विनाश की त्रासद गली पर ठहरी दिल्ली की झुग्गी बस्तियां

दिल्ली सरकार कहती रही है कि झुग्गियां नहीं तोड़ी जाएंगी. लेकिन जब झुग्गी तोड़ी जाती है, तो सरकार तर्क देती है कि ये तोड़फोड़ कोर्ट के आदेश के तहत हुई है. आखिर सरकार अदालत के सामने अपनी पुनर्वास नीति को मजबूती से क्यों नहीं रखती, ताकि या तो झुग्गी तोड़ी ही न जायें, या उनका बेहतर पुनर्वास हो.

मुख्यमंत्री के 'एक भी झुग्गी नहीं टूटेगी' वाले वाक्य पर लोगों का भरोसा नहीं बचा है. वे इस वादे को कई बार दोहरा चुकी हैं, फिर भी झुग्गी-बस्तियों पर बुलडोज़र चलते रहे हैं. (फोटो: सुनील कुमार)

‘विकास बड़े लोगों का हो रहा है, झुग्गी वालों का विनाश हो रहा है.’
– चंदा देवी, इंदिरा कॉलोनी

दिल्ली में झुग्गी-बस्तियों का मुद्दा हमेशा से सभी राजनीतिक पार्टियों के घोषणा-पत्रों का अहम हिस्सा रहा है. प्रधानमंत्री जहां झुग्गी, वहां मकान’ का वादा हर चुनाव में करते आए हैं. लेकिन फरवरी में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद झुग्गी-बस्तियों को तोड़ने की कार्रवाई तेज़ हो गई.

इसके बावजूद दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता बार-बार कहती रही हैं कि दिल्ली में झुग्गियां नहीं तोड़ी जाएंगी. जब भी कोई झुग्गी तोड़ी जाती है, तो दिल्ली सरकार यह तर्क देती है कि ये तोड़फोड़ कोर्ट के आदेश के तहत हुई है.

सवाल यह उठता है कि कोर्ट में सरकार अपनी पुनर्वास नीति को मजबूती से क्यों नहीं रखती और झुग्गीवासियों को उसी के तहत पुनर्वास का प्रयास क्यों नहीं करती? उदाहरण के लिए, दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) की सूची में ‘जय हिंद कैंप‘ को डीडीए की ज़मीन पर स्थित बताया गया है, लेकिन कोर्ट ने उसे निजी ज़मीन मान लिया, जिससे सरकार की मंशा पर सवाल उठने लगे.

जेलरवाला बाग की बस्ती में डीयूएसआईबी की सूची के अनुसार 1,575 झुग्गियां थीं, जिनमें से 567 लोगों को ‘अपात्र’ घोषित कर पुनर्वास से वंचित कर दिया गया. इन 567 लोगों ने कोर्ट से स्टे लिया, लेकिन फिर भी कई झुग्गियां तोड़ दी गईं और इन लोगों को बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं देना सरकार ने बंद कर दिया.

पहले जब झुग्गियां प्लास्टिक की शीट और बांस-बल्ली से बनी होती थीं, तो उन्हें आग लगा दी जाती थी और राहत के नाम पर टेंट में रख दिया जाता था. एक माह बाद टेंट भी छीन लिया जाता था. अब कोर्ट से राहत मिलने पर भी लोगों को बिजली-पानी जैसी सुविधाओं से वंचित कर दिया जाता है, जिससे वे मजबूरी में वहां से पलायन कर जाएं. इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार की मंशा लोगों को सुविधाओं से वंचित करने का रहा है.

जेलरवाला बाग में कई महीनों से बिजली-पानी नहीं है, और जय हिंद कैंप के लोग भी एक महीने से अंधेरे में रहने को मजबूर हैं.

शहरी विकास मंत्रालय ने एक सवाल के जवाब में संसद में बताया कि दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने पिछले तीन वर्षों में पांच जगहों से 5,158 झुग्गियां तोड़ी हैं. दिल्ली सरकार की 2015 की पुनर्वास नीति के अनुसार, इनमें से 3,403 झुग्गियों को पुनर्वास मिला, जबकि लगभग एक तिहाई यानी 1,755 झुग्गीवासियों को ‘अपात्र’ मान लिया गया.

डीडीए के अलावा अन्य एजेंसियों द्वारा भी बस्तियां तोड़ी गईं, जैसे कि 60 साल पुरानी ‘मद्रासी कैंप’ की बस्ती जिसमें 370 झुग्गियां रेलवे की ज़मीन पर थीं, जिन्हें 1 जून 2025 को हाईकोर्ट के आदेश पर तोड़ दिया गया.

डीयूएसआईबी की सूची में मद्रासी कैंप में 353 झुग्गियां दर्ज हैं, और 189 झुग्गीवासियों को 40 किलोमीटर दूर नरेला में पुनर्वासित किया जाएगा. वज़ीरपुर की रेलवे लाइन किनारे, ओखला और यमुना किनारे की बस्तियां—क्या ये सभी वही पांच स्थान हैं जिनकी जानकारी संसद को दी गई?

जब झुग्गियां तोड़े जाने का विरोध बढ़ने लगा और 22 जुलाई 2025 को वामपंथी संगठनों के नेतृत्व में ‘इंदिरा कॉलोनी’ (जो डीयूएसआईबी की सूची में हरियाणा पावर हाउस के नाम से दर्ज है) के लोगों ने मुख्यमंत्री आवास पर प्रदर्शन किया. चार अगस्त को झुग्गी-बस्ती तोड़े जाने के खिलाफ दिल्ली विधानसभा पर कांग्रेस पार्टी ने भी प्रदर्शन किया.

इसके पहले 1 अगस्त को मुख्यमंत्री ने कहा कि दिल्ली में कोई भी झुग्गी-बस्ती नहीं तोड़ी जाएगी. उन्होंने रेलवे, डीडीए और अन्य एजेंसियों को निर्देश दिए कि किसी भी झुग्गी को न तोड़ा जाए. साथ ही 50,000 जर्जर फ्लैटों को दुरुस्त कर झुग्गीवासियों को देने की योजना की घोषणा की और ज़रूरत पड़ने पर नीति में बदलाव का आश्वासन भी दिया.

लेकिन मुख्यमंत्री के ‘एक भी झुग्गी नहीं टूटेगी’ वाले वाक्य पर लोगों का भरोसा नहीं बचा है. वे इस वादे को कई बार दोहरा चुकी हैं, फिर भी झुग्गी-बस्तियों पर बुलडोज़र चलते रहे हैं.

8 जून 2025 को शालीमार विधानसभा क्षेत्र के दौरे पर मुख्यमंत्री ने कहा, ‘झुग्गियां अदालत के आदेश पर तोड़ी जाती हैं, इसलिए सरकार का हस्तक्षेप संभव नहीं है.’ साथ ही कहा कि ‘बिना पक्के मकान दिए कोई भी झुग्गी नहीं तोड़ी जाएगी. तोड़फोड़ पर अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर सख्त कार्रवाई की जाएगी.’

इंदिरा कॉलोनी के निवासी

प्रमोद, जो भाजपा के पूर्वांचल मंडल अध्यक्ष भी हैं, मुख्यमंत्री के आश्वासन पर विश्वास नहीं करते.

वह बताते हैं कि मुख्यमंत्री और सांसद दोनों से मुलाकात की गई थी, और दोनों ने भरोसा दिलाया था कि बस्ती नहीं टूटेगी. लेकिन रेलवे की हलचल बढ़ने लगी थी; रेलवे फोर्स के लिए डीएसपी को पत्र भेजा, बीएसईएस को 26 जुलाई 2025 को ‘इंदिरा कैंप’ की बिजली काटने के लिए कह दिया गया. प्रमोद कहते हैं कि ‘मोदी की गारंटी एक ब्रांड बन चुकी है, जिस पर लोगों ने विश्वास किया. आज आश्चर्य होता है कि इतना बड़ा बयान देने के बाद भी बिना सर्वे के बस्ती तोड़ने का नोटिस आ गया. हम हाईकोर्ट गए हैं, जहां से हमें स्टे मिला है. अब हमें न रेखा गुप्ता पर भरोसा है, न किसी मंत्री पर.’

यह पूछे जाने पर कि क्या पूरी बस्ती कोर्ट गई है या कुछ लोग ही गए हैं, प्रमोद बताते हैं कि उनकी कॉलोनी की आरडब्लूए (रजिस्टर्ड) के तहत वे हाईकोर्ट में गए हैं.

चंदा देवी (50 वर्ष) पिछले 40 साल से इंदिरा कॉलोनी में रह रही हैं. उनकी बेटी और नाती-पोते भी इसी बस्ती में रहते हैं — यानी तीन पीढ़ियां एक ही बस्ती में बसी हैं. चंदा देवी पंजाबी बाग में घरों में सफाई का काम करती हैं और उनके पति ठेला चलाते हैं.

जब उनसे पूछा गया कि बस्ती में किस तरह के विकास की ज़रूरत है, तो वे कहती हैं, ‘जैसा है, वैसा ही रहने दो, बस इसको तोड़ो मत.’

उनके अनुसार, अगर बस्ती टूटती है, तो किराये पर रहना उनके लिए असंभव है— वे दो फ्लैटों की सफाई करके मुश्किल से 3,000 रुपये महीना कमाती हैं. चंदा देवी कहती हैं, ‘विकास बड़े लोगों के लिए हो रहा है, झुग्गी वालों का विनाश हो रहा है. झगड़ा नेता ही कराते हैं, दारू पिलाकर भेज देते हैं.’

2025 के मतदाता सूची के अनुसार इंदिरा कॉलोनी में 2,381 वोटर हैं. प्रमोद बताते हैं कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में यहां भाजपा को सबसे ज़्यादा 648 वोट मिले थे, आप पार्टी को 574 और कांग्रेस को 36 .

उन्नाव जिले के निवासी विकास वर्मा, जो दूरदर्शन में नौकरी करते हैं, भी इसी बस्ती में रहते हैं. उनसे जब बातचीत शुरू हुई, तो उनका पहला वाक्य था: ‘बस्ती में एक भी मुसलमान नहीं है!’

यह सुनकर आश्चर्य हुआ, और उनसे पूछा गया कि क्या मुस्लिम बस्ती होने पर बस्ती तोड़ दी जानी चाहिए? तब वे संभलते हुए बोले: ‘न्यूज़ वाले दिन-रात हिंदू-मुसलमान कर-करके दिमाग में भर देते हैं.’ वे आगे बताते हैं कि बस्ती में यूपी-बिहार के लोगों का अनुपात 45:55 का है, और 30–40 बच्चे दिल्ली विश्वविद्यालय में रेगुलर छात्र हैं, जबकि 4 छात्र यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं.

वह बताते हैं कि डीयूएसआईबी की सूची में 595 झुग्गियां दर्ज हैं, लेकिन बिजली के 844 मीटर लगे हैं. बस्ती में एक प्राइमरी स्कूल है, जिसमें 150 छात्र-छात्राएं और 8 अध्यापक हैं. साथ ही चार आंगनबाड़ी केंद्र हैं, जिनमें लगभग 200 बच्चों का नाम दर्ज है और 8–10 गर्भवती महिलाएं पंजीकृत हैं.

इंदिरा कॉलोनी में नालियां जाम है, क्या कोई सफाईकर्मी नहीं आता है?

इस पर प्रमोद कहते हैं दो सफाईकर्मी है लेकिन जब से नोटिस चिपका है वो साफ करने नहीं आते न ही कोई नेता उनसे पूछते हैं. इससे यह लगता है कि बस्ती टूटने का सबको पता है.

मुख्यमंत्री का आश्वासन- पुरानी बोतल में नई शराब

मुख्यमंत्री का बयान लोगों का गुस्सा ठंडा करने के लिए है, न कि उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए. मुख्यमंत्री नीति में बदलाव की बात करती हैं, लेकिन उन्हें यह याद रखना चाहिए कि दिल्ली पुनर्वास नीति 2015 कहती है कि किसी को पुनर्वास दिए बिना हटाया नहीं जाएगा.

इससे पहले कांग्रेस सरकार द्वारा 2011 में शुरू की गई ‘राजीव रत्न आवास योजना’ के तहत बने मकान आज खंडहर बन चुके हैं, नशाखोरी के अड्डे में तब्दील हो चुके हैं. उन्हीं जर्जर मकानों को ठीक कर देने की बात अब की जा रही है.

राजीव आवास योजना (RAY) का उद्देश्य था 2022 तक दिल्ली को झुग्गी मुक्त बनाकर सभी को आवास देना. इस नीति में इन-सीटू स्लम अपग्रेडेशन और इन-सीटू स्लम पुनर्विकास की योजना थी. इन-सीटू अपग्रेडेशन का मतलब था कि जहां बस्ती है, वहीं पर मूलभूत सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित की जाए.

इन-सीटू स्लम पुनर्विकास का तात्पर्य था कि बस्तियों को तोड़कर उसी स्थान पर या पांच किलोमीटर की परिधि में उनका पुनर्वास किया जाए.

राजीव आवास योजना कांग्रेस से जुड़ी थी, इसलिए केंद्र में सरकार बदलने के बाद उसे प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) में बदल दिया गया और लक्ष्य तय किया गया कि 2022 तक सभी को घर मिलेगा. प्रधानमंत्री लगातार इस लक्ष्य को दोहराते रहे हैं, लेकिन अब उस समयसीमा को बढ़ाकर दिसंबर 2025 कर दिया गया है.

लोगों को आश्वासन नहीं, कार्यान्वयन चाहिए.

(सुनील कुमार स्वतंत्र पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता हैं.)