भारत

लता मंगेशकर: वक़्त से परे अगर मिल गए कहीं…

स्मृति शेष: लता मंगेशकर की अविश्वसनीय सफलता के पीछे उनकी आवाज़ की नैसर्गिक निश्छलता और सरलता का बहुत बड़ा हाथ है. जिस प्रकार उनकी आवाज़ हर व्यक्ति, समुदाय और वर्ग के लोगों को समान रूप से प्रभावित करने में सफल होती है वह इस बात का सूचक है कि वो आवाज़ अपने दैहिक कलेवर से उठकर आत्मा में निहित मानवीयता को स्पंदित करने में सक्षम हो जाती है.

लता मंगेशकर. [जन्म: 28 सितंबर- अवसान: 6 फरवरी 2022] (फोटो साभार: ट्विटर)

सन 1949, में रेडियो सेलोन पर जब हजारों सुनने वालों के अनगिनत पत्र आने लगे कि फिल्म महल के गीत ‘आएगा आनेवाला को किसने गाया है?’ तब रेडियो स्टेशन के डायरेक्टर के समक्ष एक ऐसे परेशानी खड़ी हो गई जो अब तक कभी नहीं आई थी, क्योंकि यह वह दौर था जब पार्श्वगायिका सिर्फ नाम से ही नहीं बल्कि असल ओहदे में भी पीछे ही रहा करती थी, और इसीलिए महल के उस लोकप्रिय गीत को गाने का श्रेय ग्रामोफोन रिकॉर्ड के कवर ने फिल्म की नायिका कामिनी (मधुबाला) को दिया था.

पर 1949 के उस जून में रेडियो स्टेशन के डायरेक्टर ने जब गायिका का नाम पता कर घोषणा की–’गायिका- लता मंगेशकर’, तब शायद किसी ने यह कल्पना नहीं की होगी कि यह नाम भारतीय सिनेमा के संगीत का पर्याय बन जाएगा.

क्या वजह है कि फिल्म गायकी जो हमेशा से शास्त्रीय संगीत के मुक़ाबले सस्ती और चलताऊ समझी जाती थी, उसे लता मंगेशकर ने अपनी गायकी के दम से वह स्वरूप दे दिया कि चाहे वह उच्च मध्यवर्ग या आभिजात्य वर्ग के ड्राइंग रूम हों या मेहनतकश मजदूर या कामगारों के ठिकाने, उन सबकी ज़बान पर यह संगीत गूंज रहा था. इन सवालों का जवाब पाने के लिए सबसे अहम है कि हम लता मंगेशकर की गायकी को समझने का प्रयास करें.

ट्रेंड से जुदा आवाज़

ऐसा तो नहीं था कि लता से पहले फिल्म जगत में गायिकाओं की कोई कमी थी. शमशाद बेग़म , ज़ोहराबाई अंबालेवाली, अमीरबाई कर्नाटकी, नूरजहां, ये सब उस समय के वो नाम थे जो अपनी एक खास आवाज़ के लिए जाने जाते थे. और ये आवाज एक तरह से व्यावसायिक सिनेमा की अपील को बढ़ाने के उदेश्य से थोड़ी गहरी, भारी और मादक होने की मांग चाहती थी.

इसीलिए गानों के बोल भले ही महान गीतकार ही क्यों न लिखते हों और संगीत निर्देशन भी दिग्गज ही करते हों, पर इन आवाज़ों में ऊपर कही गई तमाम विशेषताएं लगभग सामान्य रूप से मिल जाती थी.

लता ने जब 1949 में फिल्म ‘महल’ के उस गीत से अपनी गायकी को दिखलाया, तो अचानक ही एक ऐसी आवाज़ अस्तित्व में आई, जो उस समय की इन प्रचलित आवाज़ों से एकदम ही अलग थी. लता की पतली, कोमल और ऊंची सुर लगाने वाली आवाज़ में शास्त्रीय गायन पर  पकड़ होने की वजह से एक क्लास था और इसका सधापन भी अभूतपूर्व था.

ये वो आवाज थी जो देखा जाए तो एक तरह से फिल्म संगीत के लिए आंदोलनकारी थी, जिसने अब तक की बनी-बनाई परिपाटी से बिलकुल अलग और स्वतंत्र गायकी की राह खोलने का काम किया था. इस दृष्टि से लता की इस विद्रोही आवाज़ ने शुरुआत में ही हिंदी फिल्म संगीत की दशा और दिशा को बदलने का साहसी काम किया था.

पिता दीनानाथ मंगेशकर से प्रारंभिक गायन की शिक्षा और बाद के गुरु जैसे कि अमानत अली खान इत्यादि से सीखे हुए लता के गायन में सुर की पकड़ तो जो जबरदस्त थी, उस आवाज की सीमा या रेंज प्राकृतिक रूप से इतनी ज्यादा थी कि जाने-अनजाने संगीत निर्देशकों को एक ऐसी आवाज़ मिल गई जिसके लिए उन्हें भी अपना बेहतरीन दिखलाने का मौका मिल गया और लता की आवाज़ के सहारे वो संगीत के उन लहरों को भी छूने लगे जो अब से पहले कभी सुना नहीं गया था.

इसीलिए देखा जाए तो एक सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर लता की आवाज़ ने आते के साथ ही मान्यताओं को तोड़ा था, और परिवर्तन को स्वीकृति दिलाई थी.

गायन का सफर

यूं तो फिल्म गायकी का सफर 1946-47 से लता ने शुरू कर दिया था, और मराठी फिल्मों में तो और भी कच्ची उम्र से लता ने गाना शुरू किया था, परंतु देखा जाए तो लता की आवाज़ को एक अलग आवाज़ के रूप में, निर्देशक कमाल अमरोही की फिल्म महल में संगीतकार खेमचंद प्रकाश के गीत आएगा आनेवाला से ही ,सुना और पहचाना गया.

लता की गायकी के इस छह दशकों में फैले सफर को विभिन्न पड़ावों में देखने की जरूरत है ,क्योंकि जिस कच्ची उम्र में लता ने गायकी की शुरुआत की थी, उस हिसाब से लता की आवाज़ उम्र के हर पड़ावों पर अपना रूप-रंग बदलती रही.

शुरुआती दौर में, 1940 के दशक में लता की आवाज़ पर नूरजहां की गायकी का असर दिखलाई देता है और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि मालिका-ए-तरन्नुम मैडम नूरजहां एक तरह से उस युग के लिए एक संदर्भ का बिंदु थी, जहां से संगीत में क्लासिकी का स्तर शुरू हुआ था. इसीलिए शुरुआती फिल्मों जैसे बाज़ार, बड़ी बहन, अनोखा प्यार, और चांदनी रात में लता की आवाज़ को सुन कर एकबारगी नूरजहां की ही याद आ जाती है.

हालांकि, बहुत जल्द ही लता की अपनी खुद की आवाज़ ने एक मुकम्मल शक्ल अख़्तियार कर लिया, और 1949 में आई फिल्म बरसात में लता के गायन ने संगीत के कई कीर्तिमान स्थापित कर दिए.

पचास के दशक में लता की आवाज़ अभी भी एक किशोरी युवती की चंचलता और लचक से भरी हुई थी, पर सुरों की मिठास का इस दशक में कोई सानी नहीं है. तानपुरे की मिठास-सी लगती इस आवाज़ से बड़े से बड़े शास्त्रीय गायक को भी रश्क हो सकता है.

फिल्म हम-लोग (1950), जाल, बेवफा, बैजू बावरा (सभी 1952), लैला-मजनू (1953), दो बीघा ज़मीन (1953), देवदास (1955), एक ही रास्ता (1956), मदर इंडिया (1957), पेइंग गेस्ट (1957), नया ज़माना (1957), यहूदी (1958),अनाड़ी (1959), गूंज उठी शहनाई (1959) के गीत लता की इस कर्णप्रिय गायकी के जीवंत मिसाल हैं.

1960 के दशक में लता की आवाज़ एक नई करवट लेती हुई, पक्के घड़े की तरह आंच में सिंकी और सधी हुई लगती है. लता के कुछ बेहतरीन नगमें इसी दौर के हैं.

मुग़ल- ए- आज़म (1960), दिल अपना और प्रीत पराई (1960), अनुराधा (1960), बरसात की रात (1960), बीस साल बाद (1962), असली-नकली (1962), अनपढ़ (1962), हरियाली और रास्ता (1962), बंदिनी (1963), मेरे महबूब (1963), वो कौन थी (1963), हक़ीक़त (1964),आरज़ू (1965), गाइड (1965), जब-जब फूल खिले (1965), आराधना (1969), ये कुछ चंद ऐसी फिल्मों के नाम हैं, जिनके गीतों ने संगीत को एक उच्चतम विधा के रूप में स्थापित कर दिया और लता की गायकी अपने उच्चतम स्वरूप में दिखाई देती है.

इस प्रकार से देखा जाए तो 1950 और 1960 के पूरे दशक को न केवल लता की गायकी का स्वर्णिम अध्याय माना जा सकता है, बल्कि भारतीय सिनेमा के लिए भी संगीत की दृष्टि से इस दौर को ‘गोल्डन एज’ कहा जा सकता है.

बहन उषा और मीना के साथ लता. (फोटो साभार: एनएफएआई)

लता की गायकी का एक नया अध्याय 1970 के दशक में फिर शुरू होता है. इस दौर में नए संगीतकारों के निर्देशन में लता ने कुछ बहुत ही यादगार गीत गाए, हालांकि आवाज की रंगत और हरकत उम्र के चढ़ाव के साथ थोड़ी मद्धिम दिखती है, पर असर में कोई कमी नहीं है.

आन मिलो सजना (1970), हीर-रांझा (1970), कटी पतंग (1970), रेशमा और शेरा (1971),पाकीज़ा (1972), बॉबी (1973), यादों की बारात (1973), अनामिका (1973), रजनीगंधा (1974), मौसम (1975), सत्यम शिवम सुंदरम (1978), कुदरत (1981), रज़िया सुल्तान (1983), मासूम (1983), उत्सव (1984), राम तेरी गंगा मैली (1985), सागर (1985), जैसी लोकप्रिय फिल्मों में लता की आवाज़ अपने एक दूसरे रंग में दिखती है.

1990 के बाद की लता की आवाज़ और उसकी गायकी नए संगीतकारों के साथ अपने दूसरे रंग दिखलाती है, पर अब उम्र ने आवाज़ का साथ छोड़ना शुरू कर दिया था और सांसों पर सधी हुई वह नायाब पकड़ छूटती दिखती है, फिर भी जैसे कि कहते हैं हाथी मरा भी तो सवा लाख का, लता की आवाज़ अपने साथ गाने वाले पुरुष गायकों के सामने बीस ही पड़ती थी.

दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995), माचिस (1996), दिल तो पागल है (1997), दिल से (1998) कच्चे  धागे (1999) मोहब्बतें (2000), जुबैदा (2001), वीर-ज़ारा (2004) और रंग दे बसंती (2006) में लता ने एक बार फिर अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा था, पर वह जो स्वर्णिम काल की-सी नैसर्गिक अलौकिकता लता की आवाज में खनकती थी, वह निश्चित ही अब बस छाया-मात्र दिखलाई पड़ रही थी.

गायकी: सुर, स्वर और साज़

लता की आवाज़ में ऐसा क्या खास था कि उसकी आवाज़ की असीम संभावनाओं को उस दौर के संगीतकारों ने महल के उस गीत से ही पहले-पहल ही परख लिया? संगीत के उस स्वर्णिम काल के जितने भी बड़े संगीत निर्देशक हों- नौशाद, सचिन देव बर्मन, ख़ैयाम, मदन मोहन, सलिल चौधरी, शंकर-जयकिशन, उन सबने लता की आवाज़ के प्रति अपने आकर्षण को ‘आएगा आनेवाला’ गीत से माना है.

उन्हें इस गाने में लता की आवाज़ में छुपी अनंत संभावनाओं की झलक मिल गई थी और वे सब इस बात के लिए आश्वस्त हो गए थे कि वो चाहे कितना भी कठिन संगीत और कितनी भी पेचीदगियों से भरी बंदिश भले ही तैयार कर लें, लता की जादुई आवाज़ उसके साथ खिल उठेगी और पूरा न्याय भी कर पाएगी.

लता की आवाज़ और इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी गायकी के स्वरूप और उसकी विशेषताओं को समझने के लिए हमें उसकी नैसर्गिक गुणवत्ता के साथ ही तकनीकी गुणवत्ता को भी समझने की जरूरत है.

लता अपनी गायकी के संबंध में कहती थीं कि ‘उनके गायन में 75 प्रतिशत योगदान प्रकृति या किसी अलौकिक सत्ता का है, पर बाकी के 25 प्रतिशत गायकी का श्रेय सिर्फ और सिर्फ कठिन अभ्यास और रियाज़ को जाता है और ईश्वर के दिए उस अनमोल तोहफे को तराशने का काम बखूबी उन्होने ही कठिन मेहनत के साथ किया.’

लता की आवाज़ की सबसे बड़ी खासियत है -उसकी सीमा या रेंज. लता की आवाज़ तारसप्तक में जिस ऊंचाई तक जितनी सहजता के साथ पहुंच सकती है उतने ही स्वाभाविक तरीके से मंद्रसप्तक में भी खेल सकती है. हालांकि लता की आवाज़ को मंद्रसप्तक में निखरने और खुलने का मौका संगीतकारों ने कम ही दिया है.

इस बात पर खुद लता भी कहती थीं कि कैसे शंकर-जयकिशन की संगीतकार जोड़ी से लता के झगड़े भी हो जाया करते थे जब लता अपेक्षाकृत नीचे सुर में गाना चाहती थीं. इतना ही नहीं, बल्कि एक बार तो खुद राजकपूर ने इस संगीतकार जोड़ी को सलाह भी दी थी कि लता से दुख और विषाद के गीत को तार सप्तक में गवाएं और हर्ष और हल्के-फुल्के भाव लिए गानों को नीचे के सुरों में गवाएं. पर ऐसा नहीं हुआ.

इसीलिए लता के मंद्रसप्तक में गाने की काबिलियत को अक्सर अनदेखा ही कर दिया गया, जबकि लता के ऐसे कई सुंदर गीत हैं, जिसमें मंद्रसप्तक के सबसे मूलभूत स्वर ‘सा’ को जिस प्राणशक्ति के साथ लता ने साधा है, वह शास्त्रीय संगीत के पुरोधाओं को भी चमत्कृत कर देगा.

लता ने जिस स्तर पर शास्त्रीय गायन किया है उसने सच ही में शास्त्रीय गायकी के पुरोधा बड़े ग़ुलाम अली खान साहब को यह कहने पर मजबूर कर दिया था कि- ‘लता तो उस्तादों की भी उस्ताद है.’ इन्होंने ही लता की सुरों पर ऐसी मजबूत पकड़ को देखते हुए प्यार और सराहना से कहा था ‘वह तो कभी बेसुरी नहीं होती.’

हालांकि बहुत कम ही लोग यह कल्पना कर सकते हैं कि इतनी प्रशंसा और सफलता पाने के बावजूद भी स्वर सम्राज्ञी लता को एक प्रोफेशनल शास्त्रीय गायक बनने का अवसर न मिल पाने का एक दुख भीतर-ही-भीतर कचोटता रहा है. लता ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था ‘काश मैं भी स्टेज पर घंटों शास्त्रीय संगीत गा पाती, समय के अभाव ने मुझे कभी इस ओर जाने ही नहीं दिया.’

लता की सहज आवाज़ तो पांचवे सुर से ही थी, पर चूंकि बड़ी ही सहजता से लता ऊंचे सुरों को भी गाती थीं, जिसके वजह से 1960 आते आते लता प्रायः पहले सुर से ही गाया करती थीं. सुनने में कानों को तो लता की यह कोयल की-सी ऊंची तान बड़ी मधुर लगती है, पर आगे चल कर इस पैटर्न ने लता के गले को काफी नुकसान भी पहुंचाया.

और यह समस्या सबसे ज्यादा गंभीर फिल्म बीस साल बाद के निर्माण के दौरान हो गई थी, जब लता को डॉक्टरों ने पूरी तरह से गायन छोड़ देने को कहा था. लता ने 2-3 महीने गायन नहीं किया और पूरी तरह से ठीक होने पर ही ‘कहीं दीप जले कहीं दिल गाने’ की रिकॉर्डिंग कर सकीं थीं.

उम्र के साथ-साथ ऊंचे सुरों पर गायन की यह सतत प्रक्रिया लता के लिए मुश्किल होती गई और 70 के दशक आते-आते संगीत निर्देशकों की इस मांग को हर बार पूरा कर पाना लता की आवाज के लिए एक प्रायः कष्टसाध्य हो गया था. पर, शास्त्रीय गायन करने वाले कई ऐसे दिग्गज थे जो लता की इस ऊंची और पतली आवाज़ पर अपनी आपति जताया करते थे.

मसलन, कुमार गंधर्व, हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन के पुरोधा, ने एक बार कहा था कि, ‘लता अच्छा गाती हैं, पर करुण रस के गीतों के साथ लता की आवाज़ न्याय नहीं कर सकती क्योंकि वह बहुत ही ऊंचे सुर में गाती हैं.’

बहरहाल, अगर लता के गायन की विशेषता की बात अगर हम करें तो हम पाते हैं कि ऐसे कई तत्व हैं जिनसे मिलकर लता का गायन बना था, जिसने जन-मन पर अपना प्रभाव बनाया. लता की आवाज़ में एक खास किस्म की पाकीज़गी थी, एक ऐसा रूहानीपन जो आत्मा में प्रवेश करता हो. चाशनी से भी ज्यादा मीठी यह आवाज़ सुनने वाले पर अपना एक गहरा असर छोड़ती थी.

लता की इस अविश्वसनीय सफलता के पीछे लता की आवाज की नैसर्गिक निश्छलता और सरलता का बहुत बड़ा हाथ है. जिस प्रकार से लता की आवाज़ हर व्यक्ति, समुदाय और वर्ग के लोगों को समान रूप से प्रभावित करने में सफल होती है वह कहीं-न-कहीं इस बात का ही सूचक है कि लता की आवाज़ अपने भौतिक या दैहिक कलेवर से ऊपर उठकर आत्मा में निहित निष्कलुषता और मानवीयता को स्पंदित करने में सक्षम हो जाती है.

लता के गायन में एक सबसे बड़ी विशेषता है गीत के बोलों का स्पष्ट और भावपूर्ण उच्चारण करने की प्रवृत्ति, जो लता के गाने में संगीत की स्पष्टता व गीत के प्रभाव को द्विगुणित कर देती है. उनकी गायकी न केवल सुर पर अपनी बेजोड़ पकड़ के लिए जानी जाती है, बल्कि गायन के विभिन्न आयामों जैसे, हरकतें, मुरकियों इन सबकी वजह से भी विशिष्ट लगती है.

लय को कितनी देर और दूर तक ले जाना है, इस पर लता की पकड़, जबरदस्त है. एक सामान्य से लगने वाले गीत में भी जिस प्रकार की हरकतें लता ने ली हैं, उसे सुन कर शास्त्रीय संगीत के पुरोधा भी आश्चर्य से भर जाते हैं. यह सरल और सहज-सी लगने वाली गायकी, जो असल में अत्यंत ही कठिन है, लता के अत्यंत सधे हुए कौशल का ही उदाहरण है.

लता को इस दृष्टि से भी हिंदी फिल्म संगीत में एक नया अध्याय जोड़ने वाला माना जा सकता है जिसने बस व्यावसायिक सफलता के लिए संगीत की आत्मा से छेड़छाड़ न करते हुए संगीत को उसके शास्त्रीयता के साथ गाए जाने पर तवज्जो दिया.

लता के कुछ गीत तो पूर्णतया राग आधारित होने की वजह से शास्त्रीय दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ हैं ही, उनके आम गाने भी, संगीत की बारीक से बारीक हरकतों को जिस तन्मयता के साथ पकड़ते हैं, वह अद्भुत है.

उदाहरण के लिए, सलिल चौधरी की बंदिश ‘ओ सजना बरखा-बाहर आई’ (परख, 1960) में लता ने जिस तरह से एक सप्तक से दूसरे सप्तक में आवाज़ को ले जाते हुए सुर का खयाल रखा है, और द्रुत लय में भी हरकतों को स्पष्टता के साथ गाया है, वह हिंदी फिल्म संगीत में अनूठा है.

एक-एक शब्द प्रेम से आकंठ और सराबोर साधना (फिल्म की अभिनेत्री) की मनोदशा को जिस खूबसूरती के साथ उकेरता है, ऐसा लगता है मानो लता की आवाज़ ही बरखा की बूंद बनकर मन पर बिखर गई हो.

लता की गायकी की एक अन्य विशेषता है, गीत में निहित भाव को विशिष्ट तरीके से अभिव्यक्त कर पाने की क्षमता और यही वजह है कि ऐसे कई गीत है, जिसे संगीत निर्देशकों ने लता के समकालीन अन्य गायकों से भी गवाएं हैं, पर लता द्वारा गाए गए गीत का प्रभाव कुछ और ही पड़ता है. उदाहरण के लिए, फिल्म आरज़ू के गीत ‘अजी रूठकर अब’ को लता और मोहम्मद रफ़ी दोनों ही ने गाया है, पर हमारी सामूहिक स्मृतियों में बस लता वाले गीत की गूंज ही मौजूद है.

बहरहाल, लता मंगेशकर तो अब हमारे बीच नहीं रहीं, पर उनके गीत हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए इतने हैं कि हर सुनने वाले को यह गीत उन्हीं का पैग़ाम लगेगा: ‘मौसम कोई हो इस चमन में रंग बनके रहेंगे हम ख़िरामा…’

(अदिति भारद्वाज दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.)