हाल ही में छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के सारंगढ़ आने की सुगबुगाहट हो रही थी. यूं तो सारंगढ़ में राष्ट्रपति से लेकर मध्य प्रदेश के राज्यपालों के आने का इतिहास रहा है, किंतु नया राज्य बनने के बाद यह पहला मौक़ा आया जब राज्यपाल ने ज़िले-ज़िले का दौरा शुरू किया और सारंगढ़ की भी बारी आ गई. तैयारियों को लेकर उत्साह था. तारीख़ के अलावा तब तक प्रशासन के पास और कोई जानकारी नहीं थी. संभावित कार्यक्रमों की लिस्ट बना कर ऊपर भेजी जाने लगी. हेलिकॉप्टर से आएंगे तो ये कार्यक्रम, कार से आएंगे तो वो, इधर से आएंगे तो ये और उधर से आएंगे तो वो. प्लान ए, बी, सी, डी बना लिए गए. ऐसे ही एक प्लान में बैगीनडीह गांव का नाम भी जुड़ गया.
इस गांव में एक झारा बस्ती है. झारा लोहारों की एक उपजाति है. इनके लिए इस नाम की उत्पत्ति कैसे हुई इसको लेकर दो मान्यताएं हैं. संभव है झाड़ों के बीच या जंगल में रहने के कारण बाद में आए लोहारों से उन्हें यह नाम मिला हो. ऐसी कई जातियां हैं जिनके पहले से रहने वाले वर्ग को बाद में आने वालों ने ‘झरिया’ कहा जैसे झरिया यादव या झरिया ब्राह्मण. दूसरी थ्योरी कहती है कि ये चूंकि रसोईघर में इस्तेमाल होने वाले झारा जैसे बर्तन बनाते थे इसलिए यह नाम चल निकला.
हाल के दशकों तक यह एक घुमंतू जाति थी जिसके सदस्य गांवों के बाहर झोपड़ी बनाकर अस्थायी रूप से रहते और आसपास के गांवो में घूम कर पुराने बर्तनों की मरम्मत करते, लोहे और पीतल के टुकड़े ख़रीदते और कुछ नया बना कर बेचते जैसे पोरा-बैला, लक्ष्मी, जानवरों के गले में बांधी जानेवाली घंटी (जलाजेल कहलाती है), घुंघरू आदि.
लेकिन इनका एक काम इन्हें विशिष्ट बनाता रहा है. बारीक छनी हुई मिट्टी, कबाड़ से निकले पीतल के टुकड़े, तेल और पूजा में इस्तेमाल होने वाले लोबान का इस्तेमाल कर छोटी-छोटी मूर्तियों जैसी आकृतियां बनाने की कला. खिलौनेनुमा ये मूर्तियां पारंपरिक आदिवासी डिज़ाइन का ही प्रतिनिधित्व करती थीं. इनकी जीवनशैली ने इन्हें न संस्थागत शिक्षा का लाभ लेने का अवसर दिया न आमदनी बढ़ाने का.
इनके जीवन में बदलाव आने की कहानी शुरू हुई उन्नीस सौ सत्तर के दशक में. उड़ीसा की सीमा को छूता पूर्वी छत्तीसगढ़ का यह क्षेत्र तब मध्य प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था. मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी वाली सरकार में एक प्रस्ताव लाया गया कि राज्य के आकार और इसमें फैली सांस्कृतिक विविधताओं को देखते हुए शिक्षा विभाग से संस्कृति को अलग कर एक नया विभाग बनाया जाए. जब तक बात आगे बढ़ती इमरजेंसी के दिन आ गए. श्यामाचरण शुक्ल नए मुख्यमंत्री बने और यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया. मूल प्रस्ताव तब के शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह का था. लोगों ने इसे ही कारण मान लिया.
1980 की शुरुआत में दिल्ली में प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी की वापसी हुई और जून में अर्जुन सिंह मध्य प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने. इंदिरा गांधी की पर्यावरण, संस्कृति आदि विषयों में रुचि की जानकारी सर्वविदित थी. उसी वर्ष अगस्त माह में मध्य प्रदेश में एक स्वतंत्र संस्कृति विभाग का गठन कर लिया गया. मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पास अशोक बाजपेयी और कल्याण कुमार चक्रवर्ती जैसे साहित्य, पुरातत्त्व और संस्कृति आदि विषयों के विशेषज्ञों की टीम थी.
एक विचार उभरकर आया कि विभिन्न सांस्कृतिक, साहित्यिक, कलात्मक रचनात्मकता की अभिव्यक्ति और प्रोत्साहन के लिए भोपाल में एक राष्ट्रीय स्तर का प्लेटफार्म उपलब्ध कराया जाए. प्रस्ताव को लेकर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी उत्साहित थीं और उन्होंने सभी राज्यों को पत्र लिखकर देश में बनने जा रहे इस महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना में सहयोग देने की अपील की. इस पहल ने भारत भवन का रूप लिया.(इंदिरा गांधी ने ही फ़रवरी 1982 में भोपाल में इसका उद्घाटन किया.)

भारत भवन की तैयारियों के सिलसिले में 1981 में मध्य प्रदेश के कोने-कोने में पहुंच कर वहां छिपे हर तरह के कलाकारों के ‘टेलेंट हंट’ के लिए दल रवाना किए गए थे. ऐसा ही एक तीन-सदस्यीय दल पूर्वी मध्य प्रदेश के रायगढ़ (तब रायगढ़ मध्य प्रदेश का और सारंगढ़ रायगढ़ ज़िले का हिस्सा था) के समीप एकताल नामक गांव पहुंचा.
एकताल में कुछ झारा परिवार रह रहे थे. इनमें प्रमुख थे गोविंदराम झारा जिनका परिचय इसी टीम के माध्यम से पहली बार बाहर की दुनिया से हुआ. इनकी कला ‘ढोकरा आर्ट’ के नाम से जानी गई. समय बीतता गया और ‘शिल्प गुरु’ गोविंद राम झारा को राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार भी प्राप्त हो गया. दुर्भाग्य से फ़ोकस गोविंद राम झारा और एकताल में सिमट कर रह गया. वृहद झारा समुदाय की स्थिति में कोई फ़र्क़ नहीं आ पाया. ख़ानाबदोशी जारी रही.
वर्ष 1995 में सारंगढ़ क्षेत्र में कुछ गांवों के बाहर इनकी बस्तियां होने की जानकारी मुझे थी. इनमें से एक छोटा सा गांव बैगीनडीह भी था जो सारंगढ़ से रायपुर की दिशा में मुख्य मार्ग से अंदर कोई डेढ़ किलोमीटर पर है. उस वर्ष मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को पास के स्थान सरायपाली में एक मध्यावधि चुनाव के सिलसिले में सारंगढ़ से निकल कर सड़क मार्ग से यहां से गुज़रना पड़ा था. झाराओं को मैंने ख़बर भेजी और उनके पास जो भी कलाकृतियां उस वक़्त तैयार थी, उसे लेकर मुख्य सड़क पर बुलाया. वे एक कपड़ा बिछाकर किनारे बैठ गए.
जब दिग्विजय सिंह जी की गाड़ी वहां पहुंची, मैंने उनसे रुकने का अनुरोध किया. वे मान गए. मुख्यमंत्री ने झाराओं का काम देखा, प्रशंसा की, उनकी स्थिति के बारे में पूछताछ की और उनसे कुछ कलाकृतियां भी ख़रीद लीं. साथ चल रहे अधिकारियों के लिए यह घटना अप्रत्याशित थी. मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को कोई निर्देश नहीं दिया. शायद ज़रूरत ही नहीं थी. अधिकारी होशियार थे. मुख्यमंत्री के जाने के अगले ही दिन से इन झाराओं के जीवन में बदलाव आना शुरू हो गया.
बैगीनडीह के अलावा पास के गांव घोराघाटी में सबसे पहले तो जिस भूमि पर ये रह रहे थे उसके पट्टे इन्हें आवंटित किए गए और इंदिरा आवास योजना के तहत इनके लिए घर बनाए गए. काम करने के स्थान के रूप में वर्क-शेड बनाए गए. शुरुआत में सभी झाराओं को अपने आप को एक स्थान पर बांधकर रखने का विचार पसंद नहीं आया. लेकिन शीघ्र ही जीवन में पहली बार इन परिवारों को ‘अपना’ एक स्थायी पता मिलने के लाभ दिखने और मिलने लगे. बाहर से इनके पास पत्र आना संभव हुआ. निमंत्रण आए. यहां से लोग दिल्ली-हाट जैसे स्थानों पर पहुंचने लगे. डाक के माध्यम से ऑर्डर आने लगे. बीच-बीच में पुरस्कार मिलने लगे.
शहरों में चलने वाले नए डिज़ाइनों की जानकारी मिली, आमदनी बढ़ने से कच्चा माल ख़रीदने की औक़ात बढ़ी. बच्चे स्कूल जाने लगे. जीवनशैली में समझ, शिक्षा और समृद्धि, तीनों का असर दिखने लगा. अब लोगों के ‘सरनेम’ भी होने लगे हैं. झोरका, बघेल, इंदुवार जैसे उपनाम अनेक हैं.

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इस पृष्ठभूमि में हाल में बैगीनडीह गांव की हीराबाई झोरका बघेल (बताती हैं सरकारी पत्र में अंग्रेज़ी स्पेलिंग ने इनका सरनेम झरेका कर दिया है) को एक पुरस्कार की घोषणा हुई. यह पुरस्कार बैलगाड़ी पर आधारित एक बहुत सुंदर कृति के लिए घोषित हुआ है.
पुरस्कार की घोषित राशि है दो लाख रुपए. अब तक पुरस्कार की राशि इन्हें नहीं मिली है. किसी ने इन्हें बताया शायद राष्ट्रपति दिल्ली बुला कर अपने हाथों दें. इन सब के बीच अचानक चहल पहल शुरू हुई. अधिकारियों का दल गांव में पहुंचा. मंच बन गया. शामियाना लग गया. कनात तन गई. बताया गया ये तैयारियां राज्यपाल महोदय के आगमन के लिए हो रही हैं. हीराबाई से कहा गया वे नाते रिश्तेदारों को बुला लें और तैयार रहें. हीराबाई और उनके पति मिनकेतन के लिए भीड़ इकट्ठा करना कोई समस्या नहीं थी. वीआईपी के दौरे से समाज और गांव को लाभ होता है इस समुदाय को यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं थी. कांदुरपाली, दमदरहा, घौराघाटी जैसे गांवों में बस सूचना भेजी और मन में उत्साह और आंखों में अपेक्षाएं लिए समाज के लोग इकट्ठा हो गए. हीराबाई ने अपनी ओर से स्वल्पाहार की व्यवस्था कर रखी थी. अधिकारियों के बताए अनुसार भोजन के समय तक तो सबको अपने अपने घर पहुंच ही जाना था.
वह तारीख़ भी आ गई और राज्यपाल भी सारंगढ़ पहुंच गए. दोपहर हो गई और राज्यपाल का भोजन कार्यक्रम शुरू हो गया. भोजन के बाद उसी रास्ते से रायपुर जाना था लेकिन बैगीनडीह में नहीं रुकेंगे इसकी सूचना या तो अधिकारियों को नहीं थी या हीराबाई को बताने का आवश्यकता उन्होंने नहीं समझी. भोजन का समय गांव में भी हो गया था लेकिन राज्यपाल की प्रतीक्षा में सारे झारा भूखे बैठे रहे.
अंत में पुष्टि हो गई कि राज्यपाल का क़ाफ़िला मुख्य मार्ग से होते हुए सीधा निकल चुका है. हीराबाई और मिनकेतन के लिए करने के लिए बस एक काम रह गया था – तीन सौ लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था कर उन्हें खिलाने का. उन दोनों ने यह काम बखूबी किया. आख़िर ये सारे उनके व्यक्तिगत निमंत्रण पर ही तो आए थे.
(लेखक इतिहास-प्रेमी हैं, छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं.)
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