पहलगाम हमला: ‘बुलडोज़र न्याय’, छद्म देशभक्ति से नहीं छिपा सकती मोदी सरकार अपनी विफलता

जब कोई समाज आतंकवाद-रोधी कार्रवाई के बजाय, दिखावटी और खोखले 'न्याय' को चुनता है, तो इसका फायदा आतंकवादियों और उनके आकाओं को मिलता है.

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श्रीनगर के लाल चौक पर तैनात सुरक्षाकर्मी. (फोटो: पीटीआई)

पहलगाम में हुए नृशंस आतंकवादी हमले के आरोपी व्यक्तियों को कानून की नज़र में मालेगांव आतंकवादी बम विस्फोट के आरोपियों की तरह देखा जा सकता है. लेकिन दोनों प्रकरणों में सत्ता का रवैया एकदम भिन्न है. 

कश्मीर में, पिछले तीन-चार दिनों में प्रशासन ने नौ व्यक्तियों (जिनमें से केवल दो को पहलगाम हमले के मामले में पुलिस ने नामजद किया है) के घरों को ध्वस्त कर दिया.

क्या आपको याद आता है कि मालेगांव मामले की मुख्य आरोपी प्रज्ञा ठाकुर का घर तोड़ा गया था या अन्य छह आरोपियों – लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित, मेजर रमेश उपाध्याय (सेवानिवृत्त), अजय राहिरकर, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी और समीर कुलकर्णी के घर पर कोई कार्रवाई हुई थी?

मैं यहां साफ़ कर देना चाहता हूं कि आतंक के आरोपियों के प्रति कोई नरमी नहीं बरती जानी चाहिए. अपराध की जांच करें, सबूत जुटाएं और उन पर मुकदमा चलाएं. अगर मामला ठोस है, तो उन्हें दोषी ठहराएं और कानून द्वारा तय सजा दें. किसी भी सभ्य राष्ट्र में आतंकवाद से इसी तरह निपटा जाता है. कश्मीर में हमने जिस तरह के घरों को ध्वस्त होते देखा, उसका खतरा यह है कि वे भारतीय जनता को यह भ्रामक यक़ीन दिलाना चाहते हैं कि उन्हें इंसाफ मिल रहा है- वो भी ऐसे समय में जब मामले की जांच कर रहे अधिकारी असल में इस अपराध को सुलझाने या आतंकवादियों को पकड़ने और उन पर किसी किस्म का मुकदमा चलाने से कोसों दूर हैं. 

याद कीजिए- साल 2000 में जम्मू-कश्मीर के छत्तीसिंहपुरा में तीन दर्जन सिखों की हत्या करने वाले लश्कर के आतंकवादी कभी नहीं पकड़े गए. दो पाकिस्तानी नागरिकों- सुहैल मलिक और वसीम अहमद- की गिरफ्तारी हुई थी और उन पर मुकदमा भी चलाया गया था, लेकिन उन्हें बरी कर दिया गया क्योंकि ‘उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं था.’ साल 2012 में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा.

आप जानना चाहते हैं कि छत्तीसिंहपुरा हत्याकांड के लिए कोई क्यों नहीं पकड़ा गया और उसे सजा क्यों नहीं मिली?

क्योंकि सेना और पुलिस ने इस हत्याकांड के तुरंत बाद अनंतनाग और उसके आस-पास के इलाकों से पांच नागरिकों को उठाया और उनकी हत्या कर दी, उन्हें वर्दी पहनाई और पथरीबल में उनके शवों को जला दिया. फिर दुनिया से कहा कि सिख नागरिकों की हत्या करने वाले खूंखार आतंकवादियों को घेरकर मुठभेड़ में मार दिया गया है.

मैं इस भयावह मामले की गहराई में नहीं उतरूंगा, लेकिन जब सीबीआई को पथरीबल मामले की जांच सौंपी गई और उसने इसमें शामिल अधिकारियों और सैनिकों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की, उससे साबित हुआ कि मारे गए लोग बेगुनाह थे. मगर फिर भी आरोपी सैनिकों पर कभी मुकदमा नहीं चलाया गया. बात यहीं ख़त्म नहीं हुई, छत्तीसिंहपुरा आतंकवादी हमले की फाइल को फिर से न कभी खोला गया और न ही उस पर कार्रवाई हुई.

हम सभी जानते हैं कि पहलगाम में हिंदू पर्यटकों पर गोलियां बरसाने वाले बदमाशों में कुछ ऐसे आतंकवादी भी शामिल थे जिन्होंने 25 साल पहले छत्तीसिंहपुरा में सिखों की हत्या की थी.

यहां यह भी जोड़ना चाहिए कि सरकार की बुलडोज़र कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही कानून बना चुका है, लेकिन  इसके बावजूद सरकार को लगता है कि वो इस कानून की अनदेखी कर सकती है. दरअसल, आज बड़ा मसला राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का है. जब कोई समाज आतंकवाद-रोधी कार्रवाई के बजाय, दिखावटी और खोखले ‘इंसाफ’ को चुनता है, तो इसका फायदा आतंकवादियों और उनके आकाओं को मिलता है.

ऐसा हमेशा और हर बार हुआ है.