चुनाव आयोग ने हाल ही में एक ऐसा बयान दिया जिसे सुनकर विज्ञान भी शर्मा जाए और गणित भी आत्महत्या कर ले. उन्होंने कहा— अगर हमें 1 लाख मतदान केंद्रों की सीसीटीवी फुटेज देखनी पड़े, तो इसमें 273 साल लगेंगे.
मतलब आज से शुरू करें, तो शायद 2298 में जाकर आखिरी क्लिप देखी जाएगी— अगर तब तक पृथ्वी बची रही. आयोग का जवाब मोदी सरकार के डिजिटल इंडिया और भारत की तकनिकी क्षमता का अपमान है.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने भी कहा था कि 10.5 लाख मतदान केंद्रों का डेटा प्रतिदिन 8 घंटे भी देखें तो एक करोड़ घंटे यानी 3,600 साल लग जाएंगे. पर क्या वाकई इतने साल लगेंगे? क्या देश अभी भी डायल-अप इंटरनेट के दौर में है? या बैलगाड़ी युग में?
दुनिया क्वांटम चिप के युग में है. गूगल ने हाल ही में ‘विलो’ (Willow) नामक क्वांटम चिप लॉन्च की है, जो ऐसा कार्य 5 मिनट में कर सकती है, जिसे पुराने सुपरकंप्यूटर को 10 से 25 साल लगते.
सच ये है कि भारत डेटा प्रोसेसिंग में एक वैश्विक शक्ति है. आधार के पास 1.3 अरब भारतीयों का बायोमेट्रिक डेटा (10–15 पेटाबाइट) है. हर मिनट लाखों सत्यापन होते हैं.
रिलायंस जियो के 49 करोड़ ग्राहक हर महीने 14,700 पेटाबाइट (पीबी) और जियो हर मिनट 10 पेटाबाइट डेटा (कॉल, इंटरनेट, स्ट्रीमिंग) प्रोसेस करता है. फ्लिपकार्ट भी करोड़ों ऑर्डर मिनटों में प्रोसेस करता है. एक पेटाबाइट में 20 लाख घंटे की एचडी (HD) फिल्में स्टोर होती हैं. सिर्फ 1 सेकेंड में 1000 से ज्यादा एचडी फिल्में डाउनलोड होती हैं.
बेंगलुरु के 800+ ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स में 2.2 लाख टेक विशेषज्ञ गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन जैसी ग्लोबल कंपनियों के सैकड़ों पेटाबाइट यानी अरबों-खरबों डेटा प्रोसेस करते हैं. एक लाख मतदान केंद्रों के सीसीटीवी फुटेज के कुल 1–2 पेटाबाइट डेटा की प्रोसेंगिग में 273 घंटे भी नहीं लगेंगे.
फिर चुनाव आयोग ने ऐसा क्यों कहा?
दरअसल, 8 अगस्त को राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा किया कि कर्नाटक के बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र में 1,00,250 वोटों की ‘चोरी’ हुई. 11,965 डुप्लीकेट वोटर, और 40,009 फर्जी और अवैध पते वाले वोटर मिले, 10,452 बल्क वोटर, 4,132 अवैध फोटो वाले वोटर थे. 33,692 फॉर्म 6 का दुरुपयोग करने वाले वोटर थे.
उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा में सिर्फ 25 सीटों की बढ़त से देश के प्रधानमंत्री हैं और भाजपा ने जब एक सीट पर ही एक लाख से ज्यादा वोट चुराए हों तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्या हुआ होगा.
राहुल गांधी ने चुनाव आयोग से 5 सवाल पूछे –
- विपक्ष को डिजिटल वोटर लिस्ट क्यों नहीं मिल रही?
- सीसीटीवी और वीडियो सबूत मिटाए जा रहे हैं?
- फर्जी वोटिंग और वोटर लिस्ट में गड़बड़ी की गई – क्यों?
- विपक्षी नेताओं को धमकाया क्यों जा रहा है?
- क्या चुनाव आयोग अब भाजपा का एजेंट बन चुका है?
निर्वाचन आयोग ने राहुल के दावों को ‘भ्रामक’ और आरोपों को ‘पुरानी स्क्रिप्ट’ बताया. डिजिटल मतदाता सूची मांगने पर कहा कि कांग्रेस की ऐसी ही याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में खारिज कर दिया था.
सीसीटीवी फुटेज मांगने पर कहा कि पीड़ित उम्मीदवार 45 दिनों के भीतर हाईकोर्ट में चुनाव याचिका (ईपी) दायर करे तभी फुटेज सुरक्षित रखी जाती है; अन्यथा नहीं. मतदाताओं की गोपनीयता का उल्लंघन हो सकता है.
संवैधानिक हक और कानूनी जिम्मेदारी
निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव, सभी दलों को मतदाता सूची और जरूरी डेटा देना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है. अनुच्छेद 19(1)(a) विपक्ष और नागरिकों को लोकतंत्र के लिए जरूरी जानकारी मांगने का हक देता है. सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में मतदाताओं के जानकारी के हक को मान्यता दी. लेकिन चुनाव आयोग पर उठे सवालों के बचाव में भाजपा खुद आगे आ गई.
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क्या दबाव में है चुनाव आयोग?
संविधान ने चुनाव आयोग को लोकतंत्र का स्वतंत्र प्रहरी बनाया था. लेकिन बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण का डेटा छिपाना, 65 लाख नाम कटने पर चुप्पी, और दो आयुक्तों के इस्तीफे (अशोक लवासा–2020, अरुण गोयल–2024) इस पर सवाल खड़े करते हैं.
सुप्रीम कोर्ट में डेटा देने से बचते रहे आयोग को 15 फरवरी 2024 को झटका लगा, जब 15 फरवरी 2024 को इलेक्टोरल बॉन्ड योजना असंवैधानिक ठहराई गई.
कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के चुनाव आयोग मतदाता सूची और पोलिंग संबंधी डेटा की ऑनलाइन जानकारी देते हैं. हालांकि कनाडा अब भी अमेरिका की तरह ईवीएम की बजाय मतपत्रों के जरिये चुनाव करवाता है. एस्टोनिया में मतदाता डेटा और वोटिंग रिकॉर्ड ब्लॉकचेन पर होते हैं.
भारत संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की बिग डेटा कमेटी का सदस्य है. कई देशों को डिजिटल गवर्नेंस में मदद देता है. अमेरिका, यूरोप और एशिया के कई देशों का डेटा भारत में प्रोसेस होता है.
लेकिन याद रखें, चंडीगढ़ मेयर चुनाव की धांधली सीसीटीवी में कैद हुई थी. क्या इसीलिए आयोग फुटेज देने से कतरा रहा है और 273 बरसों का बेबुनियाद आंकड़ा सामने रख रहा है?
(लेखक ऑब्जर्वर ग्लोबल मीडिया ग्रुप के प्रधान संपादक, वरिष्ठ पत्रकार, रणनीतिकार, अनेक पुस्तकों के लेखक और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के सदस्य थॉट लीडर हैं)
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