भारतीय समाज में जाति से कोई भी मनुष्य बच नहीं पाया है तथा यदि किसी जातिविहीन धर्म ने बाहर से आकर अपना डेरा जमाया है तो भारतीय समाज ने उनमें भी जातियों का प्रवेश कर दिया है, शायद इसीलिए ऐसा माना जाता है कि ‘जाति नहीं जाती’. भारतीय समाज कि जातीय संरचना ही ऐसी है कि बहुत बार तो जातियों के द्वारा ही यहां बहुत कुछ निर्धारित होता है फिर चाहे वह आपकी राजनीति हो या आपका रोजगार.
अभी कुछ महीने पहले ही वर्तमान सरकार ने जातीय जनगणना की घोषणा कि है जो कि बहुत सालों से अलग अलग राजनीतिक दलों तथा संगठनों की मांग रही हैं तथा यह संगठन खासतौर से वंचित तबके या यूं कहें कि पिछड़ा वर्ग से जुड़े रहे हैं. वैसे तो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कि जनगणना हर बार होती रही है परंतु इस बार सरकार ने सभी जातियों की गिनती करने के लिए जनगणना सूची में जाति का एक कालम बढ़ा दिया है.
किसी भी सरकार का कोई भी फैसला राजनीति से परे नहीं होता तथा इस फैसले को भी बिहार के आगामी चुनाव के मद्देनजर देखा जा रहा है जहां कुछ समय पहले ही जातिगत सर्वेक्षण हुआ है. जिस तरह से पूरा विपक्ष बार-बार जाति जनगणना को मुद्दा बना रहा था, वहीं सरकार ने यह घोषणा करके विपक्ष से एक बड़ा मुद्दा अपने पक्ष में कर लिया है
भारत में व्यवस्थित जनगणना का इतिहास बहुत ज्यादा पुराना नहीं है, यह 1881 में ही आरंभ हुआ है. हालांकि समाजशास्त्री सतीश देशपांडे के अनुसार, जनगणना की शुरुआत रजवाड़ों के समय से ही शुरू हो गई थी तथा इसका मुख्य उपयोग कर उगाही के लिए किया जाता था. औपनिवेशिक काल में भी कर उगाही तथा प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए ही इसका उपयोग किया गया. अंग्रेज भारत की संस्कृति, सामाजिक संरचना और मानव इतिहास को भी समझना चाहते थे, ताकि दीर्घकाल तक इस पर राज कर सके, इसलिए भी उन्होंने जनगणना की आरम्भ किया.
जातीय जनगणना के साथ शुरू से ही समस्या हुआ करती थी क्योंकि भारत में जातियां सिर्फ एक रूप में नहीं पाई जाती. यह जातीय संरचना अत्यंत जटिलताओं से भरी हुई है तथा समय के साथ इसकी जटिलताएं बढ़ती जा रही हैं. यहां जाति की भी उपजाति होती है, तथा उपजातियां भी कई भाग में बंटी होती हैं. अगर यादव अर्थात अहीर जाति की बात करें तो इनमें विभिन्न उपजातियां मिलती हैं जैसे ग्वाल, मज़रौत, घोसी, कमरिया आदि.
एमएन श्रीनिवास के सिद्धांत संस्कृतिकरण का मुख्य उदाहरण जातीय जनगणना में देखने को मिलता है. इस सिद्धांत के अनुसार, अनेक जातियां जो हिंदू वर्णाश्रम में शूद्र के रूप में गिनी जाती हैं, स्वयं को राजपूत, ब्राह्मण तथा वैश्य स्थापित करने में लग जाती हैं. जैसे तेली जाति जो कहीं-कहीं राठौर नाम से जानी जाती है, खुद को जातीय जनगणना में राजपूत बनाने का प्रयास करती है, कुर्मी जाति समूह खुद को कुर्मवंशी क्षत्रिय स्थापित करने का प्रयास करती है.
क्रिस्टोफ जैफ्रोलॉ उत्तर भारत की राजनीति पर अच्छी पकड़ रखते हैं, वे बताते है कि विभिन्न जातीय समूह अपने लोगों की जातीय महासभा करते तथा अंग्रेज प्रशासन पर दबाव बनाकर खुद की जाति को वर्णानुक्रम में उच्च स्थापित करने का प्रयास करते जिससे अंग्रेजी प्रशासन को बहुत दिक्कत होती थी, तथा अंग्रेज प्रशासन ने जातीय जनगणना ही बंद कर दी हालांकि जातीय जनगणना 1941 में भी हुई थी परंतु द्वितीय विश्व युद्ध के कारण या अन्य कारणों से इसका संग्रह नहीं हो पाया तथा यह डेटा बाहर नहीं आ पाया.
स्वतंत्र भारत बनने के बाद जाति की बात को सरकारों, खासकर कांग्रेस की सरकारों द्वारा हमेशा अनदेखा किया जाने लगा तथा पूरा का पूरा मुख्य बिंदु विकास बनता गया. पहली बार जाति जनगणना की मांग काका कालेलकर कमीशन रिपोर्ट में देखने को मिलती है जो ओबीसी जातियों के लिए विशेष उपादान करने के लिए 1953 में स्थापित किया गया था.
1955 में रिपोर्ट जमा कर दी गई परंतु न तो काका कालेलकर कमीशन की रिपोर्ट लागू हुई न ही जातियों की गिनती की गई. हालांकि इसका मुख्य कारण काका कालेलकर कमीशन के अध्यक्ष यानी स्वयं काका कालेलकर थे जिन्होंने रिपोर्ट में एक असहमति नोट लगा दिया.
उसके बाद से यह मांग लगातार जारी रही खासकर सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली पार्टियों के द्वारा. 1978 में मंडल कमीशन के गठन के समय भी बीपी मंडल ने जातीय जनगणना की सिफारिश की थी ताकि मंडल कमीशन रिपोर्ट, जो अन्य पिछड़ा वर्ग के उत्थान के लिए तैयार हो रही थी, उसको वैज्ञानिक तरीके से बनाया जा सके परंतु तत्काल सरकार को यह उचित न लगा तथा मंडल कमीशन का आधार 1931 की जातीय जनगणना को माना गया.
मंडल कमीशन के विरोध का भी मुख्य कारण पिछड़े वर्ग की जनगणना का आंकड़ा था. मंडल कमीशन रिपोर्ट के विरोधियों का कहना था कि जब लाभार्थियों की संख्या ही नहीं पता है तो क्या आधार बनाकर अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है. मंडल कमीशन रिपोर्ट लागू होने तथा देश में उदारीकरण आने के बाद एक नई राजनीति का उद्भव होता है तथा इसमें सांप्रदायिकता से लेकर के सामाजिक न्याय की राजनीति में बढ़ावा देखने को मिलता है तथा जिसके बाद यह मांग और प्रबल हो जाती है.
2011 के जनगणना से पहले राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, द्रविड़ मुनेत्र कषगम आदि पार्टियों तथा भाजपा के भी कुछ ओबीसी नेताओं जैसे गोपीनाथ मुंडे के द्वारा 2011 की जनगणना में जाति का कॉलम जोड़ने की मांग की गई थी, जिसे तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम द्वारा अनेक बाधाएं और तकनीकी समस्याएं बताकर ठुकरा दिया गया. अत्यधिक दबाव को देखकर तबके प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अलग से एक कमेटी बनाकर सामाजिक और आर्थिक जातीय जनगणना की गई, जिसमें करीब 4,900 करोड़ रुपये खर्च हुए, पर उस सर्वे को जाति के साथ कभी भी सार्वजनिक नहीं किया गया. हालांकि उसका उपयोग सरकार अन्य कार्यों के लिए करती है.
यद्यपि उसके बाद भी अनेक राज्यों में जातीय सर्वे हुए, पर उन्हें प्रकाशित नहीं किया गया चाहे वह कर्नाटक हो या तेलंगाना. इन सब में बिहार अपवाद है जहां गणना हुई और उसे प्रकाशित भी किया गया.
2019 के आम चुनाव से पहले 2018 में तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में जातीय जनगणना करने का वादा किया था हालांकि अब तक जनगणना आरंभ ही नहीं हो पाई. पहले तो कोरोना महामारी ने रोका, बाद में सरकार की इच्छा शक्ति ने.
अब प्रश्न उठता है कि सरकार ने जातीय जनगणना कराने का फैसला अभी क्यों लिया?
इसके अनेक कारण हो सकते हैं परंतु तमाम रणनीतिकारों का मानना है कि इसका मुख्य कारण मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस तथा अन्य क्षेत्रीय दलों द्वारा बार-बार जातीय जनगणना का मुद्दा बनाकर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ राजनीति करना है. इस साल के अंत में बिहार में चुनाव होने हैं जिसे जातीय राजनीति का प्रयोगशाला माना जाता है तथा भारतीय जनता पार्टी ने जातीय जनगणना की घोषणा करके थोड़ी बढ़त हासिल कर ली है.
इस बार की जनगणना से परिसीमन के भी रास्ते खुलेंगे जिससे कि लोकसभा तथा राज्यसभा की सीटों का पुनर्वितरण होगा.
कुल मिलाकर आने वाला समय राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण होने वाला है क्योंकि एक बार जातीय जनगणना हो जाएगी तो उसके बाद आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग उठेगी, साथ ही आरक्षण में वर्गीकरण की मांग भी जोर पकड़ेगी.
(अमित कुमार गुप्ता जेएनयू में ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र के शोध छात्र हैं.)
