आज की अधिकांश कविताएं विचार से बनती हैं, अधिकतर बुरी कविताएं विचारधारा से. कविता की एक परंपरा है जहां कविता मनोस्थिति विशेष को पाठक (श्रोता) में उत्पन्न करने के लिए रची जाती रही है. जापानी कविता हो या रस सिद्ध भारतीय काव्य, इसी प्रकार की कविता के उदाहरण रहे आये हैं और इसे व्यवस्थित रूप से हमने अपने देश में पिछले डेढ़ सौ वर्षों में और छायावाद के अंत के बाद बहुत तेज़ी से नष्ट किया है. इसके समानांतर हमारे यहां वाक्-सिद्ध कविता की भी सुदीर्घ परंपरा है. अज्ञेय हिंदी के वाक्-सिद्ध कवि है. आशुतोष दुबे की कविता इन सभी मार्गों से भिन्न है. वे अवलोकन के कवि है. अवलोकन की कविता क्या है?
अवलोकन किसी भी वस्तु, व्यक्ति या घटना को एकाग्रचित्त देखना है. कवि लंबे समय तक देखता रहता है. कभी कभी वह केवल लंबे समय तक ही नहीं, दूर तक भी देखता है और इस देखने को फिर एक दिन वह कविता में बदल देता है. देखते हम सभी हैं, किन्तु हम देखते हुए बाह्य दृश्य को बस एक उपकरण की तरह बरतते हैं, और उसके मार्फ़त भीतर देखते हैं. हमारा देखना कभी विशुद्ध रूप से देखना नहीं होता. हम सीधे किसी वस्तु का साक्षात्कार नहीं कर पाते. हमें देखने के लिए विचार या विचारधारा चाहिए होती है जो हमें बताये कि क्या देखना है क्योंकि संपूर्णता में देखना बहुत कठिन होता है. विचार देखी जा रही वस्तु या घटना या व्यक्ति के अवयवों को चुनने में हमारी सहायता करते हैं. विचारधारा इसे और भी सरलीकृत कर देती है. वह क्या देखना है, यह चुनकर हमें दे देती है कि यह देखो. इस तरह हम वस्तु के टुकड़े चुनकर उसे अपने भीतर देखते है. यह खंडित दृष्टि है और इस खंडित दृष्टि से देखने के लिए मनुष्य अभिशप्त है.
कविता (अच्छी कविता) इसी खंडित दृष्टि का अतिक्रमण करती है. उसकी आकांक्षा पूरा देखने की होती है. पूरा वही देख सकता है जो जहां देख रहा हो वहां बंटा न हो, वह बाहर यदि देखता हो तो बाहर ही देखता रहे, आंतरिक विलीन हो जाये. और यदि भीतर देखे तो बाहर मात्र अंधेरा हो. यह देखना आशुतोष दुबे की कविता में हम देख पाते हैं, क्योंकि वे चीज़ों को नये सिरे से देखते हैं.
हम उन्हें नए सिरे से देखते हैं
जिनके बग़ैर जीना हमने सीख लिया था.
जैसे हम एक खोए हुए वक़्त के हाथों
अचानक पकड़े जाते हैं,
और ख़ुद को नए सिरे से देखते हैं, और
जल्दी से आईने के सामने से हट जाते हैं
सिमोन वै (Simon Weil) अपनी किताब ग्रेविटी एंड ग्रेस में लिखती है, ‘कवि अपना ध्यान किसी पर केन्द्रित करता और सुन्दरता उत्पन्न हो जाती है. प्रेम भी यही है. यह जानना कि यह भूखा-प्यासा आदमी वास्तव में उतना ही सच है जितना कि मैं – इतना ही काफी है, बाकी सब अपने आप आ जाता है.’
वै ऐसे दृश्य को देखने के इच्छा करती है जिसमें वह नहीं हों, दृश्य के दोनों ओर नहीं हों. हमारा कवि भी जल्दी से आईने के सामने से हट जाता है.
लौटते हुए समय की उँगली थामकर वे दुनिया में आने
से पहले के समय में चले जाना चाहते हैं जहां एक
कुनकुन अंधेरे में वे भ्रूण की तरह तैर रहे थे, और चमक
रही थीं उनके आस-पास अदेखी दुनिया की आवाज़ें.
यहां कवि भी ऐसे ही दृश्य को देखने की आकांक्षा करता है जिसके दोनों तरफ़ वह उपस्थित न हो. कवि एकाग्र चित्त किसी दृश्य को देखता है, वह उससे किसी झेन भिक्षु की तरह एकाकार हो जाता है. कविता पूर्ण से बनती अवश्य है किन्तु पूर्ण को प्रकट करने के लिए वह पूर्ण को दर्ज नहीं करती. इस अर्थ में वह गणित की भांति होती है. वह सुचिंतित चिह्नों का प्रयोग करती है. आशुतोष दुबे भी दृश्य से उसके काव्य-सत्य चुनते हैं. वे दृश्य से बहुत कुछ घटा देते हैं और यह तभी संभव होता है जब दृश्य से कवि एकाकार हो. यही कारण है कि कवि में हम इतना अर्थ गौरव देखते हैं. कवि शब्दों को लेकर उतना ही मितव्ययी है जितना कोई संगीतकार स्वरों को लेकर या व्यापारी पैसों को लेकर होता है. यहाँ उक्ति लाघव है, यहां न शब्दों की, न भावात्मक अवस्थाओं का कोई अपव्यय है.

आशुतोष दुबे की कविता में दृश्य अंततः विचार में रूपांतरित हो जाता है. विचार की टॉर्च से वे दृश्य को नहीं टोहते बल्कि दृश्य देखते-देखते विचार उद्घाटित होता है. इसे ही ग्रीक चिंतन का अलेथिया aletheia कहते हैं. यह सत्य के संसक्तता सिद्धांत (coherence theory of truth) या सत्य के अनुरूपता सिद्धांत (Correspondence theory of truth) से सर्वथा भिन्न है. यहाँ सत्य के संबंध में वक्तव्य नहीं दिया जाता क्योंकि कवि जानता है वक्तव्य से केवल वक्तव्य के सत्य के बारे में चलता है सत्य के विषय में नहीं. सत्य को प्रकट करने का एकमात्र तरीक़ा उसे प्रकट होने के लिए स्थान निर्मित करना है और कलाएँ ख़ासकर कविता इसे सबसे अच्छे से जानती है. शायद दार्शनिकों से अधिक उज्ज्वल तरीक़े से.
उसी ऊपर नीचे के रास्ते और रंगबिरंगी
रोशनी के तमाशे में
ऊबता रहता है फव्वारों का पानी
दिन दोपहर अजायबघर के जानवर
तमाशबीनों को अलसाए आदमियों की
जमुहाई नज़र से देखते हैं
अपनी खोह में जाने से पहले
यहां कवि किसी सत्य का दावा नहीं करता, बड़ी बड़ी बातें नहीं बनाता. बस ऊब का एक दृश्य खींचता है. हमारी कविता से ऊब के दृश्य इंटरनेट आने के बाद से ही कम होना शुरू हुए क्योंकि ऊबने का अवकाश हमारे जीवन से लगभग ख़त्म हो चुका है. यहां तक कि अब बच्चों के लिए भी ऊबने के स्थल नहीं रहे, फ़ोन और टेलीविज़न उन्हें भी लगातार व्यस्त रखते है. यह दुनिया ऊब का एक विशाल कारख़ाना है, ऊब सबसे पहले दृश्य से उसका अर्थ छीन लेती है, वह दुनिया को उसकी रिक्तता और अर्थहीनता में प्रकट करती है. वह न केवल दुनिया को बल्कि हमें भी जो कि इस दुनिया के ही एक हिस्से है उसके तमाम थोथेपन के साथ हमारे ही सामने खड़ा कर देती है. इसका परिणाम यह होता है कि हम अपने प्रामाणिक स्व को खोजने निकल पड़ते है. इसका एक ओर परिणाम है सूक्ष्म अनुभूतियों के एक बृहद अरण्य में हम ख़ुद को पाते है.
हाइकू लिखनेवाले जापानी कवि शृंगार या शौर्य में व्यस्त, या दुनिया में इंक़लाब लाने की आकांक्षी नहीं थे. वे निर्वेद प्राप्त थे. वे बर्फ़ से घिरे, कुटियों में एकाकी जीवन काट रहे थे.
यहीं निर्वेद (profound boredom/detachment) और ऊब का अंतर प्रकट होता है, वैरागी ऊबे हुए नहीं थे. ऊबे हुए लोगों में निर्वेद तत्त्व न था, वे केवल इस दुनिया में ऐसे स्थान खोज नहीं पा रहे थे जहाँ उनकी राग वृत्ति विश्राम पा सके. वैरागी राग के सभी स्थलों को देख चुके थे यह जान चुके थे कि कहीं भी राग देर तक टिक नहीं सकता. आशुतोष दुबे भले ही एक महानगर में रहते हों, वे भले ही मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट की दुनिया के निवासी हों और हम सभी की तरह इन तकनीकों के आदी हों, पर उनकी कविता का मूल तत्त्व इन्हीं सूक्ष्म अनुभूतियों से बना है जो कवि ख़ुद को किसी दृश्य पर ध्यान लगाकर और स्वेच्छा से ख़ुद को उससे निर्वेद उत्पन्न करता है. उनकी एक चार पंक्तियों की कविता ‘अब’ इसी तरह की है—
बहुत दिनों से मेरी क्षमा-याचना मेरे पास लंबित थी
आख़िर ऊबकर मैंने उसे ख़ारिज कर दिया
अब किसी भी सुबह यह धुकपुकी ख़ामोश हो सकती है
कि मैं अपने इंतज़ार में हूँ…
एक कविता है- वह, जिसमें एक स्त्री की अंगूठी सपने में खो जाती है. वह जागकर अपनी उंगली देखती है जहाँ वह अंगूठी है. अब वह सपने में खोई अंगूठी को याद कर रही है. यह विचार, रस, वक्रोक्ति या कविता के लगभग सभी प्राचीन- अर्वाचीन ढंग से अलग सूक्ष्म अनुभूतियों की कविता है. ऐसे कविता जापान में, जहां बौद्ध चिंतन और जीवन शैली, ध्यान की संस्कृति रही वहीं संभव हुई और हिंदी में आशुतोष दुबे के वाङ्मय में संभव होती है.
यहां ऋतु अपने इतने सूक्ष्मतम रूपों में प्रकट होती है कि समकालीन मनुष्य जो स्थूल का, बड़ी घटनाओं का, अद्भुत दृश्यों और शक्तिशाली नायकों का इतना अभ्यस्त हो चुका है कि इन कविताओं में जो साधारण है और इसलिए कविता का केंद्र है, उसका स्पर्श ही नहीं कर पाता.
इस तरह की काव्य चेतना हमने विकसित ही नहीं की जबकि भारतीय काव्य परंपरा का इस तरह ही आधुनिक विकास होना था. स्थायी और व्यभिचारी भाव आगे चलकर अपनी आधुनिकता में इसी तरह प्रकट होते हैं. विनोद कुमार शुक्ल के बाद आशुतोष दुबे की कविता में ही हमें इसका साक्षात्कार होता है. कवि नितांत के भव्य स्थापत्य को दूर से ही सलाम करता है.
फिर एक साझा घर हो गया एकांत का/उसकी खिड़कियों से दुनिया का एकांत दिखता था/
हम टहलते हुए उस तरफ़ भी निकल जाते हैं अक्सर/ताज्जुब से देखते हुए/कितने एकान्तों की दीवारें विसर्जित होती हैं लगातार
तब कहीं संसार का एकांत होता है
जैसे सूक्ष्म अनुभूतियों का संबंध ऊब से है उसी तरह ऊब का संबंध एकान्त से है और एकान्त लगभग एक लुप्तप्राय: स्थिति होती जा रही है. हम अकेले तो रहते है मगर एकांत दुर्लभ हो गया है, अकेले मनुष्य बहुत से लोगों से घिरा हुआ है. उसमें इस संसार के एकांत का अन्वेषण करना, दो एकांतों के मध्य पुल बनाना एक कवि का काम है और हमारा कवि यह करता है.
§
आशुतोष दुबे की कविता केंद्र से बहुत दूर, बहुत एकान्त में, ध्यानस्थ मनुष्य की कविताएं है. वे यदि कोलाहल की कविताएं नहीं है तो मौन की कविताएं भी नहीं है. वहां केवल पंछियों की यदा कदा कूजन से भरी नीरवता है. यह दुनिया बदलने नहीं निकली है, यह ख़ुद को बदलने पर भी उतारू नहीं है. यह केवल ख़ुद को खोजना, समझना चाहती है. समकालीन मनुष्य की आध्यात्मिकता कैसी होना चाहिए, यह कविताएं हमें बतलाती है. यह शुरुआत भर है. इस रास्ते पर अभी अनेक कवियों के घर, कुएं और कुंज होने बाकी हैं.
बदलने से जो बदलता है वह कितना अस्थायी होता है और उसमें कितनी हिंसा होती है, जबकि देखने और देखकर समझने से जो बदलता है वह हमेशा के लिए बदल जाता है, यह कविता उसका प्रमाण है. आत्मा का फ़र्नीचर फिर से जमाने में कोई आवाज़ नहीं होती आशुतोष दुबे की कविता ठीक यही काम करती है.
(लेखक कवि और कथाकार हैं. उनका उपन्यास ‘मतलब हिन्दू’ हाल ही प्रकाशित हुआ है.)
