राजनीति को अपराध-मुक्त करने का ज्ञान देने से पहले भाजपा को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए!

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में 35-40 फीसदी प्रत्याशियों का अापराधिक रिकॉर्ड है. कई अपराधों को वैचारिक वैधता भी मिल चुकी है क्योंकि इसके दोषियों को सज़ा के बजाय कोई बड़ी ज़िम्मेदारी या पद दे दिया जाता है. भाजपा के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष इसका सटीक उदाहरण हैं.

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में 35-40 फीसदी प्रत्याशियों का अापराधिक रिकॉर्ड है. कई अपराधों को वैचारिक वैधता भी मिल चुकी है क्योंकि इसके दोषियों को सज़ा के बजाय कोई बड़ी ज़िम्मेदारी या पद दे दिया जाता है. भाजपा के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष इसका सटीक उदाहरण हैं.

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केशव प्रसाद मौर्य प्रधानमंत्री मोदी और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के साथ (फोटो : पीटीआई)

मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने द टेलीग्राफ में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा चुनाव आयोग में जमा किए गए एक हालिया हलफ़नामे के हवाले से लिखा है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा के पहले चरण के चुनाव में भाजपा के सबसे ज़्यादा 40% दाग़ी प्रत्याशी मैदान में थे. वहीं दूसरे नंबर पर बसपा है जिसके 38% प्रत्याशियों का क्रिमिनल रिकॉर्ड था.

हालांकि दूसरे दौर के चुनावों में सबसे ज़्यादा 38% क्रिमिनल रिकॉर्ड कांग्रेस के प्रत्याशियों के थे. वहीं तीसरे चरण में खड़े प्रत्याशियों में सबसे ज़्यादा 41% दाग़ी सपा के हैं. रामचंद्र गुहा ने इन सभी आंकड़ों को मोदी के उस वादे के साथ लिखा है जो उन्होंने 2014 के आम चुनावों से पहले अपनी एक रैली में किया था, (जिसका ज़िक्र हाल ही में आई मिलन वैष्णव की क़िताब ‘व्हेन क्राइम पेज़ : मनी एंड मसल इन इंडियन पॉलिटिक्स’ में किया गया है)

मोदी ने कहा था कि अगर वो प्रधानमंत्री बने तो, ‘किसी दाग़ी की की हिम्मत नहीं होगी कि वो चुनावों में खड़ा हो. कौन कहता है कि इस तरह राजनीति को साफ़ करना मुमकिन नहीं है? इसी क़िताब में एक और बयान है जहां मोदी ने राजनीति को अपराधीकरण-मुक्त करने की ज़रूरत बताते हुए कहा था, ‘हमें राजनीति को अपराधीकरण से बचाने के लिए कुछ तो करना ही होगा, इस पर भाषण देने से तो कुछ नहीं होगा.’

पर अब जब मोदी प्रधानमंत्री बन चुके हैं तब वे राजनीति से अपराध और भ्रष्टाचार कम करने के लिए कोई कदम उठाने के बजाय भाषण ज़्यादा दे रहे हैं. अलग-अलग समय पर दिए गए उनके भाषणों में राजनीति के दलदल को साफ़ करने के अलग-अलग कारण बताए गए. हालिया संदर्भ नोटबंदी का था, जहां उन्होंने कहा था कि व्यवस्थाओं में फैली गंदगी को साफ़ करने के लिए यह फैसला लिया गया था.

मोदी के 2014 के चुनावी भाषणों को इस वक़्त याद करने की वजह सिर्फ यह बताना है कि इस नई व्यवस्था का उद्देश्य कभी कोई बदलाव लाने का रहा ही नहीं है. वरना क्यों वे अमित शाह को देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य का पार्टी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य को बनाने देते? ज्ञात हो कि मौर्य पर दर्ज़नों आपराधिक आरोप हैं, हत्या के एक मुक़दमे की चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है और सुनवाई हो चुकी है.

अप्रैल 2016 में जब मौर्य को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था, तब भाजपा के अंदर ही कलह शुरू हो गई थी. उस समय पार्टी के वरिष्ठों ने इस बात पर एतराज़ जताया था पर तब मोदी और शाह ने मौर्य का पक्ष लेते हुए कहा था कि उन पर लगे आपराधिक आरोप राजनीति से प्रेरित हैं. मौर्य ने खुद टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए कहा था कि उन पर लगाए गए ज़्यादातर आरोपों की वजह ‘जनता के मसलों पर उनके किए गए उनके विरोध-प्रदर्शन’ हैं. उनकी यह बात सिर्फ़ आधा सच है. पर उन पर लगे आरोपों में सबसे गंभीर चांद ख़ान हत्या का मामला है. इस मामले में दाखिल की गई चार्जशीट में उनका नाम था, उन पर सुनवाई भी हुई थी. हालांकि 2014 में मौर्या के लोकसभा चुनाव में फूलपुर सीट से जीतने के बाद हत्या के मुख्य चश्मदीदों का सहयोग कम हो गया. भाजपा में उनके बढ़ते कद ने मृतक के बड़े भाई को इस मामले को वापस लेने को मजबूर कर दिया.

मोदी के आने के बाद भी मौर्य का यूपी भाजपा में इस तरह आगे बढ़ना दिखाता है कि राजनीति को अपराध-मुक्त करने के मोदी के दावे में कोई दम नहीं है. एडीआर के हालिया आंकड़ों की मानें तो वे लगातार उन प्रत्याशियों को टिकट दे रहे हैं जिनका क्रिमिनल रिकॉर्ड रहा है.

मौर्य का इस तरह से आगे बढ़ना राजनीति में अपराधियों और अपराधों को वैधता देने जैसा है- ऐसा अपराधीकरण जो किसी विचारधारा पर टिका हुआ है.

यहां ध्यान देने वाली बात है कि कभी चाय विक्रेता और अख़बार के हॉकर रहे केशव प्रसाद मौर्य सीधे किसी प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बन जाना उनके विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के संगठन मंत्री के रूप में रही सक्रियता का परिणाम है. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि विहिप वही संगठन है जिसके नेतृत्व में 1991 में राम मंदिर अभियान चलाया गया था. एक समय पर मौर्य आरएसएस की स्थानीय इकाई के नगर कार्यवाह भी रहे हैं. इसके बाद बाबरी मस्जिद विध्वंस का मामला आपराधिक धारा के अंतर्गत ही दर्ज हुआ था, जिस पर सुनवाई चल ही रही है. भाजपा द्वारा ऐसे लोगों को बढ़ावा दिया जा रहा है जो इस तरह की किसी आपराधिक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं और किसी विशेष विचारधारा के तहत काम करते हैं.

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बाबरी विध्वंस (फोटो : पीटीआई)

इससे पहले 1949 में अयोध्या के जिलाधिकारी रहे केके नायर के बाबरी मस्जिद के अंदर राम की मूर्ति रखने देने में सहयोग देने पर जन संघ द्वारा इनामस्वरुप उन्हें 1952 जन संघ के टिकट पर लोकसभा चुनावों में उतारा गया था, जिसके बाद वे जीतकर लोकसभा में पहुंचे थे. इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आज जो मौर्य खुलेआम दावा करते हैं कि उन पर लगे आरोप उनके विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा रहने की वजह से लगाए गए हैं, कल की तारीख में यह भी बता सकते हैं कि ये विरोध प्रदर्शन बाबरी मस्जिद के लिए हुए थे, या हाल ही के सालों में हुए ‘गोरक्षा’ आंदोलन के लिए!

मिलन वैष्णव की क़िताब राजनीति में पैसे और पावर की बात करती है, पर हमें यह समझने की भी ज़रूरत है कि किस तरह किसी विचारधारा के चलते भी अपराधों को बढ़ावा मिल रहा है. मिसाल के तौर पर अगर हिंदुत्ववादी संगठनों का इतिहास देखें, तो दिखेगा कि राम मंदिर और गोरक्षा जैसे आंदोलनों के लिए कैसे पिछड़ी जातियों और दलितों को जोड़ा गया, और तो और विचारधारा के चलते हुए इन अपराधों का स्वरुप उन परंपरागत राजनीतिक अपराधियों से अलग है, जहां सरकार या प्रशासन के कामों को नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है.

विचारधारा के आधार पर हुए इन अपराधों का भी अपना इतिहास है. जैसे 1949 में बाबरी मस्जिद परिसर में रखी गई राम की प्रतिमा ग़ैर-कानूनी रूप से रखी गई थी. इसके बाद के दशकों में इस आंदोलन वजह से कई अपराध हुए. श्रीकृष्ण कमीशन के दस्तावेज़ों के अनुसार मस्जिद विध्वंस और हिंसा के बाद ही मुंबई में दंगे हुए थे. इस आंदोलन का संबंध गोधरा और गुजरात में हुई हिंसा से भी है, जहां कारसेवकों से भरी एक ट्रेन को जला दिया गया था.

यह सब कहने का उद्देश्य बस इतना है कि मौर्य जैसे लोग जो इस तरह के विचारधारा विशेष पर आधारित आंदोलनों का हिस्सा रहे हैं, जिन पर समय-समय पर संगीन आरोप भी लगते रहे हैं, भाजपा के प्रोत्साहन से पार्टी में व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ रहे हैं. ज़ाहिर है कि संघ इन घटनाओं को अपराध न मानकर सामान्य विचलन ही कहेगा पर अगर 1949 से 2017 तक इनका क्रमिक इतिहास देखा जाए तो सच आरएसएस की इस सोच के बिल्कुल उलट होगा. एडीआर के अनुसार ऐसे अपराधों के सामने उत्तर प्रदेश और बिहार के राजनीतिक दलों में फैले हुए ‘बाहुबलियों’ के अपराध छोटे नहीं हो जाते हैं, पर इस तरह किसी विशेष विचारधारा के लिए लगातार बढ़ रहे इन राजनीतिक ‘योद्धाओं’ की अपराध गाथा पर अलग से अध्ययन होना चाहिए, क्योंकि इनके उद्देश्य आम अपराधों से अलग होते है.

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