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उत्तर प्रदेश में क़ानून व्यवस्था बेहतर होने के भाजपा के दावों में कितनी सच्चाई है

बीते पांच सालों में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने औरतों, अल्पसंख्यकों और असहमति ज़ाहिर करने वालों पर हुए ज़ुल्म की अनदेखी की है, या इसमें स्वयं उसकी भूमिका रही. ऐसे हालात में भी विडंबना यह है कि भाजपा प्रदेश में क़ानून व्यवस्था के अपने रिकॉर्ड को उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है.

अक्टूबर 2020 में दिल्ली-नोएडा सीमा पर तैनात पुलिस. (फोटो: पीटीआई)

क़ानून के शासन के मामले में उत्तर प्रदेश कोई आदर्श राज्य नहीं है. भाजपा सरकार के पिछले पांच वर्षों में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं, जहां क़ानून व्यवस्था कायम करने वाली संस्थाएं जनता की उम्मीदों पर खरी उतरने में नाकामयाब साबित हुई हैं.

सरकार ने या तो औरतों, अल्पसंख्यकों, गरीबों और असहमति ज़ाहिर करने वालों पर ज़ुल्म को अनदेखा किया है, या हिंसा भड़काने में स्वयं उसकी अहम भूमिका रही है. ऐसे हालात में भी विडंबना ये है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में क़ानून व्यवस्था के अपने रिकॉर्ड को एक उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है.

इसी कड़ी में 29 जनवरी 2022 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने समाजवादी पार्टी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को उनके कार्यकाल (2012-17) के दौरान ख़राब क़ानून व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि पिछले पांच सालों में हालात बहुत सुधरे हैं.

शाह का यह दावा मुख्यत: दो कारणों से संदिग्ध जान पड़ता है.

पहला, शाह के इस बयान से यह साफ है कि क़ानून व्यवस्था के स्तर को आंकने का उनका तरीक़ा गलत है. कानून व्यवस्था के प्रति सम्मान को एक गुण मानने के बजाय, शाह अपने द्वारा तय किए मानकों से संतुष्ट नज़र आते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि भाजपा सरकार ने सपा की पिछली सरकार से बेहतर काम किया है.

इस नजरिये से देखें तो क़ानून के शासन का सम्मान सापेक्ष है, या सबके लिए अलग-अलग है. इस तरह से क़ानून के शासन का एक ऐसा पैमाना निर्धारित होता है जो इस बात से तय नहीं होता है कि क़ानून का शासन एक ‘अपवाद-रहित मानवीय गुण’ है, बल्कि वो जो सुविधानुसार तय किया जाता है.

मिसाल के तौर पर, अपराधों की संख्या में थोड़ी सी गिरावट का जश्न मनाना क़ानून के शासन का मज़ाक है. इससे लोगों की पीड़ा को हल्का समझा जाता है और यह वर्तमान सरकार की भद्दी सोच को बेनक़ाब करता है. यह क़ानून के शासन के नाम पर अवाम को धोखा देने के लिए एक अनिश्चित पैमाना तैयार करता है.

देश के गृह मंत्री का ऐसा बयान न केवल भारतीय राजनीति की परेशान करने वाली तस्वीर दिखाता है बल्कि क़ानून के शासन के लिए सरकार की निष्ठाहीन प्रतिबद्धता भी प्रदर्शित करता है.

दूसरा, शाह का ये बयान उत्तर प्रदेश की पिछले पांच सालों की हक़ीक़त से बिल्कुल उलट है. नीचे दिया गया विवरण उत्तर प्रदेश में लचर क़ानून व्यवस्था के साथ-साथ उन दुखद हालात पर भी प्रकाश डालता है जो आमजन पर थोप दिए गए हैं.

पुलिस शक्तियों का दुरुपयोग

साल 2020-21 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने देश भर में पुलिस बल द्वारा किए गए कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के 11,130 मामले दर्ज किए. इनमें से सर्वाधिक उत्तर प्रदेश से थे.

संयुक्त राष्ट्र संघ के चार विशेषदूतों ने उत्तर प्रदेश में मार्च 2017 से दिसंबर 2018 के बीच पुलिस द्वारा की गई कथित 59 हत्याओं के आरोपों पर चिंता जताई. उन्होंने 15 ऐसे मामलों पर भारत सरकार को विस्तृत ब्यौरा भी सौंपा.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग साल 2017 से 2021 के बीच पुलिस हिरासत में दी गई यातनाओं पर उत्तर प्रदेश सरकार को पांच नोटिस जारी कर चुका है. लेकिन सरकार ने अब तक कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया है.

यह तथ्य हालात को और भी अधिक दुष्कर बना देता है कि न तो भारत में ऐसी यातनाओं से निपटने के लिए कोई क़ानून है और न ही भारत ‘अत्याचार और अन्य क्रूरता, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार या सजा के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संधि (1984)’ का सदस्य है.

नेशनल कैंपेन अगेंस्ट टॉर्चर की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वर्ष 2019 में पुलिस हिरासत में हुई 125 मौतों में से उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 14 मौतें हुईं.

असहमति ज़ाहिर करने वालों पर कार्रवाई

जुलाई 2020 में, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति ने नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय समझौते के अनुच्छेद 21 के संबंध में अपनी टिप्पणी संख्या 37 में जोर देकर कहा था कि इंटरनेट या व्यक्तिगत तौर पर शांतिपूर्ण विरोध प्रकट करना मौलिक मानवाधिकार है.

इसी प्रकार, वर्ष 2012 में उच्चतम न्यायालय भी यह कह चुका है कि विरोध करने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है.

लेकिन उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान राज्य की पुलिस के साथ हुई झड़पों में कई लोग मारे गए थे, हालांकि प्रशासन ने इस बात से इनकार किया है. इसके अलावा हजारों की तादाद में लोगों को गिरफ़्तार कर जेलों में डाल दिया गया था.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग दोनों ने उत्तर प्रदेश पुलिस को नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध प्रदर्शन के दौरान की गई कार्रवाई पर नोटिस जारी किए थे.

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा बार इंटरनेट बंद किया गया था.

हाल ही में कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान भी कई गिरफ़्तारियां और मौतें हुई. हालांकि, बाद में इन कानूनों को केंद्र सरकार ने निरस्त कर दिया था.

अनगिनत मुठभेड़

मार्च 2017 से अगस्त 2021 के बीच उत्तर प्रदेश पुलिस ने 146 लोगों को मुठभेड़ के दौरान मार गिराया था.

इस अवधि के दौरान 8,472 मुठभेड़ें हुईं, जिनमें 3,302 लोगों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं और उन्हें घायल किया. इनमें से कई लोग पैरों में गोली लगने से विकलांग हो चुके हैं. अगस्त 2020 तक, मुठभेड़ में मारे जाने वालों में 37% मुस्लिम समुदाय से थे.

जनवरी 2019 में संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इन गैर-न्यायिक हत्याओं पर चिंता जताई. वे उत्तर प्रदेश पुलिस-प्रशासन के आला अफसरों के हिंसा भड़काने, हिंसा सही ठहराने और हिंसा की अनुमति देने वाले बयानों पर ख़ास तौर से चिंतित थे.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी मुठभेड़ में हुई हत्याओं पर उत्तर प्रदेश सरकार को कम से कम चार नोटिस भेज चुका है. साल 2018 में उच्चतम न्यायालय ने भी उत्तर प्रदेश सरकार को फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामलों में नोटिस भेजा था.

महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों में बढ़ोतरी

राष्ट्रीय महिला आयोग के अनुसार, भारत में वर्ष 2021 के पहले आठ महीनों में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की शिकायतों में 46% की वृद्धि हुई है. इनमें से आधे से ज़्यादा मामले उत्तर प्रदेश से थे.

इस दौरान, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बहुत ही संवेदनहीन ढंग से यह कहा था कि उत्तर प्रदेश में औरतें, भैंस और बैल सभी सुरक्षित हैं. वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश में महिलाओं के विरुद्ध देश में सर्वाधिक अपराध दर्ज किए गए थे.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 में देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के दर्ज किए गए 3,78,277 मामलों में से सर्वाधिक 59,445 मामले उत्तर प्रदेश से थे. इसी प्रकार वर्ष 2019 में भी देश में सर्वाधिक 59,853 मामले उत्तर प्रदेश से थे.

उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िले में एक दलित युवती के साथ बलात्कार और हत्या के बाद एक संयुक्त राष्ट्र अधिकारी ने भी प्रदेश में महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा पर चिंता जताई थी.

भारत में संयुक्त राष्ट्र के समन्वयक ने कहा कि देश में महिलाओं पर बढ़ती यौन हिंसा से वह बहुत दुखी और चिंतित है.

हाथरस गैंगरेप पीड़िता का अंतिम संस्कार करते पुलिसकर्मी. (फोटो: पीटीआई)

अल्पसंख्यकों को योजनाबद्ध ढंग से निशाना बनाना

एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2021 के पहले नौ महीनों में देश भर में ईसाइयों पर हिंसा के 300 मामले दर्ज किए गए थे. सभी राज्यों में से उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक मामले दर्ज किए गए थे. इनमें सबसे ज्यादा हमले दलित और जनजातीय समुदाय से जुड़े ईसाइयों पर हुए थे.

साल 2019 में देश में अनुसूचित जाति के लोगों के खिलाफ उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक अपराध हुए.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार देश में अनुसूचित जातियों के विरुद्ध हुए अपराधों के 45,852 मामलों में से एक-चौथाई मामले उत्तर प्रदेश से थे.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार, 2016-19 के दौरान आयोग ने दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ प्रताड़ना के 2,008 मामले दर्ज किये, जिनमें से 40% से भी ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश से थे.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2019 तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 65% से भी ज़्यादा क़ैदी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं. उत्तर प्रदेश में देश भर के सबसे ज्यादा क़ैदी हैं. अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और “अन्य” के सर्वाधिक क़ैदी भी उत्तर प्रदेश में हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा के सदस्य प्रदेश में गौ-मांस के उपभोग और पशु-व्यापार के विरुद्ध चलाए जाने वाले अभियान के लिए ज़िम्मेदार हैं, जिसके शिकार ख़ास तौर से मुस्लिम और दलित ही हैं.

संचार माध्यमों और पत्रकारों पर प्रतिबंध

नवंबर 2020 में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को प्रेस स्वतंत्रता की रक्षा और पत्रकारों के अधिकारों व सुरक्षा से जुड़े विषयों पर उपयुक्त कदम उठाने के लिए लिखा था. गिल्ड ने ऐसे छह मामले रेखांकित किए जिसमें पत्रकारों को प्रताड़ित या गिरफ़्तार किया गया था.

राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप की जून 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक, कोविड-19 के कारण 25 मार्च 2020 से 31 मई 2020 के बीच हुई तालाबंदी के दौरान देश भर के 55 पत्रकारों को काम करने के दौरान निशाना बनाया गया था.

इस दौरान पत्रकारों पर इनमें से सर्वाधिक हमले उत्तर प्रदेश में हुए थे. बड़े पैमाने पर पत्रकारों पर हमले और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पाबंदियों संबंधित घटनाएं सामने आई हैं.

दंगे और झूठे मामले

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 2019 में 5,714, 2018 में 8,908 और 2017 में 8,990 दंगों के मामले दर्ज किए गए थे.

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर द्वारा लोकसभा में दिसंबर 2018 में दिए एक जवाब के अनुसार, साल 2017 में उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक दंगों की 195 घटनाएं हुईं.

साल 2018 और 2020 के बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने 120 मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 को लागू किया. हालांकि, इनमें से 94 मामले इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा खारिज किए जा चुके हैं. इनमें से 41 मामले गोहत्या से जुड़े हुए थे और सभी आरोपित अल्पसंख्यक समुदाय से थे.

न्यायालय ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम का दुरुपयोग माना और यह भी कहा कि इन सभी एफआईआर में लिखी काफी जानकारी एक जैसी (कॉपी एंड पेस्टेड) है.

फासीवादी ताकतों की प्रयोगशाला

पिछले पांच सालों में हुए अत्याचारों का ये एक सतही ब्यौरा है. जो दल सांप्रदायिक घृणा, अंध राष्ट्रभक्ति और हाशिये पर पड़े लोगों के शोषण से खुद का पालन-पोषण करता है, वही इन कारनामों का जश्न मना सकता है.

यदि उत्तर प्रदेश उस आदर्श शासन का नमूना है जो भाजपा ला सकती है, तो भारत फासीवाद की ओर बढ़ रहा है. यदि एक लोकतंत्र में उपरोक्त घटनाओं को सार्वजनिक रूप से सही ठहराया और बताया जा सकता है तो ऐसे लोकतंत्र की गुणवत्ता जरूर शक के दायरे में है.

भारत बुरे दौर से गुजर रहा है. अल्पसंख्यक, महिलाएं, कार्यकर्त्ता, वकील, बुद्धिजीवी और वे सभी जो असहमति ज़ाहिर करने की हिम्मत जुटा पाते हैं, डर के माहौल में जी रहे हैं.

पोटेमकिन विलेज‘ (खामियों पर पर्दा डालकर सब सही दिखाया जाए) जैसा नज़र आता ये देश, उन ताक़तों के हाथों शोषण का शिकार बना है जो भारत की आत्मा को लंबे समय से ख़त्म करना चाहते थे. उत्तर प्रदेश उनकी वह प्रयोगशाला है, जिसमें उन्होंने सर्वाधिक निवेश किया है.

यदि दिल्ली को जाने वाली सड़क लखनऊ से होकर गुजरती है, तो उत्तर प्रदेश में क़ानून के शासन का स्तर उस नफ़रत और गंदगी को दर्शाता है जिसमें इस देश को झोंका जा रहा है.

योगी सरकार के बुरे कारनामों का केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा सराहा जाना इस बात की ओर इशारा करता है कि हम किस दौर में जी रहे हैं. झूठ बोलना भारतीय राजनीति का मूल-मंत्र बनकर रह गया है. इसलिए प्रगतिशील ताक़तों के लिए जरूरी है कि वे इस धोखे को उजागर करें, इस बेरहम हक़ीक़त को बयान करें और बेआवाज़ों की आवाज़ बनें.

(लेखक लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)

(डॉ. कैलाश जिंजर द्वारा मूल अंग्रेजी से अनूदित)