प्रोफेसर जयंत विष्णु नार्लिकर नहीं रहे. भारत का वैज्ञानिक समुदाय उन्हें अपने ढंग से याद कर रहा है. उन्हें याद करने पर ज्ञान के लिए समर्पित एक पूरा जीवन याद आता है. वे विश्व के श्रेष्ठ भौतिकविज्ञानियों और खगोलविदों में से थे. ब्रह्मांड की उत्पत्ति की व्याख्या करने वाले बिग बैंग के सिद्धांत से भिन्न ब्रह्मांड का मॉडल देने वाले वैज्ञानिक के रूप में उनकी ख्याति थी. अपने शोध निर्देशक फ़्रेड हॉयल के साथ उन्होंनें गुरुत्त्वीय सिद्धांत की भी एक नई परिकल्पना प्रस्तुत की थी.
1972 में जब वे कैम्ब्रिज से भारत लौटे, तब वे महज़ 34 वर्ष के थे, पर एक वैज्ञानिक के रूप में उनकी ख्याति पूरी दुनिया में फैल चुकी थी.भारत आने पर लगभग 16-17 वर्ष उन्होंने टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में पढ़ाया. लेकिन भारत में खगोल विज्ञान के एक ऐसे संस्थान की जरूरत उन्हें महसूस होती रही, जो हो तो किसी विश्वविद्यालय के अंतर्गत, पर जहां उत्कृष्ट शोध और अध्यापन साथ-साथ हो सके.
उनकी यह कल्पना साकार हुई 1992 में, जब उनके नेतृत्व में पुणे में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (आईयूसीएए) की स्थापना हुई. आईयूसीएए का विचार प्रोफेसर नार्लिकर ने जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष प्रोफेसर यशपाल के सामने रखा था, यशपाल ने तुरंत स्वीकृति दे दी थी. लेकिन एक शर्त रखी कि प्रोफेसर नार्लिकर ख़ुद इस संस्था के निदेशक की जिम्मेदारी लेंगे.
विज्ञान में उनके योगदान का मूल्यांकन तो कोई वैज्ञानिक ही कर सकता है. लेकिन मेरे जैसे लोग जिनका विज्ञान से सामान्य सा ही परिचय है, वे उन्हें कैसे याद करें?
तब याद आता है कि इस सदी के पहले और दूसरे दशक में मुझ जैसे छात्रों का नार्लिकर के नाम से परिचय एनसीईआरटी की उन किताबों के ज़रिये हुआ था, जो 2005 में आईं थी, और जिनमें विज्ञान की किताबें नार्लिकर की देख-रेख में लिखी गईं थी.
हमारे स्कूल में एनसीईआरटी की किताबें नहीं चलती थीं. हमने मध्य प्रदेश शिक्षा बोर्ड की किताबों से पढ़ाई की थी. स्कूल की किताबें कैसे लिखी जाती हैं, इसकी कोई समझ तब हमें नहीं थी. पर एनसीईआरटी की ये किताबें हमारी बाक़ी किताबों से अलग हैं, यह हमारी किशोर बुद्धि तब भी समझने लगी थी.
विज्ञान की तब की किताबें छात्रों में आतंक-सा पैदा करती थीं. ग्यारहवीं में आते ही हमारा सामना हज़ार-हज़ार पन्नों की विशालकाय किताबों से होता था, जिनमें भाषा लगभग अनुपस्थित होती थी और पूरी किताब गणितीय चिन्हों से भरी होती थी.
एक ही प्रकार के न जाने कितने सवाल हुआ करते थे, जिन्हें हम सूत्र लगाकर हल करते रहते थे और अपने उत्तर को उत्तर तालिका से मिलाते, सही होने पर संतुष्ट हो जाया करते थे. जब तक हमारे उत्तर, उत्तर तालिका से पूरी तरह न मिलने लगें, तब तक इसी प्रक्रिया को दोहराते रहते थे. हर एक अध्याय से एक ही तरह के सैकड़ों सवालों को सूत्र लगाकर हल करते रहते थे, जिससे गणना पुख्ता हो जाए और परीक्षा के समय हिसाब में कोई गलती न हो. ऐसी पढ़ाई में कल्पना और सोच विचार की कोई जगह ही कहां हो सकती थी?

विज्ञान को इस तरह पढ़ते रहने के बाद जब हमें एनसीईआरटी की किताबें पढ़ने को मिली थीं, तो जैसे एक नई दुनिया की खिड़की ही हमारे सामने खुल गई थी. प्रायः जैसा होता है, हम पर भी सबसे पहला प्रभाव रूप का ही पड़ा था. गणितीय भाषा के साथ सुंदर गद्य में ये किताबें लिखी गईं थीं. अध्याय के आरम्भ में खूब विस्तार से उस विषय का वर्णन होता था, खोजों और आविष्कारों की सामाजिक पृष्ठभूमि दी हुई होती थी, वैज्ञानिकों के संक्षिप्त जीवन परिचय होते थे, उनके चित्र होते थे; पढ़ने पर लगता जैसे कोई कहानी सुनाई जा रही हो.
याद आता है कि 11वीं की भौतिक विज्ञान की किताब का पहला अध्याय ‘हमारी भौतिक दुनिया’ (आवर फिजिकल वर्ल्ड) जब पढ़ा था, तब किसी रोचक कहानी को पढ़ने जैसा ही असर हुआ था. इस अध्याय को हम बार-बार पढ़ते था.
इन किताबों ने हमें विज्ञान को पढ़ने के आनंद से परिचित कराया और सिखाया कि कल्पना गणित के लिए भी उतनी ही ज़रूरी है जितनी साहित्य और कलाओं के लिए.
इन किताबों से हमने जाना था कि विज्ञान की सामाजिक पृष्ठभूमि हुआ करती है, कि उसका भी इतिहास है. कोई वैज्ञानिक शून्य में काम नहीं करता. मानवता का संचित ज्ञान उसे विरासत में मिलता है, जिससे वह सीखता है, नए अनुभवों की कसौटी पर उसको कसता है, और जहां कोई ऐसी परिघटना उसकी नज़र में आती है जिसकी व्याख्या वर्तमान ज्ञान से नहीं हो पाती है, वहां वह उसमें संशोधन करता है और ऐसे विज्ञान आगे बढ़ता है.
बाद में कॉलेज में आने पर जाना कि नार्लिकर का अधिकांश लेखन बच्चों और सामान्य पाठकों में विज्ञान के प्रति जिज्ञासा पैदा करने के लिए ही है. जिस शिद्दत से उन्होंने भारत में विज्ञान के शिक्षण को जनप्रिय बनाने का काम किया, उसकी तुलना सिर्फ़ प्रोफेसर यशपाल से हो सकती है. यह काम उन्होंने अनेक माध्यमों से किया; किताबें लिखकर, अख़बारों में लेख लिखकर, टेलीविज़न कार्यक्रमों के द्वारा, अध्यापन के ज़रिये, व्याख्यानों के द्वारा. उनकी स्मृति में अधिकांश लोग यह लिख रहे हैं कि नार्लिकर से प्रेरित होकर ही वे विज्ञान के क्षेत्र में आए.
2004 में आईयूसीएए में उन्होंने स्कूल के बच्चों के लिए अरविंद गुप्ता की देखरेख में मुक्तांगन एक्सप्लोरेटरी साइंस सेंटर स्थापित किया, जहां बच्चों को देश के अग्रणी वैज्ञानिकों से सीखने का अवसर मिले. गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों के लिए इंटर्नशिप कार्यक्रम शुरू किया. यह केंद्र महीने में दो बार एक व्याख्यान या प्रदर्शनी का आयोजन करता है, जिसमें पुणे के स्कूलों से 1000 से अधिक बच्चे शामिल होते हैं. यहां बच्चे विज्ञान की वर्तमान अवस्था से परिचित होते हैं.
भारत जैसे देश में, जहां धार्मिक मान्यताएं बहुत गहरे धंसी हुई है, वहां कभी-कभी वैज्ञानिक को समाज सुधारक की भूमिका भी निभानी पड़ती है. विज्ञान तब तक हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं बनेगा, जब तक इन मान्यताओं को निर्मूल नहीं किया जाएगा. इसलिए ‘अंध श्रद्धा निर्मूलन कार्यक्रम’ में नरेंद्र दाभोलकर के साथ मिलकर उन्होंने काम किया. एक तरह से उनका कार्य महाराष्ट्र के समाज सुधारक शिक्षकों की परंपरा में आता है. दिलचस्प है कि पूना ही इस परंपरा की जन्मस्थली है और जो बाद में उनकी कर्मभूमि भी रही.
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में जब कॉलेजों में ज्योतिष की पढ़ाई शुरू करने का प्रयास किया गया तब उसका सबसे तीखा विरोध करने वालों में प्रोफेसर नार्लिकर ही थे. उन्होंने ज़ोर देकर कहा और सिद्ध करके बताया कि ज्योतिष कोई विज्ञान नहीं है. भारतीय ज्ञान परंपरा के नाम पर इस छद्म विज्ञान को हमारे बच्चों को नहीं पढ़ाया जा सकता.
इसी दृढ़ता से उन्होंने वैदिक गणित को स्कूलों में पढ़ाने का विरोध किया. उन्होंने स्पष्ट कहा कि वैदिक गणित का वेदों से कोई संबंध नहीं है. वैदिक गणित नाम की एक किताब शंकराचार्य भारती कृष्णतीर्थ ने बीसवीं सदी में लिखी और यह प्रचारित किया कि इसमें दिए गए सूत्र अथर्ववेद से लिए गए हैं, लेकिन अथर्ववेद की किसी भी प्रति में ये सूत्र नहीं हैं. इसके अलावा जो सूत्र इस किताब में दिए गए हैं, वो गणित में कोई मौलिक योगदान भी नहीं है. बस उनमें गणना करने के कुछ शार्टकट तरीके है वो भी बहुत कम संख्याओं पर लागू होते हैं और कई बार तो इनकी मदद से गणना प्रचलित तरीकों से ज़्यादा मुश्किल हो जाती है.
भारतीय ज्ञान के नाम चलने वाले इस मूर्खतापूर्ण अभियान के विरोध की वजह भारत में विज्ञान के इतिहास की उनकी गहरी समझ थी. वे अच्छी तरह जानते थे कि हमारी परंपरा में क्या वैज्ञानिक है और क्या नहीं. विज्ञान को भारत की क्या देन है, इस पर रामायण-महाभारत पुराणों के प्रसंगों का हवाला देने वालों को टोकते और आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य का उदाहरण देते. पौराणिक प्रसंग कितने ही चमत्कृत करने वाले क्यों न हों, विज्ञान की बात आने पर हम आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त आदि की जगह अगर पौराणिक घटनाओं से उदाहरण देने लगेंगे तो यह हास्यास्पद तो होगा ही, हम विज्ञान में भारत के वास्तविक योगदान की अनदेखी करेंगे.
आज भारतीय ज्ञान परंपरा के नाम पर हमारी शिक्षा में फूहड़ कर्मकांडों को जगह दी जा रही है, तब उनका लेखन और उनकी दृढ़ता याद आती है.
अपनी रोज की जिंदगी में हम कैसे वैज्ञानिक ढंग से सोचें, प्रोफेसर नार्लिकर और उनके समकालीन वैज्ञानिकों की यही प्रमुख चिंता थी. वैज्ञानिक चिंतन हमारी संस्कृति का हिस्सा बने. पुराने ढंग की विचार पद्धति ने हमारे समाज को जकड़ रखा है, उससे मुक्ति के लिए जनशिक्षा का काम जरूरी है. इसलिए वैज्ञानिक को ऐसी भाषा ईजाद करनी होगी, जिसमें वह जन साधारण से संवाद कर सके. उसमें इत्मीनान हो, अपनी बात को धीरज किंतु दृढ़ता के साथ रखे. उनके विपुल लेखन का बड़ा हिस्सा मराठी और हिंदी में है.
आज के भारत को देखने पर लगता है कि नार्लिकर जैसे वैज्ञानिकों के आजीवन प्रयास विफल हो रहे हैं. विश्वविद्यालयों में और स्कूलों में अब वैदिक गणित ही नहीं, यज्ञ, गौशाला, हनुमान चालीसा, दुर्गा पाठ आदि भी होने लगा है. धार्मिक उग्रता का जो विस्फोट पिछले वर्षों हुआ उसका उदाहरण आजाद भारत में नहीं है. आजादी के बाद प्रोफेसर नार्लिकर और उनकी पीढ़ी ने जिस उत्साह के साथ विज्ञान को लिया, विज्ञान शिक्षण का कार्य जिस जुनून के साथ किया और भारतीय संस्कृति के खोल में लपेटकर पेश किए जाने वाले छद्म विज्ञान के विरुद्ध जो दृढ़ता दिखाई, पिछले 11 वर्षों में भारत के वैज्ञानिकों में वह साहस और ईमानदारी नहीं दिखी, यह कहने में कोई संकोच नहीं.
प्रोफेसर नार्लिकर को यह सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि भारतीय ज्ञान परंपरा के नाम पर हमारे बच्चों के साथ हो रही धोखाधड़ी को हम रोकें. मुझ जैसे छात्र के लिए उनकी सबसे जीवंत स्मृति है, उनके निर्देशन में लिखी स्कूल की वे किताबें जिनसे एक बच्चे की विज्ञान की पढ़ाई का सफ़र रोचक बन गया था, खबर है कि वे शायद इस वर्ष ही बंद हो जाएंगी.
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं.)
