‘राहुल-मुक्त’ संसद और विपक्ष-मुक्त भारत देश के आम लोगों के लिए घातक हैं

विपक्ष के बिना लोकतंत्र की नदी सूख जाएगी. हर सरकार ग़लती करती है और ग़लतियां होने, उन्हें सुधारने में कोई शर्म नहीं है. पर जिन देशों में एक ही दल और उसके सुप्रीम नेता को ही लोकप्रियता और जनसमर्थन प्राप्त हो और विपक्ष कमज़ोर या ग़ायब हो, वहां इस सरकार और नेता की कोई ग़लती आपदा का रूप ले लेती है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

विपक्ष के बिना लोकतंत्र की नदी सूख जाएगी. हर सरकार ग़लती करती है और ग़लतियां होने, उन्हें सुधारने में कोई शर्म नहीं है. पर जिन देशों में एक ही दल और उसके सुप्रीम नेता को ही लोकप्रियता और जनसमर्थन प्राप्त हो और विपक्ष कमज़ोर या ग़ायब हो, वहां इस सरकार और नेता की कोई ग़लती आपदा का रूप ले लेती है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

गुजरात के एक न्यायालय द्वारा संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को मानहानि के लिए दोषी पाए जाने के बाद उन्हें संसद से निष्कासित कर दिया गया. पिछले कई वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ बनाने का इरादा ज़ाहिर करते आए हैं. कांग्रेस के नेता और संसदीय विपक्ष के मुख्य नेता का सदन में अयोग्य घोषित किया जाना उसी इरादे की दिशा में एक बड़ा कदम है.

विपक्ष का सबसे मुख्य राष्ट्रीय दल कांग्रेस है; कांग्रेस-मुक्त से भाजपा का मतलब ‘विपक्ष-मुक्त’ भारत ही है. राहुल गांधी कांग्रेस के मुख्य नेता होने के साथ ही संसद में विपक्ष के शीर्ष नेताओं में एक हैं. संसद के ‘राहुल-मुक्त’ होने का सिर्फ़ राहुल गांधी या कांग्रेस पार्टी या विपक्षी दलों का नुकसान नहीं हुआ है. सबसे बड़ा नुकसान देश के सभी लोगों को (भाजपा के सभी वोटर सहित) हुआ है.

प्रधानमंत्री मोदी और उनके साथी भाजपा नेताओं ने बार-बार विपक्ष की अवहेलना की है; मतभेद को देशद्रोह बताया है; विपक्ष की जीत को ‘दुश्मन-देश’ की जीत बताया है; आंदोलन करने वालों को परजीवी और विध्वंसकारी विदेशी विचारधारा के वाहक घोषित किया है; और विपक्षी राष्ट्रीय और प्रांतीय दलों के ख़त्म होने की और भाजपा के एकतरफ़ा शासन की भविष्यवाणी की है.

आप भले ही भाजपा को वोट देते हो, विपक्ष की इस तरह की अवहेलना, विपक्षी दलों को ख़त्म करने और उनके नेताओं को चुप कराने, और चुप न हों तो संसद से ही बाहर करने की मंशा को लेकर गहरी चिंता महसूस होनी चाहिए.

सरकार, विपक्ष, और लोकतंत्र

लोकतंत्र-विरोधी ताकतें एक धारणा को जनमानस में बिठाने की कोशिश करते हैं: कि सरकार तभी कारगर हो सकती है जब सत्ता की डोर एक मज़बूत नेता के मुट्ठी में हो.

इस धारणा के प्रचारक कहते हैं कि सरकार में विचारों की बहुलता और नीतियों को लेकर बहस शासन को कमज़ोर करती हैं. इनका कहना है कि संसद या सड़क में होने वाली आलोचना के दबाव में किसी नीति को बदलना सरकार और नेता की ‘कमज़ोरी’ की निशानी है.

संसद हो या सड़क, आलोचकों के सामने जो नेता ‘झुक जाए’; जो प्रेस कॉन्फ्रेंस या इंटरव्यू में सवालों का सामना करते हुए हमेशा हाज़िरजवाब नहीं होता, कुछ क्षण सोचकर जवाब देता है- वह तो ‘पप्पू’ है, मज़ाक का पात्र है. 56 इंच की छाती वाला मज़बूत नेता तो ऐसा हो जो अपने से भिन्न किसी भी मत से बिल्कुल प्रभावित न हो, चाहे ऐसा मत रखने वाले अपने दल या सहयोगी दल के हों, या विपक्ष के.

अगर हम- आम नागरिक, नेतृत्व और शासन के इस मॉडल को स्वीकार करते हैं, तो हम लोकतंत्र में अपनी ही भूमिका, अपनी ही आवाज़, अपने ही हित की आहुति दे रहे हैं. लोकतंत्र का मतलब यह नहीं कि जिसके पास ज़्यादा जनसमर्थन है उसी की बात चलेगी. लोकतंत्र में चुनाव जीतने का मतलब यह नहीं होता कि ‘जीतने वाले’, ‘हारने वालों’ पर फ़तेह पा चुके हैं, और हारने वालों ने आलोचना करने और नीति बनाने में भागीदारी का हक़ खो दिया है.

बल्कि लोकतंत्र का मतलब है कि बहुसंख्यक अपने मत को अल्पसंख्यक पर, या यहां तक कि अकेले खड़े किसी व्यक्ति पर नहीं थोप सकते हैं. तानाशाही तंत्र बेलगाम होता है, लोकतंत्र में विपक्ष का काम है कि वह सत्तापक्ष पर लगाम लगाए, उसे जनता के हर हिस्से के प्रति और संवैधानिक मूल्यों के प्रति जवाबदेह रखे. विपक्ष की ज़िम्मेदारी है कि सत्तापक्ष की हर नीति की हर संभव ख़ामी को उठाए, ताकि अंततः जो नीति सत्ता और विपक्ष की भागीदारी से बनती है, वह सबसे अच्छी हो सकती है.

किसी देश का लोकतंत्र कितना मज़बूत है, यह उसके सरकार या शासक नेता की मज़बूती से नहीं पता चलता है. बल्कि लोकतंत्र उतना ही मज़बूत है जितना उसका विपक्ष मज़बूत है. ‘विपक्ष’ से मतलब विपक्ष की पार्टियां और संसद में विपक्ष तो है ही, पर उतना ही ज़रूरी है संसद से बाहर सड़कों पर जन-आंदोलनों वाला विपक्ष. लोकतंत्र तभी मज़बूत है जहां सत्तापक्ष विपक्ष का सम्मान करता है, आलोचना और बहस का स्वागत करता है.

लोकतंत्र का मापदंड यह नहीं है कि सरकार का तंत्र कितना बेहतर शासन करता है; वो कितने लोगों को गरीबी या भूख से मुक्त कर पाई है, कितने घरों में बिजली पहुंचा पाई है, कितने शौचालय बना पाई है, कितनी महिलाओं को सुरक्षित कर पाई है, देश की कितनी जल्दी और कितनी तरक्की हुई है, आदि.

देश कितना लोकतांत्रिक है, उसका एक ही ‘टेस्ट’ है: उसमें लोकतंत्र को बढ़ाने के लिए लोगों के संघर्ष, सवाल, बहस कितने तीव्र हैं. बर्तोल्त ब्रेख्त की कविता के शब्दों में,

जिस तरह रोटी की जरूरत रोज है
इंसाफ की जरूरत भी रोज है
बल्कि दिन में कई-कई बार भी
उसकी जरूरत है.

… दूसरी रोटी की तरह
इंसाफ की रोटी भी
जनता के हाथों ही पकनी चाहिए
भरपेट, पौष्टिक, रोज-ब-रोज.

इंसाफ तो लोकतंत्र का दूसरा नाम है. लोकतंत्र में लोगों का काम पांच वर्षों में एक बार वोट देने भर से पूरा नहीं होता है. ये तब होता है जब लोग जब रोज़ ब रोज़ निर्णयों को लेकर सवाल और बहस करते हैं, आपस में इन्हें सुलझाते हैं, आपस में संगठित होकर किसी समस्या का हल निकालते हैं, या उस हल के रास्ते में बाधा बने हुए किसी नीति का विरोध करते हैं.

लोकतंत्र किसी स्वीमिंग पूल में क़ैद, साफ़ पर ठहरा हुआ जल नहीं है. लोकतंत्र बहती नदी की तरह है, जिसे अनगिनत पत्थरों से टकराते हुए अपना घुमावदार रास्ता बनाना पड़ता है, और जिसमें हर क्षण संघर्ष और बदलाव की चमक देखी जा सकती है. लोकतांत्रिक शासन वही है जो इस नदी को क़ैद करने और ज़बरदस्ती मोड़ने की कोशिश न करें.

विपक्ष का अभाव जनता के लिए जानलेवा 

विपक्ष के दलों के बिना लोकतंत्र की नदी सूख जाएगी. हर सरकार गलती करती है और गलतियों का होना और उन्हें सुधारना, इसमें कोई शर्म नहीं है. पर जिन देशों में एक ही दल का और उस दल के सुप्रीम नेता को लोकप्रियता और जनसमर्थन प्राप्त हो और विपक्ष कमज़ोर या गायब हो, वहां सरकार और नेता की कोई गलती भीषण आपदा का रूप ले लेती है.

चीन में क्रांति के बाद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेता माओ को अभूतपूर्व लोकप्रियता और जनता का प्यार प्राप्त था. पर लोक-प्रियता में और लोक-तंत्र में बड़ा अंतर है. एकतरफ़ा लोकप्रियता अक्सर लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है. माओ द्वारा खेती के सामूहिकरण और सरकार द्वारा किसानों से फसल की वसूली के लिए अनुचित और अन्यायपूर्ण लक्ष्य की नीतियों के चलते किसान परिवारों के 3.6 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हुए.

इन नीतियों से होने वाली तबाही और मौतों के बारे में जिस भी नेता, कार्यकर्ता या कमेटी ने शीर्ष नेतृत्व और ख़ासकर शीर्ष नेता माओ को बताने की कोशिश की, उसे ‘अपनी गलती स्वीकार करने के लिए’ मजबूर किया जाता रहा, जब तक कि हर कार्यकर्ता या नेता अपने ज़िले से सिर्फ़ ‘पॉज़िटिव’ रिपोर्ट देने लगे.

संसदीय लोकतंत्र में लाख ख़ामियां और दोहरे मापदंड हैं. पर इनमें चुनाव के चलते शासक दल और नेता की गलत नीति पर अक्सर जन-दबाव और विपक्षी दल लगाम लगा पाते हैं, इससे पहले कि वह महा-आपदा का शक्ल ले ले. चीन में माओ की सर्वमान्यता और लोकप्रियता ही करोड़ों के लिए जानलेवा साबित हुई. ‘जनता के शासन’ के नाम पर विपक्ष के दलों ख़त्म कर दिए गए थे. कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर सर्वमान्य और लोकप्रिय नेता को कौन कड़वा सच बताए, जब सच बोलने की उनको सज़ा मिले और जी-हुज़ूरी के लिए शाबाशी और तरक्की?

जहां शासक नेता को सारी श्रद्धा, भरोसा और लोकप्रियता प्राप्त हो, और विपक्ष के दलों के पास भरोसा और लोकप्रियता न के बराबर, वहां सबसे भीषण आपदा का ख़तरा बना रहता है.

क्या अमेरिका और पश्चिम के अन्य उदारवादी चुनावी लोकतंत्र में जानलेवा नीतियां नहीं हैं? क्या वहां भुखमरी, नस्लवाद, पुलिस दमन और जनसंहार नहीं होते? बिल्कुल होते हैं; इन देशों के शासक अपनी ही जनता के प्रति क्रूर तो हैं है, उन्होंने पूरी दुनिया को गुलाम बनाकर वहां की जनता पर अपार क्रूरता ढाई है.

इन देशों में भले ही संसदीय विपक्ष है, वहां क्या मज़दूर-विरोधी और अमीरपरस्त आर्थिक नीतियों, या साम्राज्यवादी युद्धों पर सत्तापक्ष और विपक्ष की एकता नहीं है? बिल्कुल है. चीन में विपक्ष-मुक्त सत्ता की आलोचना का मतलब अन्य देशों के विपक्ष-युक्त तंत्र और शासकों की तारीफ़ नहीं है. किस तंत्र की नीतियों ने देश और उसकी जनता का कितना भला किया है, इस बहस का लोकतंत्र के स्वास्थ्य से कोई लेना-देना नहीं है.

चीन सचमुच समाजवादी है या फिर ‘राज्य-पूंजीवादी’ या ‘पूंजीवादी’ है, इस बहस का भी लोकतंत्र के स्वास्थ्य से कोई लेना-देना नहीं है. अमेरिका और पश्चिम के देशों में लोकतंत्र, उसके तंत्र में नहीं, बल्कि तंत्र के अन्यायपूर्ण नीतियों को चुनौती देने वाले जनसंघर्षों में पाया जाता है. चीन में संसदीय ‘उदारवादी’ लोकतंत्र की तुलना में ज़्यादा जनसंघर्ष होते हैं या कम? सरकारी की बजाय आज़ाद यूनियन बनाने के लिए आंदोलन करने की जगह है या नहीं? वहां के अख़बार और सोशल मीडिया में सरकार की आलोचना ‘उदारवादी’ लोकतंत्र वाले देशों की तुलना में से कम है या अधिक?

उसी तरह, कांग्रेस के राज की तुलना में भाजपा के राज में कम दंगे होने के दावे सही हैं या गलत, यह फिज़ूल का सवाल है. हम जब भाजपा के राज से ‘लोकतंत्र बचाने’ की बात करते हैं तो कांग्रेस के राज को और उस ज़माने के अन्यायों को वापस लाने की बात नहीं कर रहे हैं. ‘लोकतंत्र बचाने’ से हमारा मतलब है, लोकतंत्र बढ़ाने के लिए लोगों की लड़ाई की जगह को बचाना; सरकारी अन्याय को चुनौती देने की जगह को बचाना.

विपक्ष का मतलब है विपक्ष में सामाजिक और राजनीतिक एकरूपता नहीं बल्कि उसकी बहुलता. समाज के छोटे से छोटे हिस्से के और विभिन्न राजनीतिक धाराओं के स्वरों और सवालों की भागीदारी से विपक्ष मजबूत होता है. सरकार जब कमजोर तबकों के सवालों और आंदोलनों का सम्मान करें तो अक्सर उन पर ‘वोटबैंक’ की ‘खुशामद’ करने का आरोप लगता है. पर जो सरकार सबसे मज़बूत (जैसे अडानी-अंबानी) के लिए नीति बनाए या नफ़रत के आधार पर ‘वोटबैंक’ तैयार करें, तो उस पर ऐसे आरोप नहीं लगते हैं.

कानून के दोहरे मापदंड

अब राहुल गांधी के ख़िलाफ़ मानहानि के मुक़दमे पर नज़र डाली जाए. 2019 में कर्नाटक में चुनाव प्रचार के दौरान एक भाषण में ललित मोदी, नीरव मोदी, नरेंद्र मोदी की चर्चा करते हुए उन्होंने पूछा था कि आख़िर ‘सभी चोरों के नाम में मोदी क्यों है?’ इस पर गुजरात के पूर्णेश मोदी नाम के एक शख्स ने गांधी पर ‘मोदी’ सरनेम के लोगों की मानहानि करने का आरोप लगाया, जिसका फैसला हाल में सूरत की एक अदालत ने सुनाया.

क़ानून और संविधान के विशेषज्ञ गौतम भाटिया ने इस फैसले पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए याद दिलाया कि मानहानि क़ानून का ककहरा है कि किसी वर्ग के बारे में टिप्पणी ‘मानहानि’ नहीं माना जा सकता. मानहानि साबित होने के लिए आरोप लगाने वाले को दिखाना होगा कि जिस टिप्पणी को वे आपत्तिजनक बता रहे हैं, वह ठोस रूप से उनका (आरोप लगाने वाले का) मानहानि करता है.

भाटिया ने 2018 के आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के एक फैसले के बारे में बताया, जहां एक अन्य फैसले का उदाहरण देते हुए कहा गया था कि ‘अगर किसी शख्स ने लिखा कि सभी वकील चोर हैं, तो इस मामले में कोई ख़ास वकील मानहानि का मुक़दमा नहीं लगा सकता. ऐसा आरोप तब ही लग सकता है, जब वह ख़ास वकील बता सके कि उनके ख़िलाफ़ व्यक्तिगत टिप्पणी की गई है.’ इसलिए राहुल गांधी मामले में अगर नीरव, ललित या नरेंद्र मोदी आरोप लगाते तो मानहानि का केस बन सकता था. पर ‘मोदी’ नाम के सभी लोगों के ख़िलाफ़ मानहानि का केस अदालत में नहीं टिक सकता है.

यह सब जानते हुए अदालत ने गांधी को मानहानि के मामले में दोषी कैसे पाया गया?

(मोदी सरनेम रखने वाले) एक पूरे समुदाय को चुनाव प्रचार के भाषण में चोर कहना उस समुदाय की मानहानि मानी गई है. अब फर्ज कीजिए कि चुनाव प्रचार में किसी नेता ने एक पूरे समुदाय को बलात्कारी बता दिया. पहले नेता को जिस मापदंड से दोषी पाया गया, उसी मापदंड के हिसाब से दूसरा नेता भी एक पूरे समुदाय का मानहानि करने और उसके ख़िलाफ़ नफ़रत भड़काने का दोषी है.

2014 में आम चुनाव से एक महीने पहले नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के अभियान में अमित शाह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली में 3 अप्रैल को जाटों की सभा को संबोधित करते हुए 2013 में हुए दंगों के बारे में कहा, ‘क्यों दंगे होते हैं? किसी को दंगा करने का शौक़ नहीं है. जब कोई घटना होती है और प्रशासन कुछ नहीं करता, तब मां-बहनों के इज़्ज़त की रक्षा करने के लिए लोग दंगा करने के लिए मजबूर होते हैं.’

इसके दूसरे ही दिन 4 अप्रैल को बिजनौर में एक सभा को संबोधित करते हुए अमित शाह ने और भी स्पष्ट तरीक़े से बताया कि वे किस समुदाय को बलात्कारी बता रहे थे. उन्होंने कहा, ‘दलित उत्थान की बात करने वाली बहन मायावती ने दलितों को 17 टिकट दिए हैं, जबकि उन्होंने 19 सीट उस समुदाय को दिए जो हमारे बहन-बेटियों की आबरू पर हाथ डालता है.’ बसपा के प्रत्याशियों में से 19 मुस्लिम थे- इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि वे पूरे मुस्लिम समुदाय को ‘हिंदू बहन-बेटियों की आबरू पर हाथ डालने’ वाला- यानी बलात्कारी – बता रहे थे.

पूरे मुस्लिम समाज को बलात्कारी बताने और उसके ख़िलाफ़ दंगों को उचित ठहराने वाले इन भाषणों के लिए अमित शाह को नफ़रत भड़काने या मानहानि करने के लिए कोई सज़ा नहीं हुई. बल्कि इन भाषणों की नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में बड़ी भूमिका थी क्योंकि इनके चलते भाजपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित पूरे यूपी में ‘क्लीन स्वीप’ मिला.

संसद, विपक्ष, अदालत, आंदोलन, पत्रकार: सत्ता पर इन सबकी निगरानी के बिना लोकतंत्र असंभव है. जब संसद में विपक्ष को बोलने न दिया जाए या उसे निष्कासित कर दिया जाए, जब आंदोलन को देश-विरोधी बताकर उसका दमन किया जाए, जब अदालत और पत्रकार सहित अन्य संस्थाएं, संविधान की जगह सत्ता के प्रति वफ़ादार हों तो लोकतंत्र वेंटिलेटर पर है; इसे जन-विपक्ष और संसदीय विपक्ष के ऑक्सीजन की सख़्त ज़रूरत है.

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं.)