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30 से अधिक संगठनों ने साईबाबा और अन्य को बरी करने के आदेश को बरक़रार रखने की मांग की

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच द्वारा माओवादियों से संबंध रखने संबंधी मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा और अन्य को 14 अक्टूबर को बरी कर दिया गया था, लेकिन अगले ही दिन केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी थी.

जेएनयू के छात्र हेम मिश्रा के पिता केडी मिश्रा और जीएन साईबाबा की पत्नी वसंता कुमारी. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

नई दिल्ली: प्रतिबंधित माओवादियों के साथ संबंध रखने के आरोप में वर्षों से जेल में बंद प्रोफेसर जीएन साईबाबा और अन्य राजनीतिक बंदियों को बिना शर्त बरी करने की मांग को लेकर सोमवार (5 दिसंबर) को दिल्ली में 30 से अधिक अधिकार संगठन ‘कैंपेन अगेंस्ट स्टेट रिप्रेशन’ (सीएएसआर) के बैनर तले एक साथ आए.

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच द्वारा माओवादियों से संबंध रखने वाले मामले में साईबाबा और चार अन्य को बरी करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर को 24 घंटे के भीतर पलट दिया था.

शीर्ष अदालत की जस्टिस एमआर शाह और बेला एम. त्रिवेदी की खंडपीठ ने बरी करने के आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार द्वारा लगाई गई एक विशेष याचिका पर सुनवाई करते हुए 14 अक्टूबर को दिए गए बरी करने के फैसले को पलट दिया था.

अधिकार निकायों द्वारा आयोजित संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए साईबाबा की पत्नी वसंता कुमारी ने बताया कि 14-15 अक्टूबर को उन पर क्या गुजरी थी और कैसे बरी होने के बाद उनकी खुशी अल्पकालिक थी.

वसंता ने बताया, ‘जैसे ही हमें बरी होने के बारे में पता लगा, हम सब बहुत खुश थे. मुझे दुनिया भर से फोन आए कि आखिरकार साई और उनके साथ अन्य लोग बाहर आ जाएंगे. अधिवक्ताओं ने हमें नागपुर आने के लिए कहा, क्योंकि साई रिहा होने वाले थे. उन्होंने अपनी किताबों और कानूनी कागजों को छोड़कर अपना सारा सामान जेल में बांट दिया था. हम सब इंतजार कर रहे थे.’

वे आगे सवाल उठाते हुए पूछती हैं, ‘कानून के सामने सब बराबर हैं फिर साईं, हेम मिश्रा, प्रशांत राही और अन्य आदिवासियों को जमानत और पैरोल से वंचित क्यों किया जा रहा है? बिना किसी अपराध और बिना किसी सबूत के उन्हें उम्रकैद की सजा दी गई है.’

वसंता ने कहा कि संबंधित अधिकारियों को साईंबाबा को तुरंत रिहा करना चाहिए, क्योंकि उनका स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ रहा है.

उन्होंने कहा, ‘उनके बरी होने पर रोक लगने के बाद मैं साई से मिली. वह मांसपेशियों में ऐंठन, जकड़न और सांस फूलने की समस्याओं से जूझ रहे हैं. उन्हें अंडा सेल में रखा गया है. सेल को ऊपर से ढंका नहीं किया है, क्योंकि यह भारत में ब्रिटिश काल के समय का एक यातना कक्ष है. जो लोग स्वतंत्रता के लिए लड़ते थे, अंग्रेज उन्हें इसमें डाल देते थे.’

उन्होंने आगे कहा, ‘साई जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं. उन्होंने दो दिन पहले पत्र लिखकर कहा था कि उन्हें काफी परेशानी हो रही है. हालांकि, कोई डॉक्टर खुलकर नहीं बोल रहा है. वह असहनीय पीड़ा में हैं. उनकी मेडिकल कंडीशन के बावजूद भी उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब बलात्कारी और हत्यारे खुलेआम बाहर घूम रहे.’

मामले में साईबाबा के साथ पुलिस ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र हेम मिश्रा, दो आदिवासी युवकों विजय तिर्की और पांडु नरोटे, पत्रकार प्रशांत राही और महेश तिर्की को भी गिरफ्तार किया था.

साईंबाबा के साथ यूएपीए के आरोपों के तहत दोषी ठहराए गए नरोटे (33 वर्ष) की इस साल अगस्त में पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी. नरोटे के वकीलों ने आरोप लगाया था कि जेल अधिकारियों ने समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं दी. उन्होंने कहा था कि उनकी हालत बुरी तरह बिगड़ने के बाद ही उन्हें अस्पताल ले जाया गया था.

कार्यक्रम में बोलते हुए हेम मिश्रा के पिता केडी मिश्रा ने कहा, ‘जब वे बरी होने वाले थे तो उन्हें रोकने के लिए छुट्टी के बावजूद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को भेजा गया था. यह किसी के स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को निशाना बनाने के लिए किया गया था, उन्हें रोकने के लिए ही यह पीठ बनाई गई थी. ऐसा विरलतम मामलों में होता है.’

कार्यक्रम के आयोजकों ने भारतीय जनता पार्टी की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्यों पर हिंसक हमला करने का आरोप लगाया.

द वायर से बात करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी. राजा ने कहा, ‘उन्हें जेल में रखना सरकार की ओर से क्रूर और असंवेदनशील रवैया है.’

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