लिए पर्यावरण मंत्रालय पर दबाव डाल रहे हैं.

इतना ही नहीं, वन भूमि के बदले अन्य जगह की भूमि देने के लिए जितने क्षेत्र की पहचान हुई है, उसमें से काफी जमीन सरकार की नहीं, बल्कि स्थानीय निवासियों की है.

द वायर  द्वारा सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत प्राप्त किए गए दस्तावेजों से ये जानकारी सामने आई है.

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के वन संरक्षण डिविजन ने वन सलाहकार समिति की सिफारिश पर 25 मई 2017 को केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के लिए 6,017 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन कार्यों (डाइवर्जन) में इस्तेमाल की मंजूरी प्रदान की थी.

दूसरे शब्दों में कहें, तो करीब 8,427 फुटबॉल के मैदान के बराबर की भूमि में लगे पेड़ों को खत्म किया जाना है.

पन्ना टाइगर रिजर्व में एक हिरन. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

इस परियोजना के तहत मंत्रालय ने इन क्षेत्रों में कम से कम 23 लाख पेड़ों का काटने की इजाजत दी है, जिसमें से बेहद संवेदनशील पन्ना टाइगर रिजर्व का 4141 हेक्टेयर वन क्षेत्र भी शामिल है.

हालांकि ऐसा करते हुए मंत्रालय ने ये शर्त रखी थी कि सरकार को प्रभावित वनभूमि के एवज में बराबर गैर-वनभूमि (6017 हेक्टेयर) वन विभाग को उपलब्ध कराना होगा. लेकिन ऐसा कर पाने में सरकार विफल रही है. उलटे पिछले करीब तीन सालों से पर्यावरण मंत्रालय पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि वे इस प्रावधान को बदले दें.

जल मंत्रालय के तत्कालीन सचिव यूपी सिंह ने 30 जुलाई 2018 को पर्यावरण मंत्रालय के तत्कालीन सचिव सीके मिश्रा को पत्र लिखकर कहा था कि मध्य प्रदेश सरकार अपेक्षित 6,017 हेक्टेयर में से 4,206 हेक्टेयर ही गैर-वनभूमि का पता लगा पाई है, इसलिए इस शर्त को हल्का किया जाए.

उन्होंने कहा कि राज्य के मुख्यमंत्री ने केंद्रीय जल मंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि वे अतिरिक्त गैर-वनभूमि का इंतजाम करने में असमर्थ हैं.

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सचिव ने कहा कि बाकी की जो 1,811 हेक्टेयर (6,017 हेक्टेयर- 4,206 हेक्टेयर) जमीन बच रही है, उसके बदले में मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले की दोगुनी बिगड़ी या खराब वनभूमि अर्थात 3,622 हेक्टेयर क्षेत्र को प्रतिपूरक वनीकरण करने के लिए दिया जा सकता है. 

हालांकि इस कदम को विशेषज्ञों ने पर्यावरण नियम का घोर उल्लंघन और जंगल के दृष्टिकोण से खतरनाक बताया है.

इस संबंध में सीके मिश्रा ने 19 दिसंबर 2018 को सिंह को लिखे पत्र में कहा कि वन भूमि के बदले में इसके बराबर गैर-वन भूमि मुहैया कराना प्रथम स्तर के वन मंजूरी की ‘जरूरी शर्त’ है, जिसे सरकार ने स्वीकार भी किया था.

हालांकि इसके साथ ही उन्होंने पर्यावरण मंत्रालय के संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे इस मामले को उचित स्तर पर ले जाएं और देखें कि क्या इस मांग को स्वीकार किया जा सकता है.

मिश्रा ने यह भी कहा, ‘इस बीच मैं आपसे गुजारिश करूंगा कि स्टेज-1 मंजूरी की सभी शर्तों को लागू करने के लिए राज्य सरकार जरूरी कदम उठाएं.’

इसके बाद मंत्रालय ने 17.07.2019 और 05.02.20 को अतिरिक्त महानिदेशक (वन संरक्षण) को भी पत्र लिखा कि इस मामले में तेजी लाई जाए, लेकिन यहां से भी कोई जवाब नहीं.

इसके बाद केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को लागू कर रही जल शक्ति मंत्रालय की एजेंसी राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (एनडब्ल्यूडीए) के महानिदेशक भोपाल सिंह ने 22 जून 2020 को वन महानिदेशक एवं विशेष सचिव संजय कुमार को पत्र लिखकर परियोजना के लिए दी गई वन मंजूरी की शर्तों में ढील देने की मांग की. हालांकि यहां से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली.

जल शक्ति मंत्रालय द्वारा वन मंजूरी की शर्तों में ढील देने की मांग के जवाब में तत्कालीन पर्यावरण सचिव सीके मिश्रा का पत्र.

इस मामले को लेकर सरकार की बेचैनी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है पिछले करीब दो सालों में इस परियोजना को लेकर जितनी बैठकें हुई हैं, संभवत: हर एक में पर्यावरण मंत्रालय की शर्तों पर ढील दिलाने पर चर्चा हुई है.

केन-बेतवा परियोजना पर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकार के प्रतिनिधियों के साथ 25.07.2019 को हुई बैठक में जल सचिव यूपी सिंह ने एक बार फिर जोर दिया कि पर्यावरण मंत्रालय को इस संबंध कार्रवाई करने को कहा जाए.

इसके बाद साल 2020 में नौ सितंबर को सिंह की अध्यक्षता में एक और बैठक हुई, जिसमें उन्होंने कहा कि पर्यावरण मंत्रालय से कहा गया है कि वे इस परियोजना को ‘राष्ट्रीय प्रोजेक्ट’ के नजरिये से देखें, जहां केंद्र सरकार द्वारा सभी जरूरी मंजूरी मांगी जाती है.

तत्कालीन जल सचिव ने कहा कि इस मामले को लेकर जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने तत्कालीन पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के साथ बैठक की है.

इसे लेकर एनडब्ल्यूडीए के महानिदेशक भोपाल सिंह ने द वायर  से कहा कि इतने बड़े स्तर पर पुनर्वास एवं पुन: स्थापन कार्यों के चलते काफी सारी चुनौतियां आ रही हैं, इसलिए पर्यावरण मंत्रालय के सामने ये मांग रखी गई है.

उन्होंने कहा, ‘पन्ना टाइगर रिजर्व के बगल में 4,206 हेक्टेयर गैर-वन भूमि और 3,622 हेक्टेयर खराब पड़ी वन भूमि देने का प्रस्ताव किया गया है. परियोजना के तहत पानी की झील भी बनाई जाएगी, जो पन्ना टाइगर रिजर्व का हिस्सा बनेगी और इस तरह इसका पूरा क्षेत्रफल बढ़ जाएगा.’

हालांकि साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल (एसएएनडीआरपी) के कोऑर्डिनेटर और इस परियोजना की एक विशेषज्ञ समिति के सदस्य रहे हिंमाशु ठक्कर ने कहा वन मंजूरी की शर्तों का अनुपालन न करना घोर उल्लंघन है.

रिज़र्व वन क्षेत्र के भीतर लगा बोर्ड. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

उन्होंने कहा कि वन सलाहकार समिति ने विस्तृत विचार विमर्श के बाद ये शर्त लगाई थी. इसे ऐसे बदला नहीं जा सकता है.

ठक्कर कहा, ‘पहले तो इस परियोजना को पूर्ण वन मंजूरी नहीं मिली हुई है. ये स्टेज-1 की शर्तें हैं यानी कि जब तक इसे पूरा नहीं किया जाता है, तब तक अगली मंजूरी नहीं मिल सकती है. वन सलाहकर समिति ने अपनी एक सह-समिति बनाई थी, जिसने जमीन पर जाकर पूरी स्थिति की जांच की थी और उसके बाद ये शर्तें लगाई गई थीं. इसे किसी भी स्थिति में नहीं बदलना चाहिए.’

पिछले दो दशकों से नदियों की दिशा में कार्य कर करे ठक्कर ने कहा कि ये शर्तें इसलिए रखी गईं थी ताकि इस प्रोजेक्ट से पन्ना टाइगर रिजर्व को होने वाले नुकसान की थोड़ी-बहुत तो भरपाई की जा सके, लेकिन जिस तरह सरकार इन शर्तों को हल्का कराने की कोशिश कर रही है, नुकसान और बढ़ने की संभावना है.

द वायर  ने इस संबंध में पर्यावरण मंत्रालय के सचिव और वन महानिदेशक को ईमेल भेजकर उनसे जवाब मांगा है कि जल शक्ति मंत्रालय की इन मांगों से किस तरह निपटा जाएगा. इस बारे में अब तक कोई उत्तर नहीं मिला है. यदि कोई जवाब आता है तो उसे रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा.

ये ज़मीन भी लोगों की है

बात इतने पर ही नहीं रुकती. दस्तावेजों से यह भी खुलासा होता है कि मध्य प्रदेश सरकार और एनडब्ल्यूडीए ने मिलकर जिस 4,206 हेक्टेयर जमीन को गैर-वनभूमि बताकर वन विभाग को देने की बात की है, उसमें से 823 हेक्टेयर जमीन स्थानीय लोगों की है, जहां वे रहते हैं. और इसकी जानकारी अब तक पर्यावरण मंत्रालय को नहीं दी गई है.

11 जुलाई 2018 को एनडब्ल्यूडीए के तत्कालीन मुख्य अभियंता (उत्तर) एनसी जैन द्वारा भेजे गए एक पत्र के आधार पर यूपी सिंह ने पर्यावरण मंत्रालय को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि केन नदी के पूरब में सात गांवों की पहचान की गई है, जहां पर 2,179.09 हेक्टेयर गैर-वनभूमि है. इसी तरह नदी के पश्चिम में तीन गांव हैं जहां 1,009 हेक्टेयर गैर-वनभूमि है.

उन्होंने कहा कि इसके अलावा दौधन बांध के आंशिक डूब क्षेत्र में दो गांव हैं, जहां पर 1,018 हेक्टेयर गैर-वनभूमि है. इस तरह कुल मिलाकर 4,206 हेक्टेयर (2,179 हेक्टेयर + 1,009 हेक्टेयर + 1,018 हेक्टेयर) गैर-वनभूमि केन-बेतवा परियोजना के तहत काटे जा रहे पेड़ों की भरपाई के रूप में दी जा सकती है.

हालांकि मध्य प्रदेश राजपत्र और राजस्व विभाग के दस्तावेजों से पता चलता है कि इसमें से 3,383 हेक्टेयर ही गैर-वनभूमि है और बाकी जमीन पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र में शामिल गांवों की निजी भूमि है.

राज्य सरकार ने नदी के पूरब में जिन सात गांव में 2,179.09 हेक्टेयर गैर-वन भूमि के पहचान का दावा किया है, उसमें से 761.47 हेक्टेयर भूमि ग्रामीणों की है. इसी तरह पश्चिम में 60.8 हेक्टेयर जमीन गांव वालों की है.

पन्ना और छतरपुर जिले में स्थित इन गांवों के नाम कठारी बिलहटा, कौनी, मनझोली, गहादारा, मरहा, खमरी, कुदान, पाठापुरा, नैनगुन्वा और दुगरिया है.

 

इस मामले को लेकर राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण ने छतरपुर के बिजावर तहसील के कडवारा गांव की पहचान की थी, जहां 1,011 हेक्टेयर गैर-वनभूमि है, लेकिन मध्य प्रदेश के वन विभाग ने न तो अभी तक इसकी मंजूरी दी है और न ही केंद्र ने पर्यावरण मंत्रालय को इसकी कोई जानकारी दी है.

वन्यजीव अभ्यारण्य को जोड़ने को लेकर भी टाल-मटोल

जल शक्ति मंत्रालय ने सिर्फ वन क्षेत्र ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के नौरादेही एवं रानी दुर्गावती वन्यजीव अभ्यारण्य और उत्तर प्रदेश के रानीपुर वन्यजीव अभ्यारण्य को पन्ना टाइगर रिजर्व में मिलाने या इसके साथ जोड़ने के बाद परियोजना के कार्यों को शुरू करने की शर्त में भी ढील देने की मांग की है.

30 जुलाई 2018 को लिखे पत्र में मंत्रालय ने दलील दी है कि इस काम को करने में समय लग सकता है, इसलिए नदी जोड़ो परियोजना के काम शुरू करने की मंजूरी दी जाए.

तीन सितंबर 2020 को तत्कालीन जल सचिव यूपी सिंह की अध्यक्षता में हुई एक बैठके में मध्य प्रदेश सरकार के वन्यजीव विभाग के अधिकारियों ने कहा था उन्होंने अभ्यारण्य को टाइगर रिजर्व से जोड़ने का काम शुरू कर दिया है.

हालांकि राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण ने कहा कि इस काम के चलते प्रोजेक्ट में बहुत देरी हो रही है.

इस पर सिंह ने कहा, ‘पर्यावरण मंत्रालय प्रोजेक्ट का काम शुरू करने से पहले इन तीनों वन्यजीव अभ्यारण्य को कोर/क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट से जोड़ने की शर्तों को हल्का कर सकता है और केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना का काम और इन अभ्यारण्यों को जोड़ने का काम साथ-साथ चल सकता है, ताकि देरी और लागत राशि बढ़ने से बचा जा सके.’

हालांकि पर्यावरण मंत्रालय ने अभी तक इस मांग को भी मंजूरी प्रदान नहीं की है.

पन्ना टाइगर रिजर्व के इन पेड़ों को केन-बेतवा लिंक बनने पर काटा जाएगा. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

बता दें कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (एनडब्ल्यूएल) की स्थायी समिति की 39वीं बैठक में इस परियोजना के चलते बाघों के निवास स्थान के 105 स्क्वॉयर किमी क्षेत्र खत्म होने को लेकर गहरी चिंता जाहिर की थी. 

इसलिए एनटीसीए ने मध्य प्रदेश के नौरादेही एवं रानी दुर्गावती वन्यजीव अभ्यारण्य और उत्तर प्रदेश के रानीपुर वन्यजीव अभ्यारण्य को पन्ना टाइगर रिजर्व से जोड़ने के लिए कहा था.

23 अगस्त 2016 को हुई इस बैठक में एनबीडब्ल्यूएल ने केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को वन्यजीव मंजूरी प्रदान की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.

अभ्यारण्य जोड़ने के साथ-साथ ही छतरपुर और दक्षिण पन्ना डिवीजन के क्षेत्र को पन्ना टाइगर रिजर्व का बफर क्षेत्र घोषित करने के लिए कहा गया था, क्योंकि यहां पर पहले से ही बाघों का ठिकाना रहा है.

हालांकि वर्तमान में कोई भी पर्याप्त आंकड़ा नहीं है जो यह साबित कर सके कि केन-बेतवा परियोजना के तहत बाघों के मौजूदा रहवास क्षेत्र को बर्बाद करने के बाद अभ्यारण्य वगैरह जोड़कर इसे बचाया जा सकता है. माना जा रहा है कि इन सबके चलते यहां तेजी से बाघ गायब होने लगेंगे.

इसकी प्रमुख वजह ये है कि इन तीनों अभ्यारण्य का पन्ना टाइगर रिजर्व के साथ कोई कॉरिडोर नहीं है. 

सरकार द्वारा मुहैया कराई सूचनाओं से पता चलता है कि टाइगर रिजर्व की बाउंड्री से नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण्य 108.2 किमी, रानी दुर्गावती अभ्यारण्य 102.1 किमी और रानीपुर अभ्यारण्य 73.8 किमी है. 

यदि इन्हें जोड़ा जाता है तो इनका रास्ता घनी आबादी और खेती वाली जमीन से होकर गुजरेगा, जो काफी अव्यावहारिक है.

इसे लेकर महानिदेशक भोपाल सिंह का कहना है कि वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) पन्ना टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों के संरक्षण को लेकर एक व्यापक लैंडस्केप मैनेजमेंट प्लान (एलमध्य प्रदेश) तैयार कर रहा है जो कि दौधन जलाशय से हुए नुकसानों की भरपाई करेगा.

केन घड़ियाल अभ्यारण्य. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

उन्होंने दावा किया कि ये परियोजना बुंदेलखंड क्षेत्र को न सिर्फ पानी देने के लिए हैं, बल्कि यह पूरे क्षेत्र का संरक्षण करेगा.

हालांकि इन दावों में काफी विरोधाभास है क्योंकि सरकार एक बने-बनाए रिजर्व क्षेत्र को उजाड़कर उसे फिर से बसाने की बात कर रही है.

क्या है ये परियोजना

मालूम हो कि इसी साल मार्च महीने की 22 तारीख को विश्व जल दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह सेखावत, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किया था.

इस प्रोजेक्ट का मकसद यूपी और मध्य प्रदेश के सूखा प्रभावित बुंदेलखंड क्षेत्र को सिंचाई एवं पीने के लिए पानी मुहैया कराना है. 

हालांकि जानकारों एवं स्थानीय लोगों का मानना है इस लक्ष्य को दूसरे रास्ते से भी प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन सरकार इसी परियोजना को लागू कर व्यापक स्तर पर प्रर्यावरणीय नुकसान और वन्यजीव को खतरा पहुंचाने के लिए उतारू है.

यह प्रोजेक्ट इस दावे पर आधारित है कि केन नदी में पानी ज्यादा है, इसलिए इसे बेतवा नदी से जोड़ कर वहां पानी पहुंचाया जा सकता है. हालांकि सरकार ने आज तक इससे संबंधित हाइड्रोलॉजिकल आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया है. इसलिए इस दलील को सुप्रीम कोर्ट समेत कई स्तरों पर चुनौती दी जा चुकी है.

केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के पहले चरण में केन नदी के पास में स्थित दौधन गांव में एक बांध बनाया जाना है, जो 77 मीटर ऊंचा और 2,031 मीटर लंबा होगा.

इसके अलावा 221 किलोमीटर लंबी केन-बेतवा लिंक नहर बनाई जाएगी, जिसके जरिये केन का पानी बेतवा बेसिन में लाया जाएगा. दौधन बांध के चलते 9,000 हेक्टेयर का क्षेत्र डूबेगा, जिसमें से सबसे ज्यादा 5,803 हेक्टेयर पन्ना टाइगर रिजर्व का होगा, जो कि बाघों के रहवास का प्रमुख क्षेत्र माना जाता है.

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 की धारा 35(6) में कहा गया है कि किसी भी वन्यजीव को नष्ट करना या हटाना, किसी भी जंगली जानवर के आवास को नष्ट करना, नुकसान पहुंचाना या मोड़ना और नेशनल पार्क या अभयारण्य के अंदर या बाहर पानी के प्रवाह को रोकना या बढ़ाना, जैसे कार्यों के लिए केवल तभी अनुमति दी जा सकती है जब यह वन्यजीवों के सुधार और बेहतर प्रबंधन के लिए आवश्यक हो.

रिजर्व वन क्षेत्र के भीतर कुछ जगहों पर काटे गए पेड़. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

इस टाइगर रिजर्व में सिर्फ बाघ ही नहीं, बल्कि गिद्ध, सुअर, हिरण, भालू, तेंदुआ, चिंकारा, महाशीर मछली, हाइना, गीदड़, लोमड़ी, चीतल, भेड़िया, सोनकुत्ता, लाल एवं काले मुंह वाले बंदर, जंगली सुअर, सियार जैसे कई जानवर हैं. बांध बनाने के चलते केन घड़ियाल अभ्यारण्य तक भी प्रभावित होगा, जो घड़ियालों के जीवन के लिए खतरा है.

इसके साथ इस परियोजना में 10 गांव भी डूबेंगे, जिसके चलते कम से कम करीब 8,340 लोग प्रभावित होंगे.

वन सलाहकार समिति की उपसमिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इस प्रोजेक्ट के तहत 20 सेंटीमीटर और उससे अधिक की लंबाई वाले लगभग 23 लाख पेड़ों को काटा जाएगा.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त सेंट्रल इम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) ने अक्टूबर 2019 में सौंपे अपने रिपोर्ट में कहा था कि केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट फेज-1 की जांच दौरान पाया कि इस क्षेत्र में 20 सेंटीमीटर से कम लंबाई वाले पौधों की काफी संख्या है, जिनकी गणना नहीं की गई है.

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि चूंकि इस परियोजना को पूरा होने में करीब आठ साल का समय लगेगा, इसलिए ये पेड़ 20 सेमी. लंबाई की सीमा को पार कर जाएंगे और अंतत: इन्हें काट दिया जाएगा, लेकिन इन पेड़ों की कटाई के आंकड़ों में इनकी गणना नहीं की गई है, जो चिंताजनक है.

दूसरे शब्दों में कहें, तो सुप्रीम कोर्ट कमेटी का मानना था कि जितने पेड़ काटने का अनुमान लगाया गया है, उसी तुलना में काफी ज्यादा पेड़ खत्म हो जाएंगे.

यहां पर सागौन, खैर, सैजा, सलैया, गुंजा, पलाश, धवा, तेंदू, कुल्लू, करघई, बेल, महुआ, बांस इत्यादि के पेड़ पाए जाते हैं.

इस परियोजना में दौधन बांध के अलावा लोवर ओर प्रोजेक्ट, कोठा बराज और बिना कॉम्प्लेक्स मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट जैसी संरचनाओं का निर्माण किया जाएगा. साल 2017-18 के मूल्य के आधार पर इसमें 35,111.24 करोड़ रुपये का खर्च आएगा.

सरकार का दावा है इसके जरिये 9.04 लाख हेक्टेयर में सिंचाई होगी, जिसमें से मध्य प्रदेश का 6.53 लाख हेक्टेयर और उत्तर प्रदेश का 2.51 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित किया जा सकता है. 

इसके तहत बुंदेलखंड के पन्ना, टीकमगढ़, छतरपुर, सागर, दमोह, दतिया, बांदा, महोबा, झांसी और ललितपुर जैसे जिलों को लाभ मिलने की संभावना है.

अंग्रेजों के समय में केन नदी पर बना गंगऊ बांध. यहीं से करीब दो किमी. दूरी पर दौधन बांध प्रस्तावित है. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

हालांकि केन नदी पर बने बरियापुर बांध से पहले ही उत्तर प्रदेश में 2.14 लाख हेक्टेयर की सिंचाई का प्रावधान किया गया था. इस तरह केन-बेतवा प्रोजेक्ट से प्रदेश को महज 0.38 लाख हेक्टेयर (2.52 लाख हेक्टेयर – 2.41 लाख हेक्टेयर) का लाभ होगा. जबकि मध्य प्रदेश ने बांध से खुद के लिए मिली सिंचाई क्षमता का अभी तक पूरी तरह उपयोग ही नहीं किया है.

इसके अलावा एनडब्ल्यूडीए द्वारा दी गई जानकारी से पता चलता है कि केन बेसिन में पहले से ही 11 बड़े और मध्यम परियोजनाएं तथा 171 छोटी सिंचाई परियोजनाएं चल रही हैं.

इस आधार पर सीईसी ने सिफारिश की थी कि दौधन बांध को बनाए बिना और इकोलॉजी को नुकसान पहुंचाए बिना पूर्ववर्ती योजनाओं का क्षमता विस्तार कर जरूरतों को पूरी किया जा सकता है.

हालांकि इन सब तथ्यों को सिरे से खारिज करते हुए मोदी सरकार ने केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना की डील साइन कर दी है.