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सरदार सरोवर परियोजना में देरी करने वाले असली ‘अर्बन नक्सल’ कौन हैं

‘विकास’ परियोजनाओं के नाम पर जबरन बेदखल किए जाने पर अपने वजूद और प्राकृतिक संसाधनों को बचाए रखने के लिए लड़ने वालों को जब नरेंद्र मोदी ‘अर्बन नक्सल’ कहते हैं तो वे इनके संघर्षों का अपमान तो करते ही हैं, साथ ही परियोजना में हुई देरी के लिए ज़िम्मेदार सरकारी वजहों को भी नज़रअंदाज़ कर देते हैं.

2017 में अपने जन्मदिन पर गुजरात के नर्मदा ज़िले के केवड़िया में बने सरदार सरोवर बांध के उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: पीटीआई)

भारत के प्रधानमंत्री ने 23 सितंबर 2022 को विभिन्न राज्यों के पर्यावरण मंत्रियों की बैठक को संबोधित करते हुए एक बहुत ही गंभीर बयान जारी करते हुए कहा कि ‘सरदार सरोवर बांध के कार्य को ‘अर्बन (शहरी) नक्सलियों’ द्वारा रोका गया था. प्रधानमंत्री किन्हें ‘अर्बन नक्सल’ कहकर बुला रहे हैं और सरदार सरोवर का कार्य क्यों रोका गया, इसे जानने के लिए इस परियोजना का इतिहास जानना बहुत ज़रूरी है.

इस परियोजना को पहली चुनौती 1961 में दी गई, जब भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू गुजरात के नवगाम नाम के गांव की आदिवासी ज़मीनों पर बांध का शिलान्यास करने आए. उस समय का प्रस्तावित बांध बहुत छोटा था और जिस आदिवासी गांव में इसे बनाया जाना था, उसी के नाम पर इसे भी नवगाम बांध का नाम दिया गया.

उसी वर्ष, सरदार सरोवर परियोजना के लिए बनाई जाने वाली आवासीय कॉलोनी के लिए छह गांवों- केवड़िया, कोठी, लिमड़ी, नवगाम, गोरा और वाघड़िया- की ज़मीनें अधिगृहीत की गई और इनमें से एक आदिवासी गांव केवड़िया के नाम पर इस कॉलोनी को केवड़िया कॉलोनी कहा जाने लगा.

बिना किसी पुनर्वास या उपयुक्त मुआवज़े के हज़ारों आदिवासी परिवारों से उनकी ज़मीनें ले ली गईं. स्वाभाविक है कि इन छह गांवों के आदिवासियों ने इसका विरोध किया और उनमें से कई लोगों को जेल हुई और अदालत में मामला भी दायर किया गया. 1961 में आदिवासियों द्वारा लड़े गए इस संघर्ष के विस्तृत इतिहास को केवड़िया के पांच बार (आदिवासी) सरपंच रहे स्वर्गीय मूलजीभाई तड़वी की ज़ुबानी यहां सुना जा सकता है.

केवड़िया कॉलोनी के लिए विस्थापित किए गए इन छह गांवों के आदिवासियों का पुनर्वास और न्याय के लिए संघर्ष आज भी जारी है, क्योंकि विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी और उससे जुड़ी पांच सितारा पर्यटन सेवाओं के लिए उनके बचे-खुचे संसाधनों और ज़मीनों को आज भी उनसे छीना जा रहा है.

केवड़िया कॉलोनी के लिए इन आदिवासी गांवों में मचाई गई इस लूट के आदिवासियों और विशेष तौर पर महिलाओं पर हुए विनाशकारी प्रभावों को समझने के लिए वरिष्ठ आदिवासी नेता स्वर्गीय कपिलाबेन तड़वी का यह साक्षात्कार सुनना बहुत ज़रूरी है.

केवड़िया कॉलोनी के लिए विस्थापित किए गए गांवों की आदिवासी महिला नेता स्वर्गीय बलिबेन और स्वर्गीय जशीबेन तड़वी गुजरात के बड़ोदा शहर में 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में सरदार सरोवर परियोजना के विस्थापितों द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शन की अगुवाई करते हुए. (फोटो सौजन्य: नर्मदा बचाओ आंदोलन संकलन )

यहां यह याद रखना ज़रूरी है कि कुछ समय बाद नवगाम बांध का नाम बदलकर सरदार सरोवर परियोजना रख दिया गया और इस तरह नवगाम और आसपास के आदिवासी गांवों को बर्बाद करके इस बांध को बनाए जाने  , इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया गया. अब गुजरात सरकार द्वारा आदिवासी ज़मीनों पर केवड़िया कॉलोनी बनाए जाने के इतिहास को मिटाने के लिए इसका नाम बदलकर एकतानगर रखने की  कवायद चल रही है, जिसका यहां के आदिवासी विरोध कर रहे हैं.

जहां तक परियोजना में हुई देरी का सवाल है, तो यह देरी केवड़िया कॉलोनी के लिए विस्थपित किए गए आदिवासियों के संघर्ष की वजह से नहीं हुई. यह देरी हुई क्योंकि गुजरात सरकार सिर्फ एक छोटे नवगाम बांध से ही संतुष्ट नहीं थी और इससे कहीं बड़ा बांध बनाना चाहती थी.

इस बड़े बांध से मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के नर्मदा के किनारे बसे 200 से भी अधिक गांव व हज़ारों हेक्टेयर वन और उपजाऊ कृषि भूमि डूबने वाली थी. स्वाभाविक रूप से इसने संबंधित राज्यों के बीच बांध की ऊंचाई और नर्मदा के पानी के बंटवारे को लेकर विवाद को जन्म दिया.

बांध की ऊंचाई को लेकर इन राज्यों के बीच के झगड़े के चलते (अब क्या इन्हें भी ‘अर्बन नक्सल’ कहा जाए?) जब कोई आपसी समझौता नहीं हो पाया तो इस मामले को वर्ष 1969 में नर्मदा जल विवाद प्राधिकरण को सौंप दिया गया. मामला संवेदनशील होने के कारण नर्मदा जल विवाद प्राधिकरण के सदस्यों को अपना अंतिम फैसला सुनाने में पूरे दस साल लग गए (क्या ये भी ‘अर्बन नक्सली’ हुए?)

प्राधिकरण का निर्णय अगस्त 1978 में आया, जब एक गुजराती मोरारजी देसाई भारत के प्रधानमंत्री थे. मोरारजीभाई, जो इस परियोजना को लागू करने के लिए बहुत उत्सुक थे. अपनी आत्मकथा ‘मारु जीवन वृतांत’ में परियोजना में हुई देरी के कारणों के बारे में चर्चा करते हैं. परियोजना में हुई देरी के कारणों से संबंधित उनकी आत्मकथा के चुनिंदा अंश में वो कहते हैं:

‘1947-48 में मुंबई राज्य में कई सिंचाई परियोजनाओं के कार्यान्वयन के बारे में विचार चल रहा था… तापी और नर्मदा परियोजनाओं को तब मंजूरी दी गई लेकिन सांख्यिकीय जानकारी उपलब्ध न होने के कारण नर्मदा परियोजना की रूपरेखा तुरंत तैयार नहीं की जा सकी. तब सरदार वल्लभभाई पटेल और हम में से कई लोगों ने यह सोचा कि पहले तापी परियोजना की रूपरेखा बनाकर उसे लागू करना और उसके बाद नर्मदा परियोजना को लेना बेहतर रहेगा.

जब इस परियोजना की योजना बनाई जा रही थी, तब मैं मुंबई राज्य का मुख्यमंत्री था. मैंने अहमदाबाद के कई उद्योगपतियों को इस परियोजना को अंतिम स्वरूप देने और इसके लिए ज़रूरी वित्तीय राशि जुटाने के लिए एक ‘निगम’ की स्थापना करने को कह रखा था… लेकिन वित्तीय राशि की कमी के चलते, निर्माण कार्य शुरू नहीं किया जा सका…

उसके बाद सरकार ने वर्ष 1963-64 में खोसला आयोग का गठन किया… 1965-66 में अपनी अंतिम रिपोर्ट देते हुए इस आयोग ने नवगाम बांध की ऊंचाई को कम से कम 500 फीट या 530 फीट रखने की सिफारिश की …मध्य प्रदेश ने इसका विरोध किया और इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया. इस ऊंचाई के कारण मध्य प्रदेश में 99,000 एकड़ कृषि भूमि पानी में डूबने वाली थी… महाराष्ट्र, जहां नर्मदा सिर्फ 30 मील की दूरी ही तय करती है, उसने भी मध्य प्रदेश का पक्ष लेते हुए बांध से पैदा होने वाली बिजली में ज़्यादा बड़े हिस्से की मांग रखी.

मध्य प्रदेश के रोषपूर्ण विरोध के कारण गुजरात में भी परियोजना को लागू करना संभव नहीं था… मध्य प्रदेश द्वारा खड़ी की गई इस रुकावट को दूर करने के लिए… वर्ष 1968-69 में यह मामला प्राधिकरण को सौंप दिया गया. दुर्भाग्यवश, मध्य प्रदेश ने उचित और अनुचित सभी तरह के हथकंडे अपनाते हुए मामले को लटकाए रखा… ‘

प्राधिकरण की कार्रवाई में हुई लंबी देरी के बाद इसने 1979 में गुजरात के पक्ष में अपना अंतिम फैसला सुनाया, जिसके तहत कहीं ज़्यादा ऊंचे बांध को मंज़ूरी दी गई. इसने मध्य प्रदेश में तुरंत एक शक्तिशाली जनांदोलन को जन्म दिया, जिसने बांध की ऊंचाई घटाए जाने की मांग रखते हुए प्राधिकरण के फैसले का विरोध किया, ताकि राज्य में गांवो, जंगलों और उपजाऊ कृषि भूमि को बांध के पानी में डूबने से बचाया जा सके.

यही नहीं, बांध के पानी में कई ऐतिहासिक मंदिर, धार्मिक स्थल के साथ-साथ लाखों की संख्या में आध्यात्मिक हिंदू श्रद्धालुओं द्वारा नर्मदा परिक्रमा के दौरान लिया जाने वाला मार्ग भी जलमग्न होने वाला था. सरदार सरोवर बांध ने धार्मिक स्थलों, परिक्रमा मार्ग और खुद नर्मदा नदी को किस तरह से बर्बाद कर दिया है, इसे जानने के लिए बांध विस्थापितों के इन साक्षात्कारों को सुन सकते हैं.

सरदार सरोवर बांध के पानी में जलमग्न हो चुका ऐतिहासिक शूल्पनेश्वर मंदिर. (फोटो सौजन्य: नर्मदा बचाओ आंदोलन संकलन)

इन सभी कारणों के चलते, इस आंदोलन ने राज्य में एक व्यापक रूप ले लिया और मध्य प्रदेश में कांग्रेस और जनता पार्टी, दोनों ही दलों के नेताओं ने इसका नेतृत्व किया. निमाड़ बचाओ आंदोलन के इतिहास, इस आंदोलन में राजनीतिक दलों और गैर-राजनीतिक व्यक्तियों (क्या इन्हें भी ‘अर्बन नक्सली’ कहा जाए?) द्वारा निभाई गई भूमिका के बारे में जानने के लिए कुछ प्रमुख नेताओं के साक्षात्कारों को यहां और यहां सुना जा सकता है.

देशभर में बड़े बांधों के खिलाफ बढ़ते विरोध और इन बड़े बांधों के पर्यावरण पर होने वाले विनाशकारी प्रभावों के बारे में बढ़ती जागरुकता के साथ सरदार सरोवर परियोजना में देरी का एक और कारण भारत सरकार से मिलने वाली पर्यावरण और वन मंजूरी में हुई देरी भी थी. यह मंजूरियां (जो कुछ तय शर्तों पर दी गई थी) वर्ष 1987 में ही दी गई जैसा कि नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की वेबसाइट में उल्लेख किया गया है:

‘सरदार सरोवर और इंदिरा सागर परियोजनाओं का पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा पर्यावरण के दृष्टिकोण से मूल्यांकन किया गया और इन्हें वर्ष 1987 में मंजूरी दी गई. इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया कि उचित सुरक्षा उपायों को अपनाए जाने पर कोई भी पर्यावरणीय मुद्दा परियोजना के औचित्य को गलत ठहराने जितना गंभीर नहीं है.’

लेकिन कोई भी पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय लागू नहीं किए गए और क्योंकि सरकार के पास डूब-प्रभावित गांवों के ढाई लाख निवासियों और परियोजना से जुड़े बुनियादी ढांचे के निर्माण से प्रभावित होने वाले अन्य ढाई लाख लोगों को पुनर्वास देने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे, इसलिए नर्मदा बचाओ आंदोलन मजबूती से उभरा और आंदोलन को देश भर से मिलने वाला समर्थन बढ़ता चला गया.

1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सरदार सरोवर परियोजना के औचित्य पर सवाल खड़े करते हुए देश के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया और मई 1995 में न्यायालय ने 80.3 मीटर की ऊंचाई पर बांध निर्माण पर रोक लगाई. कोर्ट द्वारा बांध पर लगाई गई रोक के पीछे का कारण पर्यावरणीय और पुनर्वास-संबंधी कार्रवाई की सरकार द्वारा की जा रही अनदेखी थी.

सरदार सरोवर बांध के पानी में डूब रहा शिव मंदिर. (फोटो: गोलू सेन)

पांच साल बाद अक्टूबर 2000 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अंतिम फैसले में बांध निर्माण को मंजूरी देते हुए यह शर्त रखी कि बांध विस्थापितों और प्रभावितों के पुनर्वास की प्रक्रिया बांध निर्माण के समानांतर चलती रहनी चाहिए. लेकिन चूंकि सरकार नर्मदा जल विवाद प्राधिकरण के निर्देशानुसार लोगों को पुनर्वास देने में असफल रही, इसलिए बांध के निर्माण का कार्य, नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण के आदेशों के अनुसार शुरू-बंद होता रहा, जिसकी वजह से परियोजना में और ज़्यादा देरी हुई.

इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री होते हुए ही नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण ने 2017 में एक आपातकालीन बैठक बुलाते हुए बांध का निर्माण पूरा करने और उसमें पानी भरे जाने को आनन-फानन में मंजूरी दे दी, जैसा कि खुद प्राधिकरण की वेबसाइट पर उल्लेख किया गया है:

‘नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण द्वारा 16 जून 2017 को आयोजित की गई अपनी 89वीं आपातकालीन सभा में दूसरे चरण के प्रस्ताव को मंज़ूरी देते हुए बांध के दरवाज़ों को नीचे किए जाने और 138.68 मीटर (ईएल) के पूर्ण जलाशय स्तर तक पानी भरे जाने को स्वीकृति दी गई.’

इसके पहले सर्वोच्च न्यायालय ने 2016-17 में सुनाए गए अपने एक फैसले में कहा था कि जिन विस्थापितों को अभी तक पुनर्वास नहीं दिया गया था, उन्हें नकद मुआवजा दिया जाए. यह फैसला नर्मदा जल विवाद प्राधिकरण और खुद सर्वोच्च न्यायालय के उन आदेशों का उल्लंघन था, जिनमें भूमि-आधारित पुनर्वास को अनिवार्य कहा गया था. विस्थापितों का पुनर्वास अब भी अधूरा है और पुनर्वास के लिए उनका लंबा संघर्ष अब भी जारी है.

दिलचस्प बात यह है कि तुरत-फुरत मंजूरी हासिल करने के बाद सितंबर 2017 में अपने जन्मदिन के अवसर पर नरेंद्र मोदी खुद बांध का उद्घाटन करने आए जबकि बांध की नहरों का काम अब भी अधूरा ही पड़ा था- जबकि इस पर अदालतों द्वारा कोई रोक भी नहीं लगाई गई थी!

नहरों के निर्माण कार्य में हो रही देरी के कारणों को खुद गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री सुरेश मेहता ने गुजराती में जारी की गई अपनी एक प्रेस विज्ञप्ति में इन शब्दों में बखूबी समझाया है:

‘…सरकार खुद इस बात को मान रही है कि नहरों का निर्माण अब भी अधूरा ही है. सरकार खुद भी यह कह रही है कि वर्ष 2017-18 में वह सिर्फ 3,856 किमी की नहरों का निर्माण कर पाएगी… अगर गुजरात सरकार इस रफ़्तार से काम करने वाली है तो नहरों के निर्माण के पूरे काम को ख़त्म करने में 11 साल और लग जाएंगे!

फिलहाल गुजरात सरकार (इस परियोजना पर) प्रतिवर्ष 9,000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है. इस दर पर आने वाले 11 सालों में बजट बढ़कर 99,000 करोड़ तक पहुंच जाएगा! विशेषज्ञों ने कहा था कि जब तक बांध की ऊंचाई बढ़ाई जाती है, तब तक नहरों का निर्माण कार्य पूरा किया जा सकता है. लेकिन सरकार इसमें विफल रही है. इसे ध्यान में रखते हुए क्या गुजरात सरकार को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए?’

सुरेश मेहता की इस प्रेस विज्ञप्ति के कुछ और ज़रूरी अंशों को यहां पढ़ा जा सकता है. नरेंद्र मोदी को कम से कम नहरों के निर्माण में हुई इस देरी की खुद ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए जिसका उल्लेख उनकी खुद की पार्टी के सदस्य सुरेशभाई ने किया है.

‘विकास’ परियोजनाओं के नाम पर जबरन बेदखल किए जाने पर अपने वजूद और अपने देश के प्राकृतिक संसाधनों को विनाश से बचाए रखने के लिए लड़ने वालों को जब नरेंद्र मोदी ‘अर्बन नक्सली’ कहते हैं तो वे लोगों के इन वास्तविक जीवन संघर्षों का अपमान करते हैं.

प्रधानमंत्री को पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकार और न्यायिक/टिकाऊ विकास के संबंध में इन शक्तिशाली आंदोलनों के सुझावों को सुनना चाहिए और उन्हें उचित सम्मान और महत्व देना चाहिए.

(नंदिनी ओझा नर्मदा बचाओ आंदोलन में कार्यकर्ता के रूप में बारह सालों तक काम करने के बाद अब नर्मदा संघर्ष के मौखिक इतिहास पर काम कर रही हैं.)

(मूल अंग्रेज़ी लेख से सिद्धार्थ जोशी द्वारा अनूदित)