किसी भी साहित्य को श्रेष्ठ मानने के क्या प्रतिमान होते हैं? वह कौन-सी रचना है जिसे पढ़ कर हमें यह लगता है कि यह अब तक का पढ़ा, अब तक लिखा श्रेष्ठ साहित्य है? क्या वह व्यक्तिगत आकांक्षाओं को स्वर देने वाला होता है, जिसमें हमें हमारी ही प्रतिध्वनियां सुनाई पड़ती हैं या वह समाज और युग की अपेक्षाओं का वाहक होता है जिससे जुड़ कर हमें यह बोध होने लगे कि यह हमारे समय का यथार्थ है या वह जो किसी दिवास्वप्न की तरह एक काल्पनिक यूटोपिया में ले जा कर हमें हमारी गतिहीन वर्तमान की वास्तविकता से बाहर निकाल दे.
प्रेमचंद का साहित्य 1920-1930 के औपनिवेशिक भारतीय परिदृश्य में यह तीनों ही काम कर रहा था. ‘शांति’ और ‘पूस की रात’ जैसी कहानियों में स्त्री और पुरुष मन के व्यक्तिगत आकांक्षाओं की झलकें थीं, तो ‘बूढ़ी काकी’ या ‘कफ़न’ कहानियों में समाज के बहुस्तरीय यथार्थ का अंकन था, तो वहीं ‘पंच परमेश्वर’ और ‘नमक का दरोगा’ जैसी कहानियाँ तमाम बुराइयों के बीच एक ऐसे समाज की कल्पना करती थी जहां न्यायप्रिय और ईमानदार होना संभव था.
‘लेखक’ प्रेमचंद को भारतीय साहित्य की परम्परा में किसी एक भाषा या किसी एक क्षेत्र की सीमाओं में सीमित नहीं किया जा सकता, पर उनके साहित्य की जनप्रियता मात्र को ही उनकी उत्कृष्टता से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए. क्योंकि अगर लोकप्रियता उत्कृष्टता का मानदंड होती तो प्रेमचंद हिंदी ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय साहित्य के उन विवादास्पद साहित्यकारों में से नहीं होते जिनके साहित्य को प्रायः ही हर बीतते दशक में प्रश्नों का, आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. प्रेमचंद के लेखन को बीतते समय के साथ प्रश्नों से, शंकाओं से, विस्मय से, परम्परा के बढ़ते दबावों से, आधुनिकता की संवेदनाओं से जूझना पड़ा है. कभी तो वे दलित विरोधी हो जाते हैं, उनकी रचनाओं का सार्वजनिक बहिष्कार किया जाने लगता है, तो कभी उन पर स्त्रियों के प्रति उसी सामंती दृष्टि का आग्रही होने का आरोप लग जाता है. इतना ही नहीं, जीवन के उज्ज्वल पक्षों के प्रति अपनी आस्था रखने वाले लेखक को अपनी रचनाओं में कई बार एक पूर्वनिर्धारित समाधान प्रस्तुत करने वाला भी समझा जाता है.
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हालांकि विचार किया जाए तो किसी स्थापित रचनाकार की रचनाशीलता पर उठाए जाने वाले ये तमाम प्रश्नचिह्न हमें दो बातों के लिए आश्वस्त करते हैं: पहला तो यह कि साहित्य ही एक ऐसी विधा है जो सतत गतिशील है, वह बदलते समय की मांग से, परिवर्तन के दबावों से अपना पुनर्परीक्षण स्वयं आमंत्रित करती है और दूसरा यह कि हर युग में समय और विचारधाराओं के प्रभाव में श्रेष्ठता के मानदंड भी बदलते रहते हैं. प्रेमचंद की प्रासंगिकता या यूं कहें कि उनके साहित्य की श्रेष्ठता का प्रश्न आज के वर्तमान परिदृश्य में और भी अधिक ज्वलंत इसीलिए लगने लगता है क्योंकि आज के समय में लेखक की सर्जनात्मकता पर लोकप्रिय और सर्वाधिक बिकाऊ होने का दबाव जिस अभूतपूर्व तरीक़े से बढ़ता जा रहा है, वैसे में साहित्य लेखन अब वैचारिक श्रम न होकर एक ज़बरन और त्वरित सफलता का पर्याय बन कर रह गया है. ऐसे में प्रेमचंद हमें बरबस याद आते हैं. जीवन में गहरे धंसे हो कर, अपने परिवेश से पूर्ण रूप से एकमेव हो कर लिखे गए प्रेमचंद के साहित्य की प्रदीर्घता इतनी स्वाभाविक लगती है वह अब किसी भी रचना को मिलना असंभव लगता है. उनकी रचनाओं की कालजयता भी इसीलिए अधिक है क्योंकि उनका साहित्य लोकप्रियता के सस्ते दबावों में आकर नहीं लिखा गया था. पर सिर्फ़ दीर्घजीविता ही तो किसी भी साहित्य के श्रेष्ठ होने का मयार नहीं हो सकती?
तो क्या प्रासंगिकता प्रेमचंद की रचनाओं को श्रेष्ठ बनाती हैं? देखा जाए तो प्रेमचंद कि रचनाएँ मसलन कफ़न या गोदान में निहित समस्याएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं. कहानी जैसे छोटे से कलेवर में कफ़न में एक साथ वह इतना कुछ दिखला देते हैं जो हमारा आज का भी यथार्थ है. घीसू और माधव जो कफ़न के दलित पात्र हैं, उनके प्रति सामाजिक हृदयहीनता हमारे आज के समाज की भी उतनी ही मार्मिक वास्तविकता है, जितनी कि बुधिया के प्रति पुरुष, घीसू और माधव की संवेदनहीन नृशंसता.
किसी भी युग का यथार्थ, युग सापेक्ष होता है पर भारतीय संदर्भों में सामाजिक परिस्थितियाँ, विशेषकर हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए, वैसी-की-वैसी ही हैं. इसीलिए जब सामाजिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता में इतने सालों बाद भी आधारभूत परिवर्तन नहीं आया है, तो प्रेमचंद के कथा-साहित्य में वर्णित वस्तुस्थितियों के लिए भी हम अधिक आलोचनात्मक नहीं हो सकते. पर प्रासंगिक मात्र होना प्रेमचंद के साहित्य को श्रेष्ठ नहीं बनाता. कहीं बहुत भीतर जाकर यह प्रेमचंद की अनोखी रचनाशीलता है जो आलोचक शिव कुमार मिश्र के शब्दों में कहें तो ज़िंदगी की सीधी रगड़ से प्राप्त अनुभवों से अर्जित यथार्थबोध तथा ज़िंदगी को केवल हाशिए में देख-समझ और पा लेने की भ्रांति से जुड़े यथार्थ बोध के बुनियादी फ़र्क़ के कारण उनकी रचनाओं में वह तीखापन लाती है, उसे इतना मानीख़ेज बनाती है.
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देखा जाए तो यही वह अनुभव की ज़मीन है, जहां प्रेमचंद की रचनाशीलता हमारे अपने समय की रचनाशीलता बनती हुई आज की तमाम रचनाशीलताओं के लिए नए नए सवाल खड़े करती है. प्रेमचंद के यहां साहित्य और जीवन दो अलग आयाम नहीं हैं. युग जीवन के सभी बड़े परिप्रेक्ष्य, चाहे वह राष्ट्रीय आंदोलन हो या सामाजिक न्याय या मानवीय आचरण प्रेमचंद की रचनाशीलता में समाहित होते हैं. वह अपनी यथार्थ दृष्टि से चुने हुए पात्रों के क्रिया-व्यापार से ऐसी वस्तु-स्थितियां दिखलाते हैं जो उन्हें जीवन का इतना कुशल चितेरा सिद्ध करती है, जो उनसे पहले तो विरल था ही, आगे भी उसकी सम्भावना नहीं दिखती. विशेषकर जब हम प्रेमचंद के बाद की रचनाओं का विस्तार देखते हैं जहां वह सामाजिक यथार्थ की भूमि से उपजी अपनी रचना को युग की व्यापक चिंताओं से जोड़ देते हैं, मसलन 1930 के बाद की.
अपनी स्थानीयता में रंगे हो कर प्रेमचंद जीवन की रगड़ खा कर जो विश्वबोध अर्जित करते हैं, उसी से वह अपने समय की लगभग सभी समस्याओं पर एक सक्रिय दार्शनिकता से विचार करते हैं. वह युग की सच्चाई को अभिव्यक्त करते हुए उसमें किसी भी प्रकार की ऊपरी मिलावट नहीं करते. प्रेमचंद के लिए लेखन जैसे नितांत राजनीतिक कर्म का उद्देश्य अंततः इसी बात की ध्वनि देता है कि मुक्ति कभी भी व्यक्तिगत नहीं होती बल्कि वह सबकी होती है और सबके सामने होती है.
प्रेमचंद की दृष्टि में साहित्य की कई परिभाषाओं में सबसे सार्थक परिभाषा यह थी कि साहित्य जीवन की आलोचना है. इसीलिए भी उन्होंने अपने कथा-संसार के लिए पात्र गढ़े नहीं हैं, बल्कि जीवन से उठा कर अपने काल्पनिक संसार में प्रस्तुत किया है. वे अशरीरी, अलौकिक आदर्श पात्र नहीं हैं बल्कि प्रेमचंद ने ही सम्भवतः सबसे पहले-पहल यह आश्वासन दिया कि मनुष्य अपनी चरित्रगत विभिन्नताओं के कारण ही तो मनुष्य है और इसीलिए उसे गढ़ने से अधिक उसकी समग्रता में प्रस्तुत करना ही साहित्य का उद्देश्य होना चाहिए. प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के भाषण में कहा था कि साहित्य का धर्म पीड़ित, शोषित, दमित की वकालत करना और उनका पक्ष समाज के सामने रखना है. इसीलिए प्रेमचंद के साहित्य की उत्कृष्टता को मापने का एक पैमाना यह भी हो सकता है कि उनका अपना साहित्य उनके इस सोच के साथ कितनी संगति बिठा पाता है. उनकी रचनाएँ क्या वास्तव में उनके साथ खड़ी होती हैं जो समाज के सबसे निचले पायदान पर स्थित हैं? तो इसका प्रमाण सेवासदन में पहली बार समाज के हाशिए पर खड़ी वेश्या के साथ प्रेमचंद की लेखकीय सहानुभूति है तो वहीं उनकी अंतिम रचना गोदान में होरी जैसे पात्र को महानायकत्व देने के उनकी क़वायद.
इसके साथ ही प्रेमचंद के साहित्य की रचनाशीलता इसीलिए भी हमें प्रभावित करती है क्योंकि उनकी साहित्यिक यात्रा निरंतर विकासशील रही. सन 1920 से 1930-31 तक के दौर में प्रेमचंद जिस गांधीवादी आदर्शों के प्रभाव में लिख रहे थे वह 1930 के बाद के वैश्विक-राष्ट्रीय समाजवादी आग्रहों से अपना रूप निश्चित तौर पर बदलता है. ‘लेखक’ प्रेमचंद अब वस्तुतः अब इस भ्रम में नहीं हैं कि ‘समाज और उसकी व्यवस्था को सुधारा जा सकता है, उस पर रंग-रोगन लगाकर उसे मनुष्य के अनुकूल बनाया जा सकता है.’
समय के साथ शोषण की नित विकसित होती मशीनरी से वह इतना वाबस्ता हो चुके हैं कि मानते हैं कि बिना आधारभूत परिवर्तन के चीज़ें ठीक नहीं की जा सकतीं. जिस आदर्शवाद की ज़मीन पर गहरे धंस कर उन्होंने सेवासदन जैसी रचनाओं से अपना लेखन शुरू किया था, वह हर बीतते सालों में अपने जीवनानुभवों से, सामाजिक-राष्ट्रीय चेतना में परिवर्तन के आग्रहों से स्वयं अपना स्वरूप बदलता रहा. गोदान आते-आते तक वह समाज व्यवस्था में शोषण की लड़ाइयां लड़ने के लिए नए हथियार ढूंढते हैं पर फिर भी होरी नियति से समझौता करने के लिए तैयार दिखता है, पर अपनी अंतिम रचना मंगलसूत्र तक पहुंचते-पहुंचते जैसा कि मिश्र कहते हैं, ‘वे दरिंदों के ख़िलाफ़ हथियार उठाने की भी बात करने लगते हैं जो गोदान के बाद निश्चित रूप से एक बहुत आगे बढ़ा हुआ कदम है.’
यह परिवर्तन संवेदनाओं का है, परंतु इसके केंद्र में भी वह अपनी पक्षधरता उसी हाशिए पर खड़े मनुष्य के साथ रखते हैं जो सताया हुआ है. सम्भवतः यह उत्कट पक्षधरता ही प्रेमचंद को हर युग, हर संदर्भों में एक बड़ा साहित्यकार बनाती है और साहित्य की श्रेष्ठता के प्रश्न का हल भी इसी में निहित है कि क्यों कोई रचना युगों को परिभाषित करने वाली बन जाती है. इसीलिए प्रेमचंद अपने विज़न में एक विरल रचनाकार बन कर उभरते हैं तो इसीलिए कि मानवीय करुणा को एक गल्प कथा के कलेवर में प्रस्तुत करते हुए एक विश्वदृष्टि रचना आसान नहीं है.
पर जीवन की तरह ही साहित्य में भी कुछ ऐब्सलूट (एक मात्र) नहीं होता. अंतर्विरोध किसी भी स्थिति को अधिक मानवीय बनाते हैं. प्रेमचंद के भी अपने अंतर्विरोध थे. हालांकि उनकी पक्षधरता अपने किंचित अंतर्विरोधों के बावज़ूद भी अंततः मनुष्यता के साथ ही है. और यह जिन अंतर्विरोधों की बात हम कर रहे हैं वह उनके युग के अंतर्विरोध अधिक हैं न कि व्यक्ति प्रेमचंद के आंतरिक संसार की विसंगतियां. मसलन प्रायः प्रेमचंद को (गोदान या उनकी अन्य कहानियां) पढ़ते हुए यह एहसास होता है कि प्रेमचंद स्त्री की एक विशिष्ट छवि या उसकी एक ख़ास भूमिका के प्रति ही अधिक आग्रही हैं.
वह मिस्टर मेहता के विचारों से यह दिखलाते प्रतीत होते हैं कि स्त्री ‘मधुमक्खी’ रूप में, जो संचय करने वाले गुणों से लैस होती है, ही अधिक श्रेष्ठ है, न कि एक ‘तितली’ की तरह जो कि रस लोलुप, चंचल होती है. पर प्रेमचंद के इस निष्कर्ष को हम उनके किसी पूर्वाग्रह का प्रमाण न मान कर उस राष्ट्रवादी- गांधीवादी आंदोलनों की ही अनुगूंज समझ कर प्रश्न उठा सकते हैं, जहां पर गांधी या सामान्य तौर पर भारतीय राष्ट्रवाद ही स्त्रियों के एक विशिष्ट रूप (गृहिणी/सहचरी) को जो पुरुष के साथ उसके जीवन के महत् उद्देश्य में अपना योगदान दे सके, काम्य मानता था.
आज की नारीवादी निगाहों से देखने पर उनमें हम कई तरह की कमियाँ पा सकते हैं, पर हमें यह स्वीकार करना होगा कि रचनाकार अपने संदर्भों से जुड़ा रह कर सीमाओं का अतिक्रमण भी एक हद तक कर सकता है.
प्रेमचंद-साहित्य की उत्कृष्टता का प्रमाण हमें सिर्फ़ प्रेमचंद के साहित्य या उनके व्यक्तित्व में ढूंढने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि हमें यह उनके समकालीनों द्वारा रचे गए साहित्य के आलोक में भी समझने की आवश्यकता है. प्रेमचंद के समकालीन या उनकी परम्परा के अन्य लेखक जिन्होंने समाजवादी यथार्थवाद पर आधारित साहित्य लिखा, वह व्यवहार में उपदेशात्मक अधिक होता गया. प्रेमचंद के बाद के साहित्यकारों ने साहित्य में मनोविश्लेषणवाद को रेखांकित करते हुए एक निश्चित क़िस्म के व्यक्तिवाद में साहित्य की यात्रा को एक नया मोड़ दे दिया.
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हालांकि बतौर लेखक प्रेमचंद की स्थिति इससे कमज़ोर नहीं हुई बल्कि उनका लेखन समाजोन्मुखी यथार्थवाद की एक विशिष्ट श्रेणी बन कर और व्यवस्थित हो गया जिसे ही हम बार-बार आगे के दशकों में दुहराता हुआ देखते हैं. पर प्रेमचंद को आज तमाम विचारधाराओं के धुँधलके के बावज़ूद एक तटस्थ दृष्टि से, एक शुद्ध साहित्यिक दृष्टि से पढ़ने की आवश्यकता है.
रचनाकार अपने युग से सर्वथा निरपेक्ष हो कर रचना कर ही नहीं सकता. इसीलिए प्रेमचंद संक्रमणकालीन औपनिवेशिक भारतीय जीवन के प्रभावों से अछूते रह कर लेखन नहीं कर रहे थे. अपने युग की चिन्ताएं और समस्याओं से वह अनभिज्ञ नहीं रह सकते थे और इसीलिए वह प्रायः उन सभी स्थितियों को अपने साहित्य में दिखला पाते हैं और मनुष्य के अंतर्जगत में भी प्रवेश करते हैं, भले ही वह चित्रण एकदम से मनोविश्लेषणात्मकता की कोटि में न आए.
ईदगाह के बच्चे हामिद और बुढ़िया दादी अमीना का परस्पर संवाद और पूरी कथा योजना व्यक्ति मन के भीतर को ही कुरेदती है या बड़े भाई साहब में जिस प्रकार से एक असफल बड़े बाई के दिन-पर-दिन बढ़ते असुरक्षा बोध का मार्मिक चित्रण है, वह कहीं भी एक आरोपित वैचारिकी के साथ नहीं आता,बल्कि एक छाया के रूप में पूरी कहानी में गूंथा हुआ है. इसीलिए प्रेमचंद-साहित्य अपने आस्वाद में भी विविधवर्णी है, यहां साहित्यिक स्थितियों पर वैचारिक स्थितियों का प्रक्षेपण नहीं हैं, बल्कि जीवन के गहन अनुभव में पक कर ही स्थितियां कथा भूमि के निर्माण में अनायास खप जाती है. इसीलिए प्रेमचंद की कहानियां विचारधारा के किसी भी ख़ास आग्रह के बग़ैर ही एक सुचिंतित वैचारिकता से लैस लगती हैं.
कथा शिल्प की दृष्टि से भी प्रेमचंद अपने समय के प्रयोगधर्मी कथाकार थे. एक तकनीकी शिल्प की तरह यथार्थवाद को कहानियों के ढांचे के लिए प्रयोग करने की शैली प्रेमचंद की अपनी विकसित शैली थी. उन्होंने नैरेशन, का सबसे अधिक विकसित रूप में अपनी कहानियों में दिखलाया है. कभी तो वह कहानियों के बीच में खड़े एक सूत्रधार हैं, जो समय की तरह अपने पात्रों के जीवन को खोल कर रख रहा है, तो कभी एक किस्सागो की तरह कथा को इस रोचकीयता और नाटकीयता के साथ सुना रहे होते हैं, मानो कहानी कही नहीं जा रही हो, बल्कि दिखलायी पड़ रही हो.
पर प्रेमचंद निर्णायक की भूमिका में कहीं भी नहीं हैं, वह पात्रों पर अपनी टिप्पणियां नहीं करते, बस उन वस्तुस्थितियों को दिखला भर देते हैं जिनसे कि उनके पात्र इस प्रकार से व्यवहार कर रहे होते हैं. प्रेमचंद की रचनाएं इसीलिए एक छोटे बच्चे के स्कूली पाठ्यक्रम में भी उतने ही सहज तरीक़े से लगायी जाती हैं और साहित्यिकों के विश्लेषण के लिए भी इतने रिक्त स्थान छोड़ देती हैं कि हर बार प्रेमचंद पर नए सिरे से, उनकी कहानियों को एक नयी दृष्टि से पढ़ने की जगह छूट जाती हैं.
और प्रेमचंद पर की गयी कोई भी टिप्पणी, बग़ैर भाषा के संदर्भ में प्रेमचंद के लिए गए मूल्यांकन के कोई माने नहीं रखेगी. शहरी या ग्रामीण चाहे जिस भी परिवेश की कहानी प्रेमचंद सुनाते हैं वह अगर हमें विश्वसनीय लगती हैं तो केवल इसीलिए कि वह अत्यंत सहज, सरल, प्राणों से भरी भरी भाषा में लिखे गए हैं. परवर्ती रचनाकारों की तरह भाषा के आभिजात्य-संस्कृतनिष्ठ होने के आग्रह से सर्वथा रहित प्रेमचंद की भाषा में जन-जीवन के सुख-दुःख, इच्छाएं-आकांक्षाएं ध्वनित होती हैं. वहां अपनी बात को सम्प्रेषित करने का आग्रह अधिक हैं न कि स्वयं को जीवन-जगत का गम्भीर अध्येता साबित करने का मुग़ालता.
प्रेमचंद की विरासत का जायज़ा हमें अगर लेना हो तो शायद यह सोचना अधिक मुनासिब होगा कि प्रेमचंद ने कहानी-आख्यान विधा को साहित्य के लिए रूढ़ कर दिया, जिसमें शिल्प-तकनीक-कथ्य-शैली के परिवर्तन तो युग सापेक्ष होते रहे, पर जिसका अभीष्ट प्रेमचंद जैसी सम्प्रेषण, प्रभाव और लोकप्रियता प्राप्त करना ही रहा. प्रेमचंद का आविर्भाव हिंदी साहित्य के लिए कितनी बड़ी घटना है, उसके संदर्भ में कभी स्वयं अज्ञेय को कहना पड़ा है कि ‘ऐयारी, तिलिस्मी और मालिनों-भटियारिनों के क़िस्सों से या पुराने आख्यानों के पुनःसंस्करणों से ‘सेवा सदन’ तक कितनी बड़ी मंज़िल है, इस पर थोड़ी देर विचार करने से प्रेमचंद की देन पर चकित रह जाना पड़ता है’.
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.)
