बस्तर में हुई हत्याओं के एनएचआरसी के रिकॉर्ड जवाबों से ज़्यादा सवाल खड़े करते हैं

2024 से अब तक छत्तीसगढ़ में लगभग 589 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें आम नागरिक, सुरक्षा बल और माओवादी/नक्सली शामिल हैं. अकेले छत्तीसगढ़ में देशभर में हुई कुल मौतों का लगभग 54% और इस अवधि के दौरान माओवादी-उग्रवाद से संबंधित मौतों का लगभग 80% हिस्सा है. ये आंकड़े एक बुनियादी लेकिन परेशान करने वाला सवाल उठाते हैं: मरने वाले कौन हैं?

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

छत्तीसगढ़ में साल 2024 से अब तक लगभग 589 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें आम नागरिक, सुरक्षा बल और माओवादी/नक्सली शामिल हैं. और अभी 2025 का आधा समय ही बीता है. इन 18 महीनों में 2019 से 2023 तक के पांच सालों (534 लोगों) से ज़्यादा लोग मारे गए हैं.

जून और जुलाई में मैंने जनवरी 2024 से दर्ज की गई राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की शिकायतों को पढ़ा, जो बस्तर संभाग के सात जिलों- बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, कांकेर, कोंडागांव, नारायणपुर और सुकमा – पर केंद्रित थीं.

यह लेख पिछले डेढ़ साल यानी 2024 और 2025 की पहली छमाही पर केंद्रित है, जो मौतों में हुई अचानक वृद्धि का दौर है. ये रिकॉर्ड उन लोगों के साथ राज्य के संबंधों की कहानी बयां करते हैं जिन्हें उसने मारा है.

ये रिकॉर्ड उस संस्था की विफलताओं को भी उजागर करते हैं जिसका उद्देश्य मानवाधिकारों की रक्षा करना है.

मृतकों के आंकड़े

अब तक हम इन लोगों को ज़्यादातर ‘आंकड़ों’ के रूप में जानते हैं. दक्षिण एशिया आतंकवाद पोर्टल (एसएटीपी) इनका विस्तृत विवरण देता है:

अखिल भारतीय: 1,095

माओवादी-उग्रवाद से संबंधित: 736

अकेले छत्तीसगढ़: 589

बस्तर संभाग (7 जिले): उपलब्ध नहीं

अकेले छत्तीसगढ़ में देश भर में हुई कुल मौतों का लगभग 54% और इस अवधि के दौरान माओवादी-उग्रवाद से संबंधित मौतों का लगभग 80% हिस्सा है. ये आंकड़े एक बुनियादी, लेकिन परेशान करने वाला सवाल उठाते हैं: मरने वाले कौन हैं?

इसलिए, मैंने एनएचआरसी का रुख किया, जो इन मौतों का आधिकारिक रिकॉर्ड है.

एनएचआरसी की शिकायतें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं, या कम से कम कुछ जानकारी तो उपलब्ध है. ये शिकायतें व्यक्तियों द्वारा संभावित मानवाधिकार उल्लंघनों के संबंध में प्रस्तुत की जाती हैं, जिसके बाद पुलिस, चिकित्सा और प्रशासनिक रिपोर्टों की एक प्रक्रिया शुरू होती है.

‘मुठभेड़’ में हुई मौतों के मामलों में शिकायत आमतौर पर पुलिस अधीक्षक (एसपी) द्वारा दर्ज की जाती है. पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका के बाद उन्हें 48 घंटों के भीतर सभी मुठभेड़ों की सूचना एनएचआरसी को देनी होती है और तीन महीने के भीतर सभी संबंधित दस्तावेज़ भेजने होते हैं.

जब पीड़ितों के नाम देखे, तो मुझे वास्तविक नामों की तुलना में ‘अज्ञात’ शब्द ज़्यादा बार देखने को मिला: ‘अज्ञात नक्सली. अज्ञात माओवादी या अज्ञात पुरुष और अज्ञात महिलाएं.’

उनका पता और गांव? ‘अज्ञात’

बीजापुर ज़िले से कुछ शिकायतें, जहां इस साल अप्रैल में कर्रेगुट्टा ऑपरेशन हुआ था, नीचे दी गई हैं. परिणामों का पहला पृष्ठ अस्पष्ट प्रविष्टियों से भरा था, जिनमें ‘अज्ञात’ व्यक्ति जैसे शब्द और संख्यात्मक प्लेसहोल्डर दोहराए गए थे. (चित्र 1)

चित्र 1. बीजापुर के लिए एनएचआरसी शिकायत परिणामों का पहला पृष्ठ

दूसरे पृष्ठ पर और भी अज्ञात और संख्याएं दिखाई दीं, साथ ही moists, moaists और moiasts जैसी गलत स्पेलिंग भी थीं. कुछ को नक्सली और कुछ को माओवादी लिखा गया था. शब्द बदल गए, लेकिन अस्पष्टता का सार वही रहा. (चित्र 2)

चित्र 2. परिणामों का दूसरा पृष्ठ

सूची को ध्यान से देखने पर विसंगतियां और विरोधाभास और भी स्पष्ट हो जाते हैं.

28 मार्च, 2024 की एक शिकायत में लिंग गणना ‘4 पुरुष, 2 महिला’ से बदलकर ‘5 महिला, 1 पुरुष’ हो गई. (चित्र 3)

12 फरवरी, 2025 की एक अन्य शिकायत में 20 पुरुष और 11 महिलाएं, सभी पुरुष के रूप में दर्ज की गईं. (चित्र 4)

चित्र 3. लिंग पहचान में विसंगति.
चित्र 4. लिंग का गलत वर्गीकरण.

ये छोटी-मोटी गलतियां नहीं हैं, बल्कि दोहराए जाने वाले पैटर्न हैं.

ये आंकड़ों में कोई कमी नहीं, बल्कि मानवीय खामियां हैं. ये पहचान और यहां तक कि लिंग का भी पता नहीं लगा पातीं. बार-बार होने वाली ‘गलतियों के पैटर्न’ संदिग्ध लगने लगते हैं, मानो यह अस्पष्टता जानबूझकर की गई हो.

एक प्रविष्टि में 1 जनवरी, 2024 को क्रॉस-फ़ायरिंग में छह महीने के बच्चे की मौत दर्ज की गई थी. 9 सितंबर, 2024 को 7 लाख रुपये के मुआवज़े के साथ मामला बंद कर दिया गया (चित्र 5).

शिकायत में और कोई विवरण नहीं दिया गया. यह स्पष्ट नहीं है कि क्या कोई जांच हुई या संबंधित व्यक्ति तक मुआवज़ा पहुंचा भी या नहीं?

चित्र 5. क्रॉस-फायरिंग में छह महीने के बच्चे की मौत

20 मार्च, 2024 को हुई एक घटना के बारे में एक शिकायत में कहा गया है कि पुलिस मुठभेड़ में अज्ञात संख्या में ‘लोग’ मारे गए और एनएचआरसी द्वारा अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है. (चित्र 6)

चित्र 6: अनगिनत ‘लोगों’ की मौतें.

कब, अगर कभी, उनकी पहचान उजागर होगी? और इस बीच क्या खो जाएगा?

जब एनएचआरसी के पास और जानकारी उपलब्ध हो भी जाती है, तब भी उसे वेबसाइट पर शायद ही कभी अपडेट किया जाता है. जनता शिकायतों का एक छोटा सा हिस्सा ही देख पाती है. एक बार अज्ञात मृत्यु के रूप में दर्ज होने के बाद वह वेबसाइट पर वैसे ही रहती है. इस सवाल का जवाब नहीं मिलता कि क्या शव की पहचान नहीं हुई है या उस पर दावा नहीं किया गया है.

हालांकि एनएचआरसी पुलिस और प्रशासन से अपेक्षित कई दस्तावेज़ों की सूची बनाता है – जैसे मेडिकल रिकॉर्ड, पुलिस रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट – ये सभी प्रस्तुत होने पर भी एक ऐसी प्रणाली से गुजरते हैं जो इन शिकायतों के पीछे की पहचान और मानव जीवन को बहुत आसानी से भूल जाती है. (चित्र 7)

चित्र 7. एनएचआरसी को आवश्यक दस्तावेजों की सूची.

यह क्यों मायने रखता है?

चूंकि इन अज्ञात लोगों का नाम एनएचआरसी डेटाबेस में दर्ज था, इसलिए बस्तर में रहने वाले उनके परिवारों द्वारा मृतकों की पहचान नहीं हो पाई, क्योंकि प्रत्येक के नाम अलग-अलग नंबरों से चिह्नित थे.

पिछले डेढ़ साल से, जबकि एनएचआरसी अपनी शिकायत प्रक्रिया जारी रखे हुए था और पुलिस व प्रशासन को ज़रूरी दस्तावेज़ जमा करने के लिए रिमाइंडर भेज रहा था, ग्रामीणों ने दावा किया कि मुठभेड़ों में मारे गए कई लोग आम नागरिक थे.

12 मई, 2024 को हुई एक घटना में ग्रामीणों ने कहा कि मारे गए 12 कथित माओवादियों में से दस असल में आम नागरिक थे. फिर भी संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के सिद्धांतों के अनुसार स्थापित देश की सर्वोच्च मानवाधिकार संस्था, एनएचआरसी ने चुप्पी साधे रखी. उसे एक ही घटना में इतनी बड़ी संख्या में हुई मौतों की स्वतः संज्ञान लेकर फैक्ट-फाइडिंग या जांच की कोई ज़रूरत नहीं दिखी.

2012 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2002 में दर्ज एक शिकायत के आधार पर आंध्र प्रदेश में हुए 19 ‘मुठभेड़ों’ में से 16 को फर्ज़ी घोषित कर दिया. इसने प्रत्येक पीड़ित को 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया. एक दशक का अन्याय और एक इंसानी जान की क़ीमत 5 लाख रुपये.

छत्तीसगढ़ में लोगों और बच्चों को बिना नाम के दफना दिया गया, तथा कभी-कभार मुआवजा देने के आदेश के साथ शिकायतों को चुपचाप बंद कर दिया गया और अधिकांश मामले लंबित ही रहे.

मैंने पिछले 18 महीनों में बीजापुर से दर्ज लगभग 40 शिकायतों की समीक्षा की है, जो सभी पुलिस मुठभेड़ों, गोलीबारी या इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) से जुड़ी मौतों से जुड़ी हैं. इनमें से मुझे केवल दो मामले ऐसे मिले जहां एनएचआरसी ने मुआवज़े के आदेश पारित किए.

हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि लोगों को कभी पैसा मिला भी या नहीं. वेबसाइट पर कोई अपडेट नहीं है, न ही इस बात का कोई संकेत है कि एनएचआरसी ने फ़ॉलो-अप किया या यह सत्यापित किया कि मुआवज़ा वास्तव में दिया गया था या नहीं.

यह कोई नई बात नहीं है. पहले भी हमने ऐसे उदाहरण देखे हैं जहां एनएचआरसी के आदेशों के बावजूद ग्रामीणों को कभी मुआवज़ा नहीं मिला. उदाहरण के लिए 2009 में सलवा जुडूम हत्याकांड में, पहले से ही विलंबित 2019 के आदेश के दो महीने बाद भी परिवारों को मुआवज़े के बारे में पता नहीं चला. जब तक आदेश आया, तब तक लोगों की मुआवज़े की राशि में रुचि खत्म हो चुकी थी और उन्होंने इसे लेने से इनकार कर दिया था, क्योंकि अपराधियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई थी.

2016 में तेलंगाना के उन वकीलों की फर्ज़ी गिरफ़्तारियों के एक मामले में, जिन्होंने छह महीने जेल में बिताए थे, एनएचआरसी ने प्रत्येक वकील को एक-एक लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया था. एक वकील ने पुष्टि की कि उन्हें मुआवज़ा नहीं मिला है.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2019 में बीजापुर के एक अक्टूबर 2015 के मामले में मुआवज़े का आदेश दिया था. यह मामला पांच गांवों में पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और हमलों की एक श्रृंखला से जुड़ा था. अदालत ने फरवरी 2020 में इस मामले में अपना अंतिम आदेश सुनाया, जिसमें उसने कहा कि महिलाओं ने पैसे लेने से इनकार कर दिया है क्योंकि अपराधियों को सज़ा नहीं मिली है.

इसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कलेक्टर को निर्देश दिया कि वह उनके नाम से फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) में पैसा जमा करें और कहा कि अगर दो साल के भीतर कोई दावा नहीं किया जाता है, तो कलेक्टर ‘इसका इस्तेमाल कुछ सामाजिक लाभों के लिए’ कर सकते हैं.

साथ ही, आदेश में कहा गया था कि आपराधिक जांच अभी भी जारी है और चार हफ़्तों के भीतर रिपोर्ट पेश की जाएगी. लेकिन मामला बंद होने के बावजूद इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई कि पीड़ितों को न्याय मिला या नहीं, या जांच पूरी हुई भी या नहीं. (चित्र 8)

चित्र 8. 2015 बीजापुर यौन हिंसा मामले में एनएचआरसी का अंतिम आदेश.

इन ‘अज्ञात’ बातों का क्या उद्देश्य है?

जनता को अधूरी जानकारी और आंकड़े दिए जाते हैं और जब कभी-कभार ही दिए जाते हैं, तो केवल मुआवज़ा राशि. ये कोई लिपिकीय गलतियां नहीं हैं. ये मिटाने, भुलाने की राजनीतिक हरकतें हैं.

एनएचआरसी का गठन सत्ता को जवाबदेह बनाने के लिए किया गया था. लेकिन ऐसा लगता है कि यह सरकार का एक मुंशी बन गया है, जो बिना सच्चाई के हिंसा दर्ज करता है और ‘अज्ञात’ शब्द का दुरुपयोग करता है. क्या होता है जब अधिकारों की रक्षा के लिए बनी संस्था ही उन्हें मिटाने में भागीदार बन जाती है? जब नाम ही गायब हों तो न्याय कैसा दिखता है?

ये नाम मायने रखते हैं. स्मृति, जवाबदेही और न्याय के लिए.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों से निपटने के अपने तरीके में सुधार करना होगा. उसे मृतकों को केवल संख्या या टैग के रूप में नहीं, बल्कि व्यक्ति के रूप में पहचानना होगा. नई जानकारी आने पर उसे रिकॉर्ड अपडेट करने होंगे. यदि मुआवज़ा देने का आदेश दिया जाता है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि वह परिवारों या पीड़ितों तक पहुंचे.

लेकिन सिर्फ़ मुआवज़ा न्याय का विकल्प नहीं हो सकता. जांच पारदर्शी और गहनता से होनी चाहिए. तथ्यों में विरोधाभासों पर सवाल उठाए जाने चाहिए. और जब परिस्थिति की मांग हो, तो उसे स्वतंत्र जांच शुरू करने के लिए अपनी शक्तियों का उपयोग करना चाहिए.

(सौम्या लांबा एक स्वतंत्र शोधकर्ता हैं.)

(नोट: इस लेख में उद्धृत आंकड़े एसएटीपी द्वारा 27 जुलाई, 2025 को अपडेट की गईं और 29 जुलाई, 2025 को प्राप्त की गईं हैं.)

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)