बढ़ते यौन अपराधों को रोकने के लिए पॉर्न पर बैन लगाने से आगे सोचना होगा

निर्मम बलात्कार या यौन अपराधों के कई मामलों में अपराधी का पॉर्न देखने का आदी होना बड़ी वजह बनकर सामने आया है. पॉर्न देखने के मामले में भारत विश्व में तीसरे नंबर पर है, जिसमें 48% दर्शक युवा है. ऐसे में ज़रूरी है कि किशोर होते बच्चों को स्कूलों और सामुदायिक स्तर पर 'पॉर्न की सच्चाई’ को लेकर शिक्षित किया जाए.

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(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Pixabay)

निर्मम बलात्कार या यौन अपराधों के कई मामलों में अपराधी का पॉर्न देखने का आदी होना बड़ी वजह बनकर सामने आया है. पॉर्न देखने के मामले में भारत विश्व में तीसरे नंबर पर है, जिसमें 48% दर्शक युवा है. ऐसे में ज़रूरी है कि किशोर होते बच्चों को स्कूलों और सामुदायिक स्तर पर ‘पॉर्न की सच्चाई’ को लेकर शिक्षित किया जाए.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Pixabay)

साल 2018 में पॉर्नहब द्वारा जारी एक अध्ययन रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया कि पॉर्न देखने के मामले में भारत विश्व में तीसरे पायदान पर है, जिसमें 48 फीसदी दर्शक युवा है. पॉर्न पर आधारित इस अध्ययन को मानें, तो भारतीय युवा कम उम्र से ही पॉर्न देखना शुरू कर देते हैं, जबकि 24 साल या उससे कम उम्र के युवा सबसे ज्यादा पॉर्न देखते हैं.

इसी बीच, बेंगलुरु के 10 स्कूलों में हुए हालिया एक सर्वे के मुताबिक, 400 में से 70 फीसदी बच्चों ने 10 साल की उम्र से ही इंटरनेट पर पॉर्न देखना शुरू कर दिया था. जबकि ‘वेलोसिटी एमआर’ नामक एक रिसर्च एजेंसी के अध्ययन के अनुसार 10 में से 9 माता-पिता अभी भी यही सोचते है कि बच्चे इंटरनेट का इस्तेमाल केवल अपनी पढ़ाई करने के लिए करते है- पॉर्न देखने के लिए नहीं.

पॉर्न देखने से जुड़े यह आंकड़े बेहद आपत्तिजनक है. जहां बढ़ती उम्र के बच्चे स्मार्ट फोन और इंटरनेट की सुलभता के चलते पॉर्न देखने के आदी होते जा रहे है, वही पॉर्न देखने के कारण उनके दिमाग में विकृत और असुरक्षित सोच पैदा हो रही है, जोकि उन्हें मानसिक रूप से यौन-हिंसा के लिए तैयार व प्रेरित कर रही है. आधुनिक मनोवैज्ञानिक अध्ययनों का यह कहना है कि जिन कार्यों और बातों को हम बार-बार देखते, सुनते, कहते या करते हैं, वे काफी हद तक हमारे मन-मस्तिष्क और निर्णयों का स्वरूप तय करते है.

हालिया उदयपुर (राजस्थान) के मावली क्षेत्र में घटित एक नाबालिग से क्रूरता के मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला. चार्जशीट के मुताबिक, आरोपी पॉर्न फिल्में देखने का इतना शौक़ीन था कि उसने घटना वाले दिन 30 बार हिंसात्मक-पॉर्न-वीडियो देखी और उससे कुंठित होकर बच्ची के साथ बर्बरता की. इसी प्रकार सीरियल किलर रविंदर कुमार के बारे में भी दिल्ली पुलिस ने यही खुलासा किया कि आरोपी बचपन से अपने सीडी प्लेयर पर भयानक पॉर्न फिल्में देखने का आदी था, जिसके चलते उसने वर्ष 2005 और 2015 के बीच 30 मासूम बच्चियों से दरिंगी कर उनकी हत्या कर दी.

कैसे करें सामना

पॉर्न-से-हिंसा रोकने के लिए स्कूलों और मोहल्ला सुरक्षा समितिओं में ‘पॉर्न की सच्चाई’ के पाठ पढ़ाना शुरू करने होंगे, ताकि किशोर होते बच्चे यह समझ सके कि जो चीज़ पॉर्न-वेबसाइट पर दिखाई जाती है वह सामान्य या असल सेक्स-जीवन का हिस्सा नहीं, बल्कि मानव-कामुकता का वो नज़रिया है जो आक्रामक और हिंसात्मक यौन क्रियाओं के लिए उकसाने वाले रवैयों को बढ़ावा देती है.

यह शिक्षा शीघ्र प्रभावित होने वाले किशोरों को सेक्शुअल-मीडिया के बारे में तर्कसंगत रूप से सोचने व उसका अर्थ समझने के लिए तैयार करेगी, जिससे वे यह पहचान सकेंगे कि आत्म सुख की आड़ में पॉर्न द्वारा सिखाए जा रहे अतिरंजित व काल्पनिक सबक न केवल महिलाओं का शोषण कर उन्हें नीचा दिखाते है, बल्कि आपसी रिश्तों को भी शर्मसार करते है.

यौन हिंसा के जोखिम (रिस्क फैक्टर्स) पता लगाने हेतु राजस्थान में स्थित सेंटर फॉर क्रिमिनोलॉजी एंड पब्लिक पॉलिसी द्वारा क्राइम-हॉटस्पॉट्स में किए गए क्षेत्र अन्वेषण से यह जानने को मिला है कि पॉर्न फिल्में युवाओं को वास्तविक सेक्स जीवन के प्रति शारीरिक और मानसिक रूप से असंवेदनशील बना देती है, जिसके चलते उनका दिमाग मारपीट और गाली-गलौज दिखाने वाले हिंसक दृश्यों को ही कामोत्तेजना का जरिया मानने लगता है. लेकिन वे यह भूल जाते है कि पॉर्न में दिखने वाले पात्रों को हिंसा झेलने व उनकी इज़्ज़त के साथ खिलवाड़ होते देख कैसा महसूस होता है.

अतः पॉर्न से यौन हिंसा की वारदातों को रोकने ने लिए अपराधशास्त्रियों की मदद से युवा किशोरों को ‘विक्टिम-एम्पथी ट्रेनिंग’ देनी होगी, जो अक्सर जेलों में यौन अपराधियों के सुधार के लिए दी जाती है. इस ट्रेनिंग से यूजर्स/दर्शक के मन में पॉर्न अभिनेत्रियों के खिलाफ अमानवीय बर्ताव को लेकर जिम्मेदारी, संवेदना और दया-भावना उजागर होगी और ऐसे यौन दुर्व्यवहार से औरतों पर पड़ने वाले नुकसानदेह प्रभाव की समझ भी उनमें विकसित होगी. इसके अतिरिकत यह ट्रेनिंग युवा होते किशोरों को एक स्वस्थ और सकारात्मक पुरुषत्व व सेक्सशुअलिटी अपनाने का सबक देगी, जिसकी नींव औरतों को सहयोग, सहानुभूति और इज़्ज़त देने पर आधारित होगी.

सहानुभूति प्रशिक्षण के साथ साथ, यह पहचानना भी जरूरी है कि पॉर्न फिल्में किशोरों की ‘सेक्शुअल-स्क्रिप्ट’ को अक्सर एक जोखिम भरा आकार दे देती है, जिसके मुख्यतः छह तत्व माने जाते है: 1) यौन संपर्क के दौरान या उससे पहले शराब पीना; 2) आकस्मिक यौन संबंध बनाना पसदं करना; 3) अपने यौन इरादों के बारे में अस्पष्ट रूप से बातें करना; 4) यौन संपर्क के दौरान निरोध का इस्तेमाल न करना; 5) जोर-जबरदस्ती से यौन संपर्क स्थापित करने की कोशिश करना; और 6) जान-बूझकर पीड़िता को बलात्कार जैसी अत्यधिक क्षति पहुंचाना. ऐसी असुरक्षित ‘सेक्शुअल-स्क्रिप्ट’ न केवल घातक रेप मिथकों(जैसे कि यह गलतफहमी या त्रुटिपूर्ण समझ रखना कि औरतें जबरन यौन संबंध के प्रयासों को पसंद करती है, भले ही उन्होंने पहले यौन संपर्क के लिए अनिच्छा जताई हो) को स्वीकारना सिखाती है, बल्कि यौन हिंसा को सामान्यीकृत कर आक्रामक यौन उत्पीड़न और अपराध की संभावना भी बढ़ा देती है.

अतः इस अनुचित सेक्शुअल-स्क्रिप्ट को संज्ञानात्मक (काग्निटिव) और स्वभाविक (बिहेवियरल) तरीके से बदलने के लिए इन किशोरों को पॉर्न-आधारित आपराधिकी शोध और क़ानूनी शिक्षा के जरिये ‘सामाजिक सेक्शुअल-स्क्रिप्ट’ की बातों से सचेत करना होगा.

इस क्रम में सबसे पहले हमे किशोरों को यह समझाना होगा कि पॉर्नोग्राफिक कहानियों में पात्रों के आचरण व व्यवहार में अमूमन किसी भी तरह कि मनाही, रोक-टोक या प्रतिबंध नहीं दिखाया जाता. लेकिन असल जीवन में पॉर्न से प्रेरित व्यवहारों को हर हाल में गलत, अवांछनीय और आपत्तिजनक ही माना जाएगा, क्योंकि उन आचरणों पर सामाजिक और कानूनी रूप से सख्त मनाही है.

वहीं, देखा गया है कि किशोरों के बीच पॉर्न सेवन अक्सर यौन प्रतिफल (सेक्शुअल रिवॉर्ड्स) की भावना से प्रेरित होता है, न कि उसका खामियाज़ा भुगतने या कानूनी नतीजों के बारे में पूर्व विचार से. इस कारण वे केवल अपनी यौन इच्छाओं की तुरंत पूर्ति करने की सोचते है न कि ये कि उनके स्वार्थी और बेतहाशा व्यवहार के चलते उन्हें क्या खामियाजा भुगतना पड़ेगा और पुनर्बलित यौन व्यवहार से पीड़िता को कितनी हानि और क्षति पहुंचेगी. अतः किशोरों को वास्तविक यौन स्थितियों में ‘पॉर्नोग्राफिक सेक्शुअल स्क्रिप्ट’ अमल से रोकने के लिए उन्हें सतर्कता और सावधानीपूर्वक सोच-विचार करने के सबक सिखाने के साथ-साथ उनमे सचेत विश्लेषण और विलंबित संतुष्टि के मूल्य पैदा करने होंगे.

पॉर्न से बलात्कार पर लगाम लगाने के लिए यह आदर्श अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि ये मूल्य-शिक्षा बढ़ती उम्र के लड़कों को वास्तविक जीवन में यौन इच्छा पूरी करने व आनंदपूर्ण गतिविधियों में शामिल होने से पहले सचेत निर्णय, आत्मसंयम, आवेग नियंत्रण, धैर्य करने का सबक सिखाएंगी, ताकि वे अपनी कामेच्छा का गुलाम बनकर मोबाइल या लैपटॉप पर तत्काल पॉर्न देखने के आदी न हो जाए.

दूसरी ओर, ये सुनिश्चित करना होगा कि बढ़ते बच्चों और किशोरों को पॉर्न से मिल रहे सबक व आदर्शों को भुलाने की शिक्षा (अनलर्निंग शिक्षा) दी जाए, ताकि वे औरतों के व्यक्तित्व और गरिमा की परवाह करना सीख सकें और उनके साथ ऐसा बर्ताव न करे कि मानो वे कामवासना की एक चीज़ हों.

यह शिक्षा आपसी रिश्तों में पॉर्न के कारण होने वाले यौन दुर्वयवहार को रोकने में बेहद कारगर साबित होगी, खासकर उन मामलों में जहां किशोरों व युवाओं के बीच अंतरंग रिश्तों के कारण थानों में बलात्कार और हिंसा की शिकायतें दर्ज होती है. ऐसा इसलिए क्योंकि यह शिक्षा न केवल लड़कों को अपने साथी से यौन सबंध बनाने हेतु सहमति प्राप्त करना सिखाएगी बल्कि उन्हें प्रेम संबंधों में त्याग, विश्वास, अनुराग, दयालुता, उदारता और परस्परता की अहमियत भी बताएगी.

इससे लड़कों में अपने प्रेम साथी की इच्छाओं का ख़याल रखने का भाव भी पैदा होगा और वे उनकी ज़रूरतों को अपनी ज़रूरतों से पहले रखना सीखेंगे, जो कि आमतौर पर अपने यौन टेम्पलेट को जगाने व उत्तेजित करने का स्वस्थ तरीका माना जाता है. इसी दौरान यह सचेतन तरीका बातों के आदान प्रदान से रिश्तों में भावनात्मक गहराई लाने पर जोर डालेगा ताकि प्यार संबंध में प्रतिबद्ध जोड़े यौन कार्यकलाप का उच्चतम आनंद ले सके.

ये सभी कदम ‘पॉर्न-से-बलात्कार’ पर लगाम कसने में कारगर साबित होंगे. समय आ गया है कि हम पॉर्न पर प्रतिबंध लगाने की बहस में न उलझकर समुदाय-आधारित अपराध-निवारण योजनाएं लागू करने की पहल करे, जो किशोरों और युवाओं को सेक्सशुअलिटी के संबंध में उच्च मानक नैतिकता (एथिक्स), आदर्श (वैल्यूज) और चरित्र (कैरेक्टर) निर्माण करने की शिक्षा दे और उनके व्यक्तित्व को बदलें.

(लेखक उदयपुर के सेंटर फॉर क्रिमिनोलॉजी एंड पब्लिक पॉलिसी के निदेशक और चीफ क्रिमिनोलॉजिस्ट हैं.)