भारत

भारत के लोकतंत्र और मीडिया को बचाने की एक गुहार…

आज जब हम एक ऐसे ख़तरे से रूबरू हैं जहां सचमुच अपने लोकतंत्र को खो सकते हैं, हमारे लिए यह बहुत ज़रूरी है कि इस बात पर यक़ीन रखें कि हम इस तबाही से ख़ुद को बचा सकते हैं.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

यह लेख 15 अप्रैल 2022 को ब्राउन यूनिवर्सिटी में लेखक द्वारा दिए गए ओपी जिंदल डिस्टिंगुएश लेक्चर है, जिसे थोड़ा संशोधित किया गया है ताकि संवाद में शामिल तीन विद्वानों एड लुस, पाउला चक्रवर्ती और सलिल त्रिपाठी के साथसाथ आशुतोष वार्ष्णेय द्वारा सुझाए गए बिंदुओं को शामिल किया जा सके. लेखक उनके प्रति, और ब्राउन यूनिवर्सिटी के वॉटसन इंस्टिट्यूट में आए दर्शकों का उनकी टिप्पणियों, सुझावों और सवालों के लिए आभारी है.

भारत में लोकतंत्र में कमियां हमेशा ही रही हैं और यहां का मीडिया उन ख़ामियों पर उंगली रखने की भूमिका निभाता रहा है. लेकिन आज मैंने लोकतंत्र और मीडिया के इस दोहरे मुद्दे पर बोलने का फ़ैसला किया है तो इसलिए कि हम इन दोनों के ही जीवन के एक बेहद ख़तरनाक दौर से गुज़र रहे हैं.

बेशक आज जब हम अपने ‘लोकतंत्र के स्तंभों’ में से सभी की निर्णायक रूप से डगमगाती हुई हालत को देख रहे हैं तो ऐसे में उस अनदेखी, बेपरवाही और नुक़सानदेह रवैये को याद करना फ़ायदेमंद होगा, जिसने हमें यहां तक पहुंचाया है. यह बात बहुत साफ़ है कि हमारा गणतंत्र आज ख़ुद को जिन हालात में पाता है, वहां हम एक दिन में नहीं पहुंचे हैं, न ही यह किसी अकेले शख़्स या अकेली पार्टी का कारनामा है.

भविष्य के इतिहासकार जब यह कहेंगे कि नई दिल्ली एक दिन में तबाह नहीं हुई थी, तब इसमें कोई शक नहीं कि वे बहुत सटीक बात कह रहे होंगे. लेकिन हमें इस बात को क़बूल करने की ईमानदारी भी होनी चाहिए कि भारतीय लोकतंत्र के ताने-बाने को नरेंद्र मोदी, उनकी पार्टी और उनकी सरकार ने इतनी बुरी तरह से- और जानबूझकर- तबाह किया है कि आज हम एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गए हैं जहां से छुटकारा पाना उतना आसान नहीं होगा, जितना 1977 में देखा गया था.

यह वो साल था जब देश पर दो साल लंबा ‘आपातकाल’ थोपने के बाद चुनावों में इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर कर दिया गया था.

मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं? पहली वजह तो यह है कि आज का अघोषित आपातकाल किसी एक अकेले नेता की मनमर्ज़ी या असुरक्षाओं की उपज नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी परियोजना का एक पड़ाव है, जिसे 1925 से अमल में लाया जा रहा है. और वह है हिंदुत्व की परियोजना.

लेकिन चूंकि यह लेक्चर मीडिया के बारे में भी है, तो इस सबूत पर ग़ौर करें. 1977 तक ज़्यादातर मीडिया घराने श्रीमती गांधी द्वारा थोपी गई पाबंदियों से नाख़ुश थे, यहां तक कि वे घराने भी जो झुकने को कहने पर रेंगने के लिए बदनाम हो गए थे. लेकिन आज मीडिया के एक बड़े हिस्से ने ख़ुद को न सिर्फ़ सत्ता के साथ मिला दिया है, बल्कि वह अपनी क्षमता के भीतर हर वह काम कर रहा है जिससे लोकतंत्र की अभी चल रही तबाही को और तेज़ किया जा सके.

मुसलमानों को सांप्रदायिक तौर पर निशाना बनाना इस प्रक्रिया का एक अभिन्न हिस्सा है. मीडिया का एक दूसरा बड़ा हिस्सा इसके लिए तैयार नहीं दिखता कि वह अपनी आज़ादी का इस्तेमाल करके ज़मीनी हालात की ख़बर दे. मीडिया की इस अनिच्छा की भारत में लोकतंत्र के सामने खड़े संकट में कोई छोटी भूमिका नहीं है.

हम यहां जो बातें कर रहे हैं उनका रिश्ता लाखों लोगों की क़िस्मत से है, इसलिए हमारे पास इसकी हरेक वजह है कि हम उदासी से भर जाएं और आने वाले दिनों के बारे में मायूस हो जाएं. लेकिन फिर भी, जब हम एक ऐसे ख़तरे से रूबरू हैं कि हम सचमुच में अपने लोकतंत्र को खो सकते हैं, हमारे लिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम इसमें यक़ीन रखें कि हम इस तबाही से ख़ुद को बचा सकते हैं, और हम बचा लेंगे.

इसलिए अपने लेक्चर में मैं इस उदासी और मायूसी से आगे जाकर उम्मीद की उन किरणों की बातें करूंगा जो अभी भी क़ायम हैं.

लोकतंत्र किसी म्यूज़ियम में नुमाइश पर लगाकर रखने की कोई चीज़ नहीं है, बल्कि यह जीने का एक सलीका है, जिसे बचाने, मज़बूती देने और उसकी जड़ों को गहराई देने के लिए लड़ना ज़रूरी होता है. ऐसे में यह विडंबना ही है कि नरेंद्र मोदी लोकतंत्र की एक समाधि बना रहे हैं, और यह उसी इमारत में होगी जहां अभी भारत की संसद है.

नेहरू मेमोरियल को दरकिनार करने के लिए और भारत के विरासत संरक्षण क़ानूनों को चुनौती देते हुए दिल्ली में नए बने और बदसूरत दिखने वाले ‘प्रधानमंत्रियों के संग्रहालय’ का पहला टिकट ख़रीदने के बाद मिस्टर मोदी उम्मीद करते हैं कि 2025 में वे अपने ‘भारतीय लोकतंत्र का म्यूज़ियम’ का उद्घाटन करेंगे.

इसी साल हिंदू श्रेष्ठता का दावा करने वाले संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी वर्षगांठ भी है, जिसके प्रधानमंत्री और उनके अनेक शीर्ष नेता सदस्य हैं. ये लोग अपनी शताब्दी वर्षगांठ को दूसरी बड़ी उपलब्धियों के साथ मनाना चाहेंगे. और उन उपलब्धियों को हासिल करने की गंभीर कोशिशें शुरू हो चुकी हैं.

  1. एक सतत प्रक्रिया

संयुक्त राज्य अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एंटनी ब्लिंकेन ने जुलाई 2021 में जब भारत का दौरा किया था, तब उनके भारतीय समकक्ष के साथ एक संयुक्त प्रेस सम्मेलन में उनसे पूछा गया था कि वे ‘भारतीय सरकार द्वारा मानवाधिकारों के मुद्दों पर पीछे हटने’ को किस तरह संबोधित करेंगे.

इस सवाल का सीधा हवाला जम्मू और कश्मीर में सामूहिक गिरफ़्तारियों और दमन से था, जो राज्य की स्वायत्तता और उससे राज्य के दर्जे को छीने जाने के साथ शुरू हुई थीं, यह उन लोगों के दमन का हवाला भी था जो विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) और नए कृषि क़ानूनों का विरोध कर रहे थे, यह हिंदुत्व संगठनों द्वारा मुसलमान और ईसाइयों पर होने वाले हमलों और पत्रकारों को परेशान किए जाने का हवाला भी था- देश भर में 50 से अधिक पत्रकार अपनी ख़बरों के कारण आपराधिक मुक़दमों का सामना कर रहे हैं.

ब्लिंकेन अपने जवाब में सतर्क थे और वे बहुत संभलकर बोले. भारत में होने वाली घटनाओं के बारे में अपनी राय को नरमी के साथ पेश करते हुए उन्होंने इसे ‘लोकतंत्र की मंदी का दौर’ कहा, जो उनके मुताबिक़ एक ऐसी समस्या है जिसका सामना अमेरिका भी कर रहा है:

‘मैं अपने लोकतंत्र से ही शुरू करूंगा, हरेक लोकतंत्र एक सतत प्रक्रिया है… हमने उन चुनौतियों को देखा जिनका अतीत में और आज भी हमारा लोकतंत्र सामना कर रहा है. लेकिन एक मायने में यह सभी लोकतंत्रों की एक साझी चीज़ है. हम… अपने स्थापना दस्तावेज़ में एक दोषमुक्त (परफ़ेक्ट) यूनियन की तलाश की बात करते हैं. इसका मतलब ही है कि हम मुकम्मल नहीं हैं और हमारी पूरी तलाश उन आदर्शों के अधिक से अधिक करीब जाने की है जिन्हें हमने अपने लिए नियत किया है… और आख़िरकार, मुझे लगता है कि हमारे लोकतंत्रों में ख़ुद को सुधारने की एक व्यवस्था है, जो (व्यवस्था) विभिन्न पृष्ठभूमियों, विभिन्न आस्था वाले स्वतंत्र नागरिकों से, एक मुक्त मीडिया से, स्वतंत्र अदालतों से मिलकर बनी है और जिसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव मज़बूती बनाते हैं.’

ब्लिंकेन की इन बातों पर भी भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने प्रतिक्रिया दी, और मैं उनकी बात को यहां पूरा का पूरा पेश करूंगा क्योंकि यह मोदी सरकार के लोकतंत्र के प्रति रवैये को आधुनिक राजनीति की ज़ुबान में सबसे साफ़ तौर पर पेश करता है. डॉ. जयशंकर ने कहा कि उन्होंने मिस्टर ब्लिंकेन से इस मुद्दे पर तीन चीज़ें कहीं:

‘एक, कि एक अधिक दोषमुक्त यूनियन की तलाश भारतीय लोकतंत्र पर जितनी लागू होती है उतनी ही अमेरिकी लोकतंत्र पर भी – बल्कि सभी लोकतंत्रों पर. दूसरी बात, सभी क़िस्म के शासन की यह नैतिक ज़िम्मेदारी है कि जब कोई ग़लत बात हुई हो तो उसे सुधारा जाए, जिसमें ऐतिहासिक ग़लतियां भी शामिल हैं. और आपने पिछले कुछ बरसों में जो फ़ैसले और नीतियां देखी हैं, उनमें से अनेक इसी श्रेणी में आती हैं.

और तीसरे, कि स्वतंत्रताएं महत्वपूर्ण हैं, हम उन्हें अहम मानते हैं, लेकिन हम कभी भी शासनहीनता या शासन के अभाव या बुरे शासन को स्वतंत्रता के बराबर नहीं रखते हैं.’

मैं डॉ. जयशंकर के इन तीन बिंदुओं पर थोड़े विस्तार में बात करूं, इसके पहले मैं आपको बताना चाहूंगा कि ब्लिंकेन के साथ उनकी ताज़ा मीटिंग में 12 अप्रैल को क्या कुछ हुआ.

इस बार अमेरिकी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने भारतीय लोकतंत्र की दशा पर अपने नज़रिये के बारे में सवाल पूछे जाने का इंतज़ार नहीं किया. बल्कि वॉशिंगटन में भारतीय विदेश और रक्षा मंत्रियों के साथ 2+2 मीटिंग में अपने शुरुआती वक्तव्य में उन्होंने यह बात कही:

‘हमारे बीच की साझी बातों में मानवाधिकारों की रक्षा जैसे अपने लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति वचनबद्धता भी शामिल है. इन साझे मूल्यों पर हम अपने भारतीय सहयोगियों के साथ नियमित रूप से बातचीत करते हैं, और इस मक़सद से हम भारत में होने वाली हालिया घटनाओं की निगरानी कर रहे हैं, जिसमें कुछ सरकारी, पुलिस और जेल अधिकारियों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाओं में इज़ाफ़ा शामिल है.’

यह एक सीधी फटकार थी, और यह इस तथ्य से और अधिक तीखी हो गई कि ब्लिंकेन ने सिर्फ़ मानवाधिकारों के उल्लंघन का हवाला ही नहीं दिया बल्कि उन्होंने ख़ुद भारतीय सरकार पर उंगली उठाई थी.

डॉ. जयशंकर का जवाब एक-दो दिनों के बाद आया. उन्होंने कहा कि उनके अमेरिकी समकक्ष ने भारत के बारे में जो बातें कही हैं, वैसे नज़रिये ‘हितों, लॉबियों और वोट बैंकों’ द्वारा प्रेरित होते हैं और यह भी कि अमेरिका समेत दूसरी जगहों पर घटने वाली घटनाओं पर भारत भी अपना नज़रिया रखता है.

इसमें कोई शक नहीं है कि मानवाधिकारों की बात आने पर अपने पहले के प्रशासन की तरह ही बाइडेन प्रशासन भी दुनिया भर में अपने हितों को नज़र में रखते हुए ही यह तय करता है कि इनमें से किसके हनन पर कार्रवाई करनी है और किसकी अनदेखी करनी है.

मोदी के कार्यकाल के दौरान ओबामा और ट्रंप सत्ता में रहे हैं. भारतीय ‘अधिकारियों’ की कार्रवाई को (मानवाधिकारों के) ‘दुरुपयोगों में बढ़ोतरी’ से जोड़ने का ब्लिंकेन का दावा अगर अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट के अपने दस्तावेज़ों पर आधारित है, तब ऐसी रिपोर्टों में पहले भी तारीफ़ का कोई पुलिंदा नहीं बांधा गया था.

तो अगर राष्ट्रपति ओबामा और ट्रंप ने भारत के बिगड़ते हुए मानवाधिकार रिकॉर्ड पर चुप रहना पसंद किया, तो क्या ऐसा इसलिए था कि वे राष्ट्रपति बाइडेन से अलग क़िस्म के ‘हितों, लॉबियों और वोट बैंकों’ से प्रेरित थे? या फिर क्या इसकी वजह यह है कि भारत में मानवाधिकार उल्लंघन इस पैमाने पर होने लगे हैं जिसके नतीजे में वॉशिंगटन का नज़रिया बदला है, जिसमें यूक्रेन में रूसी हमले की निंदा करने से नई दिल्ली के इनकार ने भी अपनी भूमिका निभाई हो?

मेरे लेक्चर का विषय विदेश नीति और भू-राजनीति नहीं है, इसलिए मैं इस दिशा में बात नहीं करूंगा और भारतीय लोकतंत्र और मीडिया की दशा पर वापस लौटूंगा. और डॉ. जयशंकर के तीन बिंदुओं पर बात करूंगा जिनसे उन्होंने मोदी सरकार का बचाव किया.

उन्होंने कहा कि हमसे मानवाधिकारों और लोकतंत्र की बात मत कीजिए, क्योंकि जैसा कि ब्लिंकेन ने ख़ुद ही क़बूल किया है, ‘एक दोषमुक्त यूनियन’ की तलाश तो भारत और अमेरिका दोनों ही कर रहे हैं.

डॉ. जयशंकर ने दूसरी बात यह कही कि मोदी सरकार पर ऐतिहासिक ग़लतियों को सुधारने की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ है, और यह ‘अपने अनेक फ़ैसलों और नीतियों’ के ज़रिये ऐसा कर रही है. उन्होंने किसी ख़ास फ़ैसले का नाम नहीं लिया, लेकिन कश्मीर की स्वायत्तता ख़त्म करना, भेदभाव करनेवाले नागरिकता (संशोधन) अधिनियम को पारित करना, और अयोध्या में राम मंदिर के लिए उनकी सरकार की कोशिशों को – जिसको उन्होंने एक दूसरी जगह ‘एक पूरी हुई प्रतिज्ञा, और विरासत पर दावा‘ कहा है – शायद ऐसी श्रेणी में रखा जा सकता है जिसे भाजपा ‘ऐतिहासिक ग़लतियों’ को ठीक करना मान सकती है.

यह दूसरी बात है कि इन फ़ैसलों और नीतियों के नतीजे में अवाम के अधिकारों का एक अभूतपूर्व पैमाने पर हनन हुआ है. इन्होंने भारत के मुसलमानों द्वारा दिन ब दिन महसूस की जा रही असुरक्षा और बेचारगी में योगदान दिया है.

हम यह भी जानते हैं कि ऐतिहासिक ग़लतियों को सुधारने का शोर हिंदुत्व के आज़माए हुए हथियारों में से एक है, जो यह मानते हैं कि भारत की आज़ादी की कोशिशें ब्रिटिश उपनिवेशवाद के आने से शुरू नहीं हुई थीं, बल्कि आठ सदियों पहले, उनके शब्दों में ‘मुस्लिम शासन’ के आने से शुरू हुई थीं. मोदी ख़ुद ‘1,200 बरसों की गुलाम मानसिकता’ की बात करते हैं, इस तरह हम अरबों के सिंध पर विजय हासिल करने के कुछ सौ साल बाद नौवीं सदी में पहुंचते हैं.

तीसरी बात ज़रा भेद भरी है, जिसमें डॉ. जयशंकर ने कहा कि जहां मोदी सरकार लोकतंत्र और मानवाधिकारों जैसी ‘स्वतंत्रताओं’ को अहम मानती है, इनको शासन के अभाव के बराबर नहीं माना जाना चाहिए.

इसमें कोई शक नहीं है कि भारत के विदेश मंत्री उन दुखद बातों का हवाला दे रहे थे जो ब्लिंकेन ने उसी दिन नागरिक समाज से आने वाले कार्यकर्ताओं के साथ दिल्ली में एक बहुचर्चित बातचीत के दौरान सुनी थीं. भारत सरकार ने वैश्विक स्वतंत्रता और शासन सूचकांकों के मामले में ‘विश्व के स्वयंभू संरक्षक’ बनने वालों पर पहले ही व्यंग्य किए हैं, जिनमें भारत की रैंकिंग हाल के बरसों में तेज़ी से गिरी है.

यह कहते हुए कि स्वतंत्रता का मतलब ख़राब शासन नहीं माना जाना चाहिए, डॉ. जयशंकर निरंकुश तानाशाही के उसी पुराने घिसे-पिटे मुहावरे को दोहरा रहे थे, जिनमें दावा किया जाता था कि ट्रेनें सही समय पर चल रही हैं. उनका संदेश यह है कि अच्छा शासन वही है जो मोदी सरकार दे रही है, चाहे इसके लिए स्वतंत्रताओं की थोड़ी क़ुर्बानी ही क्यों नहीं देनी पड़े.

पिछले नवंबर में मोदी सरकार के ख़ुफ़िया मामलों के सर्वेसर्वा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने इस तीसरे बिंदु को विस्तार दिया, जब उन्होंने प्रशिक्षु पुलिस अधिकारियों को चेतावनी दी, ‘युद्ध का नया मोर्चा सिविल सोसाइटी है, जिसे हम चौथी पीढ़ी की लड़ाई कहते हैं.’

उन्होंने कहा कि यह सिविल सोसाइटी ‘भटकाई जा सकती है, जिसे अधीन किया जा सकता है, जो एक बिखरा हुआ विचार हो सकती है, जिसको एक राष्ट्र के हितों को नुक़सान पहुंचाने के लिए भटकाया जा सकता है.’

सर्वश्री डोभाल और जयशंकर जो कह रहे हैं, उसको आपस में मिलाकर देखा जाए तो यह बात निकलती है कि सिविल सोसाइटी कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार के हक़ में लड़ने वालों, पर्यावरणवादियों, किसान संगठनों, दलित और आदिवासी कार्यकर्ताओं, छात्रों और स्वतंत्र मीडिया, इन सबको इस तरह बरगलाया जा सकता है कि ये राष्ट्र के हितों को नुक़सान पहुंचाने लगें. और यह कि इस अधीनता, आज़ादी के इस दुरुपयोग के ख़िलाफ़ खड़े होना ही अच्छा शासन है, और क़ानून का शासन इसी सबके बारे में है. थोडे़ में कहें, तो सिविल सोसाइटी ख़तरनाक रूप से (और पैदाइशी) असभ्य है.

सरकारी कहानी यह बात क़बूल करती है कि इसके बावजूद दुरुपयोग की समस्या मुमकिन है- आख़िरकार लोकतंत्र एक जारी रहने वाली प्रक्रिया है, सभी लोकतंत्रों में लगातार यह कशमकश चलती रहती है- लेकिन भारत के संवैधानिक संस्थान इन ख़ामियों को सुधारने के काम के लिए पूरी तरह मुस्तैद हैं. यही वह दावा है, जिसकी बात करना ज़रूरी है, और जो भारतीय लोकतंत्र के दशा के हमारे जायज़े का अहम बिंदु है.

  1. एक अधिक दोषमुक्त यूनियन की तलाश

ब्लिंकेन ने जब एक ‘अधिक दोषमुक्त यूनियन’ के लिए एक ‘साझी तलाश’ की बात की, तब वे कोशिश कर रहे थे कि अंतरराष्ट्रीय रिश्तों के लिहाज़ से शिष्टता और कूटनीतिक संयम बनाए रखें. इसलिए यह हैरानी की बात नहीं है कि डॉ. जयशंकर ने उसी बात को पकड़ लिया.

लेकिन हममें से ग़ैर-कूटनीतिक लोगों के लिए यह साफ़ होना चाहिए कि एक ‘साझी तलाश’ की कोई भी बात राई और पहाड़ की तुलना करने जैसा है.

भारत की तरह ही अमेरिका में भी अवाम के बीच में राजनीतिक अलगाव बहुत तीखा है. और यह सही है कि ट्रंप प्रशासन के आख़िरी कुछ हफ़्तों में अमेरिका अभूतपूर्व उथल-पुथल से गुज़रा, जिसमें ऊपर तक भारी अराजकता थी. इसी तरह, भारतीय अवाम के बुनियादी अधिकारों को कमज़ोर कर देने वाली अनेक कार्रवाइयां राजनीतिक शिखर से शुरू होती हैं, लेकिन भारत और अमेरिका के हालात की यह समानता यहीं ख़त्म भी हो जाती है.

मैं इसकी क़ाबिलियत नहीं रखता कि मैं अमेरिका के न्याय विभाग (जस्टिस डिपार्टमेंट), एफबीआई, देश भर के चुनावी अधिकारियों, और अमेरिकी मीडिया द्वारा निभाई गई भूमिका पर निर्णायक रूप से कुछ कह सकूं. लेकिन यह मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि भारत में, लोकतंत्र जिस ख़तरे का सामना कर रहा है, उसमें इस ख़तरे से निबटने की ज़िम्मेदारी मीडिया समेत जिन संस्थानों के ऊपर है, उनकी भूमिका यही रही है कि वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और उन्होंने अपराध में भागीदारी की.

और यही बात सबसे अहम है. ब्लिंकेन ने ‘ख़ुद को सुधारने वाली व्यवस्था’ के रूप में लोकतंत्र के जिन बुनियादी घटकों के नाम लिए, (धार्मिक) आस्थाओं के परे नागरिकों की समानता, एक स्वतंत्र मीडिया, एक स्वतंत्र न्यायपालिका और एक निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया- ये सभी भारत में ज़ाहिर तौर पर ख़स्ताहाल और बिखरे हुए हैं. आगे मैं यही दिखाने की कोशिश करूंगा.

नागरिकों की समानता की बात पर मैं अगले सेक्शन में बोलूंगा, लेकिन यहां मैं न्यायपालिका, मीडिया और चुनावों पर बात करना चाहूंगा, ताकि मैं इस पर रोशनी डाल सकूं कि समस्या की जड़ें कहां तक पहुंचती हैं.

भारतीय संविधान में न्यायपालिका की परिकल्पना लोकतंत्र के एक स्वतंत्र स्तंभ के रूप में की गई है, जो कार्यपालिका और विधायिका से अलग है. हक़ीक़त में, जब बुनियादी अधिकारों का मुद्दा दांव पर हो तो शायद ही ऐसा होता है कि निचली अदालतें सरकार से टकराती हों. और जब ये अदालतें सरकारों के ख़िलाफ़ जाती भी हैं तो उनके फ़ैसले आसानी से पलट दिए जाते हैं.

आकार पटेल एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के पूर्व प्रमुख हैं और उन्होंने मोदी के भारत पर हाल ही में एक किताब द प्राइड ऑफ द मोदी ईयर्स लिखी है. बीते दिनों जब वे यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन में एक लेक्चर देने के लिए देश से बाहर जा रहे थे तो उन्हें रोक दिया गया. एक निचली अदालत, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत, ने सरकार द्वारा पटेल को इस तरह मनमाने तरीक़े से रोके जाने पर खिंचाई की और आदेश दिया कि उन्हें बाहर जाने की इजाज़त दी जाए.

इसके बावजूद सीबीआई ने फ़ैसले की अनदेखी की और पटेल को हवाई अड्डे पर दूसरी बार रोक दिया गया. मैं इस घटना के ब्योरे आपको नहीं सुनाऊंगा, लेकिन इस मामले का एक पहलू ग़ौर किए जाने लायक़ है ताकि आपको उस आधिकारिक मनमानी का अंदाज़ा लग सके, जो आज भारतीयों के बुनियादी अधिकारों को खोखला कर रही है.

सीबीआई ने इमिग्रेशन अधिकारियों से कहा कि वे पटेल को हवाई अड्डे पर रोक दें, और दावा किया कि एक आपराधिक मामले में पूछताछ के लिए उनकी ज़रूरत (वॉन्टेड) है. लेकिन सीधे पटेल से ख़ुद कभी यह नहीं कहा गया कि सीबीआई उनसे पूछताछ करना चाहती है! जोसेफ के को पटेल की इस मुसीबत में अपनी कहानी की झलक भी मिलेगी.

अफ़सोस यह है कि समस्या निचली अदालतों तक सीमित नहीं है. भारत का सर्वोच्च न्यायालय अभी भी मोदी सरकार द्वारा लिए गए कुछ मुख्य फ़ैसलों की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं को देखने का समय नहीं निकाल पाया है. उनमें से मुख्य याचिका उस तरीक़े के बारे में है, जिसके तहत संविधान के अनुच्छेद 370 को ख़त्म किया गया.

यह क़दम जम्मू कश्मीर के लोगों को दी गई स्वायत्तता की गारंटी और राज्य के दर्जे ख़त्म करने के लिए उठाया गया. इस फ़ैसले के साथ ही कश्मीर घाटी में नागरिक आबादी पर सबसे सख़्त और सबसे लंबा दमन और लॉकडाउन थोप दिया गया: मुख्यधारा के दर्जनों नेताओं को गिरफ्तार किया गया, हिरासत में लिया गया, जिनमें राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल थे, महीनों तक इंटरनेट को बंद कर दिया गया और मीडिया का कामकाज एक तरह से नामुमकिन बना दिया गया.

क़रीब पांच वर्षों से जम्मू कश्मीर के अवाम को अपने प्रतिनिधि चुनने के अधिकार से वंचित रखा गया है. जब यह सब कुछ हो रहा है, सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी दख़लंदाज़ी को जितना संभव हो, न्यूनतम बनाए रखा है. जिस करतबबाज़ी के साथ अनुच्छेद 370 को ख़त्म किया गया, कम ही संभावना है कि वह न्यायिक कसौटी पर खरी उतरे.

इसकी बुनियादी वजह यह है कि ऐसा करने के लिए राज्य के चुने हुए जनप्रतिनिधियों की सहमति ज़रूरी थी, जिनकी जगह राज्यपाल की सहमति ली गई जो केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं. इसलिए अदालती सुनवाई में इस देरी से भाजपा सरकार बहुत ख़ुश है.

अगर इस मामले पर कभी फ़ैसला लिया जाएगा, और जब भी लिया जाएगा, तो इतना समय बीत चुका होगा कि अदालत आसानी से इस निर्णय पर पहुंच सकती है कि – भारतीय जजों की पसंदीदा शैली में कहें तो- सरकारी फ़ैसले को यह चुनौती अब निरर्थक हो गई है.

यहीं पर मुझे यह बात भी कहनी चाहिए कि मोदी ने जो कारनामा किया, वह सिर्फ़ जम्मू कश्मीर की स्वायत्तता पर हमला भर नहीं था, बल्कि वह भारतीय संघ के बुनियादी ढांचे पर हमला था.

भारत असल में एक संघीय भारत है, और अगर संघीय सरकार, राष्ट्रीय संसद में अपनी ताक़त के आधार पर, किसी भी राज्य के राज्य दर्जे को इतनी आसानी से ख़त्म कर सकती है, तब यह संघीय सिद्धांत को एक मज़ाक़ बनाकर रख देती है. कल जो इसने जम्मू कश्मीर के साथ किया, क्या यह तमिलनाडु के साथ कर सकती है? बेशक, डीएमके के दिमाग में यह सवाल रहा होगा, जो इस सवाल पर कश्मीरियों के बचाव में बोलने वाली कुछेक क्षेत्रीय पार्टियों में से एक थी.

सर्वोच्च न्यायालय ने एक और मामले को सुनने से मज़बूती से इनकार करता रहा है, वह बेनामी चुनावी बॉन्ड्स की संवैधानिकता से जुड़ा हुआ है. 2017-18 में मोदी सरकार द्वारा लाए गए इस क़ानून की मदद से कुल चुनावी चंदे का तीन-चौथाई हिस्सा लगातार भाजपा की जेब में गया है. 2019-2020 में यह रक़म 2,555 करोड़ रुपये थी, जो क़रीब 320 मिलियन डॉलर होते हैं.

बॉन्ड्स कॉरपोरेट कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को दिया गया चंदा होते हैं, जिनकी पहचान जनता से और चुनाव आयोग से छुपाकर रखी जाती है. और मोदी सरकार द्वारा चुनावी चंदे जुटाने के इस तरीक़े को पारदर्शिता की दिशा में एक क़दम के रूप में पेश किया गया था!

बेनामी बॉन्ड्स को चुनौती देने वाली एक याचिका एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) द्वारा सितंबर 2017 में दायर की गई थी. इसको अब क़रीब पांच साल हो गए हैं. चुनाव आयोग ने भी इस योजना का विरोध करते हुए एक हलफ़नामा दायर किया और कहा कि यह योजना ‘राजनीतिक चंदों में पारदर्शिता के लक्ष्य के विरुद्ध’ है.

इस मामले पर अंतिम बार मार्च 2021 में ग़ौर किया गया, जब एडीआर ने इन बॉन्ड्स की बिक्री पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी, जिसको मंज़ूर करने से सर्वोच्च न्यायालय ने इनकार कर दिया. तब तक, चुनाव आयोग का मन भी बदला हुआ दिखा. इसने रोक लगाने की मांग का विरोध किया और यह भी कहा कि वह चुनावी बॉन्ड्स का समर्थन करता है, बस वह चाहता है कि वे और पारदर्शी हों.

5 अप्रैल को भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने कहा कि वे चुनावी बॉन्ड्स के मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने की इजाज़त देंगे. लेकिन हमें बहुत अधिक उम्मीद नहीं है.

बेनामी चुनावी बॉन्ड मुक्त और निष्पक्ष चुनावों के लिए जो ख़तरा पेश करते हैं, वह बहुत साफ़ है – एक राजनीतिक दल किसी कॉरपोरेट कंपनी के साथ समझौते करके उनसे भारी चंदा वसूल कर सकता है और बदले में उनके अनुकूल नीतियां बना सकता है. जनता को इसके बारे में कोई भनक तक नहीं लगेगी कि उसे पैसा कहां से आ रहा है. इसके बावजूद इस अहम मामले पर सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई में तेज़ी करने से इनकार किया है.

चुनाव आयोग ने अपना रुख़ जिस तरह साफ़-साफ़ पलट दिया है, वह चुनावी क़ानूनों का पालन करवाने के मामले में इसके पक्षपातपूर्ण रवैये से मेल खाता है. यह रवैया तब बहुत साफ़ ज़ाहिर होता है जब मोदी सरकार के अहम सदस्यों द्वारा चुनावी क़ानूनों के उल्लंघन का कोई मामला आता है.

2019 के आम चुनावों के दौरान आयोग मोदी के मुसलमान विरोधी बयानों की शिकायतों पर चुप्पी लगा गया था. मिसाल के लिए, कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा केरल के वायनाड से चुनाव लड़ने पर मज़ाक़ उड़ाते हुए मोदी ने कहा कि यह एक ऐसा निर्वाचन क्षेत्र है, ‘जहां अल्पसंख्यक बहुमत में हैं.’ जब याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि वह चुनाव आयोग को शिकायतों का निबटारा करने के लिए कहे, तब जाकर तीन सदस्यीय संस्थान हरकत में आया और 2-1 के मत से यह फ़ैसला किया कि मोदी के ख़िलाफ़ शिकायतें निराधार थीं.

इस फ़ैसले से असहमत चुनाव आयुक्त अशोक लवासा को क़ायदे से अगला मुख्य चुनाव आयुक्त बनना था, लेकिन फ़ैसले से असहमति जताने के साथ ही उन्होंने अपने को भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा हुआ पाया. लेकिन ये आरोप उतने ही रहस्यमय ढंग से तब ग़ायब हो गए जब वे आयोग से इस्तीफ़ा देकर एशियन डेवेलपमेंट बैंक में चले गए.

मुझे यह जोड़ना चाहिए कि जब द वायर  ने भारत में पेगासस स्पायवेयर के उपयोग की जांच की थी, हमने पाया कि टारगेट किए जाने वाले संभावित लोगों की लीक हुई सूची में लवासा का नंबर भी था.

सरकार द्वारा इस तरह लोकतांत्रिक कायदों को तोड़ने-मरोड़ने और पटरी से उतार देने पर सर्वोच्च न्यायालय की बेपरवाही और चुनाव आयोग की मिलीभगत मानो काफ़ी नहीं थी कि एक बहुत अहम चुनावी अभियान के बीच में विपक्षी नेताओं के ख़िलाफ़ जासूसी सॉफ़्टवेयर पेगासस का उपयोग दिखाता है कि चुनावी प्रक्रिया कितनी पक्षपातपूर्ण हो गई है.

यह अमेरिका में वाटरगेट कांड से भी बदतर है, क्योंकि भारत में इसमें सरकारी अधिकारियों ने मिलीभगत की, जिन्होंने सरकारी पैसे से जासूसी सॉफ़्टवेयर ख़रीदे ताकि विरोधी दलों के नेताओं की राजनीतिक जासूसी की जा सके.

  1. आज़ादी नुक़सानदेह है’: मीडिया पर निशाना

पिछले साल द वायर  ने एक बड़ी ख़बर को सामने लाने में मदद की, जो भारत में एक गुमनाम सरकारी क्लाइंट द्वारा एक इजरायली कंपनी एनएसओ ग्रुप के मिलिट्री स्तर के जासूसी सॉफ़्टवेयर का उपयोग करके एक बड़ी संख्या में लोगों की जासूसी करने के बारे में थी.

हम जिन 300 के क़रीब जिन फोन नंबरों की पुष्टि करने में कामयाब रहे थे, उनमें से क़रीब 40 पत्रकारों के थे. इनमें से पांच उन पत्रकारों के थे जो द वायर  में काम करते हैं या मुख्यतः इसके लिए लिखते हैं. मेरे और मेरे सह-संस्थापक संपादक एमके वेणु के मामलों में फॉरेंसिक जांच ने यह स्थापित किया कि हमारे स्मार्ट फोन्स में पेगासस मौजूद था.

जिन दूसरे लोगों के फोन को इस सॉफ़्टवेयर का निशाना बनाया गया था, उनमें मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील, विपक्ष की राजनीतिक रणनीतियां बनाने वाले प्रशांत किशोर और राहुल गांधी के साथ-साथ वह युवा महिला भी शामिल थी जिसने रंजन गोगोई के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे, जब वे भारत के मुख्य न्यायधीश हुआ करते थे.

मोदी सरकार ने पेगासस का इस्तेमाल करने की बात की पुष्टि या खंडन करने से मना कर दिया और कहा कि यह कोई विस्तृत हलफ़नामा दाख़िल नहीं करेगी. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर इसकी जांच कराने से बचने की कोशिश को ख़ारिज कर दिया.

एक पूर्व न्यायाधीश की देख-रेख में एक तकनीकी समिति की स्थापना उम्मीद की एक रोशनी है, जिसके बारे में मैंने शुरुआत में ज़िक्र किया था. इस समिति का काम यह जांच करना है कि पेगासस का उपयोग किस हद तक हुआ है और इसकी पहचान करना है कि किसने स्पायवेयर का उपयोग किसके आदेश पर किया.

इसमें संदेह नहीं है कि सरकार समिति की अनसुनी करेगी और गेंद वापस मुख्य न्यायाधीश के पास आएगी. उस मौक़े पर उन्हें या तो एक क़दम उठाना पड़ेगा- जैसा करने की शक्ति उन्हें संविधान से मिली हुई है- या फिर वे बस अपनी खीझ को ज़ाहिर करके रह जाएंगे. इस मामले में दांव पर बहुत मूल्यवान चीज़ें लगी हैं- सरकार के लिए, चुनावों की निष्पक्षता के लिए, नागरिकों की निजता के अधिकार के लिए, और बेशक, प्रेस की आज़ादी के लिए.

पेगासस के बारे में यह बात अब सामने आई है, लेकिन पिछले छह सालों में मोदी सरकार ने मीडिया के ख़िलाफ़ लगातार अदावत भरा रवैया ही दिखाया है. इस दौरान यह देखा गया कि प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय ने इससे इनकार किया है कि वे एक व्यवस्थित रूप में और पारदर्शी तरीक़े से प्रेस के सवालों का जवाब दें- जबकि उनसे पहले के प्रधानमंत्रियों ने कभी भी ऐसा नहीं किया.

मोदी और उनके दूसरे मंत्री उन पत्रकारों या मंचों पर इंटरव्यू देने को राज़ी नहीं होते हैं जिनके स्वतंत्र होने की जरा भी संभावना होती है और जहां पलटकर उनके जवाबों पर सवाल किया जा सकता हो. मंत्री पत्रकारों के ख़िलाफ़ नियमित रूप से ऐसे शब्दों का उपयोग करते हैं जो उन्हें लगता है कि अपमानजनक हैं, जैसे कि ‘प्रेस्टिट्यूट’. पार्टी के आईटी सेल की रहनुमाई में भाजपा समर्थक पत्रकारों को ट्रोल करते हैं और उनके साथ बदतमीजियां करते हैं.

इस साल द वायर  ने भाजपा द्वारा एक ताकतवर, ख़ुफ़िया ऐप टेफफॉग का उपयोग करने की ख़बर प्रकाशित की थी, जो एक बहुत बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया ट्रेंड्स को मनमाने तरीक़े से मोड़ने, निष्क्रिय पड़े वॉट्सऐप एकाउंटों को हैक करने और सरकार के आलोचकों को ट्रोल करने में सक्षम है- इसमें पैसे लेकर काम करने वाले लोगों के लिए एक ड्रॉपडाउन मेन्यू भी है जो उन महिला पत्रकारों की शारीरिक विशेषताओं को रेखांकित करता है, जिनके साथ वे ख़ास तौर से बदतमीज़ी करना चाहते हैं.

इन सबके बावजूद यह मुमकिन था कि मीडिया इन सबका सामना करने में सक्षम होता, जैसा कि हम बरसों तक मानहानि के बेबुनियाद मुक़दमों के मामले में करते आए हैं. लेकिन फ़र्क़ यह है कि भाजपा और इसकी सरकारों ने अपना हमला तेज़ कर दिया है.

न्यूज़क्लिक, दैनिक भास्कर, द क्विंट और एनडीटीवी के ख़िलाफ़ वित्तीय क़ानूनों के उल्लंघन के आरोप लगाए गए हैं. यह अतीत में भी हो चुका है, जैसे कि 2002 में तहलका के साथ हुआ था. लेकिन अब के रुझान कहीं अधिक बेचैन करने वाले हैं: अब उत्तर प्रदेश और जम्मू कश्मीर केंद्रशासित क्षेत्र जैसे राज्यों में पत्रकारों के ख़िलाफ़ उनकी ख़बरों पर आपराधिक मामले दायर करना एक नियमित घटना बन गई है, यहां तक कि ये मुक़दमे उन ख़बरों पर भी दायर किए जाते हैं जिन्हें उन्होंने लिखा नहीं था, बल्कि लिखने की कोशिश कर रहे थे.

सिद्दीक कप्पन एक साल से अधिक समय से उत्तर प्रदेश की जेल में बंद हैं, उन पर आतंकवादी होने का आरोप है, इसलिए कि वे हाथरस क़स्बे में एक दलित महिला के बलात्कार और हत्या की ख़बर लिखने की कोशिश कर रहे थे. कश्मीर में फ़हद शाह और सज्जाद गुल को ग़ैरक़ानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और जन सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया.

आसिफ़ सुल्तान को यूएपीए के तहत जेल गए चार साल हो गए हैं. उन पर जो आरोप लगाए गए हैं उनके बारे में राज्य को भी पता है वह कभी साबित नहीं कर पाएगा. बीते  अप्रैल में उन्हें आख़िरकार जब एक अदालत ने ज़मानत दी तो उन्हें जन सुरक्षा अधिनियम के तहत फिर से गिरफ्तार कर लिया गया.

मणिपुर में टीवी पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम ने फ़ेसबुक पोस्ट्स के लिए दो बार लंबा समय जेल में गुज़ारा है. इनमें से एक पोस्ट यह पूछते हुए लिखी गई थी कि कैसे गोमूत्र और गोबर किसी को कोविड-19 से बचा सकते हैं. अंडमान स्थित एक पत्रकार ज़ुबेर अहमद को अपने ऊपर लगाए गए गंभीर अपराधों के आरोपों को उच्च न्यायालय से रद्द करवाने में 17 महीने लग गए, यह तब हुआ जब उन्होंने ट्वीट करके बस यह पूछा था कि पुलिस ने क्यों एक परिवार को सिर्फ़ इसके लिए क्वारंटीन में डाल दिया है कि उन्होंने एक कोरोना वायरस मरीज़ से टेलीफोन पर बात की थी.

ऐसी परेशान और आजिज़ कर देने वाली ख़बरों की एक बहुत लंबी फेहरिस्त है, जो मैं आपको सुना सकता हूं. और आप कहीं यह सोचने लगें कि ये दूर-दराज़ के इलाक़ों की समस्याएं हैं, तो मत भूलिए कि यह नई दिल्ली की पुलिस थी, जिसने राजदीप सरदेसाई और मृणाल पांडे जैसे दिग्गज वरिष्ठ संपादकों के ख़िलाफ़ राजद्रोह के मामले दर्ज किए थे.

यह तब हुआ था जब उन्होंने जनवरी 2021 में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान गोली से मारे जाने वाले एक किसान की ख़बर रिपोर्ट की थी. मीडिया को निशाना बनाने की एक नई तरकीब है: ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की चिंताओं को आधार बना कर टीवी चैनलों का प्रसारण लाइसेंस रद्द करना, जबकि यह कभी नहीं बताया जाता है कि ये चिंताएं क्या हैं. हाल ही में एक मलयालम न्यूज़ चैनल मीडियावन के साथ ऐसा ही किया गया.

मोदी सरकार अभी तक डिजिटल मीडिया को नियंत्रित कर पाने में सबसे कम सफल रही है. इस पर मंत्रियों के एक समूह द्वारा सरकार की संचार नीतियों पर जारी की गई एक रिपोर्ट में खुले तौर पर अफ़सोस ज़ाहिर किया गया है.

डिजिटल मीडिया पर लगाम कसने में अपनी नाकामी के जवाब में सरकार ने दो क़दम उठाए हैं. पहला कि इसने डिजिटल ख़बरों में विदेशी निवेश की अधिकतम सीमा 26% कर दी है, जबकि पहले ऐसी कोई सीमा नहीं थी- और इसने इसके लिए सरकारी मंज़ूरी को भी ज़रूरी बना दिया है.

दूसरे, इसने नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिन्हें इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी नियम, 2021 के नाम से जाना जाता है. ये सरकार को इसका अधिकार देते हैं कि वह ऐसी सामग्री को हटाने के आदेश दे सकती है, जिसे विभिन्न मंत्रालयों के नौकरशाहों से मिल कर बनी एक समिति अनुचित मानती हो. द वायर  और दूसरे समाचार मंचों ने इन नियमों को चुनौती दी है और इसके सबसे ख़तरनाक खंडों के अमल पर रोक लगी हुई है. लेकिन खेल जारी है और ख़तरे भी.

मौजूदा रुझानों को देखते हुए एक पत्रकार के रूप में स्वाभाविक रूप से मैं मीडिया की आज़ादी के भविष्य को लेकर चिंतित हूं. हमारी उम्मीद यह है कि अदालत आज़ादी का साथ देगी, जो अतीत में भी प्रेस की आज़ादी के साथ खड़ी होती रही है.

जिस बात के कारण मुझे कम उम्मीदें हैं, वह है भारत में सार्वजनिक विमर्श में बढ़ती हुई आक्रामकता और सांप्रदायीकरण, और ख़ासकर मुसलमानों के ख़िलाफ़ धार्मिक कट्टरपंथ को सक्रिय रूप से बढ़ावा देने वाले लोगों के ख़िलाफ़ साफ़ और सीधा संदेश भेजने की दिशा में अदालतों की नाकामी.

  1. ऐतिहासिक ग़लतियों को सुधारना’: भारतीय मुसलमानों पर हमले

1936 में जर्मनी के दौरे के फ़ौरन बाद महान अमेरिकी जन बुद्धिजीवी डब्ल्यूईबी डु बुआ ने नाज़ी हुकूमत में यहूदियों के उत्पीड़न के बारे में एक बहुत प्रभावशाली लेख लिखा. डु बुआ ने अपने देश में अफ्रीकी-अमेरिकी लोगों पर किए जाने वाले नस्लवाद को देखा और उसके बारे में लिखा था, और इस अनुभव की रोशनी में उन्होंने एक चीज़ पर ज़ोर देते हुए लिखा जो उनके नज़रिये में प्रमुख फ़र्क़ था.

जूलिया बॉइड ने अपनी किताब ट्रैवलर्स इन द थर्ड रैह में उनकी बातों को उद्धृत करते हुए लिखा है कि ‘अमेरिका में काले लोगों की पीड़ा की तुलना नाज़ी जर्मनी में यहूदियों से करना नामुमकिन था क्योंकि ‘जर्मनी में जो कुछ हो रहा है वह एक क़ानूनी तौर पर और खुलेआम हो रहा है, चाहे वह क्रूर और अन्यायपूर्ण ही क्यों न हो. लेकिन अमेरिका में नीग्रो लोगों का उत्पीड़न और दमन ख़ुफ़िया तरीक़े से, क़ानूनों के खुलेआम उल्लंघन के साथ होता है.’

डु बुआ उत्पीड़न के एक तरीक़े को दूसरे की तुलना में हल्का नहीं बता रहे थे, बल्कि वे इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि उत्पीड़न और ख़ासकर हिंसा को अगर क़ानून के स्तर तक उठा दिया जाए तो इसका मतलब यह है कि हम ऐसी जगह पर पहुंच गए हैं, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है. असल में यह उनकी दूरदृष्टि की निशानी है.

भेदभाव और अलगाव काले लोगों की ज़िंदगी का एक हिस्सा था, और डु बुआ अमेरिका में जिम क्रो क़ानूनों के बारे में बख़ूबी जानते थे, लेकिन वे उस सामूहिक जनसंहार, तबाही लाने वाली उस दिशा को साफ़-साफ़ देख सके, जिस दिशा में नाज़ी बढ़ रहे थे.

डु बुआ की इस टिप्पणी ने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी क्योंकि मेरी राय में आज के भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों, ख़ासकर मुसलमानों का ‘चुपचाप क़ानूनों का सरासर उल्लंघन करते हुए, दमन करने’ से बात कहीं आगे बढ़ गई है. अब उनको क्रूर और अन्यायपूर्ण हमलों और उत्पीड़न का निशाना बनाया जाता है जो हम सबकी आंखों के सामने ‘एक क़ानूनी तौर पर और खुलेआम हो रहा है’.

गुजरात में राज्य के मुख्यमंत्री की हैसियत से नरेंद्र मोदी की हुक्मरानी में होने वाली मुसलमान विरोधी हिंसा के बारे में मैंने एक किताब संपादित की है – गुजरात: द मेकिंग ऑफ अ ट्रेजेडी (हिंदी में, गुजरात: हादसे की हक़ीक़त). इस किताब को इस विचार के साथ तैयार किया गया था कि यह एक बड़े इलाक़े में कुछ दिनों तक चलने वाले एक बहुत गंभीर अपराध का एक स्थायी सार्वजनिक दस्तावेज़ (आर्काइव) बनेगी.

1984 में जब कांग्रेस पार्टी सत्ता में थी तो उसकी हुक्मरानी में हुए सिखों के क़त्लेआम का भी ऐसा दस्तावेज़ीकरण हुआ है, लेकिन इतने विस्तार से नहीं हुआ है. ये दोनों घटनाएं उस बात की एक चरम निशानी हैं जिसे पॉल ब्रास ने ‘दंगे की संस्थागत व्यवस्था’ कहा है. हत्याएं हुईं क्योंकि सत्ता में बैठी हुई पार्टी ये हत्याएं चाहती थी: इसका मक़सद समाज को दो ख़ेमों में बांटना, हिंदुओं को गोलबंद करना और हमले का शिकार बनाए गए अल्पसंख्यकों के भीतर हमेशा बने रहने वाला ख़ौफ़ बिठाना था.

पुलिस ने अपने कारनामों और नाकारापन दोनों के साथ इसमें बड़ी तत्परता के साथ भागीदार की भूमिका निभाई. इनके प्रमुख क़सूरवार हर तरह की सज़ा से बच निकले, गुजरात में मुसलमानों और दिल्ली में सिखों के ख़िलाफ़ हुई हिंसा क़ानून का एक खुला उल्लंघन थी और इसके मुख्य कर्ता-धर्ताओं ने सावधानी बरतते हुए पर्दे में ही रहना पसंद किया, ख़ास तौर पर आला राजनेताओं ने.

आज ‘दंगों’ के पीछे का प्रमुख मक़सद तो वही है, लेकिन ‘व्यवस्था’ में एक तकनीकी बदलाव आया है. एक सीमित भौगोलिक इलाक़े में बड़े पैमाने पर लेकिन थोड़े समय के लिए एक गहन हिंसा के दौर की जगह अब हज़ार हमलों से दहशत फैलाने को तरजीह दी जा रही है. मैदान अब बहुत बड़ा, बहुत ही बड़ा है और मुहिम तो लगातार चलती रहती है.

सबसे अहम बात है कि भाजपा की रणनीति अब यह है कि मुसलमानों को एक क़ानूनी और खुले तरीक़े से उत्पीड़ित किया जाए. कुछ मामलों में इसका मतलब है कि नए भेदभावपरक क़ानूनों का उपयोग किया जाए, या फिर मौजूदा क़ानूनों को ही ज़रूरत के मुताबिक़ बदला जाए.

इसका मतलब यह भी है कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ निजी व्यक्तियों की शिकायतों का उपयोग करते हुए क़ानून को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाए, जिसमें पुलिस बड़ी फुर्ती के साथ हरकत में आती है. इस तरह गिरफ्तार लोगों को वकील खोजने में संघर्ष करना पड़ता है जो उनका मामला लें और उन्हें ज़मानत दिलाएं.

हाल की एक मिसाल पर गौर करें. पिछले महीने कुठमा शेख़ को एक निजी वॉट्सऐप स्टेटस की वजह से कर्नाटक के बागलकोट में गिरफ्तार कर लिया गया. उन्होंने पाकिस्तान के रिपब्लिक डे के दिन सिर्फ़ इतना लिखा था: ‘अल्लाह हर मुल्क को अमन, एकता और भाईचारा बख्शे.’ उनकी गिरफ़्तारी एक आदमी की निजी शिकायत पर की गई, जिसके बारे में माना जाता है कि वह स्थानीय हिंदुत्व संगठन का सदस्य है.

शेख़ पर आरोप भारतीय दंड संहिता की दो धाराओं के तहत लगाए गए, जो धर्म, नस्ल वग़ैरह के आधार पर समुदायों के बीच दुश्मनी पैदा करने के बारे में हैं. यह पूछने पर कि ऐसे एक मासूम से संदेश पर उस औरत को उन्होंने क्यों गिरफ्तार किया, पुलिस ने कहा, ‘हमें शिकायत मिली कि पोस्ट भड़काऊ है और समाज में तनाव पैदा करने के मक़सद से लिखी गई है. क्योंकि [संदेश] अपलोड करने वाले की मंशा निश्चित नहीं हो पाई है, इसलिए हम अभी भी जांच कर रहे हैं.’

हिंदुत्व कार्यकर्ताओं ने यह कहते हुए स्थानीय अधिवक्ता संघ पर दबाव डाला कि वे शेख़ की नुमाइंदगी करने से इनकार कर दें क्योंकि वह राष्ट्र-विरोधी है. आख़िरकार शेख़ को ज़मानत मिल गई लेकिन तब तक वे जेल में दो रातें गुज़ार चुकी थीं.

यह एक मुसलमान औरत की कहानी है, लेकिन भारत में ऐसे दर्जनों मामले हैं, जिनमें से ज़्यादातर भाजपा शासित राज्यों से हैं. इंस्पेक्टर यह आसानी से देख सकता था कि पोस्ट के पीछे कुठमा शेख़ की मंशा कोई नुक़सान पहुंचाने की नहीं थी, और इसकी जांच करने के बजाय उसने ठहरकर कभी ख़ुद से यह नहीं पूछा कि क्या शिकायत करने वाले आदमी की मंशा की जांच ज़रूरी नहीं थी.

उसने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह नई व्यवस्था को समझता है. ‘दंगे’ की पुरानी व्यवस्था में वह जानता था कि जब सरकार के क़रीबी कार्यकर्ता किसी पर हमले करें तो उसे अपनी आंखें मूंद लेनी हैं. ऐसा करने के लिए उसको कहने की ज़रूरत नहीं थी, अभी जैसा माहौल है उसमें हाथ पर हाथ धरे रहना ही उसके लिए स्वाभाविक कदम लगता है.

नई व्यवस्था में, इंस्पेक्टर जानता है कि उसकी भूमिका यही है कि जिस किसी की तरफ़ हिंदुत्व कार्यकर्ता उंगली उठा दें, उसे ऐसे ‘राष्ट्र-विरोधी तत्व’ को क़ानून की किताब से कुचल देना है. जब कभी ऐसे कार्यकर्ता आगे बढ़कर किसी की हत्या कर बैठें या गंभीर रूप से ज़ख़्मी कर दें, तो पुलिस पीड़ित के ख़िलाफ़ ही जवाबी आरोप दर्ज करती है, जैसा कि अख़लाक़ के मामले में हुआ, जो उत्तर भारत में गाय के नाम पर बने हिंसक गिरोहों ‘गौरक्षकों’ के शायद पहले शिकार थे.

नई व्यवस्था बख़ूबी काम करती है क्योंकि यह हिंदुत्व के ज़मीनी कार्यकर्ताओं के बलवे की मदद पर चलती है और उसे मज़बूती देती है, और मुसलमानों की ज़िंदगियों में हमेशा बनी रहने वाली एक अस्थिरता ले आती है, जिन्हें अब हर समय बड़ी सावधानी से यह सोचना पड़ता है कि वे जो खाते या पहनते हैं, पढ़ते या लिखते हैं, कहते या करते हैं, उससे कहीं उनकी जान-माल की सुरक्षा तो ख़तरे में नहीं पड़ जाएगी. इसका मक़सद मुसलमानों के वजूद को मिटा देना है, उन्हें नज़रों से ग़ायब कर देना है – व्यक्तियों के रूप में, समूह के रूप में, सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान के रूप में.

अवसाद से भर देने वाली इस फ़ेहरिस्त को देखें, जो किसी भी लिहाज़ से अंतिम फ़ेहरिस्त नहीं है:

  • दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में जगहों के नामों को मिटाना;
  • उर्दू पर हास्यास्पद हमला;
  • स्कूलों में हिजाब पर पाबंदी लगाने की कोशिश;
  • मुसलमानों के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार का आह्वान, जिसको कोविड महामारी के बाद चले सांप्रदायिक प्रचार से मज़बूती मिली है;
  • हिंदू त्योहारों में मुसलमानों की भागीदारी पर पाबंदी (और उसे अपराध ठहराने तक) की कोशिश;
  • मांस और दूसरे उत्पादों के हलाल सर्टिफिकेशन पर हमला;
  • हिंदू त्योहारों के दौरान मांस की बिक्री पर पाबंदी;
  • मुसलमान और इस्लामी स्मारकों को लगातार ‘हिंदू’ बताते हुए उन पर दावा करने की कोशिश;
  • हिंदू धार्मिक जुलूसों को मुसलमान मुहल्लों में ले जाने की आक्रामक राजनीतिक, जिसके तहत कहा जाता है कि वे उन्हें ‘सही रास्ते पर ला रहे हैं’ और उन्हें ‘भारत’ में ‘फिर से एकीकृत’ कर रहे हैं;
  • बुलडोज़रों का उपयोग करते हुए मुसलमानों की जायदाद को तबाह कर देना (जैसा कि हाल में मध्य प्रदेश और दिल्ली तक में देखा गया है).

यह सब उनकी निशानियां मिटाने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं.

डॉ. जयशंकर के शब्दों का उपयोग करते हुए कहें, तो संघ परिवार इन क़दमों को ऐतिहासिक ग़लतियों को सुधारने का तरीक़ा मानता है. कुछ हिंदुत्व नेता लगातार मुसलमानों के सामूहिक क़त्लेआम और इस्लाम को मिटा देने का आह्वान करते हैं, ऐसे नेताओं में यति नरसिंहानंद उल्लेखनीय हैं.

इन सभी उकसावेबाजियों को भाजपा के चुने हुए प्रतिनिधियों और नेताओं का खुला या भीतरी समर्थन हासिल है. सबसे अहम बात है कि कभी भी उनकी आलोचना एक ऐसे प्रधानमंत्री ने नहीं की है जो सभी भारतीयों के साथ खड़ा होने का दावा करता है.

आज के भारत से उन्हें बेदख़ल करने की यह प्रक्रिया मुसलमानों के खुले और क़ानूनी उत्पीड़न का सिर्फ़ एक पहलू है. लेकिन ऐसे क़ानून भी हैं जो बहुत साफ़ तौर पर मुसलमानों की ऐसे लोगों के रूप में निशानदेही करते हैं कि वे सज़ा के भागीदार हैं. और यह भारतीय राजनीति में एक ख़तरनाक नए मोड़ का प्रतिनिधित्व करता है.

मैं जानना चाहता हूं कि कितने लोग यह जानते हैं कि जब एक मुसलमान अपनी पत्नी को छोड़ देता है, मतलब क़ानून के मुताबिक़ उसे तलाक़ देने में नाकाम रहता है, तब उसे जेल में डाला जा सकता है, जबकि एक हिंदू, सिख या फिर एक ईसाई को ऐसा ही क़दम उठाने पर कोई आपराधिक सज़ा नहीं मिलेगी?

मैं 2019 के क़ानून की बात कर रहा हूं जो तलाक़ की प्रक्रिया में, तीन तलाक़ को एक अपराध बना देता है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही ग़ैरक़ानूनी करार दिया था.

2019 में ही मोदी सरकार ने एक बार फिर क़ानून में मुसलमानों की निशानदेही की. इस बार नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के ज़रिये, जिसके तहत उन्हें नागरिकता के उन लाभों से बाहर कर दिया गया, जिन्हें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से बिना दस्तावेज़ों के आनेवाले सभी प्रवासियों को प्रदान किया गया था.

अगर मक़सद यह था कि इन देशों से भारत में भागकर आने वाले धार्मिक उत्पीड़न के शिकार लोगों को फ़ायदे मुहैया कराए जाएं, जो कि बेशक तारीफ़ के लायक़ एक क़दम है, तब इसे इस तरह भी हासिल किया जा सकता था कि एक ऐसा क़ानून पारित किया जाए जो उत्पीड़न के शिकार लोगों को शरणार्थियों का दर्जा दे, और एक ऐसी पारदर्शी और न्यायिक प्रक्रिया कायम करे जो आवेदन करने वालों के दावों को तेज़ी से निबटा सके.

जिनको शरणार्थियों का दर्जा दिया गया था, उन्हें  नागरिकता के योग्य बनाया जा सकता था, जैसा कि 1951 रिफ्यूजी कॉन्वेन्शन का पालन करने वाले लोकतांत्रिक देशों में एक नियम है. लेकिन मक़सद तो कुछ और ही था – और डॉ. जयशंकर के शब्दों का इस्तेमाल करें तो मक़सद ऐतिहासिक ग़लतियों को सुधारना था.

भाजपा की राय में, भारत हिंदुओं, या तथाकथित भारतीय धर्मों के अनुयायियों की स्वाभाविक भूमि है, जिनमें से अनेक बंटवारे की वजह से फंसे रह गए. इसलिए, मोदी सरकार के लिए, सीएए एक तार्किक कदम है, जिसमें ईसाइयों को भी शामिल कर लिया गया है क्योंकि ज़ाहिरन पाकिस्तान में वे एक उत्पीड़ित अल्पसंख्यक हैं.

सीएए पर मैं एक बात और कहना चाहता हूं. भाजपा के मंत्री यह कहना पसंद करते हैं कि सीएए सिर्फ़ ग़ैर-भारतीय लोगों के बारे में है और यह कि क़ानून किसी भी तरह से भारतीय मुसलमानों के ख़िलाफ़ भेदभाव नहीं करता है. यह दलील नैतिक रूप से झूठी और बेबुनियाद है, लेकिन यह तथ्यात्मक रूप से भी ग़लत है.

आप दो भारतीय औरतों की एक मिसाल लें, जिनमें एक हिंदू है और एक मुसलमान. उनकी शादी बिना दस्तावेज़ों वाले दो बांग्लादेशी मर्दों के साथ हुई है, जिनमें एक हिंदू है और एक मुसलमान. पुराने नागरिकता क़ानून के मुताबिक़, दोनों औरतों के बच्चों को ‘ग़ैरक़ानूनी प्रवासी माना जाता’, और उन्हें उनके अपने पिताओं के साथ वापस भेज दिया जाता. लेकिन सीएए साफ़ तौर पर इस बात की राह खोलता है कि हिंदू भारतीय औरत एक सामान्य पारिवारिक जीवन जीती रहेगी, जिसमें उसे वापस भेजे जाने के किसी ख़तरे का सामना नहीं करना होगा. लेकिन मुसलमान भारतीय औरत को भारत से अपने परिवार के बाहर कर दिए जाने के जोखिम के साथ जीना होगा.

निश्चित रूप से कोई भी लोकतांत्रिक देश क़ानून में ऐसे खुलेआम भेदभाव का समर्थन नहीं कर सकता. लेकिन तीन साल हो गए, सर्वोच्च न्यायालय को अभी तक सीएए की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका को ढंग से सुनने का समय नहीं मिला है.

इसी तरह भाजपा की हुकूमत वाले अनेक राज्यों ने धर्मांतरण के ख़िलाफ़ कठोर क़ानून लागू किए हैं (या करना चाहते हैं). उनकी बुनियाद में यह झूठा दावा है कि मुसलमान आबादी में अपना हिस्सा बढ़ाने के लिए हिंदू औरतों को लुभाकर उनका धर्मांतरण करने की कोशिश रहे हैं. छूट सिर्फ़ उन लोगों को दी गई है जो लोगों को उनके मूल धर्म में वापस धर्मांतरण कराते हैं, जिसका मतलब है कि आरएसएस की घर वापसी की गतिविधियां जारी रहेंगी, तब भी जब इस्लाम (या ईसाइयत) में धर्मांतरण को एक अपराध बना दिया गया है, ख़ासकर जहां अंतर-धार्मिक शादी हुई है.

  1. निष्कर्ष: अंधेरे के बीच, उजाले की किरणें

उदासी का यह सफ़र हमें कहां ले जाएगा? मैंने आपको उम्मीद की थोड़ी रोशनियों का भी वादा किया था, इसलिए अब मुझे हिम्मत न खोने वाली उम्मीद के बारे में बोलने की इजाज़त दीजिए.

मैं अपनी बात से ही शुरू करूंगा: द वायर  अपनी जगह बना रहेगा. और हम अकेले नहीं हैं. ऐसे दर्जनों मीडिया प्लेटफ़ॉर्म हैं जो स्वतंत्र पत्रकारिता की राह पर मज़बूती से आगे बढ़ रहे हैं – ख़ासकर वेबसाइट्स, कुछ अख़बार और टीवी चैनल. ऐसे हज़ारों बहादुर फ्रीलांस रिपोर्टर हैं जिन्होंने धमकियों-चेतावनियों के आगे झुकने से इनकार किया है, भले ही वे कई तरह से सबसे असुरक्षित हैं. और मैं ख़ास तौर से उन सबको सलाम करता हूं जो जम्मू कश्मीर में काम कर रहे हैं.

यूट्यूब पर वीडियो कंटेंट ने हमारे लिए एक नया दर्शक और बाज़ार पैदा किया है. इसने स्थापित मीडिया घरानों के एकाधिकार और पक्षपात को चुनौती दी है. डिजिटल ख़बरों के प्रसार ने ग़लत सूचनाओं को नफ़रत का औज़ार भी बनाया है (और इसमें बिग टेक की भूमिका ख़ास तौर से समस्याजनक रही है) लेकिन इसने स्वतंत्र, प्रोफेशनल तरीक़े से लिखी गई ख़बरों के लिए भी जगह बनाई है.

चौतरफ़ा होने वाली पतन के ख़िलाफ़ उम्मीद की एक और रोशनी दक्षिण और पूरब के इलाक़ों के राजनीतिक दलों और अवाम का प्रतिरोध है जो लोकतंत्र विरोधी परियोजना को भारत में संघवाद की बची-खुची निशानियों पर भी एक हमले के रूप में देखा है.

उम्मीद की रोशनी सिर्फ़ मीडिया या राजनीतिक दलों के स्तर पर ही नहीं है. सरकार द्वारा बड़े मीडिया घरानों के क़रीब-क़रीब पूरे नियंत्रण के बावजूद यह भी एक तथ्य है कि एक साल के भीतर दो बड़े जनांदोलन हुए – एक सीएए के ख़िलाफ़ 2019-2020 में और दूसरा कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ 2021-22 में, जो दिखाता है कि आम नागरिक सरकार को चुनौती देने की चाहत रखते हैं और जिन उसूलों और मुद्दों में वे यक़ीन रखते हैं उनके लिए उनमें लड़ने का जज़्बा भी है.

वैकल्पिक मीडिया की मदद से इन आंदोलनों ने लोकतंत्र के लगातार जारी उस पतन को कारगर तरीक़ों से चुनौती दी है जिसे भारत में देखा जा रहा है. भारत में दूसरी जगहों पर भी, आम अवाम ने अपनी ताक़त में यक़ीन करना नहीं छोड़ा है, चाहे वह छत्तीसगढ़ का सिलगेर हो या ओडिशा और असम हों. ये वह आम अवाम है जो लोकतंत्र को सबसे अधिक प्यार करता है. उन्हीं में भारत को मुक्ति मिलेगी.

(मूल अंग्रेज़ी से रेयाज़ुल हक़ द्वारा अनूदित)