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यूपी: अस्तित्व बचाने के लिए संघर्षरत टैनरियों की स्थिति का ज़िम्मेदार आदित्यनाथ का (कु)शासन है

ग्राउंड रिपोर्ट: हिंदुत्ववादी पोंगापंथी, दूरदर्शिताविहीन शासन और योगी सरकार की टैनरी कामगारों के प्रति बेरुख़ी ने कानपुर के चमड़ा उद्योग को अब तक के सबसे बड़े संकट में धकेल दिया है.

कानपुर की एक टैनरी. (सभी फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

कानपुर: उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्रों की सियासी बहसें मुख्य तौर पर औद्योगिक संकटक के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं. सूबे के एक शहर से दूसरे शहर की यात्रा के दौरान मिलने वाले छोटे और मझोले कारोबारी, फैक्ट्री मालिक और बेरोजगार मजदूर, हर किसी का- लगभग एक स्वर में- कहना है कि सरकार की नीतियों ने परंपरागत उद्योगों को के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा दिया है और पिछले कुछ वर्षों में किस तरह से उनकी आजीविका पर सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है.

कुछ लोग इन हालातों के लिए आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को दोषी ठहराते हैं तो कुछ उन्हें दोष नहीं देते. हालांकि, अपनी नाखुशी न जाहिर करने वाला कोई नहीं मिलेगा.

भारत की सबसे ज्यादा आबादी वाले सूबे की कारोबारी राजधानी के तौर पर मशहूर कानपुर एक ऐसा ही औद्योगिक केंद्र है, जहां ऐसी कहानियां आम हैं.

ज्यादातर सूती मिलों के बंद हो जाने के बाद, उनसे बेरोजगार हुए कर्मचारी अभी तक अपने बकाये के अधिकांश हिस्से के भुगतान का इंतजार कर रहे हैं. बची रह गईं कुछ मिलें एक के बाद आनेवाली मुश्किलों के सामने खुद को बचाए रखने का संघर्ष कर रही हैं.

टैनरियों पर पड़ी सबसे ज्यादा मार

लेकिन मुस्लिम बहुमत वाली कानपुर कैंटोनमेंट सीट के तहत आने वाली सैकड़ों टैनरियां (चमड़ा शोधन इकाइयां) हाल के सरकारी आदेशों का सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतने के कारण खासतौर पर सुर्खियों में हैं. 20 फरवरी को हुए मतदान से पहले यहां घाटों और ख़त्म हो रहे कारोबार की कहानियां चुनावी चर्चाओं में छाई हुई थी.

इस विधानसभा क्षेत्र के सबसे बड़े मोहल्ले जाजमऊ में तीन साल पहले तक 400 से ज्यादा टैनरियां हुआ करती थीं. इनमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से 10 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला हुआ था. लेकिन 2018 के बाद से केंद्र और राज्य सरकार के आदेशों ने टैनरियों की रफ्तार थाम दी है और 200 के करीब टैनरियों को ताला लगाने पर मजबूर कर दिया है.

टैनरी मालिकों का कहना है कि इसके नतीजे के तौर पर पिछले तीन साल से ज्यादा समय के दौरान पैदा हुई बेरोजगारी के संकट को लेकर राज्य सरकार ने पूरी तरह से अपनी आंखें मूंद ली हैं.

टैनरी उद्योग को पहला झटका 2018 में लगा जब उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने इलाहाबाद में आयोजित किए जाने वाले महाकुंभ के आयोजन से तीन महीने पहले गंगा नदी को साफ करने के एक उपाय के तौर पर टैनरियों को पूरी तरह से बंद करने का आदेश दे दिया. टैनरियों पर यह पाबंदी 14 महीने तक रही.

इस नुकसान से टैनरियां अभी किसी तरह उबर ही रही थीं कि राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बगैर कोई वजह बताए 248 यूनिटों को स्थायी तौर पर बंद करने का आदेश सुना दिया.

इसके बाद चुनिंदा यूनिटों को ऐसे ही आदेशों ने उद्योग की हालत और खस्ता कर दी. इनमें से एक आदेश उत्तर प्रदेश जल निगम का था जिसने अप्रैल, 2021 में 1165 मीटर लंबे सीवर की सफाई के काम के लिए सभी टैनरियों के कामों को रोक दिया.

मकसद मुस्लिमों को आर्थिक नुकसान पहुंचाना

इसमें कोई शक नहीं है कि ये टैनरियां अपना अधिकांश कचरा इस सीवर में डालती हैं, जो जाकर गंगा नदी में मिलता है. लेकिन टैनरी मालिकों का कहना है कि एक फलते-फूलते उद्योग को बंद करना इसका समाधान नहीं हो सकता है.

कच्चे चमड़े का प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) एक काफी समय लगने वाली प्रक्रिया है और इसमें अच्छी खासी मात्रा में प्रदूषक तत्व निकलता है, लेकिन टैनरी मालिकों का कहना है कि ‘पवित्र गंगा नदी को गंदा करने के लिए’ सिर्फ इस उद्योग को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए.

एक टैनरी मालिक ने द वायर  को बताया, ‘सरकार नदी के प्रदूषण के लिए सिर्फ हमें जिम्मेदार मानती है. लेकिन अभी तक इस उद्योग के लिए समर्पित सीवर की व्यवस्था नहीं है. वर्तमान सीवर लाइन ज्यादा समय उफनाया रहता है, क्योंकि शहर का घरेलू और औद्योगिक कचरा, दोनों का ही निस्तारण इसमें ही किया जाता है.’

टैनरी के मालिकों ने लगातार सरकारी विभागों द्वारा बहाए जाने वाले कचरे के लिए बुनियादी ढांचे को और मजबूत करने, सीवर की क्षमता को बढ़ाने और उद्योग की जरूरतों को पूरा करने के लिए वाटर ट्रीटमेंट और रिसाइकलिंग इकाइयों का निमार्ण करने की मांग की है,

एक टैनरी मालिक ने कहा, ‘लेकिन एक के बाद आनेवाली सरकारों ने इस दिशा में कुछ ख़ास नहीं किया है. मुझे लगता है कि वर्तमान भाजपा सरकार ने हमारे चमड़ा उद्योग को बचाए रखने की फिक्र करने की जहमत ही नहीं उठाई है.’

उन्होंने किसी भी सूरत में अपना नाम न बताने के आग्रह के साथ पूछा, ‘क्या ऐसे में सारा कसूर हमारा ही है?’ उन्होंने कहा, ‘मैं सहमा हुआ हूं. मेरी टैनरी उन टैनरियों में से है, जिसने सरकार के मानकों पर खरा उतरने के हर संभव उपाय किए हैं. मैं आलोचना करके बेवजह प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की निगाह में नहीं आना चाहता हूं.’

उन्होंने कहा कि टैनरी मालिकों को सबसे ज्यादा डर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का है.

ये टैनरियां मुख्य तौर पर मुस्लिमों के स्वामित्व वाली हैं. उन्हें लगता है कि आदित्यनाथ के कार्यकाल में टैनरियों के खिलाफ इस तरह की सख्त कार्रवाई का संबंध कहीं न कहीं अल्पसंख्यकों के प्रति मुख्यमंत्री के ‘नफरत’ से है.

लेकिन सिर्फ मुसलमान ही इससे प्रभावित नहीं हुए हैं. एक हिंदू टैनरी मालिक ने बताया, ‘हिंदू टैनरी मालिक भी समान रूप से प्रभावित हुए हैं. हम जानते हैं कि भाजपा मुसलमानों को आर्थिक तौर पर उन्नति करते हुए नहीं देखना चाहती. कानपुर के चमड़ा उद्योग के मौजूदा संकट की मुख्य वजह यह सोच है.’

आगे उन्होंने जोड़ा, ‘ऑन द रिकॉर्ड (आधिकारिक) टिप्पणी के लिए के लिए आपको हमारे एसोसिएशन के पास जाना चाहिए, लेकिन वहां आपको पूरी सच्चाई नहीं बताई जाएगी.’

वहां बैठे एक मुस्लिम टैनरी मालिक ने टैनरी उद्योग, जिसका आकार पांच साल पहले अनुमानित तौर पर 50,000 करोड़ था, को हुए नुकसान का थोड़ा अंदाजा दिया. ‘तीन साल पहले सिर्फ जाजमऊ में 410 टैनरियां थीं. कानपुर के दूसरे हिस्सों की टैनरियां इससे अलग थीं. अब यहां सिर्फ 270 टैनरियां हैं. पिछले कुछ वर्षों में कई टैनरियों के सालाना टर्नओवर में भारी गिरावट आई है. मैं ऐसी कई टैनरियों के नाम बता सकता हूं.’

नीतिगत जड़ता?

‘प्रदूषण को नियंत्रण में रखने के लिए यूपीपीसीबी ने ज्यादातर चर्मशोधन इकाइयों की उत्पादन क्षमता को भी घटाकर आधा कर दिया है. व्यावहारिक तौर पर इसका मतलब है कि एक यूनिट अब अपनी चर्म-प्रसंस्करण (लेदर प्रोसेसिंग) क्षमता का सिर्फ एक चौथाई ही इस्तेमाल कर सकता है.

प्रत्यक्ष तौर पर जितना दिखता है, इस आदेश के नतीजे उससे कहीं अधिक व्यापक हैं. 2017 में आदित्यनाथ द्वारा कई कसाईखानों को बंद किए जाने के बाद टैनरियों के लिए कच्चे चमड़े की जरूरत को पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो गया.

कानपुर की ज्यादातर टैनरियां लाइसेंस प्राप्त कसाईखानों से कच्चा माल हासिल करती हैं. किसी तरह से कच्चे माल की आपूर्ति का वैकल्पिक इंतजाम करने के बाद यूपीपीसीबी और जल निगम के एक बाद एक आदेशों उनके लिए नई आफतों की तरह आए.

उस मुस्लिम टैनरी मालिक ने कहा, ‘इन सबके बीच आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव की पिछली सरकार द्वारा चमड़ा उद्योग को दी गई कर राहत को भी वापस ले लिया. एक तरफ सब्सिडियां वापस ले ली गईं, दूसरी तरफ जीएसटी व्यवस्था लागू हो गई. हालांकि हम 5 प्रतिशत के टैक्स स्लैब में आए थे, लेकिन जीएसटी रिटर्न को आने में एक साल या उससे ज्यादा का समय लगता है. इससे खर्च करने की हमारी क्षमता और भी कम हो जाती है.’ उनकी इस बात से औरों ने भी अपनी सहमति जताई.

केंद्र सरकार के दो फैसलों ने भी उद्योग को समान तरीके से नुकसान पहुंचाया. पहला, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने पिछली यूपीए सरकार में चमड़ा उद्योग को मिलने वाले वाले इंसेंटिव को बंद कर दिया.

एक 27 वर्षीय मुस्लिम टैनरी मालिक, जिनका अपना एक बेल्ट और घुड़सवारी (एक्वेसटेरियन) उत्पाद निर्माण फैक्ट्री भी है, ने द वायर  को बताया, ‘चमड़ा उद्योग के निर्यातोन्मुख होने के तथ्य ने टैनरियों के विकास में काफी योगदान दिया. केंद्र द्वारा निर्यात रिफंड (एक्सपोर्ट ड्रॉबैक्स) को रोकने के बाद हमारी लागत बढ़ गई. फिनिश्ड लेदर गुड्स कारोबार के बड़े भारतीय कारोबारी अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्द्धा करने के लिए इस रिफंड पर काफी निर्भर थे. वे मात्रा बढ़ाकर और कीमतें घटाकर अंतरराष्ट्रीय फैशन बाजार में टिक सकते थे, तो सिर्फ इसलिए कि इस रिफंड (ड्रॉबैक्स) से उनकी लागत का एक बड़ा हिस्सा निकल जाता था.’

दूसरा, चमड़ा उद्योग को एक ओर धक्का तब लगा जब मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 2020 में 1.9 फीसदी का आयात शुल्क लगा दिया. एक युवा उद्यमी ने कहा, ‘हम बेल्ट के बक्कल ओर चमड़े के उत्पाद में इस्तेमाल किए जाने वाले कई मेटल फिटिंग्स को चीन और दूसरे देशों से आयात किया करते थे. अतिरिक्त आयात शुल्क ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में हमारी मोलभाव करने की शक्ति को नुकसान पहुंचाया है.’

उन्होंने कहा, पहले लॉकडाउन और उसके बाद ये शुल्क, ऐसे में हमसे प्रतिस्पर्द्धा में टिकने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? जिस समय कानपुर की टैनरियां बद पड़ी थीं, उस समय अंतरराष्ट्रीय फैशन बाजार में ऐसा कोई डर नहीं था. भारत चमड़े के उत्पादों के निर्यात में अग्रणी था, क्योंकि ज्यादातर गंभीर खरीददार सिर्फ कानपुर के भैंस का चमड़ा ही चाहते थे. लेकिन अब ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर धीरे-धीरे बांग्लादेश, वियतनाम और चीन की ओर रुख कर रहे हैं.’

साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि कभी खत्म हो रहे संकटों के मद्देनजर उन्हें अपने खरीददारों को बनाए रखने में संघर्ष करना पड़ रहा है.

कानपुर का औद्योगिक पतन सीधे तौर पर भारतीय समाज के सबसे हाशियाकृत लोगों को सीधे प्रभावित करता है. चमड़ा उद्योग के संकट के कारण जिनकी नौकरी चली गई, उनमें से ज्यादातर या तो दलित थे या मुसलमान थे क्योंकि समाज के दूसरे वर्ग के लोग चमड़ा संबंधित काम को अच्छी नजर से नहीं देखते हैं और इसे गंदा काम मानते हैं.

टैनरी में काम करते एक कामगार.

एक टैनरी मालिक ने बताया, ‘तीन साल पहले तक ज्यादातर टैनरी मजदूरों को एक न्यूनतम आय हो जाती थी. जब से टैनरियां आधे महीने बंद रहने लगी हैं, उन्हें अब दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर होना पड़ा है. लेकिन, चूंकि इससे होने वाली कमाई काफी कम है, इसलिए इन मजदूरों का एक बड़ा हिस्सा- जिनमें ज्यादातर लोग कानपुर क्षेत्र के हैं- यहां से प्रवास कर रहा है. ये लोग गुड़गांव के पास मानेसर, जो चमड़ा उद्योग का एक बड़ा केंद्र है, की तरफ जाने लगे हैं.

कानपुर के चमड़ा उद्योग का संकट इस बात का सिर्फ एक उदाहरण है कि कैसे हिंदुत्ववादी पोंगापंथी, दूरदर्शिताविहीन शासन और बेरोजगारी और अन्य आर्थिक मुद्दों से ज्यादा अपने वैचारिक मसलों को सरकारी प्राथमिकता दिए जाने के संयोग ने एक सामाजिक-आर्थिक संकट को जन्म दिया है.

कानपुर का सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला क्षेत्र- मुस्लिम बहुल जाजमऊ- शहर के दूसरे इलाकों से कई मायनों में अलग है. बंद पड़ी टैनरियां, खराब सड़कें और चारों तरफ कचरे के पहाड़ कानपुर के छावनी विधानसभा क्षेत्र में आपका स्वागत करते हैं. यह नियोजित शहरी बुनियादी ढांचे, निर्माणाधीन मेट्रो रेल और बड़े मॉलों वाले नगर के केंद्रीय हिस्से से बिल्कुल अलग नजर आता है.

एक पतनोन्मुख चमड़ा उद्योग को कैसे पुनर्जीवित किया जाए, या कम से कम इसे बचाया जाए यह एक बड़ा सवाल है जो सिर्फ टैनरी मालिकों के मन में ही नहीं, उन सैकड़ों आम लोगों के मन में भी है, जिनका जीवन इस क्षेत्र की उन्नति पर टिका था.

एक टैनरी मालिक ने चलते-चलते कहा, ‘अखिलेश यादव ने चमड़ा उद्योग के लिए एक बड़े जल शोधन संयंत्र का निर्माण की घोषणा की थी. हमें उम्मीद है कि यह जल्दी बनेगा.’

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)