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क्या भारतीय रिज़र्व बैंक ने उच्च मुद्रास्फीति से निपटने का प्रयास नहीं किया

रिज़र्व बैंक का ध्यान जहां देश के ऋण प्रबंधन और विकास को गति देने पर ही केंद्रित है, वहीं महंगाई दिन दूनी-रात चौगुनी रफ़्तार से बढ़ती जा रही है.

आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास. (फोटो: पीटीआई)

यह द रिपोर्टर्स कलेक्टिव द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक को लेकर की जा रही तीन लेखों की शृंखला का तीसरा भाग है. पहला और दूसरा भाग यहां पढ़ें.

नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) किसी केंद्रीय बैंक के एक ऐसे दुर्लभ उदाहरण के तौर पर सामने आया है, जिसने महामारी के बाद के समय में ब्याज दरों में बढ़ोतरी को रोका और बढ़ती मुद्रास्फीति के बावजूद दरों में कटौती का रास्ता खुला रखा.

जहां आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) अपनी नवीनतम ब्याज दर नीति तय करने के लिए 6-8 अप्रैल को मिल रही है, वहीं द रिपोर्टर्स कलेक्टिव (टीआरसी) द्वारा समीक्षा किए गए आधिकारिक दस्तावेजों से पता चलता है कि आरबीआई ने अब तक वित्त मंत्रालय द्वारा मौद्रिक नीति में दिए गए एक अंतर्निहित ‘एस्केप क्लॉज’ (Escape clause) का फायदा उठाते हुए ब्याज दरों को कम रखा है, जो मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत के अनिवार्य लक्ष्य से ऊपर रहने की अनुमति देता है.

इस प्रक्रिया में सरकार कम लागत पर बाजार से पैसा उधार लेने में सक्षम रही है क्योंकि आरबीआई को संप्रभु ऋण के प्रबंधन का भी काम सौंपा गया है.

अपनी दिसंबर 2021 की बैठक में आरबीआई की एमपीसी ने यह कहते हुए कि आर्थिक सुधार के लिए ‘निरंतर नीतिगत समर्थन’ की जरूरत है और वह ‘मुद्रास्फीति के उतार-चढ़ाव को लेकर सतर्क रहते हुए विकास के संकेतों के मजबूत होने की प्रतीक्षा करेगा’ ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया.

फरवरी 2022 में आरबीआई ने ‘ओमीक्रॉन और वैश्विक हालात से संबंधित अनिश्चितताओं’ और संभाले जा सकने वाले मुद्रास्फीति दृष्टिकोण का हवाला देते हुए अपनी मौद्रिक नीति का रुख बदलने से इनकार करते हुए नीति विश्लेषकों को चौंका दिया.

इन निर्णयों ने नीति विश्लेषकों के बीच बहस शुरू कर दी है, जिनमें से कुछ ने इसे आरबीआई के विकास और सार्वजनिक ऋण प्रबंधन के अन्य उद्देश्यों को अधिक प्राथमिकता देने के प्रमाण के रूप में देखा है. चूंकि आरबीआई सरकार के लिए उधार लेता है, कम ब्याज दरें सरकार को बाजार से कम दरों पर पैसा जुटाने में मदद करती हैं.

आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने अपने सार्वजनिक बयानों में एमपीसी के फैसलों को सही ठहराते हुए कहा कि केंद्रीय बैंक आर्थिक विकास को प्राथमिकता दे रहा है.

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (एनआईपीएफपी) की फेलो राधिका पांडे कहती हैं, ‘जहां आरबीआई का कहना है कि विकास एक प्राथमिकता है, वहीं हमें लगता है कि यह मुख्य रूप से उनकी ऋण प्रबंधन जिम्मेदारी है, जिसने उन्हें ब्याज दरों में बढ़ोतरी से रोका है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘आरबीआई को कम से कम यह तो मानना चाहिए था कि महंगाई बढ़ रही है.’ राधिका पांडे उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने भारत के मुद्रास्फीति-लक्षित मौद्रिक नीति ढांचे के मसौदे को लेकर वित्त मंत्रालय के साथ काम किया है.

दुनिया भर में बढ़ती महंगाई के बीच केंद्रीय बैंक आसान मुद्रा नीतियों को बंद कर रहे हैं. बैंक ऑफ इंग्लैंड ने हाल ही में लगातार तीसरी बार ब्याज दरें बढ़ाईं, जबकि मार्च में यूएस फेडरल रिजर्व ने इस साल के लिए छह नियोजित दरों में पहली बढ़ोतरी की. यहां तक ​​​​कि ब्राजील, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका, चिली, रूस में उभरते केंद्रीय बैंकों ने भी कीमतों में स्थिरता को प्राथमिकता के रूप में देखते हुए दरों में वृद्धि शुरू की है.

लेकिन भारत में ऐसा नहीं हुआ, जहां रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले भी लगातार पांच महीने से महंगाई दर में इजाफा हो रहा है. जनवरी 2022 में महंगाई दर 6.1 फीसदी और उसके अगले महीने 6.07 फीसदी पर पहुंच गई. अब भी कीमतों में और वृद्धि जारी रहने की उम्मीद है.

जापानी ब्रोकरेज फर्म नोमुरा होल्डिंग्स इंक का अनुमान है कि इस अप्रैल से शुरू हुए वित्तीय वर्ष में मुद्रास्फीति 6.2 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी, जो ईंधन की ऊंची कीमतों, कृषि लागत और वस्तुओं की बढ़ती  कीमतों के कारण आरबीआई के 4.5 प्रतिशत के अनुमानों से काफी अधिक है. विश्लेषकों को उम्मीद है कि आरबीआई आगामी मौद्रिक नीति बैठक में मुद्रास्फीति के अनुमान में बदलाव कर सकता है.

(साभार: अल-जज़ीरा)

बढ़ता संप्रभु कर्ज

ब्याज दरों में बढ़ोतरी न करके आरबीआई केंद्र सरकार को अपनी उधार लेने की लागत कम रखने में मदद करता है.

भारत सरकार ने 2022-23 में 15 ट्रिलियन रुपये (200 बिलियन डॉलर) उधार लेने की योजना बनाई है, जो 2021-22 के 10.5 ट्रिलियन रुपये (140 बिलियन डॉलर) और 2020-21 के 12.6 ट्रिलियन रुपये (165 बिलियन डॉलर) से काफी अधिक है.

2015 में मुद्रास्फीति संभालने के लिए एक नई मौद्रिक नीति व्यवस्था की शुरुआत करते हुए नीति निर्माताओं ने आरबीआई के नीतिगत उद्देश्यों में हितों के टकराव से बचने के लिए ऋण प्रबंधन को एक अलग इकाई में बदलने का सुझाव दिया था.

टीआरसी ने तत्कालीन प्रधान आर्थिक सलाहकार इला पटनायक का 11 फरवरी, 2015 को लिखा एक आंतरिक नोट देखा है, जिसमें कहा गया था, ‘अंतरराष्ट्रीय अनुभव और विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों के आलोक में यह स्पष्ट है कि मौद्रिक नीति और ऋण प्रबंधन कार्यों के बीच एक अंतर्निहित संघर्ष है. इसलिए, मौद्रिक नीति के उद्देश्यों को आरबीआई अधिनियम में तब तक शामिल नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि सार्वजनिक ऋण प्रबंधन कार्य को आरबीआई अधिनियम से अलग नहीं किया जाता.’

केंद्र सरकार ने एक ऋण प्रबंधन एजेंसी स्थापित करने के लिए कानून में बदलाव और आरबीआई से पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) को सरकारी बॉन्ड बाजार की निगरानी का प्रस्ताव देकर इस विसंगति को दूर करने की कोशिश की थी, लेकिन आरबीआई द्वारा अपनी ऋण प्रबंधन भूमिका को छोड़ने पर आपत्ति जताए जाने के बाद इसने प्रस्ताव वापस ले लिया.

एनआईपीएफपी की राधिका पांडे कहती हैं कि आरबीआई जिन कई उद्देश्यों, खासकर संप्रभु ऋण के प्रबंधन से जूझ रहा है, वह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है और ‘यदि इस समय महंगाई को स्थिर नहीं किया गया है, तो मुद्रास्फीति के अनुमान उसी जगह रह जाएंगे और फिर कीमतों पर नियंत्रण मुश्किल होगा.

हालांकि, एमपीसी के एक बाहरी सदस्य जयंत आर. वर्मा कहते हैं कि ब्याज दरों को तय करने में ऋण प्रबंधन एक कारक नहीं है और कोई हितों का टकराव नहीं है क्योंकि समिति के आधे सदस्य बाहरी विशेषज्ञ हैं.

उन्होंने कहा, ‘मैं यह मानना ​​​​चाहता हूं कि आरबीआई के वरिष्ठ अधिकारी जो एमपीसी में बैठते हैं, उनके पास अपनी एमपीसी की भूमिका को आरबीआई की भूमिकाओं से अलग रखने की समझ और निपुणता है. और वे एमपीसी में पूरी तरह से वैधानिक आधार पर वोट करेंगे.’

उन्होंने जोड़ा, ‘इसके अलावा, एमपीसी के आधे सदस्य स्वतंत्र बाहरी विशेषज्ञ होते हैं जिन पर इस तरह से विवाद नहीं होता है.’ (उनकी पूरी प्रतिक्रिया यहां पढ़ी जा सकती है.)

वित्त मंत्रालय और आरबीआई ने उन्हें भेजी गई सवालों की सूची का जवाब नहीं दिया.

अलग-अलग प्राथमिकताएं

8 दिसंबर 2021 को मौद्रिक नीति की घोषणा के बाद पत्रकारों के साथ होने वाली बैठक में एक पत्रकार ने गवर्नर दास से एक सीधा, लेकिन महत्वपूर्ण सवाल पूछा: ‘भारत के केंद्रीय बैंक की क्या प्राथमिकता होनी चाहिए- विकास या मुद्रास्फीति?’

दास ने इसके जवाब में कहा, ‘जैसा कि मैंने अपने बयान में स्पष्ट रूप से कहा है, इस स्तर पर आरबीआई की बड़ी प्राथमिकता विकास को रिवाइव करना है. इसके साथ-साथ मैंने कहा है कि मूल्य स्थिरता भी हमारी चिंता है. इसलिए, इस समय मूल्य स्थिरता को नजरअंदाज किए बिना हम विकास को पहली प्राथमिकता देंगे.’

दास अनियंत्रित मुद्रास्फीति के खिलाफ तर्क देने में पारंगत हैं. 2016 में आर्थिक मामलों के सचिव के रूप में दास मौद्रिक नीति लक्ष्यों को निर्धारित करने वाले कैबिनेट नोट का मसौदा तैयार करने में शामिल थे. इस कैबिनेट नोट में लिखा था, ‘मौद्रिक नीति का प्रमुख उद्देश्य मुद्रास्फीति उम्मीदों को स्थिर करना और मुद्रास्फीति के वांछनीय स्तरों से उतार-चढ़ाव को दूर करना होना चाहिए.’

भारतीय कानून कहता है कि ‘मौद्रिक नीति का प्राथमिक उद्देश्य विकास के मकसद को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना है.’ हालांकि, 2018 में पदभार संभालने के बाद से  दास ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि केंद्रीय बैंक के लिए आर्थिक विकास का समर्थन मूल्य स्थिरता की तुलना में समान रूप से या अधिक महत्वपूर्ण है, भले ही अर्थव्यवस्था रिकवरी कर रही हो, जैसे अभी है, लेकिन मुद्रास्फीति दर बढ़ना जारी है.

(साभार: अल-जज़ीरा)

दास के कार्यकाल में एमपीसी ने 2019 में लगातार पांच ब्याज दरों में कटौती के साथ अर्थव्यवस्था में पैसा डालना शुरू किया. कुल मिलाकर आरबीआई ने रेपो दर- जिस दर पर बैंक आरबीआई से उधार लेते हैं- को फरवरी 2019 और फरवरी 2020 के बीच रिकॉर्ड 135 आधार अंक (100 आधार अंक 1 प्रतिशत अंक के बराबर है) के साथ कम कर दिया.

महामारी की शुरुआत के साथ ही दास ने यह घोषणा करते हुए कि आरबीआई विकास का समर्थन करने के लिए ‘जो कुछ भी जरूरी है, वो करेगा’ ढीली-ढाली नीति को जारी रखने का संकेत दिया. मुद्रास्फीति के उच्च स्तर के बावजूद आरबीआई ने 2020 में ब्याज दरों में 115 आधार अंकों की कटौती की, जो अब तक के सबसे निचले स्तर 4 प्रतिशत पर है.

(साभार: अल-जज़ीरा)

विशेषज्ञों का कहना है कि दास द्वारा विभिन्न नजरियों को अपनाने के प्रमुख कारणों में से एक कानून में बताए गए मौद्रिक नीति के उद्देश्यों की व्याख्या करने में किया गया फर्क है.

कोलंबिया विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय और सार्वजनिक मामलों के सहायक प्रोफेसर और बैंक ऑफ इंग्लैंड की मौद्रिक नीति समिति के पूर्व बाहरी सदस्य विलियम बुइटर ने कहा कि दास के समय में आरबीआई ने या तो ‘वास्तव में अपने मुख्य काम को बदल दिया है जो वास्तविक आर्थिक गतिविधि को मूल्य स्थिरता की तुलना में अधिक तवज्जो देता है, या फिर बैंक इसके सामने खड़ी मुद्रास्फीति की चुनौती की गंभीरता को कम करके आंक रहा है.’

महामारी

दुनिया के अधिकांश हिस्सों में मुद्रास्फीति में गिरावट के बावजूद जब महामारी की मार पड़ी, तब भी भारत में मूल्य वृद्धि उच्च स्तर पर बनी रही- आपूर्ति संकटों और सरकार के ईंधन पर कर लगाने के कदम के बावजूद अप्रैल 2020 से मार्च 2021 के वित्तीय वर्ष के लिए यह औसत 6.2 प्रतिशत रही.

महामारी के बाद से हुई सभी एमपीसी बैठकों में आरबीआई ने कहा है कि वह ‘तब तक उदारवादी रुख बनाए रखेगा जब तक कि स्थायी आधार पर विकास को दोबारा खड़ा करना और बनाए रखना जरूरी है’ साथ ही वह यह सुनिश्चित करेगा किअर्थव्यवस्था पर कोविड-19 के प्रभाव को कम करते हुए मुद्रास्फीति लक्ष्य के भीतर बनी रहे.’ उदार रुख का मतलब हुआ कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती के लिए अपने दरवाजे खुले रखेगा.

ऐसा इस तथ्य के बावजूद है कि अक्टूबर के बाद से मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि हो रही है क्योंकि अर्थव्यवस्था महामारी से उबर रही है.

हालांकि एमपीसी के सभी सदस्य इस रुख को लेकर सहज नहीं हैं. अगस्त 2020 में एमपीसी में शामिल हुए वर्मा ने आरबीआई द्वारा आर्थिक विकास को सबसे ऊपर रखने को लेकर आपत्ति जताई है.

समिति की अगस्त 2021 की बैठक के मिनट्स के अनुसार वर्मा ने कहा, ‘एमपीसी यह गलत धारणा बनाकर कि वह अब मुद्रास्फीति के बारे में चिंतित नहीं है और विशेष रूप से विकास पर केंद्रित है, समिति अनजाने में यह जोखिम को बढ़ा सकती है कि मुद्रास्फीति की उम्मीदें खत्म हो जाएंगी.’

वर्मा ने तब से आरबीआई के उदार रुख से असहमति जताई है, और उनका यह मानना है कि एमपीसी को किसी ‘ठोस कार्रवाई’- जो कम ब्याज दरों को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करे और ‘जिससे आर्थिक सुधार में सहायता मिले’- करते हुए मुद्रास्फीति लक्ष्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए.

सरकार के नीति संकेत

2016 में जब सरकार मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारित कर रही थी, तब इसने आरबीआई, उसके पूर्व गवर्नरों और कई विशेषज्ञ समितियों के साथ परामर्श के बाद फैसला किया कि अगर कीमतें 4 प्रतिशत बढ़ीं, तो यह वास्तव में अर्थव्यवस्था को अपनी सबसे अच्छी रफ़्तार से बढ़ने देंगी. इससे ज्यादा कुछ भी तुरंत आम भारतीयों की जेब को प्रभावित करेगा.

दास ने जुलाई 2016 में वित्त मंत्रालय की फाइल में लिखा था, ‘4 प्रतिशत +/(-) 2 प्रतिशत का लक्ष्य आरबीआई को पर्याप्त फ्लैक्सिबिलिटी देगा. किसी भी मामले में 6 प्रतिशत (4 प्रतिशत + 2 प्रतिशत) से अधिक की सीपीआई मुद्रास्फीति अस्वीकार्य होगी.’

टीआरसी द्वारा समीक्षा किए गए दस्तावेज़ बताते हैं कि मार्च 2021 में अगले पांच वर्षों के लिए मुद्रास्फीति लक्ष्यों पर चर्चा करते हुए वित्त मंत्रालय ने इस बात पर ध्यान दिया कि क्या विशेष परिस्थितियों में एस्केप क्लॉज होना चाहिए. चेक गणराज्य और रोमानिया के पास ऐसे आधिकारिक एस्केप क्लॉज़ हैं, जो आर्थिक संकट की स्थिति में उनके केंद्रीय बैंकों को अपने मुद्रास्फीति लक्ष्य को कुछ समय तक टालने की अनुमति देते हैं.

वित्त मंत्रालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा, हालांकि ऐसा कानून में नहीं लिखा है, कि भारत का मुद्रास्फीति लक्ष्य पहले से ही उन केंद्रीय बैंकों के समान ही संचालित होता है, क्योंकि यह कई तरह के आंकड़ों के लिए अनुमति देता है, जैसा कि एस्केप क्लॉज के साथ होता है. अधिकांश देशों में एक सीमा तय की जाती है लेकिन आमतौर पर वह उसे अपने मुद्रास्फीति लक्ष्य के करीब ही रखते हैं. भारत और तुर्की ही ऐसे दो देश हैं जहां किसी भी दिशा (ऊपर या नीचे) में यह सीमा 2 प्रतिशत तक है.

इसके अलावा अधिकांश देशों के विपरीत, जहां एक महीने के लिए भी मुद्रास्फीति लक्ष्य चूके, तो इसे केंद्रीय बैंक की तकनीकी विफलता माना जाता है, भारत में ऐसा होने को ‘विफलता’ घोषित करने से पहले लगातार तीन तिमाहियों तक लक्ष्य से चूक की अनुमति है. 25 फरवरी 2021 के वित्त मंत्रालय के एक नोट के अनुसार, इन दो मौद्रिक नीति सुविधाओं को ‘एस्केप क्लॉज के साथ एक फ्लैक्सिबल व्यवस्था’ के समान माना जा सकता है.

नवंबर 2019 से फरवरी 2022 तक 22 महीनों में से केवल पांच महीनों में मुद्रास्फीति केंद्रीय बैंक के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से कुछ ही ऊपर रही है. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण आने वाले महीनों में वस्तुओं और तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण इसके और बढ़ने की उम्मीद है.

मार्च के अंत में दास ने कहा कि हाल के महीनों की 6 प्रतिशत से अधिक मुद्रास्फीति ‘अस्थायी’ थी. मौद्रिक नीति के रुख को कड़ा न करने के केंद्रीय बैंक के कदम का बचाव करते हुए उन्होंने यह तर्क दिया कि ‘समय से पहले मांग का दबाव’ बनाने का असर उल्टा हो सकता है.’

हालांकि, कोलंबिया यूनिवर्सिटी के बुइटर का कहना है कि ऐसा सोचना गलत था. उन्होंने कहा, ‘यह इस बात को पहचानने का समय है कि यह मुद्रास्फीति अस्थायी या कुछ समय का मामला भर नहीं है, या कि यह अल्पकालिक आपूर्ति संकट और वैश्विक तौर पर फॉसिल ईंधन की कीमतों में वृद्धि, शायद जिसके दोहराव की संभावना नहीं है, के चलते नहीं हुई है.

उन्होंने जोड़ा, ‘इसके अलावा अगर आरबीआई अपने मध्य अवधि के मुद्रास्फीति लक्ष्य 4 प्रतिशत के बारे में गंभीर है, तो उसे अपनी नीतिगत दरों को अभी बढ़ाना चाहिए.’

(सोमेश झा द रिपोर्टर्स कलेक्टिव के सदस्य हैं.)

यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेज़ी में अल जज़ीरा पर प्रकाशित हुई है.