क़िस्सा सारंगढ़: गोवा में जन्मे पुर्तगाली नागरिक ने एक भारतीय रियासत में पाकशास्त्र का अनूठा अध्याय रचा

पहले विश्वयुद्ध के दौरान जब आर्थिक मंदी आयी, एक पुर्तगाली नागरिक, जिनका जन्म गोवा में हुआ था और जो बंबई के ताज होटल के प्रमुख खानसामा हुआ करते थे, के सामने आजीविका का संकट आ खड़ा हुआ. ऐसे में मध्य भारत के एक राजा ने उन्हें अपने साथ चलने का प्रस्ताव दिया, और फिर विविध संस्कृतियों के एक अनूठे संगम का जन्म हुआ. 'क़िस्सा सारंगढ़' में आज पढ़ें, इतिहास का यह अद्भुत पन्ना.

सारंगढ़ के गिरिविलास पैलेस का डाइनिंग हॉल, जो बरसों बरस देश-विदेश की पाकशैलियों और व्यंजनों का गवाह रहा. (सभी फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

नवंबर 1956 में चार राज्यों को हिंदी की डोर से बांधकर जब देश का सबसे बड़ा राज्य मध्य प्रदेश अस्तित्व में आया तो आम बोलचाल में इसे ‘नया’ मध्य प्रदेश कहा जाता था. इससे पहले 1950 में एक राज्य इसी नाम से अस्तित्व में आ चुका था जिसकी राजधानी नागपुर थी.

राजा-महाराजा-नवाब वाले राज्यों और अंग्रेज़ी सूबे का हिस्सा रह चुके इलाक़ों में अनेक अंतर थे, विविधता थी. राज्यों और इलाक़ों की प्रशासनिक शैलियों में ज़मीन आसमान का अंतर था. एक तरफ़ था नवाबों वाला भोपाल. दूसरी ओर था रीवा, खजुराहो और बान्धवगढ़ वाला विन्ध्य प्रदेश. एक था जबलपुर यानी महाकौशल. इनके अलावा इंदौर और ग्वालियर की रियासत भी थी. और इन सबसे अलग था रायपुर वाला छत्तीसगढ़. ये सभी मध्य प्रदेश के अंग तो थे, लेकिन कई मामलों में भिन्न और विशिष्ट थे. संस्कृति और बोलियां के अलावा खानपान की आदतें भी जुदा थीं.

आहार की विविधता में एकता लाने का एक छोटा प्रयास किया था अन्नपूर्णा पाटस्कर ने. वे राज्यपाल हरि विनायक पाटस्कर की पत्नी थीं. आमतौर पर लोग उन्हें ताई कहकर बुलाते थे. ताई ने नई-नई भोपाल पहुंची कुछ प्रमुख महिलाओं को जोड़कर एक क्लब की स्थापना की. इसमें सारंगढ़ की रानी ललिता देवी सहित कुछ मंत्रियों और अधिकारियों की पत्नियां तो थीं ही, भोपाल की बेगम (नवाब साजिदा सुल्तान जो सीनियर बेगम कहलाती थीं) जैसी कुछ महिलाएं भी थीं जो इन दोनों श्रेणियों में नहीं आती थीं.

सदस्यों का ज़िम्मा था कि बारी-बारी से वे अपने अपने इलाक़े की विशिष्ट पाकशैलियों और व्यंजनों से दूसरों को परिचित कराएं.

सारंगढ़ की रानी ललिता देवी.

एक दिन बारी आई सारंगढ़ की रानी ललिता देवी की. उनके साथ जो व्यंजन पहुंचा उसने अपनी अनूठी शैली, स्वाद और प्रस्तुतीकरण से सबको मुग्ध कर दिया. एक स्वर में मांग उठी कि अगली बैठक में रानी साहिबा अपने रसोईया को साथ लाएं ताकि इस सर्वथा अपरिचित डिश को समझा जा सके. अगली बैठक की तिथि आई. ललिता देवी पहुंचीं और बैठक हॉल में चली गईं.

पीछे-पीछे राजभवन के पोर्च में दूसरी कार आ कर रुकी. दरबान (उन दिनों सरकारी/सामाजिक व्यवस्था में दरबान, अर्दली, बावर्ची, खानसामा जैसे शब्द आम प्रचलन में थे) ने लपककर कार का दरवाजा खोला. कार से सूट, टाई, चमचमाते जूतों और हैट के साथ पांच फुट दस इंच के एक साहबनुमा शख्स उतरे. उन्होंने अपने कोट की सलवटों को सुधारा, हैट को करीने से सिर से उतार कर बाएं हाथ की कोहनी के नीचे रखा और कदम प्रवेश द्वार की ओर बढ़ाए ही थे कि दरबान ने हाथ बढ़ाकर उन्हें रोक दिया. यहां महिलाओं का कार्यक्रम चल रहा था और साहबों का प्रवेश वर्जित था.

विलंब होता देख रानी साहिबा बाहर आईं, दरबान को समझाया और इन शख्स को अपने साथ अंदर ले गईं. वे थे – मिस्टर सिक्वेरा, उनके खानसामा.

§

उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में जन्मे मिस्टर सिक्वेरा मूल रूप से गोवा के रहने वाले थे. गोवा उन दिनों पुर्तगाल का उपनिवेश था. सीमा पर आने-जाने में रोक-टोक नहीं थी और वहां के युवक रोज़गार की तलाश में आमतौर पर बंबई ही आते थे. मिस्टर सिक्वेरा सारंगढ़ के राजा जवाहिर सिंह के समकालीन थे. उन दिनों बंबई जैसे हिंदुस्तानी इलाकों में मान्यता थी कि गोवा में हर दूसरा व्यक्ति या तो पाक-कला में पारंगत होता है या वायलिन बजाने में.

जब पुर्तगालियों ने गोवा में चर्च स्थापित किए, संगीत की समझ रखने वाले स्थानीय युवकों को कॉयर मास्टर के रूप में चर्चों में ऑर्गन और प्यानो जैसे पाश्चात्य वाद्ययंत्र बजाने के अवसर मिलने लगे. बहुत जल्द गोवा के निवासियों ने पाश्चात्य संगीत के संगीत के साथ उसकी लिपि, स्टाफ नोट, को भी साध लिया. पाश्चात्य वाद्ययंत्रों तथा स्टाफ नोट से परिचय इनके बड़े काम आया. प्रथम विश्वयुद्ध में लड़ने के लिए सामान्य सैनिकों की भर्ती तो देश भर में हुई, लेकिन मिलेट्री बैंड जितने भी बने उनमें गोवा के लोगों की भरमार थी.

बंबई में उन दिनों पारसी तथा एंग्लो-इंडियन समुदाय की बड़ी आबादी रहती थी. युद्ध समाप्ति के बाद उनकी पार्टियों के साथ उनके थियेटर/नाटक, नाइट-क्लब, होटल आदि के लाइव-संगीत में भी गोवा के इन कलाकारों को जीविकोपार्जन का अवसर मिला. कुछ आगे चलकर जब शंकर-जयकिशन पृथ्वी थियेटर में संगीत देना छोड़कर फिल्म संगीत की ओर आए तो पाश्चात्य संगीत में सिद्धहस्त गोवन, पारसी तथा यहूदी कलाकार साथ हो लिए और ऑर्केस्ट्रा दलों में वादक के रूप में आ जमे. जहां पांच से दस वादकों को साथ ले कर गाने रिकॉर्ड कर लिए जाते थे, वहां पचास से सत्तर वादकों वाले आर्केस्ट्रा का चलन प्रारंभ हो गया.

संगीत के अलावा जिस दूसरी पारंपरिक कला में ये सिद्धहस्त थे, वह थी पाक-कला. पुर्तगालियों के साथ रहने का प्रभाव गोवा के निवासियों की पाक कला पर पड़ा था. सन् 1903 के दिसंबर में जमशेदजी टाटा ने ताज होटल की शुरुआत कर होटल और खानपान उद्योग के दरवाजे गोवा के युवकों के लिए खोल दिए.

मिस्टर सिक्वेरा ने अपनी शुरुआत ताज महल होटल से की लेकिन कुछ ही सालों में परिस्थितियों ने ऐसा रूप बदला कि जब राजा जवाहिर सिंह ने मिस्टर सिक्वेरा को अपनी पाक-कला, प्रशिक्षण और प्रशस्तियों के साथ सारंगढ़ आ कर बसने का प्रस्ताव दिया तो वे इनकार नहीं कर पाये. इस तरह सुदूर गोवा में जन्मे, पोर्चगीज़ (पुर्तगाली), कोंकणी, मराठी, हिंदी और अंग्रेज़ी बोलने वाले, इंग्लैंड में प्रशिक्षण पा चुके ताज होटल के शेफ-दि-क्विज़ीन, पुर्तगाली नागरिक मिस्टर सिक्वेरा 1920 के आसपास सारंगढ़ में आकर बस गए.

§

ताज जैसे होटल के लिए पाश्चात्य या कॉन्टिनेंटल भोजन बनाने के लिए गोवा के युवकों से बेहतर विकल्प नहीं था. यह पहला ऐसा होटल स्थापित हुआ जहां शेफ और बटलर के रूप में पुर्तगाली युवकों को न सिर्फ भर्ती किया गया, बल्कि शुरुआती बैच के युवकों को ट्रेनिंग के लिए इंग्लैंड भेजा गया. मिस्टर सिक्वेरा इन्हीं युवाओं में से एक थे.

1914 से पहले तक ताज होटल भारत के निजी क्षेत्र में युवाओं को रोज़गार देने वाले सबसे बड़े संस्थानों में एक था. पांच साल चले प्रथम विश्वयुद्ध और उसके तत्काल बाद आई स्पैनिश फ़्लू की महामारी के कारण पूरे विश्व में आर्थिक मंदी आ गई थी. भारत भी इससे प्रभावित हुआ. पांच साल से ठप्प पड़े रहे ताज होटल के सैकड़ों कर्मचारियों के साथ साथ उनके परिवारों के हज़ारों सदस्य भीषण आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे थे.

ताज महल होटल सारंगढ़ के राजा जवाहिर सिंह और उनके घनिष्ठ मित्र बैरिस्टर रणजीत पंडित (जिनका विवाह जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी जी के साथ हुआ था) के लिए बंबई में स्थायी पता जैसा था. जब होटल व्यवसाय के कर्मचारियों के बीच भविष्य को लेकर चिंता उमड़ रही थीं, राजा जवाहिर सिंह ने मिस्टर सिक्वेरा के सामने सारंगढ़ चलने का प्रस्ताव रखा. सिक्वेरा साहब ने उसे कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करने में समय नहीं लगाया.

मिस्टर सिक्वेरा के छोटे भाई उन दिनों ताज में शेफ दि पार्टे (सहायक शेफ) के पद पर कार्य कर रहे थे. वे अपने साथ भाई को भी ले आए.

मिस्टर सिक्वेरा के कंधों पर सारंगढ़ के गिरिविलास पैलेस में न केवल कॉन्टिनेंटल भोजन का आधुनिक किचन स्थापित करने की जिम्मेदारी थी, बल्कि सहायकों के रूप में उपलब्ध कराए गए छत्तीसगढ़ी पाक-विद्या में पारंगत स्थानीय रसोईयों को प्रशिक्षित कर पाककला का एक विशिष्ट ‘घराना’ खड़ा करने का दायित्व भी था. उनके स्थानीय सहयोगियों और सहायकों को कॉन्टिनेंटल भोजन सीखने से अधिक कष्टदायी लगा सिक्वेरा शब्द का उच्चारण करना. कुछ ही समय में उनका नाम ‘सकीरा साहब’ के रूप में प्रचलित हुआ और अंत तक वे इसी नाम से जाने गए.

सकीरा साहब के लिए एक अलग और नई रसोई की व्यवस्था की गई. यह दरअसल रसोईघर नहीं, उनका छोटा-सा साम्राज्य था. सकीरा साहब की अपनी बेकरी थी जिसमें वे प्रतिदिन ब्रेड, बिस्किट, केक, पेस्ट्री के साथ साथ मरैंग जैसे अनेक इटैलियन तथा फ्रेंच डिज़र्ट बनाते थे. उनके अपने दो रेफ्रिजरेटर थे, जो फ्रिजडेयर कहलाते थे.

अमेरिका की गार्जियन फ्रिजडेयर कंपनी ने सन् 1916 में फ्रिजडेयर ब्रांड के तहत पहली बार रेफ्रिजरेटर बाज़ार में प्रस्तुत किया था. उन दिनों, और बाद के अनेक दशकों तक रेफ्रिजरेटर के लिए, चाहे वह किसी भी ब्रांड का हो, फ्रिजडेयर शब्द ही इस्तेमाल किया जाता रहा था. आज का प्रचलित शब्द ‘फ्रिज’ उसी फ्रिजडेयर का संक्षिप्त रूप है. 350 लीटर के ये विशाल फ्रिज केरोसिन से चलते थे.

इसके अलावा एक बर्फखाना भी हुआ करता था जो डीप-फ्रीज़ के लिए काम आता था. उनका अपना मुर्गीखाना और मछलियों को ताजा रखने के लिए पानी की एक विशाल टंकी थी. रोज मिर्च, नारियल, धनिया, खसखस जैसे ताज़े गीले मसाले आदि पीसने के लिए हेल्पर थे. उन दिनों मेयोनेज़ या विभिन्न प्रकार के अन्य सॉस जैसे टार्टर सॉस, मिंट सॉस जैसी अनेक खाद्य सामग्रियों के बाज़ार में मिलने का चलन प्रारंभ नही हुआ था. सकीरा साहब ने गिरिविलास के स्टाफ को ये चीजें बनाना सिखाया.

नाज़िर साहब एक रात पहले, अगले दिन के नाश्ते और रात्रि भोजन के लिए फ़रमाइशें नोट करते थे (दिन में रानी साहिबा के निर्देश पर बना छत्तीसगढ़ी भोजन धोती पहनकर पीढ़े पर बैठ कर ग्रहण किया जाता था. यह समय सकीरा साहब के लिए ताका-झांकी कर कुछ नया सीखने का होता था).

नाज़िर साहब की लिखी लिस्ट तीन प्रतियों में टाइप होती थी. एक प्रति भंडारी को जाती जो आवश्यक सामग्री की व्यवस्था करते. दूसरी नायब नाज़िर को जाती जो हर ऑर्डर को सलीके से एक कार्ड पर टाइप करवाते. यह कार्ड खाने वाले की कुर्सी के सामने मेज़ पर लगाया जाता, जिससे न केवल परोसने वालों से कोई गलती न हो बल्कि खाने वाले को भी पता हो अब अगली डिश कौन-सी आने वाली है.

सारंगढ़ के दैनिक भोज का रिकॉर्ड आज भी महल के दस्तावेज़ों में दर्ज है.

तीसरी कॉपी सकीरा साहब को भेजी जाती. अधिकांश अवसरों पर खाने वालों की फ़रमाइशें अलग होतीं और सकीरा साहब किसी को निराश नहीं करते.

इस तरह यूरोप के अभिजात्य घरानों में भोजन परोसे जाने का चलन सारंगढ़ में आ गया.

अपने ज्ञान और अनुभव को बांटने और बचे समय में छत्तीसगढ़ के व्यंजनों और पकवानों को समझने-सीखने में उन्होंने अपने आप को खपा दिया. सारंगढ़ से कुछ दूरी पर रांपागुला नामक गांव में उन्हें खेत दिए गए थे जिसमें उनके बेटे पावलो की देखरेख में खेती होती थी.

सकीरा साहब के ‘साम्राज्य’ से कुछ दूरी पर महल का जनार-राऊर (जनार- ज्योनार का स्थानीय रूप, रसोई; राऊर – स्थान या घर) था जिसमें राजमाता और रानी साहिबा की देखरेख में और निर्देश पर छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनते थे. सकीरा साहब को जब अवसर मिलता वे जनार-राऊर में ताका-झांकी कर स्थानीय व्यंजनों और शैलियों से सीखते और अपने ख़ज़ाने को समृद्ध करते. उसी का परिणाम था 1960 में भोपाल के राजभवन में उनकी पाक-कला की वाहवाही जिसका ज़िक्र शुरुआत में है.

उस दिन उनका बनाया व्यंजन था ‘कोचाई पपची’. छत्तीसगढ़ की कोचाई अन्य इलाकों में अरवी या घुइयां कहलाती है. पपची उत्तर भारत के ‘खाजा’ जैसा होता है.

अतिथियों की मेज पर ऐसी भोजन-सूचियां रखी जाती थीं.

§

सकीरा साहब अपना परिवार गोवा में छोड़कर आए थे मगर उनकी पत्नी और बेटे पावलो का आना-जाना लगा रहता था. सन् 1950 में राजा जवाहिर सिंह के बेटे और तब तक राजा बन चुके राजा नरेशचन्द्र सिंह मध्य प्रदेश के मंत्री के रूप में नागपुर में रहने लगे थे. बच्चों को हॉस्टल भेज दिया गया. अपने पिता की उम्र के सकीरा साहब को राजा साहब अपने साथ नागपुर ले गए. तब तक उनके छोटे भाई वापस गोवा जा चुके थे और स्वयं सकीरा साहब राजा साहब के विस्तृत परिवार का हिस्सा बन चुके थे.

सारंगढ़ में उनकी छत्रछाया में प्रशिक्षित खानसामाओं की फौज तैयार हो चुकी थी. 1956 में नया मध्य प्रदेश बना और राजधानी भोपाल में बन गई. राजा नरेशचन्द्र सिंह, उनकी पत्नी ललिता देवी और उनके परिवार के साथ सकीरा साहब भी भोपाल आ गए थे. उनके जीवन का यह काल सेवानिवृत्ति से पहले के लंबे अवकाश की तरह था. नियमित रूप से वे चर्च जाते. घर में सयाने की तरह समय गुज़ारते.

उनके बेटे को रेलवे में नौकरी मिल चुकी थी. 1967 में राजा नरेशचन्द्र सिंह की बड़ी बेटी रजनीगंधा का विवाह हुआ. विवाह के बाद रिसेप्शन भोपाल में राजा साहब के आवास 6, श्यामला हिल्स में हुआ जो अब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का आधिकारिक आवास है. इस रिसेप्शन में खान-पान की व्यवस्था संभालना सकीरा साहब की अंतिम औपचारिक ज़िम्मेदारी थी. इसके बाद उन्होंने सेवानिवृत्ति ली और गोवा वापस चले गए.

उनके जीवन का अधिकांश हिस्सा सकीरा साहब के रूप में छत्तीसगढ़ में बीता था. जब वे वापस मिस्टर सिक्वेरा के जीवन में लौटे तो अतीत की स्मृतियां उनके साथ चलती रहीं. कुछ ही समय में उनकी मृत्यु हो गई. 1970 के आसपास उनके बेटे ने सारंगढ़ आकर रापांगुला की जमीन बेच दीं पर गोवा के साथ सारंगढ़ के तार नहीं टूटे. उनकी यादें अभी भी गिरिविलास के रसोई और महल के दस्तावेज़ों में सुरक्षित हैं.

(लेखक इतिहास-प्रेमी हैं, छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं.)

(इस श्रृंखला के सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)