प्रासंगिक

भगत सिंह: वो चिंगारी जो ज्वाला बनकर देश के कोने-कोने में फैल गई थी…

अगस्त 1929 में जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर में हुई एक जनसभा में उस समय जेल में भूख हड़ताल कर रहे भगत सिंह और उनके साथियों के साहस का ज़िक्र करते हुए कहा कि ‘इन युवाओं की क़ुर्बानियों ने हिंदुस्तान के राजनीतिक जीवन में एक नई चेतना पैदा की है… इन बहादुर युवाओं के संघर्ष की अहमियत को समझना होगा.’

(फोटो साभार: फेसबुक/alanizart)

‘वे सभी बहुत कमजोर हो चुके थे और बिस्तर पर पड़े थे. भगत सिंह ख़ूबसूरत व्यक्तित्व और बौद्धिक मिज़ाज वाले थे, बिल्कुल धीर-गंभीर और शांत. उनमें ग़ुस्से का लेशमात्र भी नहीं था. वे बड़ी विनम्रता से बातें कर रहे थे. जतिन दास तो और भी कोमल, शांत और विनम्र लगे. हालांकि तब वे गहरी पीड़ा में थे.’

ये जवाहरलाल नेहरू के शब्द हैं. जो उन्होंने अगस्त 1929 में लाहौर जेल में भूख हड़ताल कर रहे भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों से हुई अपनी पहली मुलाक़ात की याद करते हुए अपनी आत्मकथा में लिखे हैं.

इससे वर्ष भर पहले जुलाई 1928 में ‘किरती’ पत्रिका में भगत सिंह ने एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस के विचारों की तुलना की थी.

इन दोनों राष्ट्रवादी नेताओं के बारे में भगत सिंह अपने उक्त लेख में लिखते हैं कि ‘यही दो नेता हिंदुस्तान में उभरते नज़र आ रहे हैं और युवाओं के आंदोलन में विशेष रूप से भाग ले रहे हैं. दोनों ही हिंदुस्तान की आज़ादी के कट्टर समर्थक हैं. दोनों ही समझदार और सच्चे देशभक्त हैं.’

सुभाष चंद्र बोस और नेहरू के विचारों की तुलना करते हुए भगत सिंह ने महाराष्ट्र और पंजाब में आयोजित विभिन्न राजनीतिक अधिवेशनों में दिए गए इन दोनों नेताओं के भाषणों और अन्य वक्तव्यों का विश्लेषण प्रस्तुत किया. इसी लेख के आख़िर में पंजाब के नौजवानों के सामने अपना निष्कर्ष रखते हुए भगत सिंह ने लिखा:

सुभाष आज दिल को कुछ भोजन देने के अलावा कोई दूसरी मानसिक ख़ुराक नहीं दे रहे हैं. आवश्यकता इस बात की है कि पंजाब के नौजवानों को इन युगांतकारी विचारों को खूब सोच-विचारकर पक्का कर लेना चाहिए. इस समय पंजाब को मानसिक भोजन की सख़्त ज़रूरत है और यह जवाहरलाल नेहरू से ही मिल सकता है. इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके अंधे पैरोकार बन जाना चाहिए. लेकिन जहां तक विचारों का संबंध है, वहां तक इस समय पंजाबी नौजवानों को उनके साथ लगना चाहिए, ताकि वे इंक़लाब के वास्तविक अर्थ, हिंदुस्तान में इंक़लाब की ज़रूरत, दुनिया में इंक़लाब का स्थान क्या है, आदि के बारे में जान सकें.

नौजवान भारत सभा और पंजाब में गिरफ़्तारियों का दौर

साइमन कमीशन का विरोध करने के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में बुरी तरह घायल होने वाले राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय की नवंबर 1928 में मृत्यु के बाद भगत सिंह और उनके साथियों ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की हत्या करके लिया. दिसंबर 1928 में सांडर्स की हत्या के बाद पंजाब में अंग्रेज़ी राज का दमन-चक्र तेज़ी से चला.

पंजाब के निर्दोष नौजवानों को पुलिस द्वारा गिरफ़्तार कर बुरी तरह से प्रताड़ित किया जाने लगा. इन युवाओं में नौजवान भारत सभा के सदस्य भी शामिल थे, जिसकी स्थापना भगत सिंह और उनके साथियों ने की थी.

नौजवान भारत सभा के सदस्यों की गिरफ़्तारी का विरोध करते हुए जनवरी 1929 में दिए अपने एक बयान में जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि पंजाब में हो रही गिरफ़्तारियों को लेकर प्रेस में आ रही ख़बरें चिंताजनक हैं. जांच और खोजबीन के नाम पर पंजाब पुलिस द्वारा युवा कार्यकर्ताओं, ख़ासकर नौजवान भारत सभा के सदस्यों को प्रताड़ित किया जा रहा है.

नेहरू ने चुनौती भर स्वर में ‘द सर्चलाइट’ में छपे इस संदेश में कहा था:

जितना मैं नौजवान भारत सभा और उसके सदस्यों को जानता हूं, पुलिस चाहे कितना भी दमन या आतंक फैलाने की कोशिश कर ले, वह उन नौजवानों की ललक और देशभक्ति को डिगा नहीं सकती. वे बहादुर लोग हैं, जिन्हें अपने कार्यों के परिणाम का अंदाज़ा बख़ूबी है और वे उससे डरते नहीं.

उन्हें बाहर से हिम्मत या दिलासा की ज़रूरत नहीं, लेकिन वे नौजवान निश्चिंत रहें कि हिंदुस्तान के लोगों की संवेदना उनके साथ है और वे उनकी हरसंभव मदद करेंगे. मुझे भरोसा है कि नौजवान भारत सभा जीवंत बनी रहेगी और अधिक मज़बूत होकर भारतीय राष्ट्र के निर्माण में भागीदारी करेगी.

क्रांतिकारियों की भूख हड़ताल और न्याय का मखौल

जब जुलाई 1929 में जेल में बंद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अपने दूसरे साथियों के साथ राजनीतिक बंदियों के लिए बुनियादी सुविधाओं की मांग करते हुए भूख हड़ताल शुरू की. तब नेहरू ने भी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की इस हड़ताल का समर्थन किया था. नेहरू ने 5 जुलाई, 1929 को दिए अपने संदेश में, जो ‘द ट्रिब्यून’ में छपा था, कहा:

‘लगभग बीस दिनों से वे लोग किसी भी तरह का भोजन नहीं कर रहे और मुझे यह भी मालूम हुआ है कि उन्हें ज़बरदस्ती खिलाने की कोशिशें भी की जा रही हैं. इन दोनों नौजवानों ने भले ही ग़लत रास्ता चुना हो, मगर कोई भी हिंदुस्तानी उनके अप्रतिम साहस की सराहना करने से ख़ुद को रोक नहीं सकता. वे जिस कष्ट से गुजर रहे हैं, उससे हमारा हृदय व्यथित है. वे किसी निजी स्वार्थ के लिए बल्कि सभी राजनीतिक बंदियों की भलाई के लिए ये भूख हड़ताल कर रहे हैं. हम गहरी चिंता के साथ उनकी इस मुश्किल घड़ी पर निगाह रखे हुए हैं और हमें पूरी उम्मीद है कि हमारे ये बहादुर भाई इन मुश्किलों पर जीत ज़रूर हासिल करेंगे.’

भगत सिंह और उनके साथियों के जेल में ही नहीं अदालत में भी दुर्व्यवहार किया जा रहा था. अदालत में जज के सामने पुलिस द्वारा उन्हें मारा जा रहा था और इस तरह न्याय का खुला मज़ाक़ बनाया जा रहा था. भगत सिंह के साथियों पर हो रही ज़्यादती का ज़िक्र नेहरू ने ब्रिटिश राजनयिक रेजिनाल्ड ब्रिजमैन को 23 जुलाई 1929 को लिखे अपने ख़त में किया.

नेहरू ने लिखा था कि लाहौर षड्यंत्र मामले में अभियुक्तों को अदालत में भी हथकड़ी पहनाए रखी जा रही है, पुलिस के लोग उन्हें अदालत में खुलेआम मारते-पीटते हैं और यह सब देखते हुए जज (न्यायाधीश) मुंह फेर लेते हैं. नेहरू ने यह भी लिखा कि जब इस मामले की सुनवाई को उस मजिस्ट्रेट की अदालत से दूसरी अदालत में ले जाने की अपील डाली गई, तो उस अपील को भी ख़ारिज कर दिया गया.

यही नहीं, उस पत्र में नेहरू ने लाहौर के आम नौजवानों पर पुलिस द्वारा किए जा रहे अत्याचार और बर्बरतापूर्ण कार्रवाइयों का भी उल्लेख किया. और यह भी बताया कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की भूख हड़ताल छह हफ़्तों से चल रही है.

हफ़्ते भर बाद ही 1 अगस्त 1929 को नेहरू ने एक ऐसा ही पत्र ब्रिटिश समाजवादी नेता फेनर ब्रॉकवे को लिखा, जिसमें नेहरू ने भगत सिंह और उनके साथियों की भूख हड़ताल, अदालत और जेल में उनके साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार का मार्मिक ब्योरा दिया था.

भगत सिंह और उनके साथियों से नेहरू की मुलाक़ात

जब भूख हड़ताल से हुई कमजोरी के कारण भगत सिंह और उनके साथियों का अदालत में उपस्थित हो सकना संभव न रहा. तब अंग्रेज़ी हुक़ूमत ने अदालत में सुनवाई की तारीख़ को आगे बढ़ाने की बजाय एक ऐसा क़ानून बनाया, जिसमें क्रांतिकारियों या उनके वकीलों की गैर-मौजूदगी में भी अदालत को कार्यवाही जारी रखने का अधिकार मिल गया.

उसी दौरान 8 अगस्त 1929 को नेहरू ने लाहौर की सेंट्रल जेल और बोर्स्टल जेल में भूख हड़ताल कर रहे भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, जतिंद्र नाथ दास और अन्य क्रांतिकारियों से मुलाक़ात की थी. भूख हड़ताल करने वाले क्रांतिकारियों को जेल प्रशासन द्वारा पाइप से नाक में जबरन दूध पिलाने की कोशिशें की जा रही थीं, ऐसा करते हुए विरोध करने वाले क्रांतिकारियों को बुरी तरह मारा-पीटा जाता. इसका असर क्रांतिकारियों के स्वास्थ्य पर ख़तरनाक ढंग से पड़ रहा था.

नेहरू ने इस मुलाक़ात के बाद दिए अपने वक्तव्य में साफ़ कहा कि ‘जेल प्रशासन द्वारा भूख हड़ताल कर रहे बंदियों को ज़बरदस्ती खिलाने या दूध पिलाने की कोशिशों का बुरा असर उन पर पड़ा है. अगर यही हालात रहे तो उनका अधिक समय तक बच पाना मुश्किल है. वे हर रोज़ धीरे-धीरे मर रहे हैं और त्रासदी का क्षण अब अधिक दूर नहीं है.’

इन बहादुर क्रांतिकारियों से मिलना और उनके कष्टों का साक्षी बनना नेहरू के लिए एक पीड़ादायक अनुभव था. नेहरू ने कहा कि ‘मुझे मालूम है कि वे लोग अपने प्रण पर दृढ़ बने रहेंगे, चाहे उसका नतीजा कुछ भी हो. उन्हें अपनी जान की ख़ास परवाह नहीं. वे भविष्य में अपनी किसी सुविधा के लिए ये भयावह कष्ट नहीं उठा रहे. वे यही मानते हैं कि भारत में राजनीतिक बंदियों की हालत ठीक नहीं है और उसमें सुधार होना चाहिए.’

‘द ट्रिब्यून’ में छपे इस वक्तव्य में नेहरू ने शिव वर्मा, अजय कुमार घोष और जयदेव की स्थिति को गंभीर बताया था. लेकिन नेहरू ने सबसे ज़्यादे चिंता जतिंद्रनाथ दास की हालत पर जताई. और कहा कि ‘वे बहुत कमज़ोर थे और आसानी से चल-फिर नहीं पा रहे थे. वे फुसफुसाकर ही बातें कर पा रहे थे. वे गहरी पीड़ा में थे और मानो मृत्यु के हाथों मुक्ति पाने की प्रतीक्षा कर रहे थे.’

अगले ही दिन यानी 9 अगस्त 1929 को नेहरू ने लाहौर में एक जनसभा को संबोधित किया. इसमें नेहरू ने भूख हड़ताल कर रहे भगत सिंह और उनके साथियों की क़ुर्बानी की चर्चा करते हुए देश की ख़ातिर अपार कष्ट उठाने के उनके अप्रतिम साहस की सराहना की.

इसी क्रम में, नेहरू ने लोगों से इन क्रांतिकारियों की क़ुर्बानियों से प्रेरणा लेते हुए आज़ादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का आह्वान किया. नेहरू ने कहा कि ‘इन युवाओं की क़ुर्बानियों ने हिंदुस्तान के राजनीतिक जीवन में एक नई चेतना पैदा की है और हम सभी में एक बार फिर देश की आज़ादी की चाह जगा दी है. हमें इन बहादुर युवाओं के संघर्ष की अहमियत को समझना होगा.’

नेहरू ने कहा कि ये देशभक्त नौजवान अपनी इस क़ुर्बानी के बदले में कोई सम्मान या प्रतिष्ठा नहीं चाहते. वे बस भारत में राजनीतिक बंदियों की स्थिति में सुधार चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने अपनी ज़िंदगी दांव पर लगा दी है. इसकी तुलना नेहरू ने कांग्रेस में पद के लिए होने वाली खींचतान से की और इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया. नेहरू ने कहा कि कांग्रेस के भीतर पद को लेकर होने वाली आंतरिक कलह उन्हें शर्मसार कर देती है.

नेहरू अपनी आत्मकथा में भगत सिंह और उनके साथियों के साहसिक कृत्य और उनकी जनप्रियता के संदर्भ में लिखते हैं कि अपनी क़ुर्बानियों की वजह से भगत सिंह एक प्रतीक बन गए और कुछ ही महीनों में पंजाब और शेष उत्तर भारत में उनका नाम गूंंजने लगा. बक़ौल नेहरू, भगत सिंह के जीवन और उनके साहस और बलिदान को याद करते हुए असंख्य गीत भारतीय भाषाओं में रचे गए और आम लोगों के दिलों में उन्होंने सदा के लिए जगह बना ली.

बाद में, 63 दिनों की लंबी भूख हड़ताल के बाद क्रांतिकारी जतिंद्रनाथ दास शहीद हो गए थे. जतिन दास की इस क़ुर्बानी से देश भर में सनसनी फैल गई. उनकी मौत ने देश में राजनीतिक बंदियों के सवाल को सामने ला दिया. जतिन दास की शहादत से उपजे जनाक्रोश को देखते हुए अब इस मसले की और उपेक्षा करना अंग्रेज़ी हुकूमत के लिए संभव न रहा.

आख़िरकार सरकार ने औपचारिकता निभाते हुए राजनीतिक बंदियों के प्रश्न पर विचार करने के लिए एक समिति बनाई,जिसने कुछ नए प्रावधान सुझाए और क़ैदियों को तीन वर्गों में बांटा. लेकिन समिति के इन सुझावों से राजनीतिक बंदियों की वस्तुस्थिति में कोई बदलाव नहीं आया और उनकी स्थिति असंतोषजनक बनी रही.

इस दौरान ख़ुद जवाहरलाल नेहरू 14 अप्रैल 1930 से लेकर 11 अक्टूबर 1930 तक नैनी सेंट्रल जेल में बंद रहे. ग़ौरतलब है कि रिहा होने के अगले ही दिन यानी 12 अक्टूबर 1930 को इलाहाबाद में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए नेहरू ने भगत सिंह और उनके साथियों की चर्चा करते हुए कहा कि ‘मैं भगत सिंह से सहमति रखूं या न रखूं, मेरा दिल भगत सिंह के साहस और उनके आत्म-बलिदान के लिए सम्मान और प्रशंसा से भरा हुआ है. भगत सिंह जैसे साहसी कोई बिरले ही होते हैं. अगर यह वाइसराय ये सोचते हैं कि हम इस अतुलनीय साहस और उसके पीछे के महान उद्देश्य की सराहना न करें, तो वे ग़लत हैं.’

उल्लेखनीय है कि इस जनसभा के सप्ताह भर बाद ही 19 अक्टूबर 1930 को नेहरू पुनः गिरफ़्तार कर लिए गए और फिर वे तीन महीने बाद 26 जनवरी 1931 को रिहा हुए.

भगत सिंह की शहादत

दो महीने बाद 23 मार्च 1931 भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई. इन शहीदों के बलिदान से दुखी राष्ट्र की भावना को शब्द देते हुए नेहरू ने अगले दिन दिए अपने वक्तव्य में कहा था कि ‘हम सभी उस शख़्स को बचा नहीं सके, जो हमें इतना प्यारा था, जिसकी बहादुरी और क़ुर्बानी ने हिंदुस्तान के नौजवानों को प्रेरणा दी. आज भारत अपने प्यारे बच्चों को फांसी के तख़्ते से नहीं बचा पा रहा.’

नेहरू ने कहा कि हिंदुस्तान में हर जगह भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दिए जाने के विरोध में हड़ताल और शोक-सभाएं होंगी, जिसमें हिंदुस्तान की असहाय अवस्था का दुख होगा, लेकिन उन शहीदों पर गर्व भी होगा. नेहरू ने ज़ोर देकर कहा कि ‘जब भी इंग्लैंड हमसे समझौते की बात करेगा, तब भगत सिंह की लाश हमारे बीच होगी.’ नेहरू का यह वक्तव्य ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ में छपा था.

कराची कांग्रेस में 29 मार्च 1931 को दिए अपने भाषण में भगत सिंह और उनके साथियों को याद करते हुए नेहरू ने उन शहीदों की अतुलनीय क़ुर्बानी को याद किया. हिंसा के प्रश्न पर नेहरू ने कहा कि हमने हमेशा ही हिंसा के रास्ते को नकारा है और आगे भी नकारेंगे. उनके रास्ते अलग भले ही रहे हों, लेकिन जवाहरलाल नेहरू भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों के प्रति गहरा सम्मान भाव रखते थे.

भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दिए जाने की ख़बर ने नेहरू को कितना निराश किया, इसके बारे में नेहरू ने कहा कि ‘हमें उम्मीद थी कि सरकार जनता की मांग को सुनेगी, मगर उसने ठीक उसका उल्टा किया. इससे हम दुखी और निराश हैं.’ भगत सिंह के बारे में नेहरू ने भावपूर्ण शब्दों में कहा था:

वे एक बेदाग़ योद्धा थे, जिन्होंने अपने शत्रु का सामना खुले मैदान में किया. वे देश के लिए कुछ कर गुजरने के उत्साह और ललक से भरे एक नौजवान थे. वे एक चिंगारी की तरह थे, जो देखते-ही-देखते ज्वाला बनकर देश के एक कोने से दूसरे कोने तक फैल गई. एक ऐसी ज्वाला जिसने देश में चहुंओर छाए अंधकार को मिटाने का काम किया.

(लेखक बलिया के सतीश चंद्र कॉलेज में इतिहास के शिक्षक हैं.)