एक नवंबर सन् 1956 की मध्यरात्रि सवा बारह बजे मूल रूप से चिकित्सक डॉक्टर बी. पट्टाभी सीतारामैया ने भोपाल में नए मध्यप्रदेश के राज्यपाल के रूप में शपथ ली. वे यह कहने के अधिकारी थे कि इस राज्य से मेरा पुराना नाता है. 1939 में हुए त्रिपुरी के कांग्रेस अधिवेशन को अध्यक्ष के रूप में सुभाष चंद्र बोस की विजय और फिर इस्तीफ़े के लिए याद किया जाता है. वह अधिवेशन इस नए बन रहे मध्यप्रदेश के जबलपुर के पास, नर्मदा के किनारे के गांव तेवर में हुआ था. अधिवेशन स्थल को त्रिपुरी नाम दिया गया था. उस चुनाव में पराजित होने वाले नेता पट्टाभी सीतारामैया थे.
इसके सत्रह बरस बाद, 1956 में भारत के सबसे विशाल राज्य का उदय हुआ.
बड़ा इतना कि पूर्व में उड़ीसा से लगी सीमा से पश्चिम में गुजरात को छूती सीमा तक पहुंचने में सूर्य को चालीस मिनिट लगते थे. पूरा देश एक टाईम-ज़ोन में होने के कारण इस दूरी का अहसास नहीं हुआ. कुल तेरालीस ज़िलों में बंटे राज्य का एक अकेला बस्तर ज़िला करीब चालीस हज़ार वर्ग किलोमीटर में फैला था, केरल राज्य से बड़ा था. रायगढ़ ज़िले की उत्तरी सीमा का औसत तापमान दक्षिणी छोर से दस डिग्री कम था.
नए बने मध्यप्रदेश में राजधानी को लेकर खींचतान शुरू हो गई. जबलपुर प्रबल दावेदार था. किंतु अंत में जिन दो बातों ने पलड़ा भोपाल की ओर झुकाया, उनमें पहली तो थी रेल जो उसे दिल्ली से जोड़ती थी. और दूसरा और अधिक बड़ा कारण वो बैरकें थीं जो दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज़ी फ़ौज ने बनाई थीं.
विश्वयुद्ध में जब जापानियों के साथ अंग्रेज़ों का युद्ध बर्मा सेक्टर में प्रारंभ हुआ, सैनिकों को जंगल में युद्ध के प्रशिक्षण देने की ज़रूरत महसूस हुई. भोपाल के पास बुदनी नामक स्थान के जंगल को इस ट्रेनिंग के लिए चुना गया. उस समय भोपाल के पास बैरागढ़ में हवाई अड्डा था जहां से सैनिकों का आना जाना होता था. उनके लिए हवाई अड्डे के पास ही बैरकों का निर्माण किया गया – लंबे हॉल-नुमा छोटे भवनों की क़तार जिसमें सैनिक रहते थे. युद्ध के बाद उत्तरी अफ़्रीका में बंदी बनाए गए इटली के सैनिकों को बैरागढ़ की इन्हीं बैरकों में रखा गया था.
प्रशासनिक संस्कृति के मामले में नया राज्य पुराने मध्यप्रदेश का ही विस्तार था
1956 में जब नया मध्यप्रदेश बनने का समय निकट आया तब तक युद्धबंदी या तो वापस अपने देश चले गए थे या उस वर्तमान हवाईअड्डे के पास मौजूद कब्रगाह में. इन बैरकों का एक नया इस्तेमाल हुआ जब बड़ी संख्या में भोपाल पहुंचे अधिकारियों और नेताओं और विधायकों को इनमें रखा गया था. जिनके साथ परिवार थे उनके लिए लंबे हॉल में पार्टीशन कर कमरों का भ्रम पैदा किया गया. मंत्रियों को भोपाल (नए मध्यप्रदेश में तब का यह शहर अब ‘पुराना भोपाल’ कहलाता है) में बंगले मिले. सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह को 6, शामला हिल्स की कोठी दी गई.
एक नवंबर सन् 1956 की मध्यरात्रि डॉ. पट्टाभी सीतारामैया जिस राज्य के जन्म के गवाह बने, उसमें अंग्रेज़ों द्वारा प्रशासित इलाक़ों के अलावा आज़ादी-पूर्व की पचहत्तर रियासतें शामिल थीं. इनमें चौदह छत्तीसगढ़ की, पच्चीस इंदौर-ग्वालियर वाले मध्यभारत की, पैंतीस रीवा-खजुराहो वाले विंध्य प्रदेश के अलावा भोपाल की रियासत भी शामिल थीं. इस तरह कुल छिहत्तर तरह की प्रशासनिक शैलियाँ और परंपराएं एक छतरी के नीचे आयीं.
हालांकि, प्रशासनिक संस्कृति के मामले में नया राज्य पुराने मध्यप्रदेश का ही विस्तार था. यह इकाई न केवल दर्जे में सबसे बड़ी थी बल्कि यहां की प्रशासनिक रीढ़ सबसे मज़बूत और पुरानी थी.
रविशंकर शुक्ल मुख्यमंत्री बने रहे. प्रशासन और पुलिस दोनों के मुखिया पुराने मध्यप्रदेश से लिए गए. एच.एस. कामथ (प्रख्यात समाजवादी नेता और सांसद रहे हरिविष्णु कामथ के भाई) मुख्य सचिव बने और प्रधानमंत्री नेहरू के सुरक्षा अधिकारी रह चुके के. एफ. रुस्तमजी को पहला इंस्पेक्टर जनरल (आई. जी.) नियुक्त किया गया.

भारतीय गणराज्य में विलय के समय राजाओं और नवाबों को अपने अपने प्रशासनिक अमले के भविष्य को लेकर चिंता थी. इधर, जिस अंग्रेज़-प्रशासित भारत को आज़ादी मिली थी वहां चिंता थी अधिकारियों की कमी की. फ़ौज में भी. विशेषकर ऊपरी पदों पर. अंग्रेज़ इंग्लैंड और अनेक मुस्लिम अधिकारी पाकिस्तान चले गए थे.
समस्या के तात्कालिक हल के रूप में अधिकारियों की सीधी भर्ती भी की गई थी जिसे आज के दौर में ‘लेटरल एंट्री’ कहा जाता. भोपाल में रुस्तमजी की सहायता के लिए मात्र एक डी. आई. जी. थे बालमुकुन्द शुकुल. एक वर्ष के बाद दूसरे डी.आई. जी. के रूप में पहुंचे जगदीश चंद्र (जे.सी.) दीक्षित कुछ वर्ष पूर्व तक नागपुर के विज्ञान महाविद्यालय में फ़िज़िक्स के प्रोफेसर हुआ करते थे.
राजाओं और नवाबों को आश्वस्त किया गया था कि नए निज़ाम में उनके अधिकारियों को उनके समकक्ष पदों पर समायोजित करने का भरसक प्रयास किया जाएगा. इसका एक परिणाम यह हुआ कि विलय से ठीक पहले कुछ रियासतों में दक्षता की फ़िक्र किये बग़ैर राजाओं के मनपसंद अधिकारियों की रातोंरात पदोन्नति कर दी गई.
नए मध्यप्रदेश में नया प्रशासनिक ढांचा खड़ा करना बहुत बड़ी चुनौती थी
नए मध्यप्रदेश में शामिल हो रहे सभी राज्यों के अधिकारियों और कर्मचारियों को मिलाकर एक नया प्रशासनिक ढांचा खड़ा करना बहुत बड़ी चुनौती थी. पुराने मध्यप्रदेश को छोड़ बाक़ी इलाक़ों के अधिकारियों के बीच अंग्रेज़ी भाषा पर पकड़ एक बहुत बड़ी चुनौती बन कर उभरी थी.
कई बार इस चुनौती से जूझने के परिणाम गंभीर भी हुए और रोचक भी. नया राज्य बनने के बाद राष्ट्रपति के भोपाल आगमन का कार्यक्रम बना. उन दिनों देश की सोच में स्वतंत्रता आंदोलन से निकली गांधीवादी सरलता का दबदबा था. रेल मौजूद थी तो हवाई जहाज़ का इस्तेमाल क्यों किया जाता? इसलिए तय हुआ कि राष्ट्रपति का सलून (विशेष रूप से निर्मित रेल के सर्वसुविधायुक्त डिब्बे) रात भर में भोपाल पहुंचा देने वाली जी.टी. (ग्रैंड ट्रंक) एक्सप्रेस के साथ जोड़ दिया जाएगा.
रेल यात्रा का बड़ा हिस्सा मध्यप्रदेश से होकर गुजरता था और राष्ट्रपति की प्रथम यात्रा में सुरक्षा को लेकर भोपाल में बैठे अधिकारियों की रात तनाव में जागते बीतेगी, यह तय था.
रेल को आधी रात के समय चंबल के बीहड़ वाले इलाक़े से होकर गुज़रना था. टेलीफ़ोन का विश्वसनीय नेटवर्क अस्तित्व में नहीं आया था. रास्ते में पड़ने वाले ग्वालियर के अधिकारी को ज़िम्मेदार दी गई कि टेलीग्राफ़ से सूचना भेजते रहें. श्री जे.सी. दीक्षित ने अपनी पुस्तक ‘शस्त्र से शास्त्र तक’ में लिखा कि आधी रात के बाद भोपाल में हड़कंप मच गया था.
रियासती पुलिस सेवा से पदोन्नत होकर ग्वालियर में डी. आई. जी. के रूप में पदस्थ अधिकारी का संदेश पहुंचा था अंग्रेज़ी में – ‘प्रेसिडेंट पास्ड अवे पीसफ़ुली एट मिड नाईट.’
पट्टाभि सीतारमैया साल भर से कम समय राज्यपाल रहे, किंतु इतने ही समय में उन्होंने तीन मुख्यमंत्रियों को शपथ दिलाई. 1956 के अंतिम दिन पंडित रविशंकर शुक्ल का दिल्ली में ह्रदयाघात से देहांत हो गया. बाद में ताशकंद में हुई लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु की तरह इस मृत्यु के साथ भी एक ‘रहस्य’ हमेशा के लिए जुड़ गया. 1957 की शुरुआत में देश में दूसरा आम चुनाव होने जा रहा था.

उस चुनाव में कांग्रेस की ओर से लड़ने वाले उम्मीदवारों की टिकट फ़ाइनल करने के लिए हो रही बैठक में हिस्सा लेने रविशंकर शुक्ल दिल्ली में थे. 31 दिसंबर 1956 को ह्रदयाघात और मृत्यु के बाद का एक क़यास कहानी बन कर चल निकला कि उन्होंने अंतिम सूची से अपना स्वयं का नाम अधिक उम्र की दलील पर कटा पाया और सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाए.
पंडित रविशंकर शुक्ल मात्र दो महीने ही मुख्यमंत्री रह पाए थे और उन्हें कुछ बहुत अधिक करने का अवसर नहीं मिल पाया था. लेकिन उनके कंधों पर चढ़कर जो सरकार और प्रशासन नागपुर से भोपाल होते हुए नए मध्यप्रदेश में फैला था उसमें ब्राह्मणों का दबदबा कुछ दशकों तक और क़ायम रहा. विशेषकर कान्यकुब्ज ब्राह्मणों का. कुछ लोग ब्राह्मणों की इस उपजाति को सत्ताधारी ब्राह्मण कहते थे.

रविशंकर शुक्ल की मृत्यु ने कांग्रेस के लिए बड़ी विकट स्थिति पैदा कर दी. विलीन हुई चार इकाइयों के भोपाल पहुंचे विधायकों और नेताओं का तो अभी आपस में परिचय भी नहीं हो पाया था और एक ऐसे नेता की आवश्यकता सामने आ गई जिसकी वरिष्ठता और स्वीकार्यता सबको आपस में बाँध कर रख सके.
नया नेता ढूंढने का ज़िम्मा नेहरू के पाले में डाल दिया गया. द्वारका प्रसाद मिश्रा एक ऐसे व्यक्ति हो सकते थे. वे 1937 से नागपुर वाली सरकार में शक्तिशाली गृह मंत्री रहे थे. किंतु कुछ वर्ष पूर्व ही वे इस्तीफ़ा दे कर कांग्रेस से अलग हो गए थे. वो भी नेहरू के साथ अपने मतभेदों को मुद्दा बनाकर. सो उनका रेस से बाहर हो जाना समझ में आता था.
तात्कालिक व्यवस्था के तौर पर पुराने मध्यप्रदेश के एक शहर खंडवा के रहने वाले वरिष्ठ नेता भगवंत राव मंडलोई को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई गई. पंद्रह दिन लगे पर नेहरु ने नए मुख्यमंत्री के रूप में एक ऐसे व्यक्ति का चयन कर लिया जिसके नाम की कल्पना किसी ने सपने में भी नहीं की थी. किंतु उनके बारे में अगली किश्त में.
(लेखक इतिहास-प्रेमी हैं, छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं.)
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