बिहार की वोटर लिस्ट: जनता का सवाल- चुनाव के इतना नज़दीक यह करने की क्या ज़रूरत?

भारत निर्वाचन आयोग ने बिहार में मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान 2025 आरंभ किया है, जिसके तहत घर-घर जाकर बीएलओ गणना पपत्र की दो प्रतियां बांट रहे हैं. दोनों प्रतियों के साथ स्व-हस्ताक्षरित जरूरी दस्तावेज़ संलग्न कर बीएलओ को जमा कर उनसे रसीद लेनी है. ऐसे में चुनाव से ठीक पहले सरकार और निर्वाचन आयोग की ये नीति आम आदमी की समझ से परे है.

भोजपुर जिला मुख्यालय से हरिगांव कचहरी स्थित पीपल के पेड़ के नीचे बैठे गांव के लोग पीले रंग कंधे गमछी लिए 65 वर्षीय ईश्वर दयाल चौरसिया और उनके साथी. (सभी फोटो: अशुतोष पांडेय)

आरा: बिहार में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले निर्वाचन आयोग ने मतदाताओं के पुनरीक्षण की कवायद शुरू की है, जिसने राज्य की सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है.

जुलाई का शुरुआती हफ्ता है और सुबह के लगभग साढ़े छह बजे हैं. आरा के रमना मैदान स्थित कलेक्ट्री तालाब के किनारे बरगद के चबूतरे पर गंजी पहने वरिष्ठ रंगकर्मी और जेपी आंदोलन के सेनानी रहे 62 वर्षीय अशोक मानव अपनी टीशर्ट से हवा कर रहे हैं. बगल में चाय की दुकान है, जिसके चलते चर्चा का माहौल बना हुआ है.

अशोक मानव बताते हैं, ‘अभी निर्वाचन आयोग जो कुछ भी कर रहा है, वह गलत कर रहा है. जब चुनाव इतना नज़दीक है तब यह करने की क्या जरूरत है, सालभर पहले से ही यह काम करता तब कोई कुछ नहीं बोलता.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘इतने वर्षों से हम यहां के निवासी हैं. ढेर सारे आंदोलन देखे, इतना जीवन जिए, अब क्या सरकार चाहती है?’

यह कहने पर कि यह सरकार नहीं बल्कि निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया है, अशोक मानव डपटते हुए कहते हैं, ‘हमको मत बताइए, बिना सरकार के निर्देश का कोई काम नहीं होता है. आधार कार्ड बनने के बाद हम सबको लगा कि इससे बड़ा कोई कार्ड नहीं हो सकता है, फिर आप गड़बड़ करवा रहे हैं. हमारे पास जमीन नहीं है, आधार कार्ड ही है तो क्या हम देश छोड़कर चले जाएं? सरकार को कोई विकल्प बताना चाहिए कि हम क्या करें? हमारे पास कुछ नहीं है.’

जेपी सेनानी और वरिष्ठ रंगकर्मी 62 वर्षीय अशोक मानव कलक्टरी तालाब किनारे पीपल वृक्ष के नीचे चबूतरे पर बैठे हुए.

ज्ञात हो कि भारत निर्वाचन आयोग ने बिहार में मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान 2025 आरंभ किया है, जिसके तहत घर-घर जाकर बीएलओ गणना पपत्र की दो प्रतियां बांट रहे हैं. दोनों प्रतियों के साथ स्व-हस्ताक्षरित जरूरी दस्तावेज़ संलग्न कर बीएलओ को जमा कर उनसे रसीद लेनी है.

आयोग ने यह निर्देश जारी करते हुए गणना पपत्र को भरने की तारीख 25 जून 2025 से 26 जुलाई 2025 तक की अवधि निर्धारित की है. इसके आधार पर मतदाता सूची का प्रकाशन 1 अगस्त 2025 को होगा. 1 सितंबर तक इसमें आपत्ति दर्ज कराई जाएगी और इसका अंतिम प्रकाशन 30 सितंबर 2025 को होगी.

सुबह के करीब आठ बजे बक्सर जिला मुख्यालय से बीस किलोमीटर दूर सेमरी ब्लॉक के नगवा गांव निवासी 26 वर्षीय राहुल कुमार सिंह अपनी छोटी बहन को सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज आरा में सेमेस्टर पांच का इम्तिहान दिलवाने आए हैं. वे रमना मैदान में पेड़ के नीचे बैठे हैं. 

बक्सर से 20 किलोमीटर दूर सेमरी प्रखंड के नगवा गांव निवासी 27 वर्षीय राहुल सिंह सरकारी इंजिनियरिंग कॉलेज आरा में अपनी बहन को परीक्षा दिलावे आए हैं.

उन्होंने बताया कि बीएलओ ने घर पर फॉर्म दे दिया है. उसने कुछ प्रमाण पत्र नहीं मांगा है. सरकार और निर्वाचन आयोग की नीति आम आदमी की समझ से परे है. पहली बार पंचायत चुनाव में मतदान किया है. अभी तक समय नहीं मिला कि फॉर्म भर दें.

राहुल सिंह ने आगे कहा, ‘कोई प्रमाण पत्र मांगा नहीं गया है, वैसे आधार कॉर्ड के अलावा मैट्रिक और इंटर के प्रमाण पत्र के अलावा कुछ है नहीं, बैंक में कोई खाता ही नहीं है. जब पैसा नहीं है तो खाता कैसे खुलेगा?’  

निर्वाचन आयोग द्वारा नागरिकों से मांगे गए दस्तावेज़ में आधार को वैकल्पिक माना गया है.

1 जुलाई 1987 से पहले जन्में लोगों, 1जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच जन्में नागरिकों से तथा 2दिसंबर 2004 के बाद जन्में व्यक्ति से कुल 11 में से कोई एक प्रमाण पत्र मांगा गया है.

  1. केंद्रीय, राज्य, पीएसयू के नियमित कर्मचारी/पेंशनभोगी को निर्गत कोई भी पहचान पत्र/पेंशन भुगतान आदेश.
  2. सरकार, स्थानीय प्राधिकरण, बैंक, डाकघर, एलआईसी, पीएसयू द्वारा भारत में 1 जुलाई 1987 से पूर्व का कोई भी प्रमाण पत्र.
  3. सक्षम अधिकारी द्वारा निर्गत जन्म प्रमाण पत्र.
  4. पासपोर्ट.
  5. मान्यता प्राप्त बोर्ड, मैट्रिक का प्रमाण पत्र, विश्वविद्यालय का प्रमाण पत्र.
  6. निवास प्रमाण पत्र
  7. वन अधिकार प्रमाण पत्र.
  8. जाति प्रमाण पत्र.
  9. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (जहां उपलब्ध हो)
  10. मान्यता प्राप्त परिवारिक रजिस्टर.
  11. जमीन का कागज.

जिन लोगों का जन्म 2 दिसंबर 2004 के बाद हुआ है वे अपना जन्म प्रमाण पत्र या अपने माता या पिता किसी का जन्म तिथि तथा स्थान संबंधी प्रमाण पत्र देना होगा.

इस बातचीत को सुन रहे आरा के एक बड़े व्यवसायी ने कहा, ‘इस प्रक्रिया में सिर्फ मुसलमानों और भाजपा विरोधी जातियों का नाम काटने का प्लान है, बाकी कुछ नहीं.’ इतना कहकर आगे जाते हुए उन्होंने कहा, ‘कृपया मेरा नाम मत लिखिएगा, कल ही छापेमारी हो जाएगी.’

सासाराम के हनुमान नगर निवासी 18 वर्षीय राजदीप कुमार सरकारी इंजिनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करते हैं. वे रमना मैदान में घूमने निकले हैं.

सासाराम के हनुमान नगर के रहने वाले 18 वर्षीय राजदीप कुमार आरा के गवरमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई करते है.

उन्होंने बताया, ‘हम सुने है कि निर्वाचन आयोग ने कुछ घोषणा की है. लेकिन समझ में नहीं आ रहा है कि यह जनता के लिए घोषणा है या किसके लिए. लग रहा है कि जनता को तंग करने का नया तरीका सरकार ने खोज लिया है. निर्वाचन आयोग और सरकार जनता के लिए सुविधाजनक नहीं है.’

‘जब चुनाव एकदम कपार पर है तो अभी सरकार को कौन बीमारी पकड़ लिया’

इस कवायद ने आमजन को आशंकित तो किया है, साथ ही आयोग की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं.

भोजपुर जिला मुख्यालय से लगभग 18 किलोमीटर दूर हरिगांव के कुछ लोग कचहरी स्थित पीपल के पेड़ नीचे ताश खेल रहे हैं. यहां 65 वर्षीय ईश्वर दयाल चौरसिया मौजूद हैं. वे कहते हैं, ‘जैसे हमें पता चला कि वोटर लिस्ट में फिर से नाम जोड़ा जा रहा, तो हमने सोचा कि सालभर पहले ही तो वोट दिया था, तब कुछ गड़बड़ी नहीं थी, आराम से हो गया था, अब क्या बात हो गई.’

दयाल आगे जोड़ते है, ‘सरकार जरूर कोई अच्छी बात सोची होगी, कुछ गड़बड़ी हुआ होगा, वह जनता के लिए अच्छा काम करती है. सरकार ठीक कर रही है.’

जब उनसे कहा गया, ‘यह काम तो निर्वाचन आयोग का है?’

वह खीझते हुए समझाते हैं, ‘अरे भाई कोई सरकार से ऊपर थोड़ी है, सरकार है तभी तो सबकुछ है, नहीं तो क्या होता. मुझे तो कोई परेशानी नहीं हुई, आधार नंबर जोड़ दिया.’

यह बात सुनते ही 55 वर्षीय कमलेश राम विफर पड़े. उन्होंने कहा, ‘सरकार हमारा नाम काटना चाहती है, वह नहीं चाहती है कि हम जिसको वोट देना चाहते है, उसे वोट दें.’

इसके बाद पीपल के नीचे जोरदार और तीखी बहस हो जाती है. ताश का खेल भंग हो जाता है. कमलेश राम वहां से निकल जाते हैं. उनके पीछे जाने पर हम उनकी दुकान पर पहुंचते है. वे मोची का काम करते हैं. वे अपनी छोटी दुकान खोलकर प्लास्टिक का एक चप्पल सीने लगते हैं. इसी बीच एक लड़का दो चप्पल सीलने के लिए कहता है.

55 वर्षीय रमेश राम अपने दुकान पर मोची का काम करते हुए.

उन्होंने तीखे स्वर में मना किया और कहने लगे, ‘मेरे पास आधार कार्ड, स्मार्ट कार्ड और वोटर कार्ड है. अब किस चीज का नाम जोड़ा जा रहा है, जब चुनाव एकदम कपार पर है, तो सरकार को अभी कौन सी बीमारी पकड़ लिया? मेरे पास जो है सो है, खेत-बधार नहीं है, जीवन चल रहा है, इतना से काम नहीं चल रहा है? मजदूरी करने जाएं, भोजन का व्यवस्था करें या सिर्फ यही सब बनवाते रहें? कुछ मिलना-जुलना तो है नहीं.’

हरिगांव इस इलाके का प्रसिद्ध गांव है. माना जाता है कि इसी गांव के निवासी शिव सागर राम गुलाम गिरमिटिया मजदूर के तौर पर वर्षों पहले मॉरीशस गए थे और वहां संघर्ष करते हुए राष्ट्राध्यक्ष बने. इस गांव की आबादी करीब 5000 है. इस गांव में सभी जातियों के लोग रहते हैं.

हरिगांव कचहरी में पीपल पेड़ के चबूतरे पर ताश खेलते बुजुर्ग और कंधे पर पीले रंग की गमछी लिए ईश्वर दयाल चौरसिया

हरिगांव के हरिजन टोला वार्ड नंबर सात के निवासी 75 वर्षीय जवाहिर राम ने बताया, ‘हमको पता नहीं चल रहा है कि क्या हो रहा है. हम तो अकेले है. चार लड़का है. चारों अलग है. हम अकेले रहते हैं, मजदूरी करते है. गृहस्थ के यहां कुछ काम मिल जाता है तो काम चल जाता है.’

मतदाता पुनरीक्षण पर प्रश्न पूछने पर वे कहते हैं, ‘सरकार को तो नहीं चाहिए नाम काटना, लेकिन कर देगा तो हम कहां जाएंगे, जिंदगी में कोई नहीं है सिर्फ सरकार ही मेरे साथ है. सब लड़का अलग हो गया, यदि सरकार हमको चार सौ रुपया महीना नहीं देती और पांच किलो अनाज तो हम क्या करते या खाते-पीते.’ वे आगे जोड़ते है, ‘मेरे लिए तो घर वालों से बढ़िया सरकार ही है.’

‘पढ़-लिखकर लोग बड़े बन जाते हैं और निपढ़ लोगों को तंग करने लगते हैं’

करकट से ढके अपने घर की दीवार पर भैंस की गोबर का गोइठा पाथती 45 साल की राजश्री देवी कहती हैं, ‘हमारा फॉर्म भरा गया है, यहां पर बीडीओ, सीओ, मुखिया लोग आए थे. फॉर्म भरा गया लेकिन किसी ने कोई प्रमाण पत्र नहीं मांगा, बल्कि आधार नंबर ही जोड़ा है. लेकिन सरकार क्या करना चाहती है, समझ में ही नहीं आ रहा है, कभी नोटबंदी कर देती है तो कभी फिर से नाम जोड़वा रही है.’

वे आगे कहती हैं, ‘मेरा दो लड़का हैं, लेकिन दोनों अभी 18 से कम है, इसलिए उसका नाम नहीं जोड़ा गया है. सरकार कभी अच्छी भी लगती है. तो कभी खराब लगती है, बार-बार नाम जोड़ने-घटाने से टेंशन हो जाता है, पता नहीं क्या होग?’

बगल में गोइठा उठा रही 40 वर्षीय पार्वती देवी कहती है, ‘अब सरकार पर ही है कि यहां हमको रहने देना चाहती है या कहीं और भेजना चाहती है. काहे कि हम दिन भर घर-दुआर का काम करें या यही सब पढ़ाई लिखाई करें? हमको तो कुछ भी लिखने-पढ़ने नहीं आता है. पढ़-लिखकर लोग बड़े बन जाते हैं और निपढ़ लोगों को तंग करने लगते हैं.’

मुंह में दातुन लगाए 60 वर्षीय सुरेश राम खेत से सीधे गांव में प्रवेश करने वाली सड़क पर आते हैं और बताते हैं, ‘हमको अभी फॉर्म नहीं मिला है, हम लोग दो बेक़त यहां रहते हैं, तीन लड़का है, 21 वर्ष का छोटा लड़का एतवारु सूरत रहता है. अभी हमारे पास फॉर्म भरने का फुर्सत नहीं है, हम भरते कइसे? हम किसी से भरवाते. हम पढ़े लिखें नहीं हैं. अभी खेत से रोपनी के लिए लेवाड़ करवाके आ रहे हैं. दस हज़ार प्रति बिगहा के हिसाब से दुई बिगहा खेत मालगुजारी पर लिए हैं, वहीं धान रोपवाना है. आ सरकार अलग ही लफड़ा लगा रही है.’

वे आगे कहते हैं, ‘हम खेत पर काम करें या वोटर लिस्ट के चक्कर में पड़े. जब सरकार गरीब पर कोई ध्यान नहीं दे रही है तो हम क्या सरकार पर ध्यान दें?’

इस बीच कुछ उत्साही मतदाता इस कवायद को भाजपा से जोड़ ही ले रहे हैं और उन्हें यकीन है कि पार्टी समर्थक होने का लाभ उन्हें मिल सकेगा.

हरिगांव स्थित बाजार में 19 वर्ष के अमित कुमार कुमार बताते हैं, ‘अभी मेरा नाम नहीं जुड़ा है, जबकि मेरा उम्र हो गया है, मैं वोट देना चाहता हूं मगर कोई भी अभी फॉर्म भराने नहीं आया है. मेरे पिता कामेश्वर कुमार चौरसिया व्यवसायी है, वे सारा जुगाड़ कर लेंगे. मेरा नाम कटेगा नहीं. क्योंकि मेरा पूरा खानदान भाजपा को वोट करता है.’

19 वर्षीय अमित कुमार को अभी पपत्र नहीं मिला है.

‘इतना सबूत नहीं है कि कागज देकर अपनी नागरिकता साबित करते रहें’

जगदीशपुर प्रखंड अंतर्गत बभनिआओ पंचायत का यह छोटा सा गांव टिकठी है. यहां पर अधिकांश आबादी अतिपिछड़े समाज की है.

निजी फाइनेंस कंपनी में काम करने वाले 28 वर्षीय सुनील कुमार ठाकुर बताते हैं, ‘सरकार यह सब काम करके आमजन से लफड़ा कर रहा है. इतना सबूत हमारे पास नही है कि हम यहां दिनभर कागज देकर अपनी नागरिकता साबित करते रहें. आधार कॉर्ड, पैन कॉर्ड, बैंक खाता, वोटर कॉर्ड, मैट्रिक का प्रमाण पत्र आदि है. अब इसके बाद कौन सा प्रमाण लाएं. सरकार बांग्लादेशी साबित करने के लिए यह काम कर रही है. एक दिन कह देगी कि अब यहां से जाइए, इसलिए यह सब काम हो रहा है.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)