7 जनवरी 2025 को फेसबुक के संस्थापक मार्क जुक़रबर्ग एक विडियो में सेंसरशिप के ख़िलाफ़ बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. डोनाल्ड ट्रंप की जीत को नए युग की शुरुआत मानते हुए आने वाले दिनों में फेसबुक, इंस्टाग्राम, थ्रेड्स पर अभिव्यक्ति को ज्यादा महत्व देने का वादा करते हैं. आने वाली ट्रंप सरकार के साथ मिलकर दुनिया भर में अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए काम करने का ऐलान करते हैं. इस ऐलान के बाद 20 जनवरी को ट्रंप के राष्ट्रपति पदभार ग्रहण समारोह के दौरान अग्रिम पंक्ति में मौजूद दिखते हैं.
लेकिन उसके ठीक दो महीने बाद मार्क की कंपनी मेटा अपनी पूर्व ग्लोबल पब्लिक पॉलिसी डायरेक्टर सारा विन विलियम्स की किताब ‘केयरलेस पीपुल’ पर प्रतिबंध लगाने में एड़ी चोटी एक कर देती है.
मतलब साफ है कि मार्क ज़ुकरबर्ग कहते कुछ हैं और करते कुछ और. उनकी कथनी और करनी में फ़र्क है. पर क्या यह एक अपवाद है? या उन्होंने ऐसा अनजाने में किया?
बिल्कुल नहीं. उनकी कथनी और करनी में इस तरह के अंतर बार-बार हुए हैं. उन्होंने और उनकी कंपनी ने इस तरह के पाखंड बार-बार रचे हैं. अनजाने में नहीं. बल्कि सोच-समझकर. और अब तो सचमुच जैसा मार्क साहब ख़ुद कहते हैं ‘यह एक नए युग की शुरुआत है’. ट्रंप युग की शुरुआत.
लेकिन सारा विलियम्स की किताब पर मार्क ज़ुकरबर्ग की कंपनी प्रतिबंध लगाने पर क्यों तुली हुई है? असल में सारा की किताब केयरलेस पीपुल मार्क और उनकी कंपनी के पाखंडों व कारनामों का कच्चा-चिट्ठा है. किताब में उन गतिविधियों का विवरण है जिनके फलस्वरूप दुनिया भर में लोगों को हत्या, बलात्कार जैसे अपराध का शिकार होना पड़ा है. मानसिक प्रताड़ना एवं यातनाएं सहनी पड़ी है.
न्यूजीलैंड में जन्मी और पली-बढ़ी सारा विन विलियम्स यूनाइटेड नेशंस और न्यूज़ीलैंड एम्बेसी में राजनयिक रह चुकी थीं. 2010 के आसपास वाशिंगटन में काम करते हुए वह फेसबुक से काफी प्रभावित हुईं. उन्हें महसूस होने लगा कि फेसबुक एक ऐसी कंपनी है जो दुनिया में बदलाव ला सकती है. लोगों के जीवन-स्तर को सुधारने में मदद कर सकती है. न्यूजीलैंड के भूकंप में उन्होंने देखा था कि कैसे फेसबुक ने लोगों के बीच त्वरित संदेश पहुंचाने में मदद की थी. सरकार भी इतने बड़े पैमाने पर लोगों को जोड़ने में कामयाब नहीं हुई थी.
वह समझ चुकी थीं कि आनेवाले दिनों में फेसबुक लोगों के जीवन को कितना प्रभावित करने वाला है. पर उन्हें क्या पता था कि ये प्रभाव कितना नकारात्मक सिद्ध होगा.
2011 में सारा ने जब फेसबुक में अपने करिअर की शुरुआत की, तब कंपनी से उन्हें बहुत अपेक्षाएं थीं. कंपनी के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग एवं उस वक्त की मुख्य संचालक शेरिल सैंडबर्ग के साथ उन्हें प्राइवेट जेट में घूमने, अलग-अलग देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से मुलाकात करने, कंपनी की नीतियों के निर्धारण व कार्यान्वयन का अवसर प्राप्त हुआ. फेसबुक के शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों को नजदीक से देखने, उनके व्यवहार, उनकी मनोवृत्ति को समझने का मौका मिला. धीरे-धीरे वह समझने लगीं कि मार्क और उसके नजदीकी सहयोगी कितने लापरवाह हैं. और उनकी लापरवाही दुनिया भर में फेसबुक, इंस्टाग्राम पर सक्रिय लोगों के लिए कितना नुक़सानदेह है.
2017 तक सारा विलियम्स कंपनी से पूरी तरह निराश हो चुकी थीं. सात सालों के दौरान आशा से निराशा में बदलने के अपने इन्हीं अनुभवों को उन्होंने इस किताब में दर्ज किया है.
केयरलेस पीपुल की प्रस्तावना एक दिलचस्प कहानी से शुरू होती है. 2015 में दक्षिण अमेरिकी देश पनामा में समुद्र के तट पर अमेरिकी राष्ट्राध्यक्षों की मीटिंग चल रही थी. सारा ने मार्क के लिए उस मीटिंग में शामिल होने का जुगाड़ किया था. वह चाहती थी कि मार्क जुकरबर्ग राष्ट्राध्यक्षों से मिलकर अपना संबंध स्थापित करें. इससे उन देशों में फेसबुक के संचालन में मदद मिलेगी. पर एक भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री मार्क से बात करने को तैयार नहीं था. कनाडा के प्रधानमंत्री ने तो मिलने से साफ इनकार कर दिया. इस अपमानजनक स्थिति में वहां उपस्थित रहने का कोई मतलब नहीं था.
सारा किस तरह मार्क और उसके सहयोगी को लेकर अंधेरे में वहां से निकल भागने में कामयाब होती है. यही है प्रस्तावना की कहानी. इसमें हास्य है और कॉमेडी भी. सारा बताती हैं कि फेसबुक में उनके सात साल इसी तरह ‘उम्मीद और कॉमेडी से शुरू हुए पर अंत हुआ निराशा और पश्चाताप से’.
2013 में म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ नरसंहार, महिलाओं के साथ हुए बलात्कार की घटनाओं के लिए फेसबुक की भूमिका के बारे में सारा विस्तार से लिखती हैं कि किस तरह वहां हुए नरसंहार में फेसबुक ने प्रमुख भूमिका निभाई थी. म्यांमार में इंटरनेट के नाम पर केवल फेसबुक ही मौजूद था. जब हिंसा हो रही थी तो मानवाधिकार संगठनों तथा अन्य सिविल सोसाइटी के लोगों ने बार-बार फेसबुक के अधिकारियों को चेतावनी दी थी. पर उचित कार्यवाही नहीं हुई.
5 करोड़ आबादी वाले देश के अंदर झूठ, अफवाह, घृणा को रोकने के लिए कंपनी ने एक भी व्यक्ति को नियुक्त नहीं किया था. कंपनी केवल एक व्यक्ति की मदद ले रही थी. वह व्यक्ति भी कांट्रैक्ट पर था. म्यांमार मूल का था. वहां की भाषा से अवगत था. इतनी इतनी बड़ी मात्रा में काम के निष्पादन के लिए केवल एक व्यक्ति का होना ही कंपनी के इरादे को स्पष्ट करता है. वैसे भी वह व्यक्ति म्यांमार में नहीं, आयरलैंड की राजधानी डबलिन में रह रहा था. और जानबूझकर घृणा से भरे पोस्ट को नज़रंदाज़ कर रहा था.
म्यांमार नरसंहार के संदर्भ में यूनाइटेड नेशंस की एक स्वतंत्र जांचकर्ता ने कहा है कि फेसबुक एक दानव में परिवर्तित हो गया था. रॉयटर्स ने अपने स्पेशल जांच रिपोर्ट में फेसबुक को दोषी ठहराया है. उसके रिपोर्ट का शीर्षक ही है हेटबुक. वैसे तो और भी कई भरोसेमंद रिपोर्ट्स हैं जो इन बातों की पुष्टि करते हैं. पर केयरलेस पीपुल इस मायने में खास है क्योंकि सारा इसमें कंपनी के अंदर की प्रक्रियाओं का पर्दाफाश करती हैं. शीर्ष अधिकारियों के अपराध को उजागर करती है. वह कहती हैं कि ‘इस सच्चाई से हम मुंह मोड़ नहीं सकते कि फेसबुक के बिना म्यांमार आज एक बेहतर देश होता’.
चीन में फेसबुक जिन शर्तों पर काम कर रही थी वे केवल अनैतिक ही नहीं, अमेरिकी कानून का उल्लंघन भी था. फेसबुक वहां की सरकार के साथ यूज़र्स की निजी जानकारी शेयर कर रही थी. उनके पोस्ट को सेंसर कर रही थी. दूसरे देशों के उन यूज़र्स की निजता का भी उल्लंघन कर रही थी जो चीनी नागरिकों के सम्पर्क में थे. ये दूसरे देशों के कानून का उल्लंघन था. अमेरिकी कानून का भी. सारा विलियम्स के अनुसार मार्क जुकरबर्ग ने चीनी मामले में पूछताछ के दौरान अमेरिकी कांग्रेस को झूठ बोलकर गुमराह किया है.
मेटा को चलाने वाले लोग केवल लापरवाह नहीं बल्कि घोर अनैतिक हैं. अपने टेक्नोलॉजी और व्यवसाय के ज्ञान की मदद से वे मानव कमजोरियों का शिकार करते हैं. सारा बताती हैं कि ‘अप्रैल 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम 13 से 17 वर्ष के बीच की लड़कियों की भावनात्मक कमजोरियों की शिनाख़्त कर उनके डेटा को बेचते हैं. ख़ासकर जब वे लड़कियां अपने लिए वर्थलेस, स्टुपिड, यूजलेस, इन्सिक्योर, डिफीटिड जैसे कुछ शब्दों का प्रयोग करती हैं. जब वो अपने शरीर, उसके वज़न को लेकर चिंतित हों.’
कितनी बड़ी विडंबना है कि उस वक्त फ़ेसबुक की सीओओ शेरिल सैंडबर्ग महिला सशक्तिकरण पर बड़ी-बड़ी बातें करती थीं. इस पर उन्होंने एक किताब भी लिखी है. लेकिन सारा को ख़ुद एक महिला के रूप में काम करते हुए बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. बच्चों के जन्म या उनके लालन-पालन के दौरान कंपनी ने सहयोग के बदले उन्हें परेशान किया. उन्हें यौन उत्पीड़न का सामना भी करना पड़ा. विदेश यात्रा से लौटते हुए एक बार जब शेरिल ने कहा, ‘तुम्हें मेरे बेड पर सोना चाहिए था’, तो वह चौंक गईं.
उनके बॉस जोएल कैपलन का व्यवहार इस मामले में और भी पीड़ादायक था. जोएल कैपलन ने बार-बार उन्हें परेशान किया. जोएल के खिलाफ यौन उत्पीड़ित की शिकायत पर कंपनी ने कोई कार्यवाही नहीं की. बल्कि उलटे सारा को ही इसका ख़ामियाजा भुगतना पड़ा. जोएल कैपलन की पदोन्नति हो गई. डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पदभार ग्रहण समारोह के तीन सप्ताह पहले उन्हें मेटा के ग्लोबल अफेयर्स का प्रेसिडेंट बनाया गया.
सारा विलियम्स का यह विस्फोटक संस्मरण आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ज़रूरी दस्तावेज़ है. यह दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनी के कारनामों को परत-दर-परत उजागर करती है. बताती है कि मेटा अपने यूजर्स के साथ कितने गंदे खेल खेल रही है. उसके शीर्ष नेतृत्व की क्या मानसिकता है. कैसे वे नैतिकता और कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं.
(अरुण जी लेखक, अनुवादक व शिक्षक हैं.)
