मुंबई की उमस भरी दोपहर में एक प्राथमिक विद्यालय के प्रांगण में खड़े माता-पिता की आंखों में एक सादा, लेकिन गहरी चिंता तैरती है. यह चिंता फीस या पाठ्यपुस्तकों को लेकर नहीं है. यह भाषा को लेकर है, वह भाषा जिसमें उनका बच्चा अपने पहले शब्द बोलेगा, पहला सपना देखेगा.
अप्रैल 2025 में महाराष्ट्र सरकार ने एक सरकारी प्रस्ताव जारी किया, जिसके अनुसार राज्य के मराठी और अंग्रेज़ी माध्यम वाले स्कूलों में कक्षा एक से हिंदी को अनिवार्य भाषा के रूप में पढ़ाया जाना था. यह निर्णय तीन-भाषा सूत्र के तहत लिया गया बताया गया, लेकिन इसका सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव व्यापक था.
प्रस्ताव के सार्वजनिक होते ही विभिन्न स्तरों पर विरोध की आवाज़ें उठने लगीं. केवल राजनीतिक दल ही नहीं, शिक्षकों, अभिभावकों, संस्कृतिकर्मियों और भाषा-संवेदनशील संगठनों ने भी चिंता प्रकट की. इस निर्णय को लेकर आशंका उभरी कि यह मराठी की स्थिति को धीरे-धीरे हाशिए पर ले जा सकता है.
विरोध का स्वर तब और मुखर हुआ, जब शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने इसे मराठी अस्मिता के विरुद्ध बताया. राज ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से इसे ‘हिंदी थोपने का प्रयास’ करार दिया, वहीं उद्धव ठाकरे ने कहा कि यह निर्णय महाराष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा को आघात पहुंचा सकता है. दोनों नेताओं ने इस मुद्दे पर जन आंदोलन का आह्वान किया.
बढ़ते दबाव, जनभावनाओं और सामाजिक आलोचना के बीच सरकार को पीछे हटना पड़ा. जून 2025 में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने प्रस्ताव को स्थगित करने की घोषणा की और नीति की पुनर्समीक्षा के लिए शिक्षाविद् डॉ. नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई. साथ ही मुख्यमंत्री ने यह स्पष्ट किया कि मराठी राज्य की मूल भाषा बनी रहेगी और भाषा के मुद्दे का राजनीतिक दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए.
हालांकि, प्रस्ताव को औपचारिक रूप से वापस ले लिया गया, लेकिन इसने भाषाई असंतुलन, संघीय ढांचे की संवेदनशीलता, और सांस्कृतिक आत्मसम्मान जैसे विषयों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना दिया.
लेकिन विवाद का अंत यहां नहीं होता. यह बहस शिक्षा के ढांचे से आगे बढ़कर उस बुनियादी प्रश्न से जुड़ने लगती है जो भारतीय गणराज्य की आत्मा को स्पर्श करता है, क्या भारत की एकता भाषाई विविधता के साथ कदम मिलाकर चल सकती है?
भाषाओं की रेखाओं में संघीय स्मृति
देश के तमाम राज्यों में हिंदी को लेकर व्याप्त असहजता नई नहीं है. भाषाई अस्मिता को लेकर उठने वाले प्रश्न केवल वर्तमान की चिंता नहीं, बल्कि भारतीय संघ के इतिहास में ठोस रूप से दर्ज हैं. 1960 के दशक में जब केंद्र सरकार ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पहल की थी, तब दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु में व्यापक विरोध हुआ. इसी कालखंड में महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने भी भाषाई प्राथमिकताओं पर अपने विचार स्पष्ट रूप से सामने रखे.
महाराष्ट्र की स्थिति इस संदर्भ में विशिष्ट रही है. यहां राष्ट्रवाद, मराठी सांस्कृतिक चेतना और भाषाई पहचान आपस में गुंथी हुई हैं. यह वही भूमि है, जहां एक ओर बाल गंगाधर तिलक जैसे विचारक पनपे, तो दूसरी ओर मराठी रंगमंच और साहित्य की सशक्त परंपरा ने जनचेतना को गढ़ा. ऐसे में जब किसी एक भाषा को प्राथमिकता देने की सरकारी पहल होती है, तो वह केवल शैक्षिक निर्णय नहीं रहता, बल्कि वह सांस्कृतिक और राजनीतिक विमर्श का भी हिस्सा बन जाता है.
हालिया विरोध केवल राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहा. शिक्षक, कलाकार, अभिभावक और सामाजिक कार्यकर्ता- सभी ने इसे लेकर खुलकर संवाद किया. यह स्पष्ट हुआ कि सवाल हिंदी से असहमति का नहीं है, बल्कि भाषाई संतुलन, सामाजिक सम्मान और सांस्कृतिक गरिमा के स्वरक्षण का है.
यह बहस केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है. हिंदी को लेकर असहजता और प्रतिक्रिया पूर्वोत्तर भारत, विशेषकर असम, मणिपुर और नागालैंड जैसे राज्यों में भी समय-समय पर सामने आई है. इन राज्यों में जब भी केंद्र सरकार की ओर से हिंदी को माध्यम या प्राथमिक भाषा के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की गई, तो स्थानीय समुदायों ने उसे सांस्कृतिक संप्रभुता के विरुद्ध हस्तक्षेप के रूप में देखा.
असम में 2021 में जब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हिंदी को अनिवार्य करने का सुझाव दिया, तो छात्र संगठनों, बुद्धिजीवियों और क्षेत्रीय दलों ने इसका विरोध किया और स्थानीय भाषाओं की रक्षा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई.
कर्नाटक में भी समय-समय पर ऐसी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं. विशेषकर बेंगलुरु जैसे महानगरों में जब सरकारी या डिजिटल माध्यमों में हिंदी को वरीयता मिलती है, तो स्थानीय संगठनों द्वारा कन्नड़ की उपेक्षा पर सवाल उठाए जाते हैं. मेट्रो स्टेशनों, ऐप्स, और सार्वजनिक सूचनाओं में हिंदी के प्रसार को लेकर चिंता जताई जाती रही है.
कन्नड़ कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने यह बात बार-बार उठाई है कि भारत की भाषाई एकता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि किसी एक भाषा की पहुंच बाकी सभी पर हावी हो जाए.
यह परिदृश्य यह दिखाता है कि हिंदी, जो देश के एक बड़े हिस्से में संवाद की भाषा है, वहीं कुछ अन्य क्षेत्रों में वह सत्ता के एक प्रतीक के रूप में देखी जाती है-एक ऐसी सत्ता, जो कभी-कभी स्थानीय अस्मिता की अनदेखी करती प्रतीत होती है.
संघीय भारत की यह स्मृति दरअसल केवल ऐतिहासिक तथ्य नहीं, वर्तमान संवेदना का हिस्सा है. विविधताओं के बीच संतुलन और सम्मान बनाए रखने का दायित्व केवल संविधान पर नहीं, बल्कि हमारी राजनीतिक और प्रशासनिक सोच पर भी है.
इसलिए महाराष्ट्र में उठी चिंता को संकीर्ण क्षेत्रीयता के बजाय, भारत की साझा संघीय चेतना के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए. यह चेतना हमें याद दिलाती है कि एकता का अर्थ एकरूपता नहीं होता-और भाषा का आदर तभी साकार होता है जब वह अन्य भाषाओं के अस्तित्व को सहर्ष स्वीकार करे.
संविधान में निहित भाषाई न्याय
भारतीय संविधान में भाषाई विविधता को केवल मान्यता नहीं दी गई, उसे संरक्षित भी किया गया है. अनुच्छेद 343 से 351 तक की धाराएं और आठवीं अनुसूची यह सुनिश्चित करती हैं कि विभिन्न भाषाओं को समान दर्जा मिले. अनुच्छेद 29 के माध्यम से भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने का अधिकार नागरिकों को प्राप्त है.
तीन-भाषा सूत्र, जिसे 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रस्तुत किया गया था, एक मार्गदर्शक सिद्धांत रहा है, जो अनुशंसा मात्र थी, निर्देश नहीं. इस सूत्र में यह व्यवस्था दी गई थी कि विद्यार्थी स्थानीय भाषा, हिंदी और अंग्रेज़ी तीनों से परिचित हों. यह सूत्र विविधता को साथ लेकर चलने की भावना से उत्पन्न हुआ था, एकरूपता थोपने की भावना से नहीं.
न्यायपालिका भी इस विषय पर समय-समय पर स्पष्ट कर चुकी है कि भाषाई स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति और शिक्षा के मौलिक अधिकारों से जुड़ी हुई है. ऐसे में कोई भी नीतिगत परिवर्तन जो किसी एक भाषा को विशेष दर्जा देता प्रतीत हो, संवैधानिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है.
मराठी: साहित्य से जीवन तक
मराठी भाषा एक समृद्ध और सघन परंपरा रही है. इसकी जड़ें संत ज्ञानेश्वर और तुकाराम के भक्ति काव्य से लेकर आधुनिक रंगमंच, सिनेमा और लोकसंस्कृति तक फैली हुई हैं. यह भाषा महाराष्ट्र की सांस्कृतिक स्मृति में इतनी गहराई से रची-बसी है कि उसकी नाद नाटककार विजय तेंडुलकर, कथाकार पु. ल. देशपांडे और कवि कुसुमाग्रज के शब्दों में बार-बार सुनाई देती है.
मराठी का प्रभाव केवल साहित्य या कलाओं तक सीमित नहीं है. यह लोकजीवन की लय में बहती है. ओवियां, भारुड, लावणी और तमाशा की ध्वनियां उसके ऐतिहासिक स्वरूप की गवाही देती हैं. गांव की चौपाल से लेकर शहर की सभा तक, यह भाषा संवाद का माध्यम है. और प्रशासन, पत्रकारिता, शिक्षा और जनचेतना का अवलंब भी. यही वह भाषा है जिसमें आमजन अपने सुख-दुख, संघर्ष और स्वप्नों को स्वर देते हैं.
ऐसे में जब किसी सरकारी नीति से यह आशंका जन्म ले कि मराठी की सार्वजनिक भूमिका को सीमित किया जा रहा है, तो यह केवल भाषाई चिंता नहीं रह जाती है. तब यह एक पूरे सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न बन जाती है.
राजनीति और भाषा के सघन परिप्रेक्ष्य
भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है; वह स्मृति, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक संरचना का वाहक भी होती है. ऐसे में जब भाषा सार्वजनिक नीति और राजनीति के केंद्र में आती है, तो वह केवल शैक्षिक या सांस्कृतिक विषय नहीं रह जाती-वह सत्ता, प्रतिनिधित्व और सामाजिक संतुलन का प्रश्न बन जाती है.
महाराष्ट्र में हिंदी को प्राथमिक कक्षाओं में अनिवार्य बनाने के प्रस्ताव के बाद जो जन प्रतिक्रिया सामने आई, उसमें भावनात्मक आवेग और राजनीतिक रणनीति, दोनों की छाया स्पष्ट दिखाई दी. स्थानीय निकाय चुनावों के संदर्भ में शिवसेना (उद्धव गुट) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया. राज ठाकरे ने इसे ‘हिंदी थोपने’ की कोशिश बताया, वहीं उद्धव ठाकरे ने मराठी अस्मिता की रक्षा का आह्वान किया.
इन बयानों ने जनभावनाओं को स्वर दिया, लेकिन कुछ स्थानों पर यह आंदोलन उस मर्यादा को लांघता दिखाई दिया, जिसकी अपेक्षा एक लोकतांत्रिक समाज से की जाती है. राज्य के कुछ हिस्सों में उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य हिंदी भाषी प्रदेशों से आए प्रवासी श्रमिकों और छोटे व्यवसायियों को लेकर उपजे असंतोष ने दुर्भाग्यपूर्ण रूप लिया.
ठाणे जैसी घटनाएं, जहां एक दुकानदार को केवल इसलिए अपमान और हिंसा का सामना करना पड़ा कि वह मराठी में संवाद नहीं कर सका, इस पूरे विमर्श को एक गहरे नैतिक प्रश्न के सामने ला खड़ा करती हैं.
ऐसी किसी भी हिंसा की स्पष्ट और कठोर भर्त्सना आवश्यक है- नैतिक स्तर पर भी, और संवैधानिक मूल्यबोध के आधार पर भी. मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से इस घटना की निंदा करना एक ज़रूरी संकेत था कि राज्य की ओर से ऐसी प्रवृत्तियों को मान्यता नहीं मिल सकती.
यह समझना होगा कि भाषा का सम्मान किसी अन्य भाषा या बोलनेवाले समुदाय के अपमान से संभव नहीं. यदि अस्मिता की रक्षा के नाम पर भय, अपमान या हिंसा की संस्कृति विकसित होती है, तो वह न केवल समाज को विभाजित करती है, बल्कि स्वयं उस भाषा की गरिमा को भी आघात पहुंचाती है, जिसकी रक्षा का दावा किया जा रहा होता है.
महाराष्ट्र जैसे बहुभाषी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य में संवाद, सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान की परंपरा रही है. यही वह नैतिक विरासत है जो किसी भी भाषा-आधारित असहमति को सहिष्णुता और विवेक से सुलझाने का मार्ग दिखा सकती है.
वास्तव में, भाषा का सम्मान तब सबसे गहरा होता है जब वह नारे या नाराज़गी नहीं, भरोसे और सौहार्द्र की ज़बान में बोलती है.
समावेशिता की ओर बढ़ते हुए
जिस समिति को भाषा नीति की समीक्षा का दायित्व सौंपा गया है, उसके सामने यह एक महत्वपूर्ण अवसर है कि वह व्यापक संवाद के आधार पर एक संतुलित और दूरदर्शी दृष्टिकोण प्रस्तुत करे. ऐसी नीति विकसित की जाए, जिसमें मराठी को उसकी गरिमा और संवैधानिक अधिकार के अनुरूप प्रमुख स्थान मिले, जबकि हिंदी और अंग्रेज़ी को वैकल्पिक भाषाओं के रूप में अवसर दिया जाए.
साथ ही, राज्य सरकार की यह ज़िम्मेदारी होगी कि वह प्राथमिक स्तर पर मराठी माध्यम की शिक्षा को मज़बूती दे-शिक्षकों के प्रशिक्षण, पाठ्यसामग्री के विकास और भाषाई संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित कराए. तकनीकी और डिजिटल माध्यमों में मराठी की मज़बूत उपस्थिति, भाषा-सशक्तिकरण की दिशा में एक दीर्घकालिक समाधान हो सकती है.
यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि मातृभाषा में शिक्षा केवल भाषाई गौरव का विषय नहीं, बल्कि शैक्षिक रूप से भी अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुई है. यह बच्चे के बौद्धिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास की आधारशिला रखती है. यह कोई विचारधारात्मक आग्रह नहीं, बल्कि कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शोधों से प्रमाणित तथ्य है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी इस सिद्धांत को अपनाते हुए प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा के उपयोग को प्राथमिकता दी है.
और अंत में
महाराष्ट्र में उठी यह भाषा बहस केवल एक शैक्षिक निर्णय के विरोध तक सीमित नहीं रही. यह बहस अब भारतीय संघवाद की बुनियादी समझ और भाषाई न्याय की वास्तविकता को कसौटी पर रखती है. सवाल यह है कि ‘विविधता में एकता’ का विचार क्या केवल संविधान की प्रस्तावना में सुरक्षित एक आदर्श है, या वह नागरिक जीवन की वास्तविक ज़मीन पर भी अपना आकार ग्रहण करेगा?
भारत तभी एक आदर्श गणराज्य बन सकेगा जब वह अपने हर नागरिक की सांस्कृतिक अस्मिता को समान भाव से स्वीकार करे, और प्रत्येक भाषा को उसका उचित, सम्मानजनक स्थान दे. मराठी, अपने गौरवशाली साहित्य, परंपरा और जनजीवन से जुड़ी हुई एक सशक्त भाषा है. उसे संरक्षण की याचना नहीं करनी पड़ती, न ही उसे किसी कृत्रिम विशेषाधिकार की दरकार है. उसे केवल वह स्वीकार्यता चाहिए जो उसकी ऐतिहासिक सम्मान और सामाजिक उपस्थिति के अनुरूप हो.
भाषा, अगर विवाद का कारण बन जाए, तो राष्ट्र की आत्मा में असंतुलन उत्पन्न होता है. लेकिन वही भाषा, यदि समझ, संवेदनशीलता और संवाद के आधार पर अपनाई जाए, तो वह सेतु बनती है-राज्य और राष्ट्र के बीच, नागरिक और संस्कृति के बीच.
यह विवाद किसी एक प्रस्ताव का विरोध भर नहीं है; यह उस सवाल का उत्तर खोजने की कोशिश है कि क्या भारत की एकता आदेशों से उपजेगी, या भरोसे और साझी समझ से? क्या एक नागरिक को अपनी मातृभाषा में भारत से जुड़ने का अवसर मिलेगा, या उसे किसी तयशुदा भाषा में राष्ट्रीयता की परिभाषा रटनी पड़ेगी?
भारत का लोकतंत्र तभी पूर्ण होगा जब उसकी बहुभाषिता केवल भाषाओं की गिनती में नहीं, बल्कि उनके सम्मान और अवसरों में भी झलके. तमिल से लेकर मराठी तक, मैथिली से कश्मीरी तक-हर भाषा भारत का एक रूप है, एक स्मृति है. इन स्मृतियों में दरार पड़ने लगे, तो राष्ट्र की चेतना भी थरथराने लगती है.
शायद यह बात सबसे बेहतर ढंग से एक छोटे बच्चे की आवाज़ में समझी जा सकती है-जब वह कक्षा में बैठकर पहली बार ‘आई’ कहता है, तो वह केवल अपनी माँ को नहीं पुकारता. वह उसी क्षण भारत को भी आकार दे रहा होता है. एक ऐसे भारत को, जो उसकी भाषा में उसकी पहचान को पूरा करता है.
(आशुतोष कुमार ठाकुर पेशे से मैनेजमेंट प्रोफेशनल हैं और साहित्य तथा संस्कृति पर लेखन करते हैं.)
