कला-मर्मज्ञ यतीन्द्र मिश्र के नए कविता-संग्रह का शीर्षक ‘बिना कलिंग विजय के‘ आपको एकबारगी चौंका सकता है कि जीवन का उत्सव मनाता आया कवि इस बार क्या नई राह पर चल पड़ा है. जब किताब धीरे- धीरे खुलती है तो यतीन्द्र अपने अलग बोध और कहन की छवि के साथ प्रस्तुत होते हैं, कहीं अधिक बुलंद, और गहन.
यतीन्द्र की कविताओं में जीवन बहुरंगी होकर एक सूफियाना रक्स करता है. उनका स्वर कहीं बहुत ऊपर नहीं जाता. उनकी कविताओं में अनुस्यूत विचार महीन होकर बड़ी दूर तक मार करते हैं. जैसे थोड़ी देर की बारिश के बाद किसी पेड़ के पत्तों से पानी झरता रहता है. वे अपनी कविताई में मंच से आह्वान नहीं करते. वे कदमताल करते हुए पाठक को हाथ पकड़कर या उसके कंधे पे हाथ रखके उसे दूर तक ले जाते हैं. पाठक को थोड़ी देर बाद पता चलता है कि उसके भीतर कुछ हलचल मचा गया है कोई. ठहरे पानी में कंकरी मार गया कोई.
वाणी प्रकाशन से आई इस किताब की कई कविताएं या लगभग हर कविता उन्हें भारतीयता में ओतप्रोत कवि साबित करती है, जिन्हें पश्चिम की हवा छूती ही नहीं है. वरना बहुतेरे कवियों की कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद के बाद उनमें भारतीय सुगंध खोजना ही मुश्किल होता है, पर यतीन्द्र की कविताओं में भारतीयता की सुगंध इतनी व्याप्त है कि वह दुनिया की किसी भी भाषा में जाकर भी भारत का पासपोर्ट लहराती हुई महसूस होगी.
इस संग्रह में उनकी एक कविता है ‘ झुकना’ –
‘झुककर ही हम छू सकते हैं पृथ्वी को… झुककर नदी से उसके पानी का हाल पूछा जा सकता है…’
यह कविता अग्रज हिंदी कवि नरेश सक्सेना की कविता ‘गिरना’ की याद ही नहीं दिलाती, उसका विनम्र प्रतिरोध करती हुई भी प्रतीत होती है. ऐसे सकारात्मक प्रतिरोध होने चाहिए. प्रतिरोध न भी कहें, संयोगवश काव्यात्मक हस्तक्षेप ही कह लें, उनका स्वागत होना चाहिए.
फिल्म, राग, वाद्य या चित्र पर कविता लिखते हुए यतीन्द्र अतीन्द्रिय हो जाते हैं. उस समय उनका कोई दुर्घर्ष दुश्मन भी उनको गले लगा सकता है-
‘हज़ार तरीके से होकर गुजरता है
रौशनाई का रास्ता
स्याही बनाने का नुस्खा फिर भी
हाथ कहां आता?’
कविता- दर- कविता, वे लोक के गायक के रूप में उभरते हैं. उनकी कविताएं लोक का संक्षिप्त इतिहास बन जाती हैं. यह सद्गुण या सलाहियत प्रकृति द्वारा उपकृत ही हो सकता है.
ग़ालिब, फ़ैज़, कबीर, रैदास, शमशेर उनकी कविताओं में ऐसे आते हैं जैसे घर के किसी कमरे से उठता आता कोई बुजुर्ग कुछ कहकर या कभी कभी बिना कहे अपने एकांत में लौट जाता है . वह क्षणिक उपस्थिति सदियों के मिलन की साक्षी बन जाती है.
संग्रह में मां को लेकर कुछ मार्मिक कविताएं हैं. ‘जामुन और अमरूद ‘ दुर्लभ कैथार्सिस रचती हुई भिगो जाती हैं. ‘एक गाढ़ा नीला समुद्र’ की सान्द्रता आपके साथ दूर तक जा सकती है.
कुछ कवियों की कविताओं के भीतर दुनिया में किसी बदलाव की कामना होती है. यतीन्द्र का कवि दुनिया में बहुत कुछ बचा लेना चाहता है. जो खोता जा रहा है, उसे बचाए जाने की ज़रूरत इसलिए है कि उसकी नज़र में वे खोती हुई चीज़ें ग़ैरज़रूरी चीजें नहीं हैं. वे दुनिया का सुंदर हिस्सा हैं. बहुत-सी सुंदरताओं के खोने की पीड़ा और फ़िक्र का कोलाज बन जाती हैं यतीन्द्र की कविताएं.
दूसरे शब्दों में, यतीन्द्र दुनिया को बचाने के मुहावरे वाली कविता की बजाय दुनिया में उपस्थित सुंदरताओं को बचाने के लिए चिंतित रहने वाले कवि हैं. यह एक अलग एक्टिविज्म है जिसे मान्यता देनी चाहिए. हमारे बहुत से बौद्धिकों को इसे मान्यता देना सीखना है.
कविता में विरोधाभास उस कविता को जीवन के और करीब कर देता है. जीवन विरोधाभासों का कोलाज ही तो है. ‘फूल वालों की सैर’ में यतीन्द्र कहते हैं,
‘दिल्ली में दिल मिलते थे मजहबों के/हिन्दू और मुसलमान होने की शिनाख्त से अलग/ये रोशनी बांटने का मामला था/अलग-अलग जाती हुई दो गलियों के मध्य’.
जबकि कुछ पंक्तियों बाद कवि कहता है- मुसलमान चढ़ाते रहे ख़्वाजा की दरगाह पर फूलों का पंखा/उधर हिन्दू योगमाया मंदिर में चढ़ाते थे यही पंखा’. यह कविता एक सुंदरतम नोट पर क्लाइमेक्स पाती है -‘ जिसने मिटा दी थी दो गलियों की लकीरें’.
अगर कोई एक कविता इस संग्रह को विस्मृति से बचा ले जाएगी, तो वह कविता कौन-सी होगी? मैं बिना एक पल गंवाए कहूंगा, ‘समय ओपेरा’. इस कविता की एक सुंदर पंक्ति है – ‘एक आत्मीय धुन खो गई है’. ये शब्द अपने समय का मर्सिया सुनाते हैं.
यतीन्द्र की ये कविताएं यह अहसास शिद्दत से करवाती हैं कि कितना कुछ था, और है, जिसे केवल इसी तरह से कहा जा सकता है. संग्रह की कविताओं का आद्योपांत संगीतमय स्वर एकरस होते हुए भी एकरस नहीं होता.
यतीन्द्र एक ही संग्रह में अपने पाठक के काव्य रसास्वादन को परिष्कृत करते चलते हैं. उसकी भाव संपदा को गहन, शब्द संपदा को बहुआयामी और संवेदना को समृद्ध करते हैं. यह एक अच्छे कवि की कसौटी है.
(दुष्यंत लेखक हैं, हिंदी फिल्म जगत से जुड़े हैं.)
