हाल के वर्षों में ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ की समरूपता के इर्द-गिर्द बहस राजनीतिक और शैक्षणिक दोनों क्षेत्रों में बढ़ी है. इस बहस के दो दृष्टिकोण हैं—एक का मानना है कि ओबीसी एक सजातीय समूह है. वहीं— दूसरा पक्ष इसका तार्किक खंडन करते हुए मानता है कि ओबीसी एक विजातीय समूह है—जिसमें विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तरों वाली हजारों जातियां शामिल हैं.
यह लेख ओबीसी के भीतर आंतरिक स्तरीकरण की जांच करता हुआ आयोगों, जाति-आधारित असमानताओं और प्रतिनिधित्व और न्याय के बारे में चल रही बहसों का विश्लेषण करके ओबीसी एकता की संभावनाओं और सीमाओं को समझने का प्रयास करता है.
स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दौर में स्थापित ‘काका कालेलकर आयोग’ पिछड़ेपन की पहचान करने वाले पहले आयोगों में से एक था. बाद में 1971 में बिहार में गठित मुंगेरीलाल आयोग और 1975 में उत्तर प्रदेश में गठित छेदीलाल साथी आयोग ने माना कि ओबीसी एक विजातीय समूह हैं जिसमें दो और तीन स्तरों पर जातियां विद्यमान हैं.
मुंगेरीलाल आयोग ने सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक स्थिति के आधार पर ओबीसी को दो भागों में विभाजित किया—पिछड़ी जातियां और अति पिछड़ी जातियां. छेदीलाल साथी आयोग ने आगे बढ़कर उन्हें तीन समूहों में विभाजित किया—उच्च पिछड़ा, अति पिछड़ा और अत्यंत पिछड़ा वर्ग.
ओबीसी श्रेणी को मोटे तौर पर तीन स्तरों में विभाजित किया जा सकता है —उच्च पिछड़ी जातियां. ये बड़ी, भूमि-स्वामित्व वाली जातियां हैं जिन्हें भूमि सुधारों और आधुनिकीकरण से लाभ मिला है. मंडल आयोग के लागू होने के बाद इन जातियों की पूर्व निर्मित सामाजिक और राजनीतिक पूंजी ने इन्हें वह तमाम अवसर उपलब्ध कराएं—जिनकी वजह से इनकी दृश्यमानता बढ़ती गई.
दूसरे स्तर पर वह जातियां हैं—जो संख्याबल में कम हैं. इसमें दस्तकार जातियां हैं—जो पहले जजमानी प्रणाली का हिस्सा थीं. डी.आर. नागराज इन समुदायों को ‘टेक्नोसाइड समुदाय’ के रूप में संदर्भित करते हैं. उनका तर्क है कि आधुनिकीकरण ने उनके पारंपरिक व्यवसायों को नष्ट कर दिया—जिससे वे सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमज़ोर हो गए. मंडल आयोग से लाभ उठाने के लिए उनके पास आवश्यक सामाजिक और राजनीतिक पूंजी नहीं थी इसलिए वह आरक्षण का फायदा लेने में नाकाम रहे.
तीसरे स्तर पर हाशिए पर पड़ी छोटी जातियां और पसमांदा मुसलमान हैं. इनके पास जीवन जीने के दिन-प्रतिदिन का संघर्ष हैं. इसके अलावा ओबीसी की कई जातियां अंग्रेजी शासन में बनाए गए कानून ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ में शामिल रही हैं जिसके कारण उनके साथ एक अलग तरह की समस्याएं हैं—जिसे संबोधित किया जाना अभी बाकी है.
मंडल आयोग द्वारा आंतरिक वर्गीकरण के बिना ओबीसी को 27% आरक्षण दिए जाने के कारण अधिकांश लाभ कुछ प्रमुख ओबीसी जातियों को मिले. राजनीतिक पूंजी और राजनीतिक दृश्यता में कमी के कारण अन्य समूह पिछड़ते गए. रोहिणी कमीशन की बाहर आई अनुशंसाओं से महत्वपूर्ण बात उभरकर सामने आई कि देश की सरकारी नौकरियों में उच्च पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात से ज्यादा है.
प्रमुख जातियां अक्सर अपने अधिक प्रतिनिधित्व को सही ठहराने के लिए मेरिट के तर्क का उपयोग करती हैं—जो उच्च-जाति के तर्क के समान है. यह कहना समस्याग्रस्त है क्योंकि योग्यता संसाधनों और अवसरों तक पहुंच से आकार लेती है—जो इन प्रमुख ओबीसी जातियों के पास पहले से ही हैं. आरक्षण की अवधारणा योग्यता पर आधारित नहीं है, बल्कि समान अवसर सुनिश्चित करने पर आधारित है.
उच्च पिछड़ी जातियों का ज्यादा प्रतिनिधित्व एक तथ्य है. इसे बार-बार भाजपा और आरएसएस का फैलाया झूठ बोलना सही नहीं है. हां यह सही है कि भाजपा ने इसका अपने पक्ष में इस्तेमाल किया है. वह चाहती हैं कि अति पिछड़ी जातियां—उच्च जातियों के ज्यादा प्रतिनिधित्व पर सवाल खड़े करे लेकिन उच्च पिछड़ी जातियों के ज्यादा प्रतिनिधित्व पर सवाल न करें. यह रवैया ठीक नहीं है. सवाल दोनों तरफ़ से एक साथ होना चाहिए
असली सवाल यह है कि —आरक्षण तक समान पहुंच कैसे सुनिश्चित की जा सकती है. यदि वही प्रभावशाली समूह लाभों पर एकाधिकार करना जारी रखते हैं तो वर्गीकरण और आनुपातिक प्रतिनिधित्व के बिना सामाजिक न्याय अधूरा रह जाएगा.
उच्च पिछड़ी जातियां ओबीसी के अनुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण कोटा बढ़ाने का तर्क देती हैं. यह सतही तौर पर सही लगता है, लेकिन चिंता यह है कि क्या इस तरह के कदम से वास्तव में सभी ओबीसी को समान रूप से लाभ होगा. उदाहरण के लिए, यदि 27% आरक्षण में पहले से ही प्रमुख पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व 20% है तो 50% आरक्षण में उनकी हिस्सेदारी 40% तक भी हो सकती है.
बिहार जैसे कई राज्यों ने ओबीसी के भीतर वर्गीकरण लागू किया है. उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार को इसी तरह के उपायों पर विचार करने की आवश्यकता है. केवल आरक्षण को समान रूप से पुनर्वितरित करके ही सामाजिक न्याय के लक्ष्यों को पूरा किया जा सकता है.
अधिकांश पिछड़ी जातियों के खिलाफ भेदभाव केवल उच्च जातियों द्वारा ही नहीं किया जाता है, बल्कि ‘प्रभुत्वशाली ओबीसी जातियों’ द्वारा भी किया जाता है. ओबीसी की प्रथम स्तरीय जातियों में कुछ जातियां दबंग स्वभाव की हैं. यह जातियां ओबीसी की अन्य जातियों पर सामंतवादी व्यवहार करती पाई जाती हैं.
यहां तक कि ओबीसी के बीच ‘सांस्कृतिक विविधता’ भी उनकी विजातीय स्थिति को दर्शाती है. कुछ जातियां शाकाहारीं और कुछ मांसाहारी हैं. कारीगर और नदी किनारे के समुदायों के पारंपरिक व्यवसाय नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण विलुप्त होने के करीब हैं, जबकि प्रमुख ओबीसी जातियों की आजीविका सुरक्षित है. इसलिए ओबीसी एकता इस विविधता को नजरअंदाज नहीं कर सकती. यह सवाल होना चाहिए कि क्या आंतरिक उत्पीड़न मौजूद होते हुए एक सुसंगत राजनीतिक पहचान बनाई जा सकती है?
ओबीसी एकता का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि भविष्य में कौन और कैसे नेतृत्व करता है. यदि वही प्रमुख जातियां नेतृत्व के पदों पर बनी रहती हैं, तो यह सह एकता संभव नहीं होगी. आनुपातिक प्रतिनिधित्व, समावेशी भागीदारी और असहमति की आवाज़ों के लिए जगह एक न्यायपूर्ण ओबीसी एकता के निर्माण के लिए आवश्यक है.
दलित अस्पृश्यता के आधार पर एकजुट हो सकते हैं लेकिन ओबीसी के पास एक एकीकृत एकता के आधार का अभाव है. ओबीसी जातियों के बीच आंतरिक विभाजन, प्रतिद्वंद्विता और पारस्परिक शोषण एकता को और भी जटिल बना देते हैं. उनके कुछ मुद्दों पर एकजुटता की संभावना है—ओबीसी आरक्षण पर हमले, आरक्षण नीतियों का अनुचित क्रियान्वयन और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता.
हालांकि, एकजुटता तभी वास्तविक होगी जब प्रमुख जातियां यह स्वीकार करेंगी कि ओबीसी के बीच आरक्षण को उचित तरीके से लागू नहीं किया गया है. अन्यथा—ओबीसी एकता एक प्रतीक बनकर ही रह जाएगी. ओबीसी एकता के लिए प्रतिनिधित्व के न्यायपूर्ण की ओर बढ़ना ही होगा.
ओबीसी एकता या पीडीए राजनीति तभी सफल हो सकती है जब वह आंतरिक असमानताओं को पहचाने और उन्हें ठीक करने के लिए काम करे. वहां प्रभावशाली जातियों की बजाय अति पिछड़ी जातियों की आवाज़ों के लिए जगह स्थान देना होगा. आज भी मुंगेरीलाल और छेदीलाल साथी आयोगों पर गहन विद्वत्तापूर्ण कार्य का अभाव है. ये रिपोर्ट अंतर-ओबीसी असमानता को संबोधित करने के लिए आवश्यक हैं और इनका गंभीरता से अध्ययन किया जाना चाहिए.
बी.पी. मंडल के नायकत्व पर बात करते समय अन्य हस्तियों को नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने आंतरिक वर्गीकरण के लिए आधार तैयार किया. ओबीसी नायको की निर्मिति में इन सवालों का ध्यान रखना होगा नही तो किसी एक नायक निर्मिति में अन्य नायक नेपथ्य में रह जायेंगे.
इन मूलभूत मुद्दों को संबोधित किए बिना पीडीए या ओबीसी एकता की कोई भी राजनीति सतही होगी. यह केवल प्रभुत्वशाली जातियों को लाभ पहुंचाएगी—जबकि अधिकांश जातियों हाशिए पर पड़ी रहेंगी.
(लेखक इलाहाबाद स्थित जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में शोध छात्र हैं.)
