जिन्होंने आंबेडकर को भारतीय अकादमिक समाजशास्त्र में स्थापित किया, अलविदा प्रोफेसर नंदू राम…

प्रोफेसर नंदू राम ने जेएनयू के वाम दृष्टिकोण से हटकर एक अलग वैकल्पिक वैचारिक दृष्टिकोण के साथ आंबेडकर को समाज विज्ञान की दुनिया में स्थापित किया. उन्होंने शैक्षणिक परिदृश्य में वामपंथी विचारधारा के प्रभुत्व के इतर वंचित समाज के मुद्दे को आगे बढ़ाया. उन्होंने जिस वैचारिक आंदोलन की नींव रखी, वह आने वाली पीढ़ियों को रास्ता दिखाता रहेगा.

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प्रोफेसर नंदू राम का  लेखन, शोध और जीवन संघर्ष आने वाले समय में दलित विमर्श को दिशा देता रहेगा. वे न सिर्फ एक शिक्षक थे, बल्कि एक समाजद्रष्टा थे. (फोटो: अरेंजमेंट)

दलित समाजशास्त्र के पथ प्रदर्शक प्रोफेसर नंदू राम नहीं रहे. देश के प्रख्यात समाजशास्त्री, शिक्षाविद और दलित चिंतक प्रोफेसर नंदू राम का शनिवार 13 जुलाई की सुबह निधन हो गया. अपने चार दशकों से भी ज़्यादा कार्यकाल में उन्हें भारतीय समाजशास्त्र को नया रूप दिया था. वे एक अग्रणी समाजशास्त्री थे, जिन्हें दलित दृष्टिकोण को भारतीय शिक्षा जगत के केंद्र में लाने में मदद करने के लिए जाना जाता है. वे आधुनिक भारत में जाति की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गतिशीलता का गहनता से अपने अनुभवों से अन्वेषण करने वाले पहले लोगों में से थे.

उनके पुत्र सिद्धार्थ कहते हैं कि वे अपने लेखन के माध्यम से दलित समुदाय का उत्थान करना चाहते थे. वरिष्ठ शैक्षणिक पदों पर रहते हुए भी प्रोफेसर राम अद्भुत विनम्रता से रहते थे. सिद्धार्थ याद करते हैं, ‘उन्होंने कभी कार नहीं खरीदी. वे हमेशा पैदल चलते थे’. उनका जन्म 28 जुलाई, 1946 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के मरहिया गांव के एक बेहद साधारण दलित परिवार में हुआ था.

उनके पिता हलवाहे थे, मां दूसरों के घरों में गोबर लीपती थीं, और भाई बनारस में रिक्शा चलाते थे. लेकिन उन्होंने इस पृष्ठभूमि को कमजोरी नहीं, ऊर्जा में बदला. उनके माता-पिता, जानकी देवी और पट्टू राम ने यह सुनिश्चित किया कि वे पढ़ाई कर सकें. बीएचयू और फिर जेएनयू तक की उनकी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा अगर ठान ली जाए, तो जाति की सारी दीवारें पार की जा सकती हैं.

वे हाई स्कूल में अपने ज़िले में अव्वल आए और बाद में उच्चतर माध्यमिक शिक्षा के लिए वाराणसी चले गए. क्वीन्स कॉलेज में उन्हें अक्सर ‘ग्रामीण’ कहकर मज़ाक उड़ाया जाता था, लेकिन उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एमए की उपाधि प्राप्त की और 1976 में आईआईटी कानपुर से समाजशास्त्र में पीएचडी पूरी की, जहां उन्होंने कई वर्षों तक अध्यापन भी किया.

जब वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) पहुंचे थे, तब सुखदेव थोरात और तुलसीराम जैसे लोग वहां छात्र थे. 1978 में वे जेएनयू के सामाजिक व्यवस्था अध्ययन केंद्र (सीएसएसएस) में प्राध्यापक के बतौर शामिल हो गए, जहां उन्होंने तीन दशकों से भी अधिक समय तक अध्यापन किया. उन्होंने 1999 से 2001 तक सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल सिस्टम  (सीएसएसएस) के अध्यक्ष और बाद में सामाजिक विज्ञान संकाय के पहले दलित संकायाध्यक्ष (डीन) के रूप में कार्य किया.

उन्होंने जेएनयू में आंबेडकर चेयर की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्हें 1995 में जेएनयू में संस्थापक आंबेडकर चेयर प्रोफेसर नियुक्त किया गया. जेएनयू के इतिहास में अनुसूचित जाति समुदाय से नियुक्ति पाने वाले प्रोफेसर नंदू राम पहले शिक्षक थे.

2001 से 2004 के बीच, उन्होंने मध्य प्रदेश में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर राष्ट्रीय सामाजिक विज्ञान संस्थान के महानिदेशक के रूप में भी कार्य किया. जेएनयू से वह 2011 में सेवानिवृत्त हुए. उनके निधन से भारत ने एक ऐसा अकादमिक बुद्धिजीवी खो दिया है, जिसने समाजशास्त्र को सिर्फ अध्ययन नहीं, सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया.

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मैं कभी उनका छात्र नहीं रहा. लेकिन मैं उनके छात्रों का छात्र जरूर रहा. उनके द्वारा प्रशिक्षित छात्रों द्वारा प्रशिक्षित हुआ. हालांकि मेरा उनसे व्यक्तिगत रूप से व्यापक संपर्क नहीं था, फिर भी मैं उन्हें सीएसएसएस में एक शिक्षक के रूप में याद करता हूं. भारत में अनुसूचित जातियों के विश्वकोश (ज्ञान प्रकाशन 2007) पर उनके काम और आंबेडकर तथा बौद्ध धर्म पर उनके कई अन्य लेखों के माध्यम से मुझे उनके गहन विद्वत्तापूर्ण योगदान के बारे में और गहराई से पता चला.

उनकी पुस्तक ‘द मोबाइल शेड्यूल्ड कास्ट्स: राइज़ ऑफ अ न्यू मिडिल क्लास’ ने विद्वानों को सामाजिक गतिशीलता की जांच करने का एक नया नज़रिया दिया. उनकी किताब ‘बियॉन्ड आंबेडकर’ (1995) ने दलित राजनीतिक चिंतन की सीमाओं को आगे बढ़ाया. प्रोफेसर नंदू राम जैसे विद्वान ही भारत में पहली बार अनुसूचित जातियों का विश्वकोश तैयार कर सकते थे, जो ‘इंसाइक्लोपीडिया ऑफ शेड्यूल्ड कास्ट्स इन इंडिया’ शीर्षक से वर्ष 2003 में पांच खंडों में प्रकाशित हुआ.

इस विश्वकोश में उन्होंने भारत की सभी अनुसूचित जातियों का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, और उद्भव का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है. इन कार्यों ने उन्हें देश और विदेश में पहचान दिलाई.

दुख की बात है कि मुख्यधारा के अकादमिक हलकों ने उनके अधिकांश कार्यों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया. मैं उनके द्वारा प्रशिक्षित तीन छात्रों प्रोफेसर विवेक कुमार, प्रोफेसर कामेश्वर चौधरी और प्रोफेसर बीबी मलिक का आभारी हूं, जिन्होंने न केवल प्रोफेसर नंदू राम की बौद्धिक विरासत को आगे बढ़ाया, बल्कि अकादमिक जगत में दलित विद्वता के व्यवस्थित ह्रास को भी ज़ोरदार ढंग से उजागर किया.

प्रोफेसर नंदू राम का भारतीय समाजशास्त्र में अकादमिक हस्तक्षेप

प्रोफेसर नंदू राम ने हजारों छात्रों को पढ़ाया, सैकड़ों एमफिल और पीएचडी छात्रों को प्रशिक्षित किया और कई दर्जन छात्रों को देश के कई विश्वविद्यालयों, कालेजों अकादमिक शोध संस्थाओं में शिक्षण और शोध के लिए स्थापित करने में सहयोग किया. देश के कई केंद्रीय एवं राज्य विश्वविद्यालयों और अनेकों महाविद्यालयों में प्रोफेसर नंदू राम के छात्र विभिन्न पदों पर समाजशास्त्र को अधिक समावेशी और समाज को अधिक न्यायपूर्ण, करुणामय बनाने के लिए प्रयासरत हैं.

प्रोफेसर नंदू राम उस पहली पीढ़ी से थे, जिन्होंने भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर को अकादमिक रूप से विश्वविद्यालयों की शोध और बहस की मुख्यधारा में शामिल कराया.

जेएनयू के वाम दृष्टिकोण के प्रभुत्व से हटकर एक अलग वैकल्पिक वैचारिक दृष्टिकोण के साथ प्रोफेसर नंदू राम ने आंबेडकर को समाज विज्ञान और खासकर समाजशास्त्र में स्थापित किया और उसे विकसित करने तक लगातार सक्रिय रहे. उन्होंने समाज विज्ञान के शैक्षणिक परिदृश्य में वामपंथी विचारधारा के प्रभुत्व के इतर वंचित समाज के मुद्दे को डॉ. आंबेडकर की विचारधारा के साथ आगे बढ़ाया और उसे बॉटम-अप पर्सपेक्टिव जैसा अकादमिक सैद्धांतिक नाम दिया.

प्रोफेसर तुलसीराम ने एक बार कहा था कि प्रोफेसर नंदू राम अपने स्कूल और कॉलेज जीवन से ही वंचित समाज के विषय में चिंतन करते थे. वे शुरू से ही भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर से प्रभावित थे. जेएनयू में आंबेडकर पीठ की स्थापना उनके ही प्रयासों से संभव हो सकी. उनके कार्यकाल में आंबेडकर पीठ ने ऐसी कई विचार-गोष्ठियां आयोजित कीं, जिन्हें पहले अनदेखा किया जाता था मानो वंचित समाज का दर्द वही है जो प्रभुत्वशाली वर्ग समझता है या आपको बताना चाहता है.

आंबेडकर पीठ की स्थापना के बाद इस यूनिवर्सिटी में पहली बार संस्थागत रूप से वंचित समाज ने अपनी विचारधारा को अभिव्यक्त करना शुरू किया. उनके बाद उन्हीं के निर्देशन में पीएचडी करने वाले प्रोफेसर विवेक कुमार आंबेडकर पीठ के अध्यक्ष बने.

प्रोफेसर नंदू राम के छात्र और लखनऊ में समाजशात्र के प्रोफेसर बीबी मालिक कहते हैं,

जब मैं पहली बार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नंदू राम की कक्षा में गया, तो मैं भी एक झिझकता हुआ छात्र था, सवालों और अनिश्चितताओं से भरा हुआ. मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि मैं उस शिक्षक से मिलने वाला हूं जो न सिर्फ़ मेरे अकादमिक नज़रिए को नया आकार देगा, बल्कि मुझे अपनी आवाज़ की ताकत भी तलाशने में मदद करेगा….वे हमसे कहा करते थे, ‘तुम यहां सिर्फ़ डिग्रियां लेने नहीं आए हो. तुम यहां सुख-सुविधाओं को तोड़ने और जहां अंधेरा छाया है, वहां प्रकाश फैलाने आए हो.’

वे आंबेडकर और फुले के उद्धरण देते थे, लेकिन हमें मार्क्स, ग्राम्शी और फूको को पढ़ने के लिए भी प्रेरित करते थे. हमेशा एक संश्लेषण पर ज़ोर देते थे, कभी किसी सिद्धांत पर नहीं. उन्होंने हमें सिखाया कि प्रतिरोध कठोर हो सकता है, और विद्वता संघर्ष का एक रूप हो सकती है.

भारतीय समाजशास्त्र परिषद (इंडियन सोशियोलोजिकल) ने अपने शोक सन्देश में लिखा है- ‘प्रो. नंदू राम एक ऐसे विरले विद्वान थे, जिन्होंने समाजशास्त्र को केवल सिलेबस तक नहीं, जमीनी हकीकत से जोड़ा.’

‘दलित दस्तक’ के संपादक अशोक दास लिखते हैं, ‘प्रोफेसर नंदू राम हमारे समय के ‘अज्ञात योद्धा’ थे. उन्होंने शिक्षण, शोध और संस्थानिक नेतृत्व के ज़रिए जो खामोश क्रांति चलाई, वह नई पीढ़ी के दलित स्कॉलर्स के लिए मशाल बन चुकी है. वह डॉ. आंबेडकर के विचारों को विश्वविद्यालय की दीवारों से जोड़ने वाले सेतु थे.’

मैत्रेयी चौधरी, जो उनकी शुरुआती छात्राओं में से एक थीं और बाद में जेएनयू में उनकी सहकर्मी बनीं, ने कहा, ‘दशकों से, उन्होंने विद्वानों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार की जिसने हाशिए पर पड़े समुदायों पर ज्ञान का एक विशिष्ट भंडार तैयार किया. उस समय वे एक अकेली आवाज़ थे और यह आसान नहीं था.’

वे कैंपस की राजनीति और सार्वजनिक दिखावे से दूर रहे. उनके एक और लंबे समय के सहयोगी आनंद कुमार ने कहा, ‘वे कभी नारेबाजी में शामिल नहीं रहे. उन्होंने अपनी आंबेडकरवादी पहचान को कभी खुलकर नहीं दिखाया. वे जाति या वर्ग की परवाह किए बिना लोगों का सम्मान करते थे, और इसीलिए लोग उनका सम्मान करते थे.’

2017 में भारतीय समाजशास्त्रीय परिषद ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया.

वे अब नहीं है, लेकिन उन्होंने जिस वैचारिक आंदोलन की नींव रखी, वह आने वाली पीढ़ियों को रास्ता दिखाता रहेगा. उनका  लेखन, शोध और जीवन संघर्ष आने वाले समय में दलित विमर्श को दिशा देता रहेगा. वे न सिर्फ एक शिक्षक थे, बल्कि एक समाजद्रष्टा थे. अलविदा प्रोफेसर नंदू राम…

(अजय कुमार, बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.)