हिंदी थोपना संघवाद के ख़िलाफ़, सहज संवाद से आगे बढ़ेगी भाषा

भाजपा के हिंदी प्रेम से हिंदी का काफी नुकसान हुआ है. विभिन्न राज्यों में हिंदी को थोपने के ख़िलाफ़ चलने वाले आंदोलन दरअसल हिंदी भाषा के ख़िलाफ़ नहीं हैं. ये विरोध उस प्रवृत्ति की मुख़ालफ़त करते हैं जो संघवाद की धारणा की अवहेलना करके देश पर एक भाषा थोपना चाहती है.

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हिंदी के विविध रूप अलग-अलग भाषाओं, उप-भाषाओं से मिलकर बने हैं. भाजपा समर्थक विद्वानों द्वारा एक तरह की हिंदी पर जोर देना हिंदी भाषा की विविधता के लिए भी खतरनाक है. (प्रतीकात्मक फोटो साभार: Flickr/Stars Foundation)

पिछले दिनों एक बार फिर से देश में भाषा संबंधी तकरार उभरकर सामने आई है. महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव) और राज ठाकरे के महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने महाराष्ट्र में स्कूलों में अनिवार्य रूप से हिंदी पढ़ाने का तीखा विरोध किया. उनके विरोध के कारण महाराष्ट्र सरकार को यह फैसला वापस लेना पड़ा. इन दलों के कार्यकर्त्ताओं द्वारा मराठी न बोलने पर हिंदी भाषी लोगों के साथ बदसलूकी और मार-पीट करने के कई वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए.

इसके पहले, तमिलनाडु और कर्नाटक में भी हिंदी का विरोध करने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं. ऐसा लगता है कि कई राज्यों में भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से हिंदी को बढ़ावा देने की कोशिशों को लेकर काफी आक्रोश है.

भाषा से संबंधित इन हालिया विवादों से किस तरह के राजनीतिक संकेत सामने आते हैं? क्या भाजपा का हिंदी प्रेम हिंदी का कल्याण कर रहा है? क्या हिंदी को सरकारी नीतियों के माध्यम से आगे बढ़ाया जा सकता है?

भारत की आजादी से पहले से ही भाषा एक भावानात्मक मुद्दा रही है. आजादी से पहले 1938 में  सी. राजगोपालाचारी द्वारा मद्रास प्रांत में स्कूलों में हिंदी पढ़ाने के फैसले का स्थानीय लोगों ने तीखा विरोध किया. आजादी के बाद स्थानीय स्तर पर जबर्दस्त गोलबंदी के कारण ही जवाहरलाल नेहरू को भाषायी प्रांतों के निर्माण के प्रस्ताव को स्वीकार करना पड़ा.

दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु में लोग अपनी भाषा को लेकर अत्यंत संवेदनशील रहे हैं. लेकिन हाल के समय में जिस तरह हिंदी विरोध समाने आया है, उसके दो पहलू उल्लेखनीय हैं. पहला, बहुत से राज्यों और वहां के क्षेत्रीय दलों को यह लगता है कि मौजूदा केंद्र सरकार संघवाद के मानकों का उल्लंघन करते हुए हिंदी को थोप रही है. दूसरा, हिंदी का विरोध क्षेत्रीय दलों को अपने राजनीतिक आधार को सुरक्षित रखने और राजनीतिक गोलबंदी का एक साधन भी दिखता है. मसलन, तमिलनाडु में द्रमुक द्वारा भाजपा पर हिंदी थोपने का आरोप भाजपा के स्थानीय नेताओं और उसके चुनावी सहयोगियों के लिए गले की हड्डी बन गया है.

इसी तरह, महाराष्ट्र हिंदी थोपने के मुद्दे ने उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे को एक साथ आने और एक भावनात्मक मुद्दे पर राजनीतिक गोलबंदी का आधार पर प्रदान किया है.

देश के कई राज्यों में अपनी भाषा को लेकर गर्व और भावनात्मक लगाव है. इन राज्यों के बहुत से लोग यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि हिंदी या कोई अन्य भाषा उनकी भाषा से ज्यादा उच्चतर है. मसलन, तमिलनाडु के निवासियों के लिए तमिल, कर्नाटक के निवासियों के लिए कन्नड़ और आंध्र प्रदेश के निवासियों के लिए तेलुगु सबसे बेहतर भाषा है. इनके लिए हिंदी के प्रसार की हर सरकारी कोशिश हिंदी थोपने की तरह है.

इन राज्यों के गैर-हिंदी भाषी यह मानते हैं कि हिंदी को बढ़ावा देने की सरकारी कोशिश संघवाद के मूल्यों के खिलाफ है, और यह देश में एक भाषा के प्रभुत्व को स्थापित करने का प्रयास है. विशेष रूप से, उत्तर भारत के राज्यों किसी गैर-हिंदी भाषा को न सिखाने की प्रवृत्ति से भी यह सोच गहरी हुई है कि सरकार द्वारा हिंदी को प्रोत्साहन भाषायी सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि यह एक खास भाषा को अन्य भाषाओं से ज्यादा वरीयता देने और उसे थोपने का मसला है.

रोजगार संबंधी अवसर भी कभी भाषायी विवाद का कारण बनते हैं. महाराष्ट्र में स्थानीय युवाओं को उत्तर प्रदेश और बिहार से आए लोग इसलिए भी खटकते हैं, क्योंकि वे वहां के कुछ रोजगारों  में आसानी से खप जाते हैं.

भाजपा अपने आरंभिक दौर से ही हिंदी को भारतीयता की पहचान के केंद्रीय तत्त्व के रूप में देखती आई है. इसका अर्थ यह नहीं है कि इसने अन्य भाषाओं का विरोध किया, लेकिन इसके द्वारा अन्य भाषाओं से ज्यादा महत्त्व हिंदी को दिया गया. इसके कारण विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों में इसके प्रसार में कठिनाई भी आई. अमूमन गैर-हिंदी भाषी राज्यों से आने वाले भाजपा नेता भी हिंदी में ही बात करने का प्रयास करते हैं. भाजपा की भाषा नीति में विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं का तिरस्कार नहीं किया जाता है , बल्कि उनका सम्मान किया जाता है.

भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र या विभिन्न राज्यों की सरकारें सभी प्रादेशिक भाषाओं के ऊपर, राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को स्थापित करने की निरंतर कोशिश करती रही हैं. लेकिन इस तरह के प्रयासों की गंभीर सीमायें हैं.

भाजपा के द्वारा जिस तरह से हिंदी प्रेम दिखाया जाता रहा है, उससे हिंदी का काफी नुकसान हुआ है. भाजपा से जुड़े हिंदी समर्थक अक्सर हिंदी से उर्दू शब्दों को बाहर करने पर बल देते हैं. यानी वे संस्कृतनिष्ठ हिंदी के पक्षधर हैं. बहुत से लोगों के लिए संस्कृतनिष्ठ हिंदी अपने-आप में आकर्षण का केंद्र हो सकती है. लेकिन यह हिंदी के विविध रूपों में से एक रूप है.

हिंदी के विविध रूप अलग-अलग भाषाओं और उप-भाषाओं से मिलकर बने हैं. उर्दू मिश्रित हिंदी, भोजपुरी मिश्रित हिंदी या अवधी मिश्रित हिंदी आदि भी हिंदी के विविधतामय रूपों को अभिव्यक्त करती हैं. भाजपा समर्थक विद्वानों द्वारा एक तरह की हिंदी पर जोर देना हिंदी की विविधता के लिए भी खतरनाक है.

केंद्र में और राज्यों में भाजपा सरकारों द्वारा हिंदी को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की जाती रही हैं. पर यह एक कटु सत्य है कि  इनके द्वारा हिंदी में ज्ञान सृजन को लेकर कोई व्यवस्थित काम नहीं किया गया है. शिक्षण संस्थाओं में नोटिस और नाम पट्टिका आदि को हिंदी में करने से हिंदी या हिंदी-भाषी लोगों का कल्याण नहीं हो सकता है. हिंदी क्षेत्र और यहां के विद्यार्थियों का वास्तविक कल्याण तब हो सकता है जब हिंदी को ज्ञान की भाषा के रूप में स्थापित किया जाए.

असल में, ज्ञान की भाषा के रूप में हिंदी को स्थापित करने का काम गैर-सरकारी हिंदी सेवी लोगों द्वारा ज्यादा किया गया है. इस संदर्भ में हम हिंदी में समाज विज्ञान के पुस्तकों की उपलब्धता के बारे में विचार करते हैं. सरकारी स्तर पर या संघ और भाजपा के प्रति समर्पित विद्वानों के द्वारा इस दिशा में नगण्य काम किया गया है. असली काम उन लोगों द्वारा किया गया है जो दिन-रात हिंदी राष्ट्रवाद का ढोल नहीं पीटते, बल्कि बहुत ही समर्पित तरीके से हिंदी में पुस्तकों की रचना, अच्छी पत्रिकाओं के प्रकाशन आदि काम में लगे रहते हैं. इस संदर्भ में दिल्ली स्थित विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) द्वारा प्रकाशित हिंदी पुस्तकों की श्रृंखला को देखा जा सकता है.

यह याद रखने की जरूरत है कि मौजूदा दौर में विभिन्न राज्यों में हिंदी को थोपने के खिलाफ चलने वाले आंदोलन दरअसल हिंदी भाषा के खिलाफ नहीं हैं. एक स्तर पर ये विरोध उस प्रवृत्ति की मुखालफत करते हैं जो संघवाद की धारणा की अवहेलना करके देश पर एक भाषा थोपना चाहती है, और दूसरे स्तर पर इन राज्यों की स्थानीय राजनीति की मजबूरियां भी विभिन्न दलों को हिंदी विरोधी रुख अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं.

हिंदी को अपनी भाषा मानने वाले और इसके प्रति सेवा भाव रखने वाले लोगों को हिंदी को वर्चस्ववादी राजनीति का साधन बनाने की प्रवृत्ति का विरोध करना चाहिए. हिंदी का प्रसार सरकारी प्रयासों से नहीं हो सकता है. सरकारी प्रयासों के कारण तो अक्सर गैर-हिंदी भाषी लोगों के बीच हिंदी को लेकर नाराजगी ही बढ़ती है. इसका प्रयास सामान्य लोकतांत्रिक भाव से संवाद स्थापित करके  तथा साहित्य, सिनेमा जैसे माध्यमों के उपयोग से हो सकता है.

धीरे-धीरे अब यह बात सभी भारतीयों का समझ का हिस्सा बनती जा रही है कि हिंदी देश के बहुत बड़े हिस्से से जुड़ने और संवाद करने का माध्यम है. इस उपलब्धि का श्रेय हिंदी साहित्य, सिनेमा और निस्वार्थ भाव से हिंदी की सेवा करने वाले लोगों को जाता है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज में राजनीति विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.)