अडानी समूह के प्रति सरकार की कृपादृष्टि महज़ धारणा का मामला नहीं है

जितनी आक्रामक तरीके से सत्ताधारी पार्टी की तरफ से एक कारोबारी दिग्गज की हिमायत की कोशिश की जा रही है, आख़िर वह समूह अचानक पार्टी के लिए इतने महत्वपूर्ण कैसे हो गया?

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नरेंद्र मोदी और उनकी कैबिनेट के नेता और गौतम अडानी. (फोटो: पीटीआई/अडानी समूह)

जितनी आक्रामक तरीके से सत्ताधारी पार्टी की तरफ से एक कारोबारी दिग्गज की हिमायत की कोशिश की जा रही है, आख़िर वह समूह अचानक पार्टी के लिए इतने महत्वपूर्ण कैसे हो गया?

नरेंद्र मोदी के साथ उनकी कैबिनेट के नेता और गौतम अडानी. (फोटो: पीटीआई/अडानी समूह)

लेकिन उसने कुछ पहना नहीं है’, छोटे बच्चे ने कहा.

‘…लेकिन उसके शरीर पर वाकई कुछ कपड़ें नहीं है,नगर के बाकी निवासी अंततः जोर से बोल उठे

राजा थोड़ी देर डगमगाया, क्योंकि उसे लगा कि वह बिल्कुल सही बात कह रहे हैं. लेकिन उसने सोचा, ‘इ जुलूस को तो चलते ही रहना चाहिए.इसलिए वह उसी शान से अधिक रौबीले ढंग से चलने लगा, और उसके दरबारियों ने उसी नफ़ासत के साथ उसके चोगे को उठाया, जो वहां नहीं था.

 

(राजा के नए कपड़े कहानी का अनूदित अंश)

कुछ रचनाएं कालजयी हो जाती हैं और वह जब भी पढ़ी जाती हैं, अपने नए संदर्भों के साथ हर बार बेहद मौजूं हो जाती हैं.. फिर चाहे बड़ों के लिए लिखी गई किताबें हों या बच्चों के लिए रची गई रचनाएं!

अपनी बालकथाओं के लिए आज भी दुनिया भर में मशहूर महान डैनिश लेखक हान्स क्रिश्चेन एंडरसन, (2 अप्रैल 1805 – 4 अगस्त 1875) की एक बहुचर्चित कहानी ‘राजा के नए कपडे़’ शायद ही किसी ने पढ़ी/सुनी न हो. दुनिया की सौ से अधिक जबानों में अनूदित यह कहानी अपनी अकूत सत्ता और अहंकार में डूबे राजा के प्रजा के सामने बेपर्दा होने की कहानी है, जिसे कुछ ठग दुनिया का एक ऐसा ‘दिव्य वस्त्र’ पहना देते हैं – जो उन लोगों को नहीं नज़र आता जो मूर्ख हों या अहमक हों- और राजा विशाल जुलूस में निकल पड़ता है.

अचानक एक छोटा-सा बच्चा बोल उठता है कि ‘अरे राजा ने कुछ पहना नहीं है.’ राजा को सच्चाई का एहसास होता है, लेकिन वह ‘उतनी ही शान के साथ चलता रहता है.’

दाग़ अच्छे हैं‘: इजरायल का मॉडल

लगभग दो सौ साल बीतने को है, लेकिन यह रूपक आज की दुनिया पर भी हूबहू लागू होता दिखता है. इजरायल के संसद में जारी घटनाक्रम इसी बात की ताईद करता है.

फिलवक्त़ वहां एक प्रधानमंत्री सत्तासीन हैं, जो इसके पहले भी कई दफा इज़रायल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं – जिन पर घूसखोरी और गबन के आरोप लग चुके हैं, न्यायालयों में मामला विचाराधीन भी है, जिनकी पत्नी को भी राज्य की निधि का दुरुपयोग करने के लिए दंडित किया जा चुका है, निश्चित ही इस काम के लिए भी उन्हें अपने के पद का लाभ मिला होगा, उस प्रधानमंत्री ‘बीबी’ नेतन्याहू ने पिछले दिनों एक अलग किस्म का कानूनी धमाका किया.

इस संभावना को मद्देनजर रखते हुए कि कभी भी देश की अदालत उन्हें दोषसिद्ध करेगी और फिर उन्हें अपने पद को छोड़ना पड़ेगा, उन्होंने संसद में एक नया कानून ही बनवा दिया कि प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए उन्हें उनके किसी भी अपराधिक/सिविल मामलों के लिए दंडित नहीं किया जाएगा और हटाया नहीं जा सकेगा. न विधायिका उन्हें छू पाएगी और न न्यायपालिका उन पर अंकुश लगा सकेगी. इस काम को तभी अंजाम दिया जा सकेगा जब खुद प्रधानमंत्री या उनकी कैबिनेट इसके बारे में निर्णय ले.

प्रधानमंत्री के पद पर बैठे शख्स को विधायिका और न्यायपालिका के हस्तक्षेप से बचाए रखने का यह कदम दरअसल दरअसल न्यायपालिका की संरचना में आमूलचूल बदलाव लाने की नेतन्याहू की अगुआई में बनी सबसे अधिक दक्षिणपंथी हुकूमत की कोशिशों का ही हिस्सा रहा है. इस गठबंधन में शामिल पार्टियों के कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, एक पार्टी के नेता को जनवरी माह में न्यायपालिका के हस्तक्षेप के चलते ही अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा है.

याद रहे न्यायपालिका को अधिक पालूत बनाने, उसकी स्वतंत्रता पर नकेल डालने की कोशिश जनवरी माह से चल रही है, जबसे नेतन्याहू प्रधानमंत्री बने हैं, जिसने इज़रायली समाज में व्यापक जनांदोलन को जन्म दिया है, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया था. न्यायपालिका पर नकेल डालने के इस प्रयास का विरोध बुद्धिजीवी तबके में भी पहुंचा है.

मार्च माह की शुरूआत में तेल अवीव की सड़क पर जुलूस में चलते हुए अग्रणी अकादमिक और लेखक युवाल नोवा हरारी ने नेतन्याहू को चेतावनी देते हुए कहा था कि ‘नेतन्याहू अपनी बग़ावत को रोक दो वरना हम तुम्हें रोक देंगे.’

जनता के प्रचंड विरोध को देखते हुए, इस कदम से सिविल सोसाइटी में बढ़ती दरार को मद्देनजर रखते हुए और यहां तक कि सेना के रिजर्विस्टों द्वारा इस कदम के विरोध में अपनी सेवाएं देने से इनकार कर देने से फिलवक्त़ नेतन्याहू सरकार ने अपने इस कदम को स्थगित किया है, लेकिन वक्त़ आने पर इस कदम को वह आगे अवश्य बढ़ाएंगे.

क्या ट्रंप गिरफ्तार होंगे?

गौरतलब है कि अपने ‘दाग़ अच्छे हैं’ इसे प्रमाणित करने की कवायद में विश्व नेताओं में नेतन्याहू अकेले नहीं है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप को देखें – जो पद पर रहते हुए नेतन्याहू के साथ अपनी दोस्ती और आत्मीय संबंधों की अक्सर बात करते थे- विश्लेषकों के मुताबिक उनकी कानूनी चुनौतियां इन दिनों बढ़ती जा रही हैं.

उन्होंने पिछले सप्ताह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा लेकर ऐसे फोटो भी जारी किए थे कि उन्हें पुलिस गिरफ्तार कर रही है. वर्ष 2024 के राष्ट्रपति चुनावों में अपनी दावेदारी ठोकने के लिए व्याकुल ट्रंप के बारे में कहा जा रहा है कि मुमकिन है कि अमेरिका के इतिहास में वह ऐसे पहले पूर्व राष्ट्रपति हैं, जिन पर औपचारिक आरोप लगे हैं.

यह मामला वर्ष 2016 के चुनावों,जिसमें ट्रंप  राष्टपति चुने गए थे, के पहले एक पोर्न अभिनेत्री को अपना मुंह बंद रखने के लिए ट्रंप के एक सहयोगी द्वारा किए गए भुगतान से जुड़ा है, ताकि वह राष्ट्रपति के चुनाव में खड़े ट्रंप के साथ अपने अंतरंग रिश्तों का इजहार न करे. इस मामले में ट्रंप  के सहयोगी उस शख्स को सज़ा भी हो चुकी है और अब कयास लग रहे हैं कि ट्रंप भी जेल जा सकते हैं.

ध्यान रखने लायक बात है कि विगत दशकों से ट्रंप के खिलाफ लगाए जा रहे विभिन्न आरोपों, जो बाकायदा दस्तावेजीक्रत भी हैं- जैसे फर्जी विश्वविद्यालय, कोविड महामारी को खारिज करने की कोशिश, चुनावी घपलों के बारे में सरासर झूठ का प्रसार, चुनावों में हार के बाद पद छोड़ना न पड़े इसलिए दंगे को भड़काने की कोशिश आदि- के बावजूद उन्हें पहले कभी दंडित नहीं किया जा सका है.

इतना ही नहीं महिलाओं को वह किस तरह बेइज्जत करते हैं, उनके बारे में बेहद हल्की, भद्दी बातें करते हैं, इसके प्रमाणों के बावजूद न उनकी छवि पर असर पड़ा है और न ही उनकी लोकप्रियता में कभी कमी दिखाई दी है, यहां तक महिलाओं का एक हिस्सा उन्हें समर्थन देता रहा है.

जब नाश मनुज पर छाता है…’

तेजी से बदलता भारत का राजनीतिक घटनाक्रम और उससे उभर रहे प्रश्नों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि तेल अवीव या वाॅशिंग्टन डीसी या न्यूयाॅर्क की सड़कों पर जो कुछ घटित हो रहा है, उससे वह गुणात्मक तौर पर भिन्न नहीं है.

इन दिनों बहसों का फोकस एक कारोबारी दिग्गज के करिश्माई उभार पर है- सत्ताधारी जमात के सर्वोच्च नेता के साथ उसकी कथित नजदीकी के किस्से सरेआम हैं. विपक्ष के अग्रणी नेता- राहुल गांधी, जिन्हें ‘मानहानि’ के नाम पर संसद से अयोग्य घोषित किया गया, उनके द्वारा संसद के पटल पर दिए गए व्याख्यान में ऐसे तमाम तथ्य पेश किए जा चुके हैं, जो इसके बारे में बहुत कुछ बताते हैं (यह अलग बात है कि उस पूरे व्याख्यान को या विपक्ष द्वारा उठाए गए ऐसे तमाम सवालों को संसद के रिकॉर्ड से हटाया जा चुका है.)

गौरतलब है कि महज दो दशकों के अंदर फर्श से अर्श पर पहुंचे इस समूह की कार्यप्रणाली में निहित कथित अनियमतिताओं- जिसके चलते वह दुनिया के अग्रणी चंद समूहों में शुमार हो गए थे- कॉरपोरेट समूहों की जांच में मुब्तिला रहे संगठनों द्वारा बाकायदा रिपोर्ट भी जारी की जा चुकी है, जिसमें कहा गया है कि न केवल यह समूह ‘brazen stock manipulations’ (शेयर बाज़ारों में हेरफेर) करता है बल्कि ‘accounting fraud schemes’ (हिसाब-किताब में भी गबन) करता है. इस बात के भी ठोस आरोप लगे हैं कि इस समूह के संचालन में शेल कंपनियों का भी हिस्सा रहता आया है.

सबसे चिंताजनक बात है कि ऐसे अपारदर्शी समूह की कार्यप्रणाली, जिसके द्वारा सुरक्षा के क्षेत्र में भी पूंजी लगाई जा चुकी है -जिसके बारे में दुनिया में हंगामा मचा है और इस समूह को शेयर बाज़ारों में झटका भी लगा है, को लेकर जांच करने से सरकार ने बार-बार इनकार किया है.

विडंबना है कि ऐसे तमाम प्रमाणों के बावजूद सरकार ने अडानी समूह के मसले पर एक अदद बयान देने से भी इनकार किया है, संयुक्त संसदीय कमेटी बना कर जांच करने की बात दूर रही, और चर्चा न हो इसलिए भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली दफा सत्ताधारी पार्टी खुद ही सदन की कार्रवाई को निरंतर बाधित कर रही है.

याद रहे विगत लगभग चालीस सालों से संसदीय इतिहास में ऐसे मसले पर संयुक्त संसदीय कमेटी बनाने की एक स्वस्थ परंपरा विकसित हुई है, ऐसी कमेटी में पक्ष एवं विपक्ष दोनों के सांसद प्रतिनिधि के तौर पर बैठते हैं और वह ऐसे मामलों की जांच करते हैं, जिनका ताल्लुक देश की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा या अन्य जरूरी मामलों से हो. फिर चाहे बोफोर्स मुद्दा हो (1987), हर्षद मेहता स्टॉक मार्केट घोटाला (1992), केतन पारेख शेयर मार्केट घोटाला (2001), शीतल पेयों में कीटनाशक मुद्दा (2003) या टू जी स्पेक्ट्रम मामला (2011). इन सभी मामलों में संसदीय जांच समितियां बनी हैं, उनकी रिपोर्ट जारी हुईं और उसने देश के नीति निर्धारण में भी आवश्यक सुधार लाए हैं.

सवाल यह उठता है कि सत्ताधारी जमात द्वारा कायम यह चुप्पी कब तक बनी रहेगी- जिसमें न केवल भारतीय जीवन बीमा निगम और स्टेट बैंक आफ इंडिया के हजारों करोड़ रुपये स्वाहा हो चुके हैं, जिन्हें अपारदर्शी तरीके से कथित तौर पर अडानी समूह में निवेश किया गया था / या कब तक सत्ताधारी पार्टी इस मसले पर आए दिन उठ रहे तमाम असुविधाजनक सवालों को ढंक सकेगी.

क्या बला हैमोदानी माॅडल

इस संदर्भ में यह बात भी महत्वपूर्ण हो उठी है कि जितनी आक्रामक तरीके से सत्ताधारी पार्टी की तरफ से एक कारोबारी दिग्गज की हिमायत की कोशिश की जा रही है, उसने भाजपा के एक छोटे तबके में ही सही एक बेचैनी पैदा की है कि आखिर वह समूह अचानक पार्टी के लिए इतने महत्व का कैसे हो गया? इस पूरी कवायद, जिसे ‘मोदानी माॅडल’ (Modani model) कहा जा रहा है, से उसे अधिकाधिक बल मिल रहा है.

क्या है यह मोदानी माॅडल- जो शब्दावली राजनीतिक दायरों में अधिकाधिक लोकप्रिय होती जा रही है? दरअसल, राजनीति और बिजनेस के बीच आपसी रिश्ता लंबे समय से रहा है, लेकिन इसके तहत हम पा रहे हैं कि ‘बाजारोन्मुखी नीतियों के बजाय खास बिजनेस समूह उन्मुख राजनीति की दिशा में सचेतन ढंग से शिफ्ट’ (conscious shift from pro-market policies to selective pro-business politics) दिख रहा है.

दरअसल सत्ताधारी जमात ने यह उम्मीद की थी कि आननफानन तरीके से राहुल गांधी की सदस्यता समाप्त करने के बाद न केवल कांग्रेस बल्कि समूचे विपक्ष को बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करना पड़ेगा, उनमें सुस्ती छा जाएगी, लेकिन इसके बिल्कुल उलट हुआ है.

न केवल अपने अग्रणी नेता की सदस्यता समाप्ति के बाद समूची कांग्रेस नए सिरे से लामबंद हुई है, भारत जोड़ो यात्रा की अभूतपूर्व सफलता से वह पहले से अधिक उर्जा से भरी थी, बल्कि भाजपा विरोधी उन पार्टियों का एक हिस्सा, जो अपने निजी कारणों से कांग्रेस से भी दूरी बनाए रखता था, अक्सर तीसरे मोर्चे का राग अलापता रहता था, उसे भी लोकतंत्र के सामने खड़ी इस गंभीर चुनौती का एहसास हुआ है और अपने मतभेदों का फिलवक्त़ अलग रखते हुए वह कांग्रेस के साथ अधिक समन्वयन की मुद्रा में है.

विगत कुछ दिनों से संसद के अंदर तथा बाहर सत्रह से अधिक पार्टियों के बीच एक बेहतर समन्वयन दिखा है, जो इस बात का संकेत देता है. तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और भारतीय राष्ट्र समिति जैसी पार्टियां भी अब साझा कार्रवाइयों में संलग्न हैं.

तय बात है कि लोकतंत्र पर हुए इस अभूतपूर्व हमले और विपक्ष के बीच बढ़ते समन्वयन ने तमाम नई संभावनाएं पैदा की है. इस बात के भी कयास लगाए जा रहे हैं कि सत्ताधारी पार्टी आने वाले चंद दिनों में ही संसद सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर देगी.

अगर ऐसा हुआ तो इन सभी पार्टियों को जनता के बीच जाकर यह खुलकर बताने का मौका मिलेगा कि आखिर एक खास पूंजीपति घराने को बचाने के लिए सरकार इतनी बेचैन क्यों हैं, भारतीय जीवन बीमा निगम, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों के हजारों करोड़ रुपये- जो आम जनता की गाढ़ी कमाई से वहां पहुंचे थे- जिस कंपनी के कारोबार में स्वाहा हो गया आखिर उस पर सरकार की इतनी मेहरबान क्यों हैं?

एक तरफ अडानी समूह के शेयरों की कीमत लगातार गिरती जा रही है, उसमें पैसा निवेश करने से लोग, समूह हिचकिचा रहे हैं, उस वक्त आखिर ईपीएफओ (एम्लॉयज प्रोविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन) जिसमें तीस करोड़ से अधिक कामगारों, कर्मचारियों का पैसा लगा है, जो उनके भविष्य का एकमात्र सहारा है, उसके पैसे किसके आदेश पर अगले छह माह के लिए अडानी समूह में लगाए जाएंगे?

हम संभावनाओं से घिरे हैं…

कहा जाता है कि राजनीति में परसेप्शन (धारणाओं) का बहुत महत्व होता है, यूपीए-दो के दौरान हम देख चुके हैं कि 2जी घोटाले के नाम पर कांग्रेस को लेकर एक खास किस्म की छवि बनाई गई- जबकि बाद में यह साफ हुआ कि ऐसा कुछ भी नहीं था. अदालत ने फैसला दिया कि ‘कुछ लोगों ने चुनिंदा तथ्यों को चालाकी के साथ एकत्रित करके एक स्कैम को निर्मित किया’ और सभी को बाइज्जत बरी किया.

कॉरपोरेट मीडिया के एक हिस्से तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ऐसा वातावरण निर्मित करने में खूब मेहनत की थी. लेकिन इस नकली स्कैम से कांग्रेस को तो नुकसान उठाना पड़ा. और भारत के लोकतंत्र को भी गहरी चोट लगी.

अडानी समूह के प्रति सरकार की कृपादृष्टि महज किसी परसेप्शन का मामला नहीं है, उसके पीछे ठोस तथ्य हैं. और रफ्ता-रफ्ता ही सही यह बात आम जनता तक भी पहुंच रही है. ‘मोडानी माॅडल’ की यह चर्चा जितनी दूर तक फैलेगी, सत्ताधारी पार्टी को अपने आप को जनता की निगाहों में बनाए रखना अधिकाधिक मुश्किल होता जाएगा.

जिस जनता ने कभी ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ के नारे पर यकीन किया था, वह पलटकर पूछेगी कि क्या इस नारे का असली मतलब चंद दरबारी पूंजीपति मालामाल होते जाएं और जनता का बड़ा हिस्सा उसी मुफलिसी, बदहाली, भुखमरी की जिंदगी बिताता रहे. वैसे सवाल जितने भी उछले यह तो स्पष्ट है कि अपने आप को यशस्वी कहलाने वाले मुखियाजी पर उसका कोई असर नहीं पड़ेगा, वह उतनी ही ‘शान के साथ आगे बढ़ते जाएंगे.’

(सुभाष गाताडे वामपंथी एक्टिविस्ट, लेखक और अनुवादक हैं.)