परवीन शाकिर: मैं अब हर मौसम से सिर ऊंचा करके मिल सकती हूं…

परवीन शाकिर की रचनाएं साहित्य में जिस स्त्री दृष्टि को लाईं, वह निस्संदेह मील का पत्थर है. पश्चिमी नारीवादी अवधारणा या उससे प्रभावित साहित्य की लोकप्रियता तो आम बात है, पर भारत-पाकिस्तान जैसे देशों की कुंठित सामाजिकता और पितृवादी संस्कृति में जब स्त्रियां अपनी अनुभूतियां दर्ज करती हैं, तो वह निज को राजनीतिक बना देने का काम करता है. 

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परवीन शाकिर. [24 नवंबर 1952-26 दिसंबर 1994] (फोटो साभार: razarumi.com)

परवीन शाकिर की रचनाएं साहित्य में जिस स्त्री दृष्टि को लाईं, वह निस्संदेह मील का पत्थर है. पश्चिमी नारीवादी अवधारणा या उससे प्रभावित साहित्य की लोकप्रियता तो आम बात है, पर भारत-पाकिस्तान जैसे देशों की कुंठित सामाजिकता और पितृवादी संस्कृति में जब स्त्रियां अपनी अनुभूतियां दर्ज करती हैं, तो वह निज को राजनीतिक बना देने का काम करता है.

परवीन शाकिर. [24 नवंबर 1952-26 दिसंबर 1994] (फोटो साभार: razarumi.com)

‘वो तेज़ रफ्तार थी, बहुत निडर थी/सारी ज़मीन जीत कर आसमान पर चली गई 
और उसकी रहमतों की बारिश में सदा भीगती रहेगी /खुशक़िस्मत लड़की 
रहमतों की बारिश में भीगने वाली ग़ज़ल /पूरी औरत की पहली ग़ज़ल 
परवीन शाकिर.’

प्रसिद्ध उर्दू शायर बशीर बद्र की लिखी इन पंक्तियों में जिनकी बात हो रही है, वे उर्दू अदब का वो चमकता हुआ नाम है जिसने अपनी 42 साल की छोटी-सी ज़िंदगी में भी साहित्य में कुछ ऐसा जोड़ा जिससे वह और विविध, समावेशी और विशिष्ट बन सका. अप्रैल 1979 में प्रधानमंत्री भुट्टो की फांसी के बाद जिस तरह पाकिस्तान के पूर्ण इस्लामीकरण की अराजक प्रक्रिया शुरू हुई और सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर देश में अव्यवस्था और संघर्ष बना रहा, उसमें साहित्य ही वह एक अदद चीज़ थी, जिसने स्थितियों के प्रति अपना असंतोष और विद्रोह बनाए रखा. पाकिस्तान की उर्दू कविता में प्रतिरोध की एक सशक्त धारा रही है और जैसे-जैसे दमन और उत्पीड़न बढ़ता गया, प्रतिरोध की यह आवाज़ उतनी ही बुलंद होती गई.

साहित्य में यह वह दौर था जब एक तरफ समाजिकता से प्रतिबद्ध विचारधारा अपने चरम पर थी, तो वहीं लेखिकाओं की एक पूरी पीढ़ी इस युग को अपनी शायरी के भिन्न-भिन्न अंदाज़ से सींच रही थी. साहित्य का यह दौर पाकिस्तानी साहित्य और संस्कृति का वह उर्वर दौर कहा जा सकता है जहां ज़ेहरा निगाह, किश्वर नाहिद, फ़हमीदा रियाज़, परवीन शाकिर, सारा शगुफ्ता, शबनम शकील, अपने स्त्रीवादी लेखन से पूरे दक्षिण एशिया के सांस्कृतिक फ़लक को समृद्ध कर रही थीं. इनकी रचनाएं पाकिस्तानी पितृसत्तात्मक समाज के लिए महज़ अपने होने से ही एक सशस्त्र क्रांति ला रही थीं. ऐसे में, राजनीतिक मंतव्य से लिखी न जाकर भी परवीन शाकिर की नज़्में, एक राजनीतिक कारवाई लगती है. उनकी शायरी में व्यवस्था और सामाजिक बंधनों के प्रति विरोध एकदम ही मुख्तालिफ़ अंदाज़ में बयान होता है. यह उनकी काव्यात्मकता का वैशिष्ट्य है, जहां स्त्री के निजी-से-निजी, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म मनोभावों को भी अभिव्यक्ति का सौंदर्य प्राप्त होता है और इस सौंदर्य से ही साहस फूटता है.

उनकी कविताओं ने साहित्य में जिस स्त्री दृष्टि का समावेश किया है, वह निस्संदेह मील का पत्थर है. पश्चिमी नारीवादी अवधारणाओं की या उससे प्रभावित साहित्य की वैश्विक लोकप्रियता तो आम बात है, पर भारत और पाकिस्तान जैसे विकासशील-तीसरी देशों की कुंठित सामाजिकता और पितृवादी संस्कृति में जब स्त्रियां अपने मन की अनुभूतियों को दर्ज करने का काम करती हैं, तो वह अपने-आप में निज को राजनीतिक बनाने देने का काम करता है. परवीन शाकिर की शायरी भी अपनी कुछ चुनिंदा नज़्मों में ही, सामाजिक विरोधाभासों का, सभ्यतागत असमानताओं से मुखर विरोध जैसा कि किश्वर नाहिद या फ़हमीदा रियाज़ की कविताएं करती हैं, दर्ज कर देती हैं.

पर शाकिर मूलतः प्रेम और उसकी असफलता का स्त्री के मानस पर पड़ने वाले प्रभावों के, उसके अंतर्जगत का चितेरा होने की दृष्टि से अधिक कारगर और प्रसिद्ध हैं. उनकी ग़ज़लें रूमानी प्रेम की, उसकी असफलता से उत्पन्न मोहभंग को दर्ज करने की दृष्टि से सर्वाधिक विख्यात हुई हैं. इन रचनाओं में महादेवी वर्मा की तरह की रहस्यात्मकता तो नहीं, पर अंतर्तम से फूटने वाली वेदना, वही चिर-परिचित है जिसकी झलक हम महादेवी के काव्य में एक अलौकिक प्रिय के संदर्भ में पाते हैं.

परवीन शाकिर की पैदाइश एक मध्यमवर्गीय परिवार में कराची में हुई थी. उनके पिता शाकिर हुसैन शाकिब, दरभंगा (बिहार) से विभाजन के बाद कराची में आ बसे थे. बहुत ही छोटी उम्र से परवीन ने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं. उनकी शुरुआती शिक्षा कराची में ही हुई, जहां उन्होंने अंग्रज़ी साहित्य और भाषा विज्ञान में विशेषज्ञता हासिल की. आगे चलकर उन्होंने पीएचडी और बैंकिंग प्रशासन में भी स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की.

आलोचक रख़्शंदा जलील के शब्दों में अगर कहा जाए तो ‘शाकिर अपने मुआसिरों में संभवतः सबसे ज़्यादा तालीमयाफ़्ता शायरा थीं.’ लंबे अरसे तक एक शिक्षक के रूप में काम करते हुए उन्होंने पाकिस्तान की सेंट्रल सिविल सर्विसेज़ (सीएसएस) की परीक्षा पास कर फ़ेडेरेल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू में बतौर अधिकारी सेवाएं दीं.

उनकी सबसे पहली रचना, काव्य संग्रह- ख़ुशबू, साल 1976 में प्रकाशित हुई. पहली ही रचना से शाकिर ने अपने समकालीन कवियों से अलग, एक विशिष्ट ध्वनि स्थापित की और उर्दू कविताओं में, विशेषकर ग़ज़लों में निजी अनुभूतियों और एक स्त्री के स्वप्न और उसकी आकांक्षा को अभिव्यक्ति देने का एक नितांत नया आयाम खोल दिया. उन्होंने सामाजिक तहज़ीब, परंपरा, मान्यताओं के प्रति लिहाज़ की रवायत से ऊपर उठकर, एक साधारण स्त्री के मनोजगत में प्रवेश कर उसे प्रकाश में लाने का काम किया.

स्त्री प्रेम के केंद्र में नहीं, बल्कि आम ज़िंदगी में किस प्रकार उसके हाशिये पर रहती है, यह स्वीकारने का साहस हमें सबसे पहले-पहल शाकिर की कविताओं में दिखता है. वह प्रेम में परित्यक्त स्त्री की अंतर्वेदना पर, बिना किसी अतिरिक्त भावुकता के यह लिखती हैं:

‘कैसे कह दूं कि मुझे छोड़ दिया है उसने
बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की.’  

यहां अपनी इस त्रासद स्थिति पर जिस रुसवाई की बात की गई है, वह समाज की रुसवाई या, उसकी लानतें नहीं है, बल्कि यह उस स्त्री का अपने आत्म के साथ चलने वाला संवाद है. जिस प्रेम की छांव में जीवन को देखने की सहज इच्छा स्त्री रखती है, उस स्वप्न के भंग होने की स्थिति में वह स्वयं से लज्जित है.  यह लज्जा इस भाव से उपजी है कि किस प्रकार पुरुष के आश्वासन पर प्रेम की अपेक्षाओं का महल निर्मित किया गया था, जिसके खंडित होने की स्थिति में अंततः रुसवाई, या लज्जा उस भीतर की स्त्री को हुई है.

यह बेबस स्थिति प्रेम में जिस स्त्री की हुई है, वह अपनी इस स्थिति को स्वीकारने का साहस रखती है, जैसा कि रख़्शंदा जलील कहती भी हैं कि ‘शायद ही कोई और औरत इतनी लाचारी और नाकामयाबी के मायनों को अपनी शायरी में इस कदर हसीन अंदाज में पिरो पाती.’ पर यहीं पर वह स्त्री पुरुष के सामाजिक स्थान और महत्व की ग़ैर-बराबरी की भी पूरी पोल खोलते हुए कहती हैं:

‘मैं सच कहूंगी , मगर फिर भी हार जाऊंगी 
वो झूठ बोलेगा और लाजवाब कर देगा.’

यह समाज स्त्री-पुरुष के बीच सामाजिक अंतर को इस तरह सामान्यीकृत और संस्थात्मक बना देता है कि एक स्त्री के सच की कहीं सुनवाई नहीं है और वहीं दूसरी ओर एक पुरुष के झूठ को भी किसी के विरोध से नहीं गुज़रना पड़ता. स्त्री की दोयम सामाजिक स्थिति, दक्षिण एशियाई समाज के लिए इतनी सहज और मान्य बात लगती है, कि स्त्री के रूप में जन्म लेने मात्र से ही मानो उसे उम्रक़ैद मुक़र्रर हो जाती है.

अपनी एक नज़्म में शाकिर ने इस सामाजिक रूढ़ियों के बरअक्स स्त्री की कामनाओं और उसकी आकांक्षाओं को प्रतिध्वनि देते हुए लिखा है कि कैसे स्त्री अपने एकांत में बिना किसी बाह्य छद्म के सिर्फ स्त्री होती है:

‘अपने सर्द कमरे में/मैं उदास बैठी हूं
नीम वा दरीचों में/नम हवाएं आती हैं 
मेरे जिस्म को छूकर/आग-सी लगाती हैं 
तेरा नाम ले-लेकर/मुझको गुदगुदाती हैं 
काश मेरे पर होते/तेरे पास उड़ आती
तुझको छू के लौट आती/ मैं नहीं मगर कुछ भी 
संगदिल रिवाजों के/ आहनी हिसारों में 
उम्र कैद की मुल्ज़िम/सिर्फ एक लड़की हूं’ 

यह संगदिल रिवाज़  ही हैं जो सामाजिक प्रतिबंधों की शक्ल में स्त्री को उसकी हदों में, उसकी चहारदीवारी में घेरे रखने के लिए बाध्यताएं खड़ी करते हैं. शाकिर की शायरी में इसलिए इन रिवाज़ों से प्रतिरोध मुखर ही नहीं, बल्कि उस कथ्य के भीतर, उसके शब्दों में समाया हुआ है. उनकी नज़्में और ग़ज़लें पढ़ते हुए, पहले तो वह मर्मस्थल को-संवेदनाओं को छूती है, और फिर बाद में उनके व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक अर्थ खुलते हैं.

एक भिन्न धरातल पर उनकी शायरी को लोकतांत्रिक संस्थाओं की वकालत में भी खड़े होते देखा जा सकता है. इस ढंग की उनकी कविताओं की अंतर्वस्तु में एक सुव्यवस्थित राजनीतिक प्रयोजन बग़ैर किसी दुराव-छिपाव के साफ झलकता है. नज़्मों में विशेषकर राजनीतिक उथल-पुथल और सामाजिक समस्याओं के प्रति उनकी व्यंग्यात्मकता की धार देखते ही बनती है. यहां उनके भीतर का रूमानी शायर, एक अति-संवेदनशील स्त्री-मन, अपने आस-पास की जमीनी हक़ीक़तों के प्रति उदासीन नहीं बना रह पाता है और उनकी प्रतिबद्ध रचनाशीलता अपने उफ़ान पर दिखाई पड़ती है.

हमारे समाज में स्त्री की जो प्रचलित रूढ़ छवि है, शाकिर ने उसे भी, उसी शिद्दत के साथ चित्रित किया है, ताकि हमें अपने मुआशरे का सच पता चल सके. शाकिर की कई नज़्मों में हमें कुछ ऐसे चित्र दिखलायी पड़ते हैं जिनसे गुज़रते हुए एक संवेदनशील पाठक, स्त्री की सामाजिक नियति का सहज ही अंदाज़ा लगा सकता है.

जहां एक मुश्किल सवाल  में वह टाट के परदों के पीछे से झांकती एक छोटी-सी लड़की के फूलों जैसे ताज़े चेहरे का जिक्र करती हैं, वहीं लेखिका की नजरें जब उसके हाथों पर जाती है, तब हैरानी मिश्रित दुख के साथ ही वह कह उठती हैं ‘लेकिन उसके हाथ में/तरकारी काटते रहने की लकीरें थीं/और उन लकीरों में/बर्तन मांझने वाली राख जमा थी/उसके हाथ/उसके चेहरे से बीस साल बड़े थे’, तो वहीं निकनेम कविता में वह हमारे समाज में स्त्री को एक बेजान गुड़िया के बरअक्स रखते हुए, उसकी उसी त्रासद नियति की ओर संकेत करती हैं, जो उस गुड़िया की होती है, जिससे बच्चे का मन जब भर जाता है और वो उसे उठाकर ताक़ पर रख देता है. शाकिर इस सामाजिक नियति पर व्यंग्य करते हुए लिखती हैं:

‘तुम मुझको गुड़िया कहते हो/ ठीक ही कहते हो 
खेलने वाले हाथों को मैं गुड़िया ही लगती हूं
मांग भरो, सिंदूर लगाओ/ प्यार करो, आंखों में बसाओ
और फिर जब दिल भर जाए तो/दिल से उठा के ताक़ पे रख दो 
तुम मुझको गुड़िया कहते हो/ ठीक ही कहते हो’ 

परवीन शाकिर की ग़ज़लें, उनकी शायरी, स्त्री को अभिव्यक्ति का ऐसा सशक्त मुहावरा देती है, जो परंपरा की अंधभक्ति करता, एक धर्मभीरु -पितृसत्तात्मक समाज उससे छीन लेना चाहता है. वह स्त्री को उसकी छीनी हुई भाषा लौटाती हैं. उसे अपने हिस्से की ज़मीन और आसमान मांगने का साहस मुहैया कराती है. वह उर्दू साहित्य की उन आवाज़ों में हैं, जिन्होंने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हुए आत्मकथात्मक शैली और स्त्रीलिंग का इस्तेमाल किया है.

क्योंकि इससे पहले पुरुषप्रधान काव्य परिवेश में प्रायः पुरुष दृष्टि ही अपने स्त्री ‘प्रियतम’ पर बात करती थी. शाकिर ने अपनी कविताओं में एक स्त्री को अपने पुरुष प्रेमी को संबोधित करते हुए दिखलाया है. उनके यहां स्त्री, अब महज़ एक निष्क्रिय माशूक या प्रेयसी नहीं है. उनकी कविताओं से झांकती स्त्री, एक नई स्त्री है, जो अपनी आकांक्षाओं और कामनाओं के लिए सतर्क है. यह वह अस्तित्वचेता मानवी है जिसे अपनी देह और मन दोनों ही की इच्छाओं के स्वीकार से कोई परहेज नहीं है.

अपनी नज़्म सिज़्दा  में वह स्वीकार करती हैं कि ‘जिस्म की चाह में/आतिश-ए-लम्स से जब रग-ए-जां चटख़ने लगे, और मन-ओ-तू के माबैन/इक बाल से बढ़के बारीक लम्हा भी आख़िर बिखरने लगे/उस समय/सिर्फ़ मेरे निगाहों का दुख देखकर/हर तलब की ज़बां काट देना.’

अपनी एक अन्य नज़्म हनीमून  में वह, प्रेम के, स्पर्श के सुख की अनुभूति को एक स्त्री की दृष्टि से अभिव्यक्त करते हुए लिखती हैं,

‘मेरे तन की प्यासी शाख़ के सारे पीले फूल गुलाबी होने लगे हैं/खुशबू के बोसों से बोझल मेरे पलकें/ ऐसे बंद हुई जाती हैं. जैसे सारी दुनियां एक गहरा नीला सय्याल है/जो पाताल से मुझको अपनी जानिब खींच रहा है. और मैं तन के पूरे सूख से/इस पाताल की पहनाई में/ धीरे-धीरे डूब रही हूं.’

स्त्री की समाज पोषित रूढ़ छवि जहां वह सिर्फ पुरुष की दृष्टि से परिभाषित-पूजित होती आई है, शाकिर की कविताएं उस छवि, उस रूढ़ मिथक को तोड़कर, उसे सामाजिक न्याय के लंबे संघर्ष में एक सक्रिय भागीदार बना देती है. वर्किंग वूमन  शीर्षक अपनी एक नज़्म में वह इस नई स्त्री के किरदार को उकेरती हैं:

‘मेरे सारे पत्तों की शादाबी
मेरी अपनी नेक कमाई है
मेरे एक शिगूफ़े पर भी 
किसी हवा और किसी बारिश का बाल बराबर कर्ज़ नहीं है 
मैं जब चाहूं खिल सकती हैं 
मेरा सारा रूप, मिरी अपनी दरयाफ्त है 
मैं अब हर मौसम से सर ऊंचा करके मिल सकती हूं.’ 

पर यह नया किरदार कहीं भी स्वयं को अहं ब्रह्मास्मि नहीं मानता, क्योंकि अपनी तमाम सफलताओं के बावजूद भी उसे जीवन में प्रेम की चाह और आवश्यकता है, क्योंकि उसके अंदर की ये बहुत पुरानी बेल ‘कभी-कभी- जब तेज़ हवा हो, किसी बहुत मजबूत शजर के तन से लिपटना चाहती है.’

एक स्त्री का प्रेम किस प्रकार पुरुष को समृद्ध कर सकता है, शाकिर उसकी हिमायती हैं. अपनी महानता और शान में गर्वोन्नत पुरुष की दशा ‘चीड़ के मग़रूर पेड़’ की तरह होती है, ‘जिनकी आंख/अपनी क़ामत के नशे में सिर्फ ऊपर देखती हैं’ और जिनके लिए वह कहती हैं,

‘अपनी गर्दन के तनाव को कभी तो कम करें/ और नीचे देखें/ वो घने बादल जो उनके पांव को छूकर गुज़र जाते हैं/जिनको चूम सकते हैं/वो पौदे/प्यार के इस वालिहाना लम्स से कैसे निखर आए.’

शाकिर की स्त्री प्रेम में जिस अपनत्व और ऊष्मा से वंचित है, वह सबसे अधिक मार्मिक वहां हो आती है, जहां वह अपने जीवनसाथी के प्रति संबोधित इन पंक्तियों में कहती हैं,

‘धूप में बारिश होते देख के 
हैरत करने वाले!
शायद तूने मेरी हंसी को 
छूकर 
कभी नहीं देखा.’

महज पांच पंक्तियों में देखा जाए तो शाकिर, स्त्री के अंतरतम तक पहुंचने की क्षमता रखती हैं, जहां वह अपने साथी से स्वयं को समझने का भाव अभिव्यक्त करती है. स्त्री की हंसी में जिस वेदना को घुलता हुआ कवयित्री देख पाती है, उसे देखने की दृष्टि का सामाजिक अभाव उसके स्वयं के जीवनसाथी में भी पाया जाता है. यह कमोबेश उसी स्थिति के समान है जहां धूप में होने वाली बारिश को पर सब बस कौतूहल करते हैं, पर उससे आगे देखने की क्षमता उनमें नहीं होती है.

प्रेम की भाव-विह्वलता के गीत गाने वाली शाकिर हालांकि अपने गीतों के जरिये ही यह भी बतला देती हैं कि ‘इश्क में दर्द-ए-दिल और मायूसियों’ के सिवाय कुछ भी हासिल नहीं है. यहां प्रेम में धोखा खा गया मन, किस अविश्वास और संशय की मन:स्थिति में रहता है , वह उनकी कुछ कविताओं में स्पष्ट रूप से दिखता है. मसलन, एक नज़्म ओथेलो  में जो स्त्री है वह इस संशय में है कि उसका प्रेमी किसी और से बात तो नहीं करता है. वह लिखती हैं:

‘अपने फोन पे अपना नंबर बार-बार डायल करती हूं /सोच रही हूं 
कब तक उस का टेलीफोन इंगेज़ रहेगा /दिल कुढ़ता है 
इतनी-इतनी देर तलक /वो किस से बातें करता है.’

इसी प्रकार एक अन्य नज़्म ड्यूटी  में जो स्त्री है उसे यह पूर्ण विश्वास है कि उसका प्रेमी पुरुष उसके साथ छल कर रहा है. वे लिखती हैं कि ‘जान तुम्हारी मजबूरी को/अब तो मैं भी समझने लगी हूं/ शायद इस हफ्ते भी तुम्हारे चीफ़ की बीवी तन्हा होगी.’ स्त्री का पुरुष के प्रति जो संशय है, जो अविश्वास है, वह लेखिका की अपने जीवन के तिक्त अनुभवों से रिसने वाला विषाद है.

स्वयं शाकिर की कम उम्र में हुई शादी की परिणति सुखद नहीं हुई थी. अपने शौहर से अलहदगी और अंततः तलाक़ और उसके बाद एक अकेली कामकाजी मां के रूप में अपने बेटे के पालन-पोषण का दायित्व- यह सब कुछ ऐसी परिस्थितियां थीं, जिसने उनके भीतर की स्त्री में प्रेम और जीवन की कोमल अनुभूतियों के प्रति ही नहीं, बल्कि जीवन के प्रति भी मोहभंग उत्पन्न कर दिया था. इसलिए उनकी शायरी में भी प्रेम के तमाम कोमलतम चित्रों के बीच भी अवसाद और दुख की छायाएं झांक-झांक जाती हैं.

उनके यहां इश्क वह सफर है जिसमें ‘चलने का हौसला नहीं, रुकना मुहाल कर दिया/ इश्क के इस सफर ने तो मुझको निढाल कर दिया’ का भाव अधिक मुखरित है. यह उस स्त्री का आत्मस्वीकार है, जिसने अपना सर्वस्व अर्पित कर के अंततः यही जाना है कि उसकी सारी आहुतियों का कोई प्रतिदान उसे समाज देने के लिए तैयार नहीं है. उनके लिए बेवफ़ा महबूब उस खुशबू की तरह है, जो फूल से अलग होकर हर तरफ फैलता हुआ जाता है, उसका अपना अस्तित्व समाप्त नहीं होता, पर फूल वहीं-का-वहीं रहता है. उनकी एक प्रसिद्ध ग़ज़ल इस संवेदना को मार्मिक तरीके से पकड़ती है:

‘वो तो खुशबू है, हवाओं में बिखर जाएगा/मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा
वो हवाओं की तरह ख़ाना-ब-जां फिरता है/एक झोंका है जो आएगा गुज़र जाएगा.’

पर इस प्रेम की आकांक्षा रखते हुए भी वह उसके लिए बहुत आशावान नहीं हैं. यह संवेदनशीलता उनकी शायरी में एक गहरी उदासीनता और प्रेम के प्रति मोहभंग लाती हैं जो उनकी कई ग़ज़लों में ध्वनित होता है.

‘मेरी तलब था एक शख्स वो जो नहीं मिला तो फिर/हाथ दुआ से यूं गिरा भूल गया सवाल भी’ या ‘जब सितारे ही नहीं मिल पाए/ ले के हम शम्स-ओ-क़मर क्या करते’ या ‘शाम होने को है और आंख में इक ख्वाब नहीं/कोई इस घर में नहीं रोशनी करने वाला’, यह सब उनकी इसी मोहभंग की ज़बानियां हैं.

पर शाकिर की कविता इस मोहभंग पर ही नहीं खत्म हो जाती. अपने जीवन के अनुभवों और सामाजिक यथार्थ से उपजा उनका दंश भले ही उनकी ग़ज़लों-नज़्मों में अपनी अभिव्यक्ति पाता रहा, पर एक व्यापक स्तर पर उनकी कविता जीवन के सुखद, सुनहले, उज्ज्वल पक्षों को भी देखने की मुंतज़िर थी. वह प्रेम में अपनी एकनिष्ठता पर गर्व करती हैं और हृदय के अंतस्तल में उस प्रेम की शक्ति को आंकना चाहती हैं.

प्रतीक्षा में रत उनकी कविताओं की स्त्री की आंख आज भी यह मानती है कि ‘वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी/इंतिज़ार उसका मगर कुछ सोचकर करते रहे.’ पर अगले ही पल इस प्रतीक्षा को एक छलना मान कर मानो यह ऐलान करती है ‘उसकी मुट्ठी में बहुत रोज़ रहा मेरा वजूद, मेरे साहिर से कहो अब मुझे आज़ाद करे.’ यह ऐलान स्त्री को अपने स्व को पाने का, अपने भीतर की स्त्री को तमाम बंदिशों यहां तक उस इश्क की दुखद स्मृतियों से मुक्त कर देने का घोष है.

देखा जाए तो, शाकिर की ग़ज़लों की मुख्य विषयवस्तु स्त्री-पुरुष संबंधों के विविध रूपों पर, विशिष्ट अनुभवों पर आधारित है. यहां प्रेम की चाह भी है और उस प्रेम की असफलता से उत्पन्न विषाद भी, यहां स्त्री को प्रेम के सवाल पर कमज़ोर भी दिखलाया गया है तो वहीं स्थिति को स्वीकार कर लेने का साहस भी, यहां स्त्री नितांत स्त्री बनकर उभरती है तो वहीं एक सामाजिक मनुष्य भी, मोहब्बत में मायूसी की अनुभूतियां हैं तो वहीं प्रेम की सार्वभौमिकता पर असीम आस्था भी.

पर प्रेम और रूमानी भावों के चित्रों की बहुलता के बावजूद भी यह शाकिर की भाषा और शैली की विशिष्ट भंगिमा की ही बदौलत है कि ,कहीं भी हमें दुहराव और बोझिलता नहीं दिखलाई पड़ती है.

और उसकी वजह, जैसा कि रख़्शंदा जलील कहती हैं, ‘उर्दू ज़बान पर उनकी महारत, उनका हुनर, शायरी के स्वरूप, ग़ज़ल और नज़्म दोनों पर उनका बेमिसाल इख़्तियार है, जिसमें वह इन अहम मजमून का तफ़सील से बयां करने के लिए कुछ नई कैफ़ियतों और नई तश्बीह की तख़्लीक करने में कामयाब होती है.’

शाकिर की शायरी की वैश्विक लोकप्रियता उनके गरिमामयी और आकर्षक व्यक्तित्व की वजह से, और अपनी शायरी के पुरकशिश पाठ से और भी बहुगुणित हुई. शाकिर ने उर्दू कविता को स्त्री की वह दृष्टि दी जहां आदर्श और परंपरा के नाम पर स्त्री अपनी इच्छाओं और कामनाओं का दमन नहीं करती है. वह प्रेम के उस रूप को रेखांकित करती हैं जो अपनी निजता में भी सार्वभौमिक है, और सभी रचनात्मक कार्यों को स्पंदित करने वाली ऊर्जा है और इसलिए प्रेम को उसकी व्यापकता में चित्रित करने वाला उनका साहित्य हर युग में उतना ही प्रासंगिक रहेगा.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.)

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