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अंकिता हत्याकांड ने पहाड़ों की उपेक्षा को लेकर भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा किया

राज्य बनने के इतना समय बीतने के बाद भी उत्तराखंड का युवा और समाज विकल्पहीनता से जूझ रहा है. हालात बदले नहीं बल्कि और बदहाल हो गए. सरकारों की दोषपूर्ण नीतियों, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार समेत प्रकृति व पर्यावरण संरक्षण के सवालों पर सरकारी तंत्र के पास आज भी कोई जवाब नहीं है.

अंकिता हत्याकांड के विरोध में 2 अक्टूबर को ‘उत्तराखंड बंद’ का आह्वान किया गया था. इस दौरान निकली एक रैली. (फोटो साभार: फेसबुक/आइसा)

उत्तराखंड राज्य बनने के करीब 22 वर्ष बाद इस पर्वतीय प्रदेश में पांच निर्वाचित सरकारों की नाकामियों के खिलाफ पहली बार व्यापक जनाक्रोश उभरा है. श्रीनगर गढ़वाल से 19 किमी दूर धौरों की 19 साल की अंकिता भंडारी की क्रूरतम हत्या के बाद उभरे जनाक्रोश से पूरे पहाड़ में सामान्य जनजीवन को झकझोर दिया है.

इस जघन्य कांड ने राज्य बनने के बाद सरकारी भर्तियों के घोटाले और भाई-भतीजावाद के विरोध में चल रहे असंतोष व दूसरे तमाम मुद्दों पर पहाड़ के लोगों को लामबंद कर दिया है.

राज्य बनने के बाद इतना लंबा कार्यकाल बीतने के बाद भी यहां का युवा और समाज चौराहे पर खड़ा है. हालात बदले तो नहीं बल्कि और भी बदहाल हो गए. भाजपा और कांग्रेस की सरकारों की दोषपूर्ण नीतियों, पर्वतीय जनमानस की पीड़ाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार समेत यहां प्रकृति व पर्यावरण संरक्षण के सवालों पर सरकारी तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है.

राज्य गठन के बाद भी सुदूर क्षत्रों में अभावों में गुजर बसर करने वालों की पहले से ज्यादा दुर्दशा हुई है. लिखे-पढ़े युवा बेरोजगारों के सपनों और उनके दर्द को हत्या की शिकार हुई अंकिता के उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है. जो अपना करिअर बनाने की चिंता लिए नौकरी की खातिर पहाड़ से मैदान आने को विवश हुई.

अंकिता ने 12वीं कक्षा में 88 प्रतिशत अंक लाने के बाद होटल मैनेजमेंट डिप्लोमा किया था ताकि वह अपने परिवार को सहारा दे सके. ऐसे में उसने श्रीनगर गढ़वाल से दूर ऋषिकेश के पास रिसेप्शनिस्ट की नौकरी करने का फैसला किया. जाहिर है कि यह नौकरी से राज्य से बाहर जाने के विकल्प से ठीक लगी. मात्र तीन-चार घंटे के भीतर वह श्रीनगर से ऋषिकेश आ-जा सकती थी.

विडंबना देखिए कि अंकिता की हत्या ऐसे मौके पर हुई जब उत्तराखंड की भाजपा सरकार में अधीनस्थ चयन सेवा आयोग में भर्तियों में भ्रष्टाचार और मोटी रकम लेकर नकल कराने वाले रैकेट का पर्दाफाश हुआ. इस रैकेट के तार पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश से जुड़े हुए हैं. 40 से ज्यादा लोग भर्ती घोटाले में अब तक जेल जा चुके हैं, लेकिन इस गोरखधंधे में शामिल नेताओं व ब्यूरोक्रेट्स पर शिकंजा कसता नजर नहीं आता.

दूसरा भर्ती घोटाला उत्तराखंड विधानसभा का सामने आया, जहां राज्य बनने से लेकर 2022 की शुरुआत तक पिछले दरवाजे से सैकड़ों की तादाद में अवैध नियुक्तियां कर दी गईं. इनमें भाजपा व कांग्रेस दोनों के शासन की नियुक्तियां शामिल थीं. सबसे अधिक नियुक्तियां 2012 से 2016 के बीच हुईं जब कांग्रेस सरकार थी. स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल ने अपने बेटे बहू से लेकर दर्जनों रिश्तेदारों और समर्थकों और सरकारी बाबुओं के बच्चों को रेवड़ियों की तरह नियुक्तियां बांट दीं.

2017 के बाद भाजपा के सत्ता में आते ही जब ऋषिकेश के विधायक प्रेम अग्रवाल स्पीकर बने तो उन्होंने आरएसएस से लेकर अपने नाते-रिश्तेदारों और निजी स्टाफ से लेकर समर्थकों चहेतों के बेटे-बेटियों को बिना किसी प्रक्रिया के विधानसभा में नियुक्त करवा दिया.

इन अवैध नियुक्तियों पर अग्रवाल का तर्क यह था कि विधानसभा स्पीकर की हैसियत से स्वयं के विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने ये नियुक्तियां की हैं. इसी तरह की दलीलें कांग्रेस शासन में स्पीकर रहे गोविंद सिंह कुंजवाल की ओर से भी आई थीं.

जब मुख्यमंत्री धामी को लगा कि इन गैर कानूनी नियुक्तियों पर बवाल और बढ़ेगा तो उन्होंने मौजूदा स्पीकर ऋतु खंडूरी को पत्र लिखकर इन नियुक्तियों की जांच करने का आग्रह किया. स्पीकर ने जांच बिठाई और कुछ ही सप्ताह में विशेषज्ञ जांच समिति ने कुंजवाल व अग्रवाल द्वारा 2016 से लेकर 2022 तक हुई सभी तदर्थ नौकरियों को रद्द करने की सिफारिश कर दी.

उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के घोटाले के प्रमुख सूत्रधार के तौर पर उत्तरकाशी जिले के भाजपा कार्यकर्ता हाकम सिंह रावत का नाम सबसे पहले सामने आने से राज्य सरकार की चूलें हिलीं.  हाकम सिंह गिरफ्तारी के बाद जेल में हैं. 2019 में भी भर्ती घोटाले में उनका नाम उजागर हुआ था, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ निकटता के चलते उन पर दर्ज पुलिस केस दबा दिया गया.

हाकम सिंह 10-12 साल पहले उत्तरकाशी में एक जिलाधिकारी के रसोइये हुआ करते थे. जिलाधिकारी की पोस्टिंग हरिद्वार हुई तो हाकम सिंह भी हरिद्वार आ गए. यहीं पर हाकम राज्य अधीनस्थ सेवा चयन आयोग में भर्ती से रैकेट में शामिल हो गए. हरिद्वार के वह जिलाधिकारी भी इस भर्ती घोटाले का हिस्सा थे या नहीं इस पर जांच की कहीं कोई बात नहीं हो रही.

अंकिता हत्याकांड के विरोध में राज्यभर में जो उबाल और जनाक्रोश भड़का उसकी जमीन भर्ती घोटाले की वजह से पहले से ही तैयार थी. आम लोगों का गुस्सा इसलिए भी सातवें आसमान पर आ गया कि लाखों परिवार सरकारी नौकारियों में चलने वाली मोटी रिश्वतखोरी की खबरों से विचलित थे.

इधर केंद्र सरकार ने सेना की नौकरियों को 3-4 साल की अग्निवीर सेवा में तब्दील कर दिया. इससे उन हजारों नौजवानों को भारी धक्का लगा जो विगत 2-3 साल से सेना की भर्तियां खुलने का इंतजार कर रहे थे.

अंकिता की हत्या ने युवाओं, लड़कियों और आम पर्वतीय लोगों को झकझोर कर रख दिया. अंकिता को जिस तरह से आरएसएस और भाजपा नेता पुत्र के रिसॉर्ट में क्रूरता से मौत के घात उतारा गया, उसके बाद से पूरा आरएसएस और भाजपा का कुनबा निशाने पर है.

सबसे अधिक निशाने पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हैं. अंकिता की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखने को लेकर जिला पौड़ी गढ़वाल का प्रशासन पांच दिन तक चुप्पी साधे रहा. स्थानीय पटवारी जहां रिसॉर्ट बना था, वह वनतारा रिसॉर्ट में नियमित मेहमान होते थे. जाहिर है कि पटवारी व्यवस्था को एसडीएम स्तर से नियंत्रित किया जाता है, लेकिन एसडीएम, यमकेश्वर प्रमोद कुमार के खिलाफ कार्रवाई तो दूर उन्हें वहां से हटाया तक नहीं गया.

इसी तरह जिलाधिकारी पौड़ी विवादों के केंद्र में है. अंकिता के हत्यारोपी पुलकित आर्य का रिसॉर्ट, जिसमें यमकेश्वर क्षेत्र की भाजपा विधायक रेणु बिष्ट की ही मुख्य भूमिका थी. इसलिए जब प्रशासन और सरकार पर आक्रोशित लोगों ने रिसॉर्ट गिराकर हत्या के सबूत नष्ट करने के आरोप लगाए तो जिलाधिकारी पौड़ी ने भी सारा दोष रेणु बिष्ट के माथे मढ़कर हाथ झाड़ लिए.

लेकिन 48 घंटे बाद ही जिलाधिकारी ने कह दिया कि बुलडोजर जिला प्रशासन ने चलवाया था. विधायक रेणु बिष्ट के कई अवैध रिसॉर्ट हेवल घाटी से लेकर यमकेश्वर के कई हिस्सों में बताए जाते हैं. सबसे बड़ी बात है कि राज्य की धामी सरकार ने इस जघन्य हत्याकांड की जांच सीबीआई जैसी स्वतंत्र एजेंसी से कराने की मांग को ठुकरा दिया.

जांच के लिए टास्क फोर्स का झुनझुना थमा दिया गया. राज्य सरकार इस हत्याकांड में हाई प्रोफाइल भाजपा और संघ नेता को बचाने की कोशिश कर रही है. ऐसा आरोप जन संगठनों के लोग और विपक्षी दल लगा रहे हैं.

शर्मनाक बात यह है कि संघ और भाजपा के कई लोग अंकिता और उसके माता-पिता को ही बदनाम करने का कुचक्र कर रहे हैं. 2 अक्टूबर को उत्तराखंड बंद का असर मैदानी क्षेत्रों में उतना ज्यादा नहीं दिखा जितना कि पर्वतीय क्षेत्रों में. इसे भविष्य के लिए बहुत से लोगों को मैदानी बनाम पहाड़ी के नए तरह के वर्ग संघर्ष के कांटे बिछते दिख रहे हैं.

अंकिता हत्याकांड की एसआईटी जांच सत्यता पर ज्यादातर लोगों को भरोसा इसलिए नहीं है क्योंकि हत्यारोपी के पिता विनोद आर्य संघ के कई प्रभावशाली नताओं के काफी करीब हैं. आयुर्वेदिक दवा बनाने के कारोबार ने उसे संघ से राजनीति करने के बेशुमार फायदे दिलाए. वह खुद प्रदेश में राज्यमंत्री का ओहदा संभाल चुके हैं. इस बार उनका बेटा अंकित आर्य इसी तरह के ओहदे पर दर्जा प्राप्त मंत्री था, जिसे इस हत्याकांड के बाद उपजे भारी विरोध के बाद पद से हटा दिया गया.

पुलकित आर्य बाप के रसूख से ही आरएसएस व भाजपा के कई लोग वनतारा रिसॉर्ट का लुत्फ दिलाया करता था. अंकिता को वेश्यावृत्ति में धकेलने के पीछे भी अपराधी पुलकित आर्य किसी वीआईपी के साथ रात बिताने का दवाब बना रहा था. यह वीआईपी संघ परिवार से जुड़ा कोई बड़ा नाम बताया जाता है.

स्थानीय लोगों का आरोप है कि रिसॉर्ट में अरसे से वेश्यावृत्ति चल रही थी लेकिन स्थानीय प्रशासन को जानकारी होने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं होती थी. रिसॉर्ट के पूर्व कर्मचारियों ने भी पुष्टि की है कि पुलकित अपने बाप विनोद आर्य की ऊंची पहुंच और भाजपा नेतृत्व में उनकी पैठ और पैसे के दम पर कई तरह की अवांछित गतिविधियां और अय्याशी इसी रिसॉर्ट से चलाता था.

विनोद आर्य के बारे में बताया जाता है कि जो भी मुख्यमंत्री होता या ताकतवर होता उसे अपनी जेब में करने में आर्य परिवार को जरा भी दिक्कत नहीं थी. राज्यसभा सांसद नरेश बंसल, राज्य के डीजीपी अशोक कुमार, राज्य में कानूनी पैरवी करने वाले संघ से जुड़े वकील और हरिद्वार के सांसद, विधायक और दूसरे कई नेता विनोद आर्य के सत्कार के लाभ से नतमस्तक रहते थे.

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जो विनोद आर्य स्वयं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को एक समारोह में माथे पर हाथ रखकर पगड़ी पहना रहे हों, उनके मुख्यमंत्री के पद पर बने रहने से अंकिता की जघन्य हत्या की निष्पक्ष जांच के साथ उसके परिवार को न्याय कैसे मिल सकेगा?

पुलकित आर्य ने अपने मैनेजर और एक अन्य कर्मचारी को हत्या में साथ लिया. वे भले ही जेल में हैं लेकिन पुलिस ने पूछताछ और गिरफ्तारी के बाद जब उन्हें कोर्ट में पेश किया तो रिमांड पर लेकर तत्काल आगे की जांच पड़ताल और साक्ष्यों से सामना कराने के बजाय सीधे जेल भेज दिया गया.

कानूनी जानकारों ने इस मामले में टास्क फोर्स के कानूनी विवेक पर सवाल उठाए हैं. उनका मानना है की राज्य सरकार के दबाव में जांच को लंबा खींचने व सबूतों को नष्ट करके अंकिता हत्याकांड पर लीपापोती करके अपनी नाक बचाना है. जाहिर ही अपराधियों को सजा कोर्ट में जुटाए गए साक्ष्य और हत्या के पीछे के तमाम सबूतों को एकत्र करने से ही मुमकिन है.

टास्क फोर्स ने हत्यारे और उनके साथियों को सजा दिलाने के लिए पुख्ता सबूत जुटाने का दावा किया है लेकिन क्या ये सबूत अदालत की स्क्रूटनी का सामना कर पाएंगे, यह जानने लिए ज्यादा वक्त नहीं लगेगा.

विडंबना यह है कि न्याय पाने के लिए केवल सरकारी मशीनरी पर ही परिवार की निर्भरता रहेगी. मुख्यमंत्री धामी उनके कुछ मंत्री परिवार को न्याय दिलाने के तमाम वायदे कर रहे हैं, लेकिन आम लोगों और आंदोलनकारी संगठनों की मानें तो इस तरह के प्रलाप सरकार की ओर से घड़ियाली आंसू बहाने से ज्यादा कुछ नहीं हैं.

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सरकार ने अंकिता की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की प्रतिलिपि परिवार को नहीं दी है. आम लोग और आंदोलनकारी सवाल उठा रहे हैं कि आखिर ऐसी गोपनीयता की आड़ में धामी सरकार परिवार और आम जनता से क्या छिपाना चाहती है.

अंकिता की हत्या की तारीख और समय और उसकी लाश की बरामदगी के बीच का समय का आकलन बहुत अहम है. अस्पताल में अंकिता के पोस्टमॉर्टम के मौके पर मौजूद चश्मदीदों का कहना है कि लाश कई दिनों पहले की नहीं लग रही थी. शरीर व चेहरे पर चोट के निशान थे तथा दांत टूटे हुए थे.

विशेषज्ञों का लगता है कि वहशी अपराधियों द्वारा हत्या से पहले अंकिता के साथ कोई दुराचार होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. क्या टास्क फोर्स इस तह तक गई है या नहीं यह प्रश्न भी मुंह बाए खड़ा है.

उत्तराखंड में 2 अक्टूबर के देशव्यापी बंद का व्यापक असर देखने को मिला है. प्रदेश की अस्थायी राजधानी देहरादून में कई जगहों पर आंदोलनकारियों को स्वयं दुकानों को बंद करने की अपील करनी पड़ी. सरकारी मशीनरी और पुलिस की पूरी कोशिश थी कि बंद नाकाम हो लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

आने वाले दिनों में भाजपा सरकार विभिन्न मुद्दों को लेकर आंदोलन तेज होने की खबरों से बेचैन है. विपक्षी पार्टियां और जन संगठनों की एकता किस करवट बैठती है, इसी पर सबकी निगाहें लगी हैं.

अंकिता की हत्या और पहाड़ की समस्याओं पर सरकारी उपेक्षा को लेकर व्यापक बहस छिड़ गई है. उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में मूलतः गांव ही विकास और लोगों की बसाहट की मूल इकाई हैं. योजनाकारों ने यहां दृष्टि नहीं घुमाई. तसल्ली से सोचा नहीं कि गांवों की खुशहाली मजबूत करनी होगी जिससे पलायन रुके और स्थानीय लोगों को छोटे मोटे रोजगार की तलाश में गांव से पलायन न करना पड़े.

पर्वतीय जिलों में सबसे बड़ी समस्या गुणवत्ता वाले स्कूलों की है और रोजगार सृजन के अवसरों के लिए राज्य स्तरीय कौशल निर्माण विश्विद्यालय की स्थापना की मांग अरसे हो रही है. राज्य सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)