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आज़ादी या बंटवारा: ये वो सहर तो नहीं, जिसकी आरज़ू लेकर चले थे…

आज़ादी ने हमें लोकतंत्र दिया, जबकि नस्लीय राष्ट्रवाद का परिणाम बंटवारा था, जिसने अपने पीछे खून से लथपथ सांप्रदायिक हिंसा के निशान छोड़े. बेशक राष्ट्रवाद अच्छा है- लेकिन इसने नस्लीय अल्पसंख्यकों, कमज़ोरों और जिन्हें यह अपने यहां का नहीं मानता है, के लिए ख़तरे खड़े किए हैं.

(फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

राष्ट्रवाद के इर्दगिर्द प्रचार इन दिनों चरम पर है. नेता हमें बताते हैं कि हमारे घरों में 15 अगस्त से पहले और उसके बाद के दिनों में राष्ट्रीय ध्वज अवश्य ही फहराना चाहिए और कुछ का सुझाव है कि हमें स्वतंत्रता की वर्षगांठ पर एक विशेष समय पर इसे लहराना चाहिए.

एक आदर्श लोकतांत्रिक समाज में सरकारें सपने में भी नागरिकों को यह बताने की नहीं सोचेंगी कि सामान्य दिनों में कैसे बर्ताव करना है और विशेष रूप से औपचारिक अवसरों पर वे क्या करें. लोकतांत्रिक सरकारें नागरिकों के जीवन को नियंत्रित नहीं करती हैं. उनका काम जीने योग्य जीवन की के लिए विभिन्न  मानकों पर माकूल माहौल तैयार करना है, जैसे नागरिक स्वतंत्रता, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, आय पैदा करने वाली योजनाएं, आवास और मनोरंजन.

लोगों को उनके जीवन को सार्थक बनाने के लिए स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए. यदि उनमें सरकार बनाने के लिए ‘ये’ या ‘वो’ राजनीतिक दल चुनने की परिपक्वता और क्षमता है, तो निश्चित रूप से हमारी स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ पर उनके उचित तरह से देशभक्त होने के बारे में भी भरोसा किया जा सकता है. हम अपने देश से प्यार करते हैं, लेकिन हम स्वतंत्रता दिवस मनाने के किसी भी व्यवस्थित तरीके पर बारे में संदेह कर सकते हैं. इस संदेह के कारण हैं.

राष्ट्रवाद और विशेष रूप से, अति-राष्ट्रवाद की मांगें हमेशा लोकतंत्र में नागरिकों के अधिकारों के अनुरूप नहीं होतीं. हमारे इतिहास को याद करें. आज 15 अगस्त 2022 को हमारी आजादी की 75वीं वर्षगांठ है, लेकिन यह वह दिन भी है जब भारत का विभाजन हुआ था. यह दिन विभाजन, जिसने नई खींची गई सीमाओं के दोनों ओर सामूहिक बलात्कार, नरसंहार, मौत और विनाश के रूप में भयानक नतीजे दिए, की यादों को ताजा करता है.

जैसे ही 14-15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि का समय हुआ, जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में नए मंत्रालय के सदस्य संविधान सभा के हॉल में एक साथ आए. वह क्षण राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण और बेहद उत्साहपूर्ण था. इससे अलग कुछ नहीं हो सकता था; भारत आखिरकार आजाद हुआ! सैकड़ों की संख्या में लोग बाहर सड़कों पर जमा होने लगे. हालांकि दिल्ली का माहौल उदासी से भर गया. हजारों शरणार्थी शहर में आ गए थे और शिविरों में रह रहे थे या सड़कों पर डेरा डाले हुए थे.

फिर भी जैसे-जैसे आजादी का समय नजदीक आया, भीड़ नेहरू और गांधी की जय-जयकार करने लगी. आज़ादी के समय गांधी दिल्ली में नहीं थे और उन्होंने किसी समारोह में भाग नहीं लिया. वह कलकत्ता में थे, अपने तरीके से लोगों में समझदारी वापस लाने के लिए बहादुरी से लड़ रहे थे. उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सद्भाव के लिए प्रार्थना और अपील जारी रखीं. यह जानते हुए कि देश आजादी का जश्न मना रहा था, गांधी के लिए 14 की रात और 15 अगस्त की भोर विभाजन का प्रतिनिधित्व करती थी. वही बंटवारा, जिसके खिलाफ उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया था. यह घातक द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर दो समुदायों के बीच खड़े किए गए धार्मिक संघर्ष के चरम का प्रतीक है.

उस समय के अन्य संवेदनशील लोगों ने भी इसकी पीड़ा साझा की. 20वीं सदी के महान उर्दू शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने विभाजन की हिंसा के दर्द को कुछ यूं दर्ज किया:

ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त-मौज का साहिल
कहीं तो जा के रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म दिल

दिल के कुछ ऐसे कोने होते हैं जहां एक शायर के अलावा शायद ही कोई पहुंच सकता है. फ़ैज़ के अलावा और कोई नहीं लिख सकता था उस धुंधली सुबह के बारे में, जो आज भी रात के अंधेरे में डूबी हुई है. वो दुख जताते हैं कि सोचा था कि कहीं न कहीं हमें सफर की मंज़िल मिलेगी. वो साहिल, जहां दर्द-भरे मन राहत पा सकेंगे लेकिन वो सुबह नहीं आई है. 75 साल बाद भी कविता आज भी हमारे दिलों को छूती है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

दिल्ली में संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू ने आधी रात से अपनी सामान्य सुरुचिपूर्ण शैली और सुंदर भाषा में प्रसिद्ध ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ भाषण दिया, जो दुनिया के सबसे प्रसिद्ध भाषणों में से एक है. आज़ादी का स्वागत करते हुए उनके शब्दों में उत्साह और आशा की भावना थी, जिसका सपना कई पीढ़ियों ने देखा था और इसके लिए संघर्ष किया था. पर जश्न के दूसरी तरफ स्वतंत्रता के अंधेरे में क्रूर हिंसा भी छिपी हुई थी जो ब्रिटिश झंडे के तिरंगे में बदले जाने से पहले ही भड़क उठी थी.

भारतीय औपनिवेशिक शासन से मुक्त हो गए और 26 जनवरी 1950 को एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के नागरिक बन गए. लेकिन धार्मिक राष्ट्रवाद की छाया, जिसने दिल, दिमाग और सीमाओं को बांट दिया था, ने इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ा. नेहरूवादी नीतियों में सांप्रदायिकता थी. उनकी मृत्यु के बाद कुछ वर्षों के भीतर सांप्रदायिकता, जो धार्मिक राष्ट्रवाद का उग्र रूप है, ने भारतीय राजनीति को अपने वश में कर लिया.

हमें बंटवारे से सबक लेना चाहिए था. हर अच्छी दवा की तरह राष्ट्रवाद को भी थोड़ी मात्रा में दिया जाना चाहिए. इसकी अति लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों- व्यक्तिगत अधिकार, स्वतंत्रता, समानता और न्याय को नष्ट कर सकती है. इसके नतीजे सांप्रदायिकता, जातीय युद्ध, नस्लवाद, रोज़मर्रा के भेदभाव और अंततः किसी त्रासदी के रूप में सामने आ सकते हैं. हम अपने आसपास की दुनिया में ऐसा होते देख रहे हैं. लोकतंत्र उदार राष्ट्रवाद के साथ ही चल सकता है, नस्लीय राष्ट्रवाद के साथ नहीं.

बेशक राष्ट्रवाद अच्छा है. यह हम में एक ऐसे समुदाय से जुड़े होने की भावना देता है जो एक ही राष्ट्रीय ध्वज को आदर करता है, एक राष्ट्रगान को इज़्ज़त देता है, वही समुदाय, जो साथी नागरिकों के बारे में सोचता है कि वे सब संवैधानिकता और क्षेत्रीयता के एक धागे से बंधे हैं, वो समूह, जिसकी एक ही पहचान है. कोई भी समाज केवल कानून के दायरे में नहीं रह सकता. कानून एक कठिन चीज है. समाज को केवल अपनेपन, एकजुटता की भावना और दूसरों को एक ही राष्ट्रीय समुदाय के सदस्य होने की मान्यता के आधार पर एक साथ लाया जा सकता है.

फिर भी राष्ट्रवाद ने जातीय अल्पसंख्यकों, उन लोगों, जिन्हें यह संबंधित नहीं मानता और कमजोर लोगों के लिए खतरे भी पैदा किए हैं. समस्या तब होती है जब राष्ट्रवाद ऐसी परियोजना से जुड़ा हो (1) जहां उसके अपने राज्य की अवधारणा में किसी और के लिए जगह ही न हो, (2) या इसे वैधता देने वाली ऐसी विचारधारा से संबद्ध हो जो अपनी ही समझ और औचित्य को ऊपर रखे. राष्ट्रवाद प्रगतिशील हो सकता है जैसा यह उपनिवेशवाद के दौर में था. लेकिन राष्ट्रवाद चालाकी भरा, शोषक और अस्वीकार करने वाला भी हो सकता है. यह निर्भर करता है कि हम किस प्रकार के राष्ट्रवाद की बात कर रहे हैं.

उदार राष्ट्रवाद और नस्लीय राष्ट्रवाद के बीच अंतर को हैंस कोह्न ने 1955 में ‘नेशनलिज़्म: इट्स मीनिंग एंड हिस्ट्री’ में बताया था. उन्होंने तर्क दिया कि क्षेत्रीय आधारित उदार राष्ट्रवाद, नस्लीय राष्ट्रवाद से गुणात्मक रूप से भिन्न है. उदार राष्ट्रवाद मुख्य रूप से इंग्लैंड, अमेरिका और फ्रांस में सरकारी शक्ति को सीमित करने और नागरिक अधिकारों को सुरक्षित करने वाले एक राजनीतिक आंदोलन का प्रतिनिधित्व करता है. नस्लीय राष्ट्रवाद, जो बाद में जो बाद में मध्य और पूर्वी यूरोप और एशिया में उभरा, के सामयिक और स्थानिक संदर्भ अलग थे. नस्लीय राष्ट्रवाद इस बात पर टिका है कि कोई समुदाय खून के रिश्तों और हैसियत आधारित संबंधों के आधार पर साथ जुड़ा होता है.

1990 के दशक में जब नस्लीय-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने पूर्वी यूरोप में फिर से अपना कुरूप सिर उठाया; जब अन्य देशों के साथ पूर्व में यूगोस्लाविया और बोस्निया में नस्लीय सफाया और नरसंहार देखने को मिला, तब माइकल इग्नाटिफ़ ने 1994 में ‘ब्लड एंड बिलॉन्गिंग’ में दोहराया कि उदार राष्ट्रवाद अपनेपन पर आधारित हैं; नस्लीय राष्ट्रवाद खून पर.

शायद इस तरह की बाइनरी तय करके अंतर बताना अतिश्योक्ति लग सकता है. भारत का ही उदाहरण लेते हैं. 1933 में जवाहरलाल नेहरू में बॉम्बे क्रॉनिकल में एक आलेख लिखा, ‘भारत किस ओर जा रहा है? निश्चित तौर पर सामाजिक और आर्थिक समानता के महान मानवीय लक्ष्यों की ओर, राष्ट्र द्वारा राष्ट्र के, वर्ग द्वारा वर्ग के सभी शोषण को खत्म करने और एक अंतरराष्ट्रीय सहकारी समाजवादी वैश्विक फेडरेशन के ढांचे के तहत राष्ट्रीय स्वतंत्रता की तरफ.’ अन्य नेताओं ने अपने सपनों को अपने धार्मिक समुदाय के इर्दगिर्द केंद्रित किया और उनकी राष्ट्र की कल्पना अपनी नस्लीय पहचान की राजनीतिक अभिव्यक्ति के अलावा और कुछ नहीं थी. नागरिकता के सपनों के इर्दगिर्द और इसके भीतर नस्लीय राष्ट्रवाद लोकतांत्रिक सोच को खत्म करता है.

उदार और साथ ही नस्लीय और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, एक ही क्षेत्र और लगभग एक ही समय पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के प्रतिरोध में ही उभरे. एक ने नागरिकता और अधिकारों की बात सबसे जरूरी समझी, तो दूसरे के लिए जन्म, साझा इतिहास, रिवाज, सांस्कृतिक और धार्मिक जुड़ाव महत्वपूर्ण था. विभाजन ने इसी नस्लीय राष्ट्रवाद की उदार राष्ट्रवाद पर जीत को स्थापित कर दिया.

आज़ादी ने हमें लोकतंत्र दिया, जबकि नस्लीय राष्ट्रवाद का परिणाम बंटवारा था, जिसने अपनी पीछे खून से लथपथ सांप्रदायिक हिंसा के निशान छोड़े. भारत का स्वतंत्रता पाने का लम्हा खौफनाक हिंसा से जुड़ा है. हिंसा मानो इस महान देश को बपौती के तौर पर सौंपी गई थी. कुटिल नेताओं द्वारा कभी हमारे पड़ोसियों तो कभी हमारे अपने नागरिकों के खिलाफ आवेश उपजाने के लिए विभाजन के दर्द को समय-समय पर कुरेदकर नया कर दिया जाता है.

नस्लीय राष्ट्रवाद लोगों के साथ यही करता है. यह उन लोगों को न सिर्फ पीड़ित बल्कि पीड़ा देने वालों में तब्दील कर देता है, उनके साथ अत्याचार हो रहा है, लेकिन वो खुद भी वही कर रहे हैं, वे उत्पीड़ित भी होते हैं, और उत्पीड़क भी. ऐसी मूर्खतापूर्ण हिंसा के लंबे दौर में हिंसा करने वालों और इस क्रूरता से तबाह हो गए लोगों में अंतर करना मुश्किल हो जाता है. राष्ट्रवाद लगातार उस लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नष्ट करता है जो समान अधिकार और न्याय पर टिकी होती है और जो उन कारकों के आधार पर भेदभाव को रोकती है जिन्हें नियंत्रित नहीं किया जा सकता, जैसे कि किसी विशेष समुदाय में जन्म लेना.

लोकतंत्र धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से धर्म की राजनीति और सत्ता-लोलुप राजनीति को जमीन देता है. इस प्रक्रिया में धर्म को चुनावी जीत की रणनीति के तौर पर इस्तेमाल कर ओछा बना दिया जाता है. धर्म का राजनीतिकरण समझदारी को कम, एकजुटता को सीमित और राजनीति को कमजोर करता है.

और यह केवल भारत की बात नहीं है. फ्रांस में जहां आजादी को दृढ़ता से नागरिक अधिकारों और लोकप्रिय संप्रभुता के साथ जोड़ा गया था, वहां कुछ ही दशकों में ‘नागरिक’ की अवधारणा राष्ट्र के एक संशोधित सांस्कृतिक संस्करण में बदल गई. एरिक हॉब्सबॉम ने 1990 में ‘नेशंस एंड नेशनलिज़्म सिंस 1780: मिथ, रियलिटी’ में लिखा है कि देशभक्ति का मूल, क्रांतिकारी-लोकप्रिय विचार राष्ट्रवादी के बजाय सरकार (या राज) आधारित था. हॉब्सबॉम कहते हैं कि फिर भी, थोड़े ही समय में लोकतांत्रिक क्रांतियों ने लोकलुभावन चेतना पैदा की, जिसे राष्ट्रीय, यहां तक कि अतिराष्ट्रवादी देशभक्ति से अलग करना मुश्किल था.

जब आप्रवासियों की बात आती है तो फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन की आबादी राष्ट्रवादी, नस्लवादी और अस्वीकार करने वाली साबित हुई है. यह पूर्वाग्रह और कुछ नहीं बल्कि उस गहरे विश्वास की सतही अभिव्यक्ति है कि कुछ लोग राष्ट्र से जुड़े हैं, जबकि अन्य नहीं जुड़े हैं, भले ही वे वहीं पैदा हुए हों. जब उन लोगों की बात आती है, जिन्हें बाहरी समझा जाता है, तब सभी राष्ट्रवाद अतिराष्ट्रवाद (अंधराष्ट्रवाद कहना भी गलत नहीं होगा) की भयावह प्रवृत्ति दिखाते हैं. हमें विनियमित नस्लीय राष्ट्रवाद के प्रभावों को लेकर सावधान रहना चाहिए. क्योंकि अतिराष्ट्रवाद और सरकारी ताकत को साथ लाने का नतीजा संकीर्ण और असहिष्णु हो जाने के रूप में सामने आता है. अतिराष्ट्रवाद के प्रभाव में लोकतांत्रिक सपने कहीं पीछे छूट जाते हैं. एक नागरिक और मनुष्य बतौर भी हम कमतर होते जाते हैं.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाती हैं.)

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