भारत

रामदेव को तथ्यहीन और अवैज्ञानिक दावे करने की छूट क्यों मिली हुई है

विशेष: दवाओं से जुड़े क़ानूनों का उल्लंघन करते हुए रामदेव की पतंजलि वेलनेस और दिव्य साइंटिफिक आयुर्वेद द्वारा अपने उत्पादों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हुए अख़बारों में धड़ल्ले से साक्ष्य रहित एलोपैथी विरोधी विज्ञापन दिए जा रहे हैं. इससे पहले महामारी के बीच में रामदेव ने ‘कोरोना वायरस की दवा’ बनाने का भी दावा किया था.

फरवरी 2021 में कोरोनिल को लॉन्च करने के कार्यक्रम में रामदेव के साथ कैबिनेट मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी. (फोटो साभार: फेसबुक)

10 जुलाई को, एफएमसीजी कारोबार के बड़े खिलाड़ी बाबा रामदेव द्वारा संचालित दो कंपनियों- पतंजलि वेलनेस और दिव्य साइंटिफिक आयुर्वेद ने भारत के कई प्रमुख अंग्रेजी भाषा के अखबारों में एक आधे पन्ने का विज्ञापन प्रकाशित किया.

इस विज्ञापन ने एलोपैथी (अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति) पर ‘गलत धारणा’ फैलाने का आरोप लगाते हुए एक वैज्ञानिक तरीके से जांची-परखी और प्रमाणित चिकित्सा पद्धति के खिलाफ बिना किसी सबूत के एक के बाद एक कई इल्जाम जड़े गए थे. इस विज्ञापन में दावा किया गया कि पतंजलि वेलनेस भारत के कई प्रमुख गैर-संक्रामक रोगों: उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, असामान्य थायरॉयड फंक्शन, आंख और कान के इलाज, उच्च कोलेस्ट्रॉल, असामान्य लिवर फंक्शन, चर्म रोग, अर्थराइटिस और अस्थमा का निदान कर सकती है.

यह दावा भी बगैर किसी सबूत के किया गया है. इस विज्ञापन में तर्कहीन तरीके से ‘जेनेटिक रोगों’ के स्थायी समाधान का भी दावा किया गया है. अंत में इसने दबे स्वर में यह कहा है कि ‘हृदय के ब्लॉकेज’, ‘निःसंतानता’, मूत्र मार्ग का संक्रमण और ‘स्ट्रेस’ का कोई स्थायी इलाज नहीं है.

ऐसा कहते हुए इनमें से ज्यादातर रोगों के लिए साक्ष्य आधारित चिकित्सा में इनमें से ज्यादातर समस्याओं के लिए उपलब्ध समाधानों को नकार दिया.

(फोटो साभार: @AnantBhan/Twitter)

यह विज्ञापन यूं तोएलोपैथी/आयुर्वेद की एक बाइनरी तैयार करने की कोशिश करता है, लेकिन हकीकत में यह एक साक्ष्य/बिना साक्ष्य की बाइनरी तैयार कर देता है.

कानून

भारत में यह विज्ञापन सीधे तौर पर दो कानूनों का उल्लंघन करता है: ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 और ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट, 1954.

ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के भाग 9, नियम 106 (1) के मुताबिक, कोई भी दवाई अनुसूची जे में उल्लिखित किसी एक या एक से ज्यादा रोगों या बीमारियों की रोकथाम या उसका निदान करने का कथन दावा नहीं कर सकती है, न ही इसके संभावित उपयोगकर्ताओं को ऐसा कोई विचार दे सकती है कि यह उस या उन रोगों या बीमारियों की रोकथाम या उनका निदान कर सकती है.’

पतंजलि वेलनेस के विज्ञापन में जिन बीमारियों का जिक्र है, वे सभी बीमारियों अनुसूची जे में शामिल हैं.

ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट के तहत यह विज्ञापन धारा 3 (डी), 9, 14 और 15 का उल्लंघन करता है. धारा 3 (डी) कहती है कि किसी को भी अधिनियम की अनुसूची में लिखित किसी बीमारी के उपचार या उसका निदान करने का विज्ञापन करने की इजाजत नहीं है.

इस अनुसूची में वे सभी स्थितियां शामिल हैं, जिनके लिए पतंजलि वेलनेस ने विज्ञापन दिया है: उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, हृदय रोग, आर्टरिओसक्लेरोसिस और लिवर से संबंधित कुछ स्थितियां. धारा 9 अधिनियम का विस्तार करके इसे सिर्फ व्यक्तियों पर ही नहीं कंपनियों पर भी लागू करती ही.

धारा 14 और 15 उन अपवादों का जिक्र करती है जब सरकार ने विज्ञापन देने की इजाजत दी है. लेकिन इसके लिए हमारी सरकार द्वारा विज्ञापन के प्रकाशन से पहले एक गजट अधिसूचना जारी करके इसकी इजाजत दी जानी चाहिए थी. क्या सरकार ने इजाजत दी थी?

अब जबकि विज्ञापन का प्रकाशन हो गया है, सरकार को पतंजलि वेलनेस से लिखित रूप में यह विज्ञापन इस रूप तैयार करने का कारण पूछना चाहिए यह जवाब मांगना चाहिए कि इसे क्यों लगता है कि उसे पाबंदियों से छूट मिलनी चाहिए? क्या सरकार यह सवाल पूछेगी?

कानून के होते हुए यह विज्ञापन सैद्धांतिक तौर पर इसके क्रियान्वयन में एक बड़ी गड़बड़ी को दिखाता है: खराब विज्ञापन की शिकायत करने वाले लोग- व्यक्ति, संस्थान, सरकारी निकाय आदि- को सामान्य तौर पर उल्ल्ंघन करने वालों पर मुकदमा चलाने का अधिकार नहीं है.

इसकी जगह वे सिर्फ उल्लंघन करने वालों की शिकायत उच्चतर निकायों में कर सकते हैं और पाबंदियों की सिफारिश कर सकते हैं. मुकदमा चलाने का अधिकार राज्य सरकारों के पास है. लेकिन क्या वे यह जिम्मेदारी निभाते हैं?

इस साल मार्च में आई पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उपभोक्ता मामलों के विभाग के भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ शिकायत (ग्रिविएंस अगेंस्ट मिसलीडिंग एडवरटाइजमेंट) पोर्टल ने अप्रैल, 2014 से जुलाई, 2021 के बीच आयुष उत्पादों और सेवाओं के 1,416 विज्ञापन दर्ज किए.

2017 से 2019 के बीच एएससीआई ने आयुष मंत्रालय में आयुष उत्पादों के 1229 गुमराह करने वाले विज्ञापन रिपोर्ट किए. और फार्माकोविजिलेंस सेंटर्स फॉर आयुष, सिद्ध, यूनानी एंड होमियोपैथी ड्रग्स ने 2018 से 2021 के बीच में 18,812 आपत्तिजनक विज्ञापनों को रिकॉर्ड किया.

देखा जाए तो भारत में कानूनों को तोड़कर लाखों-करोड़ों भारतीयों में असत्यापित उपचारों का प्रचार करनेवाले विज्ञापनों की कोई कमी नहीं है. लेकिन फिर भी राज्य सरकारों ने कमोबेश चुप रहना ही मुनासिब समझा है. और मुकदमे न होने के कारण यह बुराई बिना किसी रोक-टोक के चल रही है.

पहले के मामले

छह साल पहले पतंजलि योगपीठ और दिव्य फार्मेसी ने अखबरों में एक विज्ञापन में बाकी चीजों के साथ यह दावा भी किया था, ‘25 वर्षों के गहन शोध और एक करोड़ से ज्यादा लोगों पर जांच करने के बाद इस देश के लोगों को सफलता के साथ एक स्वस्थ जीवनशैली देना हमारा आयुर्वेद मिशन है.’

शेष विज्ञापन में डायबिटीज के निदान का दावा किया गया था. इसमें कहा गया था कि 200 वैज्ञानिकों के एक समूह ने लाभकारी जड़ी-बूटियों की एक सूची तैयार की है. (जबकि ऐसी सूचियां पहले से ही मौजूद थीं). इसमें एक वायरस को उच्च रक्तचाप का कारण बताया गया था!

नेशनल नॉलेज कमीशन के पूर्व उपाध्यक्ष ओर सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बॉयोलॉजी के संस्थापक निदेशक दिवंगत पुष्प एम. भार्गव ने इन आरोपों की धज्जियां उड़ा दी थीं. उन्होंने द वायर साइंस में लिखा था,

‘अगर 25 वर्षों तक गहन शोध किया गया है, तो यह जरूर ही शोध वैज्ञानिकों द्वारा किसी संस्थान में किया गया होगा और इसके परिणाम सार्वजनिक दायरे में प्रकाशित किए गए होंगे- मसलन, जैसा कि विश्वभर में चलन है, इन परिणामों को सम्मानित जर्नलों में प्रकाशित किया गया होगा. विज्ञापन में ऐसे किसी प्रकाशन का जिक्र नहीं है, न ही इनके होने की कोई जानकारी नहीं है.

ऐसे किसी प्रकाशन की गैरहाजिरी में, यह सवाज वैध तरीके से पूछा जा सकता है : (ये शोध करने वाले) वैज्ञानिक कौन थे और उनकी योग्यता क्या थी? संस्थान का नाम क्या था और वह कहां है? किस शोध प्रविधि (रिसर्च मेथेडोलॉजी) का इस्तेमाल किया गया?’

अगर सभी व्यक्ति के सभी परीक्षण परिणाम एक पन्ने पर भी दर्ज किए जाएं, तो भी एक करोड़ लोगों के डेटा को रिकॉर्ड करने के लिए एक करोड़ पन्नों की जरूरत होगी. अगर 300 पन्नों की एक जिल्द का हिसाब लगाया जाए, तो सारे डेटा को संकलित करने के लिए तीस हजार से ज्यादा जिल्दों की जरूरत होगी. वे कहां हैं? क्या रामदेव इन सवालों का जवाब देंगे?

वास्तव में, क्या इनमें से कुछ सवालों का जवाब क्या विज्ञापन में ही, उसे विश्वसनीय बनाने के लिए नहीं दिया जाना चाहिए था, खासकर तब जब इसमें किए जा रहे दावों के पहली नजर में ही सही होने की गुंजाइश काफी कम नजर आ रही हो.’

हाल में, जुलाई, 2020 में आयुष मंत्रालय ने खुद पतंजलि आयुर्वेद के इस दावे को खारिज कर दिया था कि उसके द्वारा विकसित ‘कोरोनिल’ नाम का एक पदार्थ कोविड-19 का ‘इलाज’ है. हालांकि मंत्रालय ने पतंजलि आयुर्वेद को इसे कोविड-19 को ‘मैनेज’ करने वाले एक ‘उत्पाद’ के रूप में दोबारा लाने के लिए मजबूर किया.

इसके बाद फरवरी 2021 में नई दिल्ली में हुए एक समारोह में रामदेव ने ‘कोरोनिल’ को ‘कोरोना वायरस के लिए पहली साक्ष्य-आधारित दवाई’ बताया. यह कोविड-19 के खिलाफ प्रभावी होने को लेकर नाममात्र के साक्ष्यों वाली एंटी वायरल दवाइयों को स्वीकृति देने के भारत सरकार की अपनी नीतियों को आड़े हाथों लेने जैसा था, लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया. यहां तक कि तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने भी नहीं, जिन्होंने उस कार्यक्रम में रामदेव के साथ मंच साझा किया था. (कोरोनिल पेपर व्यावहारिक तौर पर अपने आप में निरर्थक था.)

फिर मई, 2021 में, जब भारत नोवेल कोरोना वायरस की दूसरी घातक लहर का सामना कर रहा था, रामदेव और हर्षवर्धन ने राजनीति के रंगमंच पर एक प्रहसन खेला: रामदेव ने एलोपैथी को ‘मूर्खतापूर्ण’ करार दिया. बाद में हर्षवर्धन की शालीन झिड़की के बाद रामदेव को अपनी टिप्पणी वापस लेनी पड़ी.’ अंत में किसी को दंडित नहीं किया गया.

तो आखिर में चल क्या रहा है?

एक अनुमान, जो सभी डेटा की भरपाई कर देता है, यह है कि भाजपा सरकार के परोक्ष सहयोग से रामदेव लगातार अपनी कंपनी के उत्पादों के लिए न्यूनतम साक्ष्यों की सीमारेखा को लगातार नीचे खिसका रहे हैं- और अपने प्रतिद्वंद्वियों के लिए इसे लगातार ऊपर कर रहे हैं. यह हमें फिर से पतंजलि के उस विज्ञापन पर वापस ले आता है.

साक्ष्य

यह विज्ञापन खुलकर साक्ष्य आधारित औषधि को ही अपराधी करार देता है. यहां बहस के इस हिस्से के दो आयाम हैं.

पहला आयाम यह है कि पतंजलि वेलनेस के दावे को जनता के बीच स्वीकृति मिलने का एक कारण यह है कि साक्ष्य आधारित औषधि का साक्ष्य शायद ही कभी सार्वजनिक दायरे में होता है. ऐसा जब होता भी है, तो भी इसे खराब तरीके से संप्रेषित किया जाता है.

यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि साक्ष्य आधारित औषधि पूर्वाग्रहों का अंत करने में सक्षम है. इसमें फायदे के लाचल से जन्म लेने वाले पूर्वाग्रह, जैसा कि पतंजलि वेलनेस के मामले में है, भी शामिल हैं.

भारत ने खासतौर पर साक्ष्यों को महत्वहीन बना देने में किस तरह से मदद की है, इसे दो उदाहरणों से समझा जा सकता है. 2020 में भारत सरकार ने बगैर किसी सबूत को कोविड-19 के इलाज के लिए आइवरमेक्टिन के इस्तेमाल को स्वीकृति दे दी, जबकि कोरोना के खिलाफ इसके प्रभावी होने का कोई साक्ष्य मौजूद नहीं था. बाद में किए गए अध्ययनों में यह पाया गया कि यह कोरोना के खिलाफ काम नहीं करता है. सरकार ने इसे सितंबर, 2021 में अनुमोदित दवाओं की सूची से हटा दिया.

लेकिन इन दो घटनाओं के बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ओर इससे संबंधित संस्थानों ने आइवरमेक्टिन को उपचार प्रोटोकॉल में शामिल रखा और वे इस बात पर जोर देते रहे कि कोविड-19 के खिलाफ इसकी प्रभावशीलता का सबूत मौजूद है. हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के लिए सरकार का प्रेम और भी ज्यादा समझ से परे था.

सरकार ने कोवैक्सीन के साथ भी ऐसी ही स्थिति बना दी: आज तक किसी भी अध्ययन ने इस वैक्सीन के सुरक्षित होने को लेकर शक पैदा करने वाला कोई कारण नहीं पाया है, इसलिए इसके इस्तेमाल में अपने आप में कोई समस्या नहीं है. लेकिन, फिर भी यह तथ्य है कि सरकार ने इस वैक्सीन को जनता को लगाने की इजाजत तब दी जबकि इसके व्यापक स्तर का परीक्षण बस शुरू ही हुआ था ( और ड्रग कंट्रोलर ने बेहद वैज्ञानिक तरीके से वैक्सीन के ‘110 फीसदी सुरक्षित’ होने का दावा किया था.)

इस तरह के दिशाहीन कदम साक्ष्यों को लेकर सिर्फ भ्रम का बीज बोने का ही काम करते हैं कि आखिर साक्ष्य का मतलब क्या है, कौन इसका निर्माण कर सकता है और इसका महत्व कब और क्यों है?

दूसरे उदाहरण का संबंध सरकार द्वारा ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की सामान्य तौर पर की जाने वाली उपेक्षा से संबंधित है. इस बदहाली का खामियाजा सरकार को तब भुगतना पड़ा जब ग्रामीण समुदाय स्वास्थ्यकर्मियों को संदेह की दृष्टि से देखने लगा, क्योंकि वे अचानक कष्ट सहकर भी उनका टीकाकरण करने के लिए गांवों में दस्तक देने लगे थे- जबकि सालों से उनकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं था. (निस्संदेह पोलियो वायरस, बीसीजी और स्मॉल पॉक्स वैक्सीनों ने इस चलन को धता बताने में कामयाबी हासिल की है, लेकिन इस समय वे व्यावहारिक तौर पर किसी और युग की चीज है.)

साक्ष्य आधारित औषधि अनुपयोगी हैं अगर साक्ष्य को सार्वजनिक डोमेन में नहीं रखा जाएगा और उन्हें सटीक, आधिकारिक और संवेदनशील तरीके से पत्रकारों के साथ ही वैज्ञानिकों द्वारा भी सरकार के साथ या स्वतंत्र तरीके से संप्रेषित नहीं किया जाएगा. अगर हम संचार में गड़बड़ी करते हैं या वैज्ञानिक जर्नलों में सबूतों को छिपाते हैं या उसे लोगों को समझ में न आने वाली भाषा में पेश करते हैं, तो साक्ष्य आधारित औषधि का साक्ष्य को तुच्छ बताने वाली परंपराओं की तुलना में महत्व शून्य है. फिर ये दोनों ही शोषणकारी बन जाते हैं – एक आयुर्वेदिक और होमियोपैथी क्लीनिकों में और दूसरा अस्पतालों और निजी क्लीनिकों में.

2-डीजी, फैविपिराविर, आइटोलिजुमैब और विराफिन के उदाहरणों पर विचार कीजिए. इन सभी को उन साक्ष्यों के आधार पर स्वीकृति दी गई थी, जो निश्चित तौर पर सार्वजनिक दायरे में मौजूद ही नहीं थे.

अगर एक डॉक्टर इसे लिखता है, तो हमारे पास उसकी बातों पर भरोसा करने, बिल भरने और भगवान से दुआ करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. अगर दुर्भाग्यजनक तरीके से किसी मित्र या संबंधी की मृत्यु हो जाए, और इसका कारण एक गलत इलाज हो, तो भी हमें इसका कभी पता कैसे चल सकता है? ज्यादा महत्वपूर्ण तरीके से, दवाई निर्माताओं को यह दावा करने से कौन रोक रहा है कि इस मृत्यु का कारण कुछ और था, न कि वह दवाई?

इस चर्चा के दूसरे आयाम का संबंध साक्ष्य आधारित औषधि को लेकर ज्यादा दार्शनिक संदर्भों से है. जुलाई, 2020 के एक आलेख में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्राइमरी केयर हेल्थ साइंसेज की प्रोफेसर तृषा ग्रीनहल्घ ने उन मान्यताओं की पड़ताल की, जो साक्ष्य आधारित औषधि का आधार हैं और और इन साक्ष्य आधारित औषधि के सर्वश्रेष्ठ होने का फैसला करने से पहले मान्यताओं पर सवाल खड़े करने का महत्व बताया. ग्रीनहल्घ के मुताबिक, ‘वैश्विक महामारियों के साथ समस्या यह है कि ये मान्यताएं शायद ही कभी टिक पाती हैं.’

पतंजलि वेलनेस के विज्ञापन के संबंध में गौरतलब बिंदु यह है कि साक्ष्य आधारित औषधि पर हमारा जोर हासिल न किए जा सकने वाली, यहां तक कि अप्रसांगिक, उम्मीदों को जन्म दे सकता है, जो पूरे न होने पर साक्ष्य के महत्व को लेकर हमारी राय में जहर घोल सकते हैं. यह बिंदु तब महत्वपूर्ण हो जाता है, हमारे लिए हमारी सरकार और हमारे स्वास्थ्यकर्मियों से समुचित विकल्प की मांग करने का वक्त आता है.

यह भी अहम है कि रामदेव आदि दरअसल बस छलावे ही के विकल्प पेश कर रहे हों: एलोपैथिक औषधियां साक्ष्य आधारित हैं (या हो सकती हैं), लेकिन यह एक परीक्षण से गुजरी हुई और विनियमित औषधि भी हैं जबकि यही बात पतंजलि वेलनेस की औषधि के बारे में नहीं कही जा सकती है.

दलीलें

2014 में नरेंद्र मोदी के साथ रामदेव. (फोटो: रॉयटर्स)

पतंजलि वेलनेस जैसे एंटरप्राइजों के फलने-फूलने के पीछे क्रोनी कैपिटलिज़्म (सांठ-गांठ वाले पूंजीवादका हाथ है, लेकिन इसका एक कारण यह भी है कि वे भारत सरकार का सार्वजनिक स्वास्थ्य, खासकर ग्रामीण केंद्रों में, उदासीन ही नहीं कई बार अवमानना से भरे बर्ताव का फायदा उठा पाने में सफल रहे हैं.

सरकारी उपेक्षा के साए तले, जहां लोग गरीबी के खतरे से से दो-चार या उससे पीड़ित हैं, और क्लीनिकल ट्रायल, फेज-4 अध्ययन, या कोल्ड चेन के अर्थ को समझ पाने में अक्षम हैं, एक अखबार में डायबिटीज का निदान करने का दावा लोगों को जरूर आकर्षित करेगा- खासकर जब यह दावा प्राचीन ज्ञान से जोड़कर किया जा रहा हो.

यहां यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि ये मसले पतंजलि वेलनेस और इसके रद्दी विज्ञापन को बरी नहीं करते हैं. थोड़ा समय बीतने दीजिए. जिस एलोपैथिक औषधि का मजाक बनाना रामदेव एंड कंपनी को इतना पसंद है, उन्हें ही उन लोगों का जवाब देना होगा, जिनकी सेहत उचित इलाज में देरी करने के कारण बिगड़ जाएगी.

तमिल सिनेमा के प्रसिद्ध हास्य अभिनेता गोंडामणि ने एक पुरानी फिल्म में तमिलनाडु में शराब पीने को लेकर एक काफी प्रासंगिक टिप्पणी की: ‘भारत में सिर्फ आठ कंपनियां अल्कोहलिक पेय बनाती हैं. अगर हमारे नेता ठान लें और इन कंपनियों से उत्पादन बंद करने के लिए कहें, तो हम मद्यपान की आदत को खत्म कर सकते हैं. लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे. इसकी जगह वे जनता के पास जाएंगे और उनसे एक-एक करके शराब न पीने की विनती करेंगे.’

हो सकता है, गोंडामणि के दुनिया को देखने के नजरिये में व्यवहारपक बदलावों और संतुलन को जगह नहीं दी गई हो, लेकिन पतंजलि वेलनेस के इश्तिहार के मामले पर यह सटीक तरीके से लागू होता है. इस विज्ञापन को तैयार करने वाले और इसे प्रकाशित करने वाले, दोनों ही बदनीयती के साथ काम कर रहे हैं. वैज्ञानिकों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कर्तव्य है कि वे इस पर सवाल उठाएं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)